श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
अध्याय २५ से ३१: ऐल-गीता, भिक्षु-गीता, यदुवंश उपसंहार व एकनाथी भागवत फलश्रुति
पच्चीसवाँ अध्याय ६८५
अवस्थाओं के गुण उसमें होने के कारण ही उसे तुरीय कहते हैं। परब्रह्म में इन सभी अवस्थाओं का आभास
होता है और इस प्रकार भासमान होने वाली अवस्था तत्काल नष्ट हो जाती है। किन्तु उस भास के विनाश के
कारण परब्रह्म नष्ट नहीं हो जाता। वह तुरीय भी शेष रहता है। तुरीय यह अवस्था त्रिकाल निरन्तर रहने वाली
है। अब गुणवृद्धि के कारण कर्म की जैसी गति होती है उसका वर्णन श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
उपर्युपरि गच्छन्ति सत्वेन ब्राह्मणा जनाः।
तमसाधोऽध आमुख्याँद् रजसान्तरचारिणः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणजन ही मुख्यतः सत्वगुण के आश्रय स्थान हैं। ऐसे जो ब्राह्मण ब्रह्मार्पण न करने पर भी स्वधर्माचरण
करते हैं, उन्हें स्वधर्म की कर्मशक्ति से ही ऊर्ध्वलोक में जाने को मिलता है। अब उन ब्राह्मणों को अलग-अलग
लोग कैसे प्राप्त होते हैं, वह भी सुनो। जो सात्त्विक ब्राह्मण होते हैं, वे स्वर्गलोक और महर्लोक को पार कर
जनलोक में पहुँचते हैं और बाद में तपोलोक का भी उल्लंघन कर सत्यलोक पहुँचते हैं। रजोगुण बढ़ने पर जीव
को शूद्रादिक चांडाल जाति प्राप्त होती है और वह बार-बार जन्म, मृत्यु के भोग भोगता ही रहता है। तमोगुण
बढ़ने पर पश्वादि योनि में जन्म लेकर मच्छर, मक्खी, पेड़, पत्थर आदि योनि भोगनी पड़ती हैं। प्राणी के
अंतकाल में देह में जो गुण बढ़ता है, उस मृत्यु का क्या फल है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
सत्वे प्रलीनः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥
संसार में तीन गुण प्रमुख हैं। उसमें जिसे सत्वगुण बढ़कर मृत्यु आती है, वह स्वर्ग का सुख भोगने के
लिये दिव्य देह प्राप्त करता है। इस प्रकार सात्विक पुरुष सत्वगुण के ही प्राबल्य में मृत्यु पाने पर स्वर्गलोक जाते
हैं। रजोगुण में मृत्यु पाने पर उन्हें मनुष्यलोक प्राप्त होता है और अन्त में काल में तमोगुण की अधिकता होकर
मृत्यु होने पर, वे अत्यन्त दुःखदायी और महाभयंकर नरक भोगते हैं। प्रेम से मेरी भक्ति करने पर भक्तों के हृदय
में, अंत समय में मेरी आत्मतेज से दीप्त मूर्ति प्रकट होती है। शंख, चक्र, गदा आदि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र धारण
किये पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण का ध्यान कर जो मरण प्राप्त करता है, वह वैकुण्ठ में मत्स्वरूप हो जाता है। समस्त
प्राणिमात्र में मैं ही आत्मा के रूप में परिपूर्ण विद्यमान हूँ। इस प्रकार जिनका भजन अखण्ड चलता रहता है, वे
जीवित अवस्था में ही तीनों गुणों को जीत कर निर्गुण पद को प्राप्त करते हैं। यदि दैवयोग से उन्हें मरण आ जाय
तो मेरे सिवाय उन्हें कोई स्थान नहीं है। निजानंद से परिपूर्ण होने के कारण वे स्वयं ही निर्गुण स्वरूप हो जाते
हैं। मेरा निर्गुण स्वरूप, अथवा वैकुण्ठ में मेरा सगुण स्वरूप ये दोनों सचमुच एक ही हैं। जो कोई स्वर्ग, नरक,
