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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 869 में से

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पृष्ठ 196

१८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधीन रहता है। उसी प्रकार योगी को पालकी में बिठाया जाय तो वह उसके अधीन होता है अथवा कोई यदि
सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाय तो वह उसकी भी आज्ञा में चलता रहता है। देह का अहंकार छोड़ देने के
कारण योगी को पराधीनता प्राप्त हुई रहती है। विश्व सभी दृष्टियों से मेरी आत्मा ही है वह समझ कर वह
सबके कहने के अनुसार चलता है। जो कुछ है वह सब मैं ही हूँ यह सोच कर वह साधक-बाधक का विचार न
कर, उसकी आज्ञा में संतोषपूर्वक रहता है। सुख या दुःख जो भी प्राप्त होगा वह भाग्य के अधीन रहता है, सब
लोग मेरी ही आत्मा है यह मान कर वह पराधीन होकर आचरण करता रहता है। सबमें मेरी आत्मा है यह जान
लेने पर उसे सहज ही पराधीनता प्राप्त होती है। यह 'परात्मता' मैंने वृक्ष से सीखी। वृक्ष से मैंने एक और गुण
सीखा है। वह गुण है अतिथि की पूजा करना। वृक्ष के पास यदि कोई अतिथि आता है तो वह उसे खाली हाथ
नहीं लौटाता। पान, फूल, फल, जड़, छाया, छाल, लकड़ी, कुछ न कुछ वह उसे देता ही है। जो वृक्ष का पालन
करता है या जो उसे काटता है, उन दोनों को ही वह समान रूप से पुष्पों से और फलों से सन्तुष्ट करता है। जिस
प्रकार वृक्ष अपना पूरा शरीर अतिथि पर खर्च कर सार्थकता प्राप्त करता है, उसी प्रकार साधु भी अपना चित्त,
वित्त, देह और शब्द सब कुछ अतिथि को अर्पण कर उसे सन्तुष्ट करता है। अतिथि को निराश न करना यही
साधु का अलौकिक गुण होता है। वह उसे अन्न, द्रव्य, जल आदि बड़े आनन्द से देता रहता है। याचक द्वार पर
आता है तो भले ही उसे अपना सर्वस्व देना पड़े लेकिन उसे खाली हाथ नहीं जाने देना है, यह विचार मैंने
आत्मबुद्धि से वृक्ष के पास सीखा। इस प्रकार पृथ्वी मेरी गुरु बनी। अब दूसरा गुरु वायु बना, उससे जो-जो
सीखने की इच्छा हुई वह भी सुनो, राजा ! वायु को गुरु पद प्राप्त हुआ वह दो प्रकार से। एक तो प्राणवायु के
द्वारा और दूसरा बाह्य वायु के द्वारा।
प्राणवृत्त्यैव संतुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥ ३९ ॥
जो प्राण की ही तरह विषय की आसक्ति नहीं रखता या विषय सेवन करने के बाद भी जिसे अहंकार, नहीं
उत्पन्न होता, उसी प्रकार उसे अहंकार नहीं होता। प्राणों की हलचल से क्षुधा उत्पन्न होती है, उसके कारण प्राण
क्षुब्ध होता है, उससे काया, वाचा, मन और इन्द्रिय भी विगलित होते हैं। उस प्राण की रक्षामात्र के लिये कैसा भी
आहार क्यों न मिले, वह मधुर है या नहीं इसका भी प्राण विचार नहीं करता। उसी प्रकार योगी देह का अभिमान
नहीं करता, वह विषय सेवन करता है लेकिन उसमें उसे आसक्ति नहीं होती। भूख लगने पर पकवान मिले या
भूसा मिले, इसकी वह चिन्ता नहीं करता। ज्ञानधारणा कहीं ढल न जाये, इन्द्रियाँ विकल न हों इसलिये वह बहुत
सम्भल कर तथा धैर्यपूर्वक आहार करता है। प्राण के ही कारण इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, प्राण के ही योग से देह
चलता है, लेकिन प्राणकर्म में देह लिप्त नहीं होता। वह अलिप्त होकर ही चलता रहता है। उस प्राण की ही तरह
योगी की स्थिति रहती है। सब कुछ करने पर भी उसकी किसी में आसक्ति नहीं रहती। इसलिये उसे देहस्थिति
का स्पर्श नहीं होता। ब्रह्मादिकों का देह सुन्दर है इसलिये उसका पालन किया जाय और सुअर आदि के देह से
परहेज किया जाय ऐसी अस्पृश्यता प्राण दयालु तथा समदृष्टि होने के कारण नहीं करता। उसी प्रकार योगी का
मन, यह कर्म उच्च है और यह कर्म नीच है ऐसी भावना नहीं रखता। राजा के शरीर का प्रेम से संपादन किया जाय
और भिखारी का देह छोड़ दिया जाय ऐसी कुंठा प्राण कभी नहीं करता। उसका समभाव सदा शुद्ध ही रहता है।
प्राण, अपान, समान, उदान अथवा अणु-रेणु में बसे व्यान इतने नाम और उसके इतने स्थान होते हुए भी प्राण
अपना एकत्व नहीं छोड़ता। उसी प्रकार ऊँच-नीच वर्णावर्ण देख अथवा उत्तम अधम आदि गुणावगुण देखकर