सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

सातवाँ अध्याय १६७
है। भक्त का वचन निभाने के लिये मुझे नरसिंहावतार में सूखी लकड़ियों में प्रकट होना पड़ा, दुर्वासा को मैं पीठ
पर लाद कर ले गया था। यह तो तुमने देखा ही था। अब यदि तुम कहोगे कि भगवान जिसका आज्ञाधारी बन
गया, उसका कर्म तो किंकर हो ही जायगा, फिर ज्ञाता विषय के नाम पर सहज ही स्वेच्छाचार करते रहेंगे। ज्ञाता
स्वेच्छा से विषयाचरण नहीं करते, उसका कारण भी सुनो। जिसका अभिमान दग्ध हुए वस्त्र की तरह रहता है
उसका प्रपंच का ध्यान मिथ्या हो जाता है और उसे विषयों का दर्शन भी मिथ्या लगता है। जिसे प्रपंच की चाह
रहती है विषयों से प्रेम रहता है, मनचाहे आचरण के प्रति आसक्ति रहती है वही संसार बन्धन के संकट में
फँसता है। किन्तु ज्ञाता को विषय के प्रति सत्यनिष्ठा नहीं रहती, इसलिये वह विषय भोग में कैसे लब्ध होगा?
अब ज्ञाता के कर्म का मर्म बताता हूँ, सुनो। ज्ञाता मनोधर्म को स्पर्श किये बिना ही सारी क्रियाओं और सारे धर्मों
का आचरण करते रहते हैं।
दोषबुद्धयोभयातीतो निषेधान्न निवर्तते।
गुणबुद्धया च विहितं न करोति यथार्भकः ॥ ११॥
श्लोक ११—गुणदोषातीत ज्ञाता मनमाने ढंग से कभी आचरण नहीं करता लेकिन वह स्वभाव से भीरू भी
नहीं होता। वह विहित कर्म करता है, लेकिन यह मैंने अच्छा किया है ऐसा अहंभाव भी नहीं रखता। कुम्हार के
चाक की तरह वह भाग्य के अनुसार चलता रहता है। न तो वृत्ति में संकल्प न मन में हेतु स्फुरता है ऐस कर्म ज्ञाता
केवल शरीर धर्म से ही करता है। इसलिये सत्कर्म करने से सिद्धि प्राप्त हुई यह घमण्ड उसे छू नहीं पाता अथवा
कर्म बीच में ही रुक गया तो इसके लिये उसके मन में बेचैनी नहीं होती। जिस प्रकार सोये हुए पुरुष के पीछे बाघ
बैठ जाये या सामने स्वर्ग का भोग विलास आ जाय तो उसे न उसका भय लगता है न प्रीति उत्पन्न होती है। उसी
प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। गुण अथवा दोष का विचार न कर जिस प्रकार बच्चे सहज रूप में खेलते रहते
हैं, उसी प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। कर्मप्राप्ति अभिमान के कारण घटती है, वह अभिमान ही जब वे त्याग
देते हैं तो फिर उसके बिना वे कैसे विचरण करते हैं? कर्म तो उनके हाथ से होने वाला नहीं है। ऐसा विकल्प यदि
तुम मन में लाओगे तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह स्थिति दूसरों की समझ में आने लायक नहीं है, निरभिमानता यह
स्वानुभव है, दूसरों की समझ में वह कैसे आयेगा? भाग्य के अनुसार देह सहज रीति से सारी हलचल करता है
लेकिन अज्ञान के जोर से अभिमान की वृद्धि होती है और वह 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बातें करने लगता है। उस समय
गुरुवचनों के अनुसार ज्ञाताजन उचित अभ्यास के साथ अज्ञान के कारण उपजे अभिमान को समाप्त कर देते हैं।
उस समय शेष प्रारब्ध के अनुसार, निरभिमान से उनका देह आचरण करता रहता है अर्थात् ज्ञानसम्पन्न लोगों के सारे
कार्य केवल शरीर धर्म से ही होते रहते हैं। उन्हें 'अहेतुक' कहते हैं। बालक की उपमा देकर इस स्थिति का वर्णन
बताया। कृष्ण ने उद्धव से कहा, "अब निरभिमान के लक्षण बताता हूँ सुनो।" तब उद्धव मन ही मन आनन्दित
हुआ और ध्यान देकर सुनने लगा।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चयः।
पश्यन्मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥
पहले शास्त्रश्रवण से ज्ञान उत्पन्न होता है, तदुपरान्त उस ज्ञान के अनुभव से 'विज्ञान' प्राप्त होता है, ऐसे
ज्ञानविज्ञान से सम्पन्न होने पर वह निरभिमान होता है। इस प्रकार सचमुच की निरभिमानता हाथ आने पर उसमें
'शान्ति' का उल्लास उत्पन्न होता है। जबर्दस्ती चित्त को निश्चल करने का प्रयत्न करना अथवा दाँत पीसकर