मृत्युलोक अथवा शुद्ध निर्गुण स्वरूपं प्राप्त करते हैं, उनके साधनों का चमत्कार श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
मदर्पणं निष्फलं वा सात्विकं निज कर्म तत्।
राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायदि तामसम्॥ २३॥
सारी क्रियाओं तथा कर्म आदि का आचरण बिना संकल्प लिये करने से, वह स्वयं ही ब्रह्मार्पण हो जाता
है। यही शुद्ध सत्त्व से निर्गुणस्वरूप का साधन है। वही सभी वर्णाश्रम धर्म का आचरण करता है लेकिन उसके
फलों की इच्छा नहीं करता। उसमें मेरी भक्ति का प्रेम ही रहता है। मेरा भजन करना यही स्वधर्म है। इसी का
नाम है, अपना कर्त्तव्य। यह रहस्य जो जानता है उसके ही कर्म को 'सात्त्विक कर्म' कहते हैं। जो अपने धर्म के
६८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनुसार आचरण कर, इन्द्रादि देवताओं को यज्ञयाग कर सन्तुष्ट करता है और उससे ऐहिक और पारलौकिक
फलों की इच्छा करता है, उसका यह कर्म 'राजस' है। जिस कर्म में प्रत्यक्ष हिंसा घटती है अथवा जारणमारणादि
प्रयोग करना आवश्यक रहता है और कर्म का स्वरूप ही घृणित मालूम होता है वह कर्म स्पष्ट ही तामस है।
जिस कर्म में ढोंग ही दिखाई देता है, जिसमें साधुओं के प्रति ईर्ष्या की जाती है, जिसमें दूसरों की पर्याप्त निन्दा
की जाती है, वह कर्म तामस है। अब तीन गुण और निर्गुण इन चार प्रकारों का लक्षण श्रीकृष्ण आगे के श्लोक
में स्वयं बताते हैं।
कैवल्यं सात्विक ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।
प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणस्मृतम् ॥ २४॥
देह में रहते हुए हम देह से भिन्न हैं, समस्त प्राणिमात्र में भगवान परमात्मा के रूप में अंतर्बाह्य व्याप्त है,
यह ज्ञान सचमुच सात्विक है। भिन्न जाति, भिन्न आकार, भिन्न नाम, भिन्न क्रिया इन सबमें ब्रह्म को अभिन्न
स्वरूप समझना, यह ज्ञान सचमुच ही सात्विक है। वेदशास्त्र पठन कर, आत्मज्ञान का विचार करते समय जो
विकल्प के कारण सन्देह करता है, उसके वे विकल्प पूरी तरह राजस हैं। वार्तिक का अध्ययन करने पर भी
जिसके चित्त में अद्वैत का निश्चय नहीं हो पाता, अपने ही तर्क से उसमें विकल्प खोजता है, यह उसका ज्ञान
राजस है। वेदशास्त्र श्रवण करने पर भी जो शिश्नोदर परायण होता है, इन्द्रियों की संतुष्टि के प्रति ही जिसकी
चाह रहती है, वह पूर्णरूप से राजस है। मन का कोई निश्चय न हो और अनेक विकल्प उत्पन्न होते हों, यह
रजोगुण की ज्ञानवृत्ति है। अब तमोगुण के बारे में सुनो। ज्ञान की जितनी भी स्फूर्ति होती है उसे महामोह ग्रस
लेता है। मैं जड़-अंध हूँ यही सच मानता है। क्षणभंगुर पदार्थों पर आसक्ति धरता है। उसका वह ज्ञान सचमुच
ही तामस है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन यही पशुतुल्य ज्ञान सचमुच तामस है, इसे ध्यान में रखो। अब निर्गुण
के बारे में सुनो। उद्धव! कार्य, कर्त्ता और कारण यह त्रिकुटी तीन गुणों को शून्य कर चैतन्यस्वरूप में रहती है,
