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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 869 में से

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पृष्ठ 185

सातवाँ अध्याय १६९
आत्मज्ञान का उपदेश किया। उसे सुनकर उद्धव की ज्ञानक्षुधा और भी बढ़ गयी। इससे मालूम होता है कि श्रीकृष्ण
का यह ज्ञानयुक्त भाषण कितना अपूर्व था। श्रीकृष्ण ने स्वमुख से अपना हृद्गत सुनाया, वह निरूपण नितांत मधुर
था जिससे मन में सुनने की इच्छा बढ़ी, जिससे भगवान की मर्यादा का भी विचार नहीं रह गया। उद्धव का हृदय
प्रेम से भर आया, उसने भगवान को साक्षात दण्डवत किया और फिर वह उनसे पूछने लगा।
उद्धव उवाच
योगेश योगविन्यास योगात्मन्योगसम्भव।
निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षण ॥ १४॥
उद्धव ने कहा, हे योगियों के योगिराज! तुम श्रीपति योगियों की निधि हो। तुम योग की साक्षात मूर्ति हो
तथा योग से ही तुम प्रकट होते हो। समस्त योगों की उत्पत्ति तुमसे ही है। मुझे मोक्ष लाभ हो इसलिये तुमने मुझे
त्याग का और संन्यास का लक्षण बताया। लेकिन यह त्याग अत्यन्त दारुण और कठिन है।
त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।
सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मतिः ॥ १५ ॥
इस त्याग की रीति देखी जाय तो हे श्रीकृष्ण! वह मुझे भी कठिन लगती है। फिर दूसरों की क्या गति
होगी? हे श्रीकृष्ण! जिनके चित्त में काम है, जिनकी बुद्धि विषयों के प्रति आसक्त हो गयी है उनसे यह त्याग
कभी भी सम्भव नहीं है। जब तक तुम्हारी कृपा नहीं होती तब तक अभक्तों के द्वारा यह त्याग कैसे सम्भव
होगा? भगवान ने जो त्याग बतलाया है वह सबके लिये सम्भव नहीं है। कैसा चमत्कार है! तुम साक्षात सबके
हृदय में रहते हो लेकिन उसमें उनका चित्त प्रवेश नहीं करता और विषयों में फँस जाता है। इस प्रकार प्रपंच में
आसक्त होने के कारण अभक्त तुमसे विमुख हो जाते हैं, उनसे त्याग नहीं हो सकता क्योंकि उनका चित्त सदैव
दूषित हुआ रहता है। "हे श्रीकृष्ण! त्याग क्यों नहीं होता?" तो सुनो, उसका कारण भी बताता हूँ। त्याग करने
में क्या कठिनाई है यह भी तुम्हें बताता हूँ।
सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढस्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।
तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाऽहं संसाधयामि भगवन्ननुशाधि भृत्यम् ॥ १६॥
तुम्हारी माया विचित्र व्याधि है। वह शरीर में आत्मबुद्धि उत्पन्न करती है और शरीर के सम्बन्ध में जो कुछ
है वह सब आत्मीय है ऐसा आभास कराती है। इस प्रकार विपरीत भावना बढ़ गयी है। 'मैं' और 'मेरा' यही
विचार छा जाने के कारण बुद्धि विचारशून्य होकर घर गृहस्थी पर विशेष आसक्ति हो जाती है, जिससे त्याग
कठिन हो जाता है। वह बुद्धि निर्मल हो सके, अनायास आत्मस्वरूप का आकलन हो जाए ऐसी कृपा भगवान
करें तभी दास तर सकता है। हे पुरुषोत्तम! हे श्रीकृष्ण! हे आत्माराम! मेरे जैसे तुम्हारे दासों को सांसारिक
यातनाओं से मुक्त करो। हे श्रीकृष्ण! तुम्हें छोड़ किसी दूसरे से पूछना मुझे अच्छा नहीं लगता क्योंकि विषयों ने
सबको ग्रस लिया है।
सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।
सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७॥
महादेव से पूछने जाओ तो वह सृष्टि की उत्पत्ति में व्यस्त हैं। रात-दिन प्रजा किस प्रकार उत्पन्न की जाय