श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १६५
सुनो। काया वाचा और मन से जो कुछ किया जाता है वह कर्म है और सूक्ष्म स्फूर्ति का भान है वह कर्म का मूल
है। मन, वाणी अथवा देह में कर्म का बीज न उत्पन्न होना ऐसा जो 'अकर्म' है वह देहाभिमान वाले में कभी नहीं
होगा। जो सभी दृष्टियों से कर्म से अलग है जिसे कर्म का स्पर्श नहीं हो पाता, जो कर्मठ के योग्य नहीं है वही
यथार्थ में 'अकर्म' है ऐसा समझो। विधिनिषेध की चिन्ता किये बिना जहाँ विशेष कर्म बढ़ता है उसे 'विकर्म'
कहते हैं। यह अत्यन्त संकट में डालने वाली चीज है। सर्वसाधारण कर्म जब विकृत होकर उसमें बड़े-बड़े
विधिनिषेध उत्पन्न हो जाते हैं तो उसे 'विकर्म' कहते हैं। जो विधि के अनुसार नहीं होते वे 'निषेध' की ओर
मुड़ते हैं यह तो स्पष्ट ही है। जिसका आचरण करते समय त्रुटि होती है अथवा बाधा आती है अथवा जिसमें
आकुलता उत्पन्न होती है वह कर्म भी वास्तव में 'निषिद्ध' ही है। ऐसे विकारयुक्त कर्म का 'विकर्म' के रूप में
स्वरूप दिखलाया। इस प्रकार कर्माकर्म के विभाग तुम्हें स्पष्टरूप से दिखलाये। जीव की उत्पत्ति ही पहले
अविद्या के कारण होने से उसके कर्म भी अविद्यात्मक ही होते हैं। अब श्रीधरस्वामी ने किये हुए व्याख्यान की
विशेषता बताता हूँ, सुनो। 'जीव' परम अविद्यायुक्त है। नित्यक्रिया यही उसका 'कर्म', नित्यकर्म न करना यह
'अकर्म' और निषिद्ध कर्म 'विकर्म' है। ऐसे भेदयुक्त कर्माकर्मविकर्म की त्रिपुटी जब सृष्टि में बढ़ती रहती है
तभी गुणदोष बुद्धि के गर्भ में भेददृष्टि भी प्रबल होती है। जिसके कारण गुणदोषों में ही दृष्टि रह जाती है और
विधि निषेधजन्य गाँठें पड़ जाती हैं, वहाँ अभेद में भेद कैसे उत्पन्न होता है ? तो उसके बारे में भी सुनो। पुरुष एक
अकेला ही होता है लेकिन जब वह मनोरथ की महापूजा पर बैठता है तब वह ध्येय, ध्याता और ध्यान के बहाने
भेद का पागलपन शुरू करता है। वहाँ वह नाना प्रकार के उपचार, पूजा साहित्य आदि के बारे में सोचता रहता है।
इस प्रकार वह अकेलेपन में भी मनस्वी भेद बढ़ाता है। 'ध्येय' को उत्तम कहता है और जो ध्याता है उसे 'नीच'
मानता है इसलिये ध्यान गौण हो जाता है और गुणदोषों की वृद्धि करता है। ध्यान में विचित्र प्रकार के गुणदोष हैं,
ध्येय को वह 'परम पवित्र' कहता है और आचरण पवित्र नहीं है इसलिये वह स्वयं अपवित्र हो जाता है। इस
प्रकार ध्यान की दृष्टि से वह स्वयं ही अपने आप में गुणदोषों की त्रिपुटी और भेददृष्टि बनता है। वास्तव में स्वयं
ही ध्येय, ध्याता और ध्यान होते हुए उसे छोड़कर गुणदोषों का स्वरूप अवश्य ही बढ़ाता जाता है। उद्धव ! यह
सारी सृष्टि भेददृष्टि के कारण बढ़ी हुई है और उस भेद के कारण ही कर्म की त्रिपुटी बढ़ गयी है। भेद के प्रति
अनुराग जैसे-जैसे बढ़ता है, जैसे-जैसे विषय का प्रेम बढ़ता जाता है या इन्द्रियों का लाड़-प्यार किया जाता है
वैसे-वैसे यह संसार बढ़ता ही जाता है। साँप को अमृत पिलाया जाय तो जैसे उसका विष ही बनता है, उसी
प्रकार इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने से दुःख बढ़ता जाता है।
तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥
इसलिये बुद्धिमान पुरुष को इन्द्रियों के द्वार में विषय का प्रवेश ही नहीं होने देना चाहिये। जिस प्रकार विष
में पकायी हुई खीर को मुँह में डाले बिना फेंक देना चाहिये अथवा रस से भरे अमृत फल पर यदि सर्प ने अपना
विष फैला दिया हो तो उसे कौवे भी नहीं खाते क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा करने में उन्हें खतरा है, उसी प्रकार
विषयों का सेवन करते समय मुमुक्षुओं को भला अच्छा कैसे लगेगा ? रात-दिन, पग-पग पर उसमें आत्मघात के
चिह्न उन्हें दिखायी पड़ते हैं। जिन्हें उसमें आत्मघात नहीं दिखायी देता, ऐसे ही लोग विषयों का सेवन करते हैं।
जिस प्रकार उल्लू भरी दोपहरी को भी आधी रात समझता है, उसी प्रकार विषय सेवन से मुमुक्षु की अवस्था
होती है। क्योंकि उससे जन्म-मरण का भोग तो नहीं ही टलता, उल्टे उसका आत्मपतन अवश्य होता है। यदि