वह निर्गुण ज्ञान है। सत्व के उल्हास से सर्वेन्द्रियों में जो ज्ञान प्रकट होता है, उसे वह व्यर्थ समझता है क्योंकि
वह कहता है कि ज्ञानरूप में मैं अनादि हूँ। समुद्र के पानी से ही नदियाँ बहती हैं। वे नदियाँ समुद्र में आकर
मिलती हैं, लेकिन इससे समुद्र इतराता नहीं है। उसी प्रकार ज्ञान की स्फूर्ति होने से उसे उसका महत्त्व नहीं
मालूम होता। रजोगुण के कारण यदि उसके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो भी वह उसे क्षुब्ध नहीं कर सकती।
वह कहता है कि मेरे कारण ही काम्य कर्म चलता है, किन्तु अन्त में मैं स्वयं निष्काम ही हूँ। जिस प्रकार सूर्य
को ग्रीष्म ऋतु की बाधा नहीं होती उसी प्रकार काम्य कर्म का विधि होते समय उस कर्म में मेरा सम्बन्ध नहीं
होता। किन्तु मेरे ही कारण काम सवेग और सोज्वल होता है। तमोगुण बढ़ने पर महामोह का घेरा जकड़ लेता
है। लेकिन उस मोह की परवाह न कर वह मोह का सच्चा स्वरूप अच्छी तरह जानता रहता है। जहाँ सूर्य नहीं
दिखायी देता, वहाँ अन्धकार छा जाता है, उसी प्रकार स्वरूप निष्ठा के कारण मोह का संकट कभी बाधक नहीं
होता। तीनों गुण भले ही शरीर पर क्यों न गिर पड़ें लेकिन वह अपना सन्तुलन नहीं खोता। उद्धव! वही सचमुच
निर्गुण की आत्मनिष्ठा है, इसे ध्यान में रखो। अज्ञान के प्रसंग में जो ज्ञान की इच्छा नहीं करता, अथवा विषयों में
प्रवृत्त होकर निष्कामता की इच्छा नहीं करता अथवा मोह की झड़ी लगने पर भी जिसके ज्ञान में कोई परिवर्तन
नहीं होता, ऐसा मेरा भक्त मेरी श्रद्धा के कारण त्रिगुण में ही निर्गुणत्व से रहता है। तीन गुणों का तीन प्रकार से
रहना और निर्गुणत्व से रहना, इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण करते हैं।
पच्चीसवाँ अध्याय ६८७
वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।
तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५॥
पवित्र तीर्थस्थल, एकान्त निर्जन वन, ऐसे स्थानों में रहने में जिसका मन प्रफुल्लित होता है, उसका वह
रहना वास्तव में सात्विक है। सार्वजनिक व्यवहार अथवा व्यापार में स्थल में निवास करना अथवा सम्मानपूर्वक
राजदरबार में रहना, अथवा विवाह-मण्डप में विचरना जिसे अच्छा लगता है, जिस धन, सम्पत्ति, चारों ओर
युवतियों का समूह जिसे अच्छा लगता है, जो सदा बड़े-बड़े शहरों और गाँवों में रहता है, उसका वह रहना
राजस है। जहाँ मन सम्मान की इच्छा करता है, जो मन विषयासक्त होकर सदा क्षुब्ध रहता है ऐसे लोग जहाँ
दिखायी पड़ें, समझ लो कि वे राजस हैं। जहाँ साधु की निंदा होती है, जहाँ सदा दूसरों के गुणदोष देखने की
प्रवृत्ति रहती है, ऐसे स्थान पर रहना जिसे अच्छा लगता है वह स्थान तामस है इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
जहाँ कलह का मूल हो, जहाँ मन अविचार करेगा, जहाँ वेश्या, द्यूत और शराब का अड्डा होगा, वह तामस के
रहने का स्थान है और हे उद्धव! देवालय की मेरी रमणीय मूर्ति को देखकर जिसकी चित्तवृत्ति को आनन्द होता
है, वही निर्गुण की बस्ती है। अभेदभाव के भक्त का जो घर है, वही मुझ निर्गुण का वसतिस्थान है। जहाँ सुख
