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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 869 में से

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पृष्ठ 188

१७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वृद्धावस्था की ओर चक्कर लगा रहा है। वार्धक्य तो केवल जाल है लेकिन उसके भी पीछे काल लगा हुआ है।
जीवन इस प्रकार बड़ी शीघ्रता से व्यर्थ जा रहा है यह बात संसार की समझ में नहीं आती। हर क्षण काल व्यर्थ हो
रहा है, परमार्थ का तो कोई काम नहीं होता इसलिये जन्म-मरण के भँवर का अनर्थ सामने दिखायी देता है। स्वर्ग,
नरक, कर्म और ब्रह्म ये चारों बातें मनुष्यत्व के कारण ही प्राप्त होती हैं इसलिये पापकर्म को छोड़ मोक्षधर्म को ही
स्वीकार करना चाहिये। हाय! मोक्ष के लायक यह नरदेह व्यर्थ ही नष्ट हो रहा है। यह बात उसे शल्य की तरह
चुभती रहती है इसलिये वह विषय-व्यापार की बात भूल जाता है। प्रत्यक्ष अनित्य के लक्षण से ही संसार
नाशवान मालूम होता है इसलिये वह उसमें आसक्त नहीं होता, मृत्युलोक के भोगों के प्रति वह विरक्त हो जाता
है। इसी प्रकार परलोक के विवेक का प्रकाश देता हूँ और उस विवेक से उसके मन में आत्मबोध जगता है।
जिसमें जैसा भाव रहता है उसके लिये मैं वैसा ही देवता बन जाता हूँ इसमें जरा भी सन्देह न करना। देखो,
उद्धव! इसके लिये केवल बुद्धि का निर्मल होना ही आवश्यक है, तभी आत्मबोध तत्काल सफल होता है।
पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम् ॥ २१॥
इस प्रकार जो वैराग्य से पूर्ण तथा विवेक से युक्त धैर्यवान पुरुष है, वही सांख्य का और योग का विचार
करता है, उसके अंतःकरण में तत्काल आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिन नरदेहों में विवेक रहता है, उन्हें
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। जो सर्वशक्तिमान तत्त्व है वही उन्हें धीरे-धीरे दृष्टिगोचर होने लगता है। जिससे
सारी शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, वह सब शक्ति को शक्ति प्रदान करने वाला है, लेकिन जो सारी शक्तियों की भी
समझ में नहीं आता ऐसे स्वरूप को वे देखते हैं। हे उद्धव! तुम्हें क्या-क्या बताऊँ? इस संसार में मैंने अनेक
प्रकार के शरीरों का निर्माण किया लेकिन सुख का अनुमान लगाकर, वह भी नश्वर ही है, उसमें भी पतन है यह
जानकर मन को उसका भी स्पर्श नहीं होने देता। कब भगवान की कृपा होगी? संसारबन्धन कब टूटेगा? जिससे
परमानन्द प्राप्त होता है, वह आत्मबोध कब प्राप्त होगा? हे श्रीहरि! दौड़ कर आओ इस दीन पर दया करो, हे
भक्तप्रेमी श्रीकृष्ण इस संसार सागर से मेरा उद्धार करो। इस प्रकार जैसे जल के बिना मछली छटपटाती है, उसी
प्रकार वह आत्मज्ञान के लिये छटपटाता रहता है, भक्तिप्रेम की लहरें मन में उठती रहती हैं इसलिये वह अपने
शरीर को भी नहीं सँभाल पाता। कोई अजाने की नरदेह से वंचित हो गये, किसी ने नास्तिकता के कारण उसकी
उपेक्षा की, किसी को ज्ञान के अहंकार ने ग्रस लिया तो कोई विषय के ही भुलावे में आ गया। कोई साधन के
अभिमान से ठगा गया, कोई आज करूँगा, कल करूँगा कहते-कहते मर गया, कोई बहक कर गलत रास्ते पर
चले गये। मन को विवेक की बात समझ में आती है लेकिन विषयवासना नहीं छूटती इसलिये वह संतप्त होकर
नारायण का चिन्तन करता है। कृष्ण उद्धव से कहते हैं-जिसमें विवेक के साथ वैराग्य उत्पन्न होता है, वही
स्वयं अपना गुरु बनता है-यह ध्यान में रखो। उसकी बुद्धि को मैं ही मुझे नरदेह ही विशेष रूप से अच्छा
लगता था क्योंकि वह देह धारण करने वाला तत्काल मद्रूप हो सकता है।
एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः।
बह्वः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषीप्रिया ॥ २२॥
मैंने कुछ शरीर एक पैर के बनाये, दो पैर के तो अनेक बनाये, कुछ तीन पैरों के बने, वे तो बड़े मजेदार
दिखायी देते हैं, चतुष्पाद प्राणी तो बहुत सुन्दर दिखायी देते हैं। सर्पादि प्राणियों को तो मैंने पैर ही नहीं दिये,