सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

सातवाँ अध्याय १७९
समभाव होता है। हे राजा ! अब तुम्हें पृथ्वी की अद्भुत शान्ति के बारे में बताता हूँ, सुनो। वही शान्ति साधु-सन्तों
ने धारण करने के कारण वे भगवद्भक्ति के लिए पात्र हुए। पृथ्वी पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसे जलायें अथवा
उस पर हल चलायें, या लातों से उसे मारे, लेकिन पृथ्वी उस अपराध का विचार न कर उलटे उन पर प्रसन्न ही
होती है और वही अनेक प्रकार की फसलें उगाकर प्राणिमात्र को तृप्त कर देती है। इस प्रकार की निजात्म-शान्ति
के लिये मैंने पृथ्वी को गुरु बनाया। हे भाग्यशाली राजा। इस शान्ति की अभिनव स्थिति के बारे में सुन लो। सुनो!
किसी ने दूसरे का अपराध किया और दूसरे ने उसे चुपचाप सहन कर लिया, अर्थात् उसकी उपेक्षा की, लेकिन
इतने से ही उसे शान्त कैसे कह सकते हैं ? ईंख को तोड़ने से वह मीठा लगता है, जिस शस्त्र से उसे तोड़ते हैं उसे
भी मीठा बना देता है और उसे पेरने से या पकाने से भी वह उपकार करने वालों को उत्कृष्ट स्वाद ही देता है।
इस प्रकार दूसरे का अपराध सहन कर उसका हित करना यही निर्द्वन्द्व शान्ति है। दूसरे का अपराध सहन कर उस
पर उपकार करना यह गुण मैंने पृथ्वी पर स्थित परोपकारी पर्वत से सीखा।
शश्वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकांतसम्भवः।
साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वी पर उत्पन्न पर्वतों को भी मैंने गुरु बनाया और उनसे मैंने जो सीखा वह भी सुनो। रत्न आदि मूल्यवान
वस्तु जिन्हें पर्वत अपने में संग्रह करके रखता है वह केवल परोपकार के ही लिये रहता है। घास, पानी आदि
अन्य पदार्थ भी वह केवल परोपकार के ही लिये रखता है। वह न किसी को बुलाता है न किसी को आने से
मना करता है और न किसी से ऊब कर उसे बाहर जाने के लिये कहता है। याचक की जो भी इच्छा रहती है
उसे वह परोपकार बुद्धि से पूरी करता है। ग्रीष्मऋतु समाप्त होते ही उस पर की घास तथा अनाज समाप्त हो
जाता है लेकिन पर्वत किसी को देने से पीछे नहीं हटता इसलिये ईश्वर भी तत्काल मेघवृष्टि कर उसे समृद्ध कर
देता है। दाता जिस उल्लास से देने लगता है, उसी उत्साह से जगन्नाथ उसकी आपूर्ति करता रहता है। मन में यदि
कोई विकल्प न रखें तो अच्युत भगवान अखण्ड देने वाला है। लेकिन शंकालु लोगों की समझ में यह बात नहीं
आती कि सच्चा दाता ईश्वर ही है। इसीलिये उन्हें दारिद्र्य भोगना पड़ता है। इस प्रकार पर्वत की उत्पत्ति केवल
परोपकार के लिये है। परोपकार के अतिरिक्त कोई अन्य कल्पना ही उसके मन में नहीं आती। साधक में सचमुच
पर्वत की जैसी उदारता चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सर्वस्व देते समय भी प्रसन्नता होनी चाहिये। हमेशा
कोई भी कार्य करते समय सब पर उपकार करते रहना चाहिये। करोड़ों प्रकार के लाभों पर लात मार कर भी
परोपकार के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिये। परमार्थ की सच्ची इच्छा रखने वाला साधक सामने दिखाई देने
वाला स्वार्थ छोड़ कर परोपकार के लिये कठिन से कठिन संकट में भी कूद पड़ता है। मूर्त्तिमंत उपकार जन्म ले
ले अथवा साक्षात परोपकार ही साकार हो जाय इस प्रकार यह उपकारी बनकर रहता है। देखो ! जिस प्रकार ईंख
अपने माधुर्य से सब पर उपकार करता है उसी प्रकार योगी भी संसार में रहकर अपने समधुर व्यवहार से
परोपकार करता रहता है। जिस प्रकार पर्वत में से पानी के सोते निकलते रहते हैं उसी प्रकार उसमें से परोपकार
के सोते निरन्तर बहते रहते हैं। वे सूखने का नाम ही नहीं लेते। उसने जगत को इतना उपकारबद्ध किया रहता
है। कंजूसी की संगत छोड़ कर पर्वत एकान्त में उपकार करता रहता है अथवा धैर्यवृत्ति का निश्चय कर वह
उपकार की साक्षात मूर्ति ही बन जाता है। अब वृक्ष से क्या सीखने लायक है यह बताता हूँ। सर्वांग से, सर्वोपरी,
सर्वकाल एवं सर्वत्र सबकी पराधीनता में ही रहना चाहिये यह मैंने वृक्ष से सीखा। जिसने वृक्ष को लगाया है,
उसके ही अधीन वह रहता हो यह बात नहीं है बल्कि जो उसे काटने के लिये तैयार होता है उसके भी वह