से चित्तवृत्ति स्थिर होती है, वही वास्तव में निर्गुण की बस्ती है। किन्तु निर्गुण का घरबार है, यह बात ही
बिलकुल व्यर्थ है क्योंकि जहाँ ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है, वही निर्गुण की बस्ती है। देखो ! उद्धव ! विषय से दूर
और केवल आनंद में सन्तुष्ट रहने की वृत्ति, वही निर्गुण की बस्ती है। आकार को भूलकर जो निराकार में सुखी
रहता है, वहीं जिसकी वृत्ति पूर्णरूप से स्थिर होती है, फिर वहाँ लोग हों या न हों, उसे निर्गुण की बस्ती समझना
चाहिये। तीन गुणों के संबंधों के कारण कर्त्ता भी तीन प्रकार के होते हैं और निर्गुण लक्षण का कर्त्ता चौथा है।
उन चारों कर्त्ताओं की व्यवस्था बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकःकारकोऽसङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः॥ २६॥
काँटे से ही काँटा निकाल देने से जिस प्रकार दुःख कम होता है, उसी प्रकार संग से ही संग का नाश
करने से सात्त्विक कर्त्ता अलिप्त हो जाता है। जो सात्विक कर्त्ता होता है वह सद्गुरुचरणों की संगति से, विरक्ति
के योग से सभी संग नष्ट कर देता है और विषयों की संगति में होते हुए भी निःसंग रहता है। मन में
फलाभिलाषा होने के कारण विवेक की दृष्टि अन्धी हो जाती है और इस प्रकार राजस कर्ता फल की आशा में
बँध कर अत्यन्त भयंकर, करोड़ों दुःख भोगता रहता है। विचारज्ञान का पूर्णरूप से विलय हो जाता है; स्मृति वन
में भटकती रहती है; कार्य क्या है और कारण क्या है इसकी याद ही नहीं रहती, ऐसा पुरुष तामस कर्त्ता होता है।
अनन्यभाव से जो श्रीहरि की शरण में जाता है और कर्म का चल केवल नारायण है यह समझ कर जो कर्म का
अभिमान नहीं करता, वही सचमुच निर्गुण कर्त्ता है। इन तीन गुणों की श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है और
निर्गुण की श्रद्धा शुद्ध होती है। इसी बात को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्म श्रद्धा तु राजसी।
तामस्यधर्मे या श्रद्धामत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७॥
देह, इंद्रिय, चेतना और प्राण आदि से जो 'मैं पन' का भास होता है, उसका पूरी तरह विचार कर हमारा
'मैं पन' हम स्वयं देखते हैं। वह कहता है, देह जड़-मूढ़ होने के कारण वह देह तो मैं नहीं हूँ; इन्द्रिय एकदेशी
६८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, प्राण चपल होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ और मन चंचल होने के कारण
वह तो मैं हूँ ही नहीं। चित्त चिन्ता करता है, इसलिये वह भी मैं नहीं हूँ, जिसका धर्म है बोध का होना, तो वह
बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, अहं बाधक होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, तो फिर 'मैं' नाम से जो भी कुछ है, वह
अनादिसिद्ध है। इस प्रकार जो बुद्धि से चतुर रहता है वह 'मैंपन' का सार क्या है, इसका विचार कर सकता है।
यही श्रेष्ठ अध्यात्मश्रद्धा है। सात्विक लोग इसी श्रद्धा को पास में रखते हैं और जो 'मैं' नहीं कहता रहता है, वह
