श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १६३
कुल वैशापनिर्दग्धमङ्क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।
समुद्रःसप्तमेऽन्ह्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति ॥ ३ ॥
अब हमारा कुल शापाग्नि से दग्ध होकर रह गया है। वह भी परस्पर कलह से नष्ट हो जाएगा। मैंने समुद्र
से जमीन माँग कर द्वारिका बसायी। मेरे निजधाम जाते ही वह उसे सातवें दिन डुबो देगा।
यह्र्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयंनष्टमंगलः।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृतः ॥४॥
हे उद्धव! तुम्हें हित की बात बताता हूँ, सुनो। मेरे इस संसार को छोड़ कर जाते ही धीरे-धीरे लोगों की
बुद्धि का विनाश होगा। चारों ओर अधर्म मच जायगा, लोकनाशक होगा अमंगल। उस अमंगलता का कारण
बताता हूँ, सुनो। जब तक मैं इस सृष्टि में विचर रहा हूँ तब तक कली को आँख खोल कर देखने का साहस नहीं
है लेकिन मेरे जाते ही वह खड़बड़ा कर उठ बैठेगा। बाली का दुर्धर प्राबल्य होते ही ब्राह्मण अपना स्वधर्म त्याग
देंगे, दानधर्म में किसी को श्रद्धा नहीं होगी क्रियाकर्म के नाम पर केवल ढोंग ही दिखायी देगा।
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।
जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ॥५॥
मेरे पृथ्वी छोड़ते ही कलि अत्यन्त प्रबल होकर ताण्डव मचायेगा। इसलिये इससे पहले कि कलि पृथ्वी
का स्पर्श करे तब तक तुम यहाँ से जाने की तैयारी कर लो। जब कलि का संचार प्रारम्भ होगा तब लोगों में
अधर्म बढ़ेगा, कुविद्या फैलेगी और निन्दा का प्रसार होगा। एक कौड़ी का भी लाभ नहीं होगा लेकिन निन्दा के
पर्वत उभरेंगे ऐसी खराब बस्ती है, कलियुग की। इसलिये तुम क्षण भर के लिये भी यहाँ न रहो।
त्वं तु सर्व परित्यज्य स्नेह स्वजनबन्धुषु ।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग्विचरस्व गाम् ॥ ६ ॥
इसलिये हे उद्धव! अपने कल्याण के लिये तुम भी यहाँ से अकेले चले जाओ। धन, धान्य, समृद्धि त्याग दो,
जो भी कोई इष्ट, मित्र आदि हों उन्हें छोड़ो, भाई, बहन, स्त्री, बच्चे आदि किसी की भी आशा न करो। घर गृहस्थी
में आशा रख कर यदि तुम केवल शरीर से हे बाहर निकलोगे तो वह त्याग बहुत कठिन और अनर्थकारी होगा।
पहले स्नेह को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिये, फिर अभिमान का त्याग करना चाहिये, तदुपरान्त वासनारूपी
जटाओं का मुंडन करना चाहिये और तब आश्रम के बाहर पैर रखना चाहिये। अब यह स्नेह कैसे छूटेगा ? अभिमान
को दण्ड कैसे मिलेगा ? यदि तुम्हें इसमें कठिनाई मालूम होती हो तो उसका भी उपाय बताता हूँ। मेरा जो सर्वव्यापी
स्वरूप है उसमें ही चित्त को रखकर निश्चयपूर्वक और सावधानी से उस आत्मस्वरूप में ही निरन्तर रहना चाहिये।
उस व्यापक स्वरूप में निश्चयपूर्वक अवधारणा करने से उस निजभाव के कारण चित्त तन्मय होकर उसे तद्रूपता
प्राप्त होती है। भृंगी भारी होती है और कीट मूर्ख होता है, फिर भी दृढ़ ध्यान के कारण वह तद्रूप होती है। सारांश
यही कि अभ्यास करने से कुछ भी कठिन नहीं है। वह गूढ़ अभ्यास मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया। मेरा
स्वरूप तो ज्ञानधन ही है और ध्यान करने वाला जीव भी संज्ञान है। इसलिये इस प्रकार ध्यान करने से वह भी तद्रूप
हो जाता है। वहाँ सारी समदृष्टि होने के कारण चित्त को समाधान प्राप्त होता है, उस समभाव को ही बढ़ा कर
यथास्थिति रहना चाहिये। पहले गृहस्थाश्रम को छोड़ें और फिर मैं कहाँ रहूँ यह विचार मन में आना स्वाभाविक है,