सचमुच वही रहता है; इसलिये मेरे 'मैंपन' के चरण पकड़ने से, चारों ओर मैं ही मैं रह जाता हूँ। यही शुद्ध
अध्यात्म श्रद्धा है। वह सदा सात्विक के पास रहती है। अब हे बुद्धिमते! राजस की श्रद्धा कैसी होती है, वह भी
सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार रहने वाला एक मैं हूँ, आश्रमधर्म का आचरण करने वाला एक मैं हूँ, कर्म करने वाला
एक मैं ही हूँ, यही भावना मन में दृढ़ करना और इसी हेतु से कर्म का आडम्बर फैलाना; दर्भ, मृत्तिका आदि
साहित्य बड़ी आस्था से एकत्र करना; शुचिता का महत्त्व इतना अधिक बढ़ाना कि उसके चारों ओर विधि निषेधों
का चक्र सदा घूमता रहता है। दोष दृष्टि के आँगन में गुणदोषों की तो ढेर सारी राशियाँ पड़ी रहती हैं। पवित्रता
के अभिमान के साथ शुचिता के मामले में वह ब्रह्मदेव को भी तुच्छ मानता है। उद्धव! देहाभिमान को कंधे पर
बिठाकर कर्मबाधा को ही सत्य मानना। यही राजस श्रद्धा है, उद्धव! अविचार जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, हाथ से
अकर्म घटता है और अधर्म का लाभ होता है, यह श्रद्धा तामस को अच्छी लगती है। जिसमें स्वैराचार, अपेय का
पान तथा मनचाहा अभक्ष्य भक्षण होता है, अथवा अगम्यागमन की घटना होती है, तो वह सारी श्रद्धा तामसी है।
अधर्म को ही धर्म मानना, यही तामसी श्रद्धा का प्रमुख रहस्य है। अब जो सबसे उत्तम निर्गुण श्रद्धा है, उसके
बारे में सुनो। समस्त प्राणिमात्र में परमेश्वर ही भरा हुआ है, ऐसी श्रद्धा से जो एकनिष्ठा से प्राणिमात्र का ही
निर्गुण है। पत्नी, बच्चे, धन दौलत तथा प्राण भी जो मुझ पर न्योछावर कर देते हैं और एकनिष्ठा से मेरा भजन
करते हैं, वह श्रद्धा सचमुच ही निर्गुण है। चारों पुरुषार्थ छोड़, चारों मुक्तियों को दूर कर जो ऐक्य भाव से मेरा
भजन करते हैं, वह श्रद्धासम्पत्ति निर्गुण है। उद्धव! निष्काम होकर नामस्मरण करना, निर्लोभ वृत्ति से हरिकीर्तन
करना, ऐसी भक्तिभावना से जो मेरा भजन करता है, वही निर्गुण श्रद्धा है। तीन गुणों का आहार भी तीन प्रकार
का है। उसे श्रीकृष्ण बताते हैं और साथ में निर्गुण आहार के बारे में भी बताते हैं जिसका विचार गहन है।
पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्विकं स्मृतम् ।
राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि ॥ २८ ॥
पवित्र होते हुए भी जो हलका हो, सत्ववृद्धि के लिये उपयुक्त और विशेष प्रयास न कर प्राप्त होने वाला
जो अन्न होता है वही सात्विक आहार है। अल्पाहार का ही नाम है पथ्य। पवित्र का अर्थ है धर्म से सम्पादित
किया हुआ और वह भी विशेष प्रयत्न के बिना मिला हुआ जो अन्न हो वही सात्त्विक आहार है। आम्ल, कतरा
या मधुर, तीखा, तला, मसालेदार, चटपटा या ऊष्ण, बार-बार भुना हुआ, एक रस में दूसरा रस मिलाकर, पन्हा,
कढ़ी या सारण, पापड़ आदि नमकीन सामग्री यह सब राजस आहार है। नाना प्रकार के प्रयास कर, कष्ट सह
कर राजस भोजन करते हैं। अब तामस का भोजन सुनो। खाना खाते समय जो मादक और दुर्गन्धियुक्त हो ऐसा
आहार वह मूर्ख करता है। अमंगल और दुःखदायी ऐसा जो आहार हो उसे तामस ही समझना चाहिये। भगवान्
का जूठा प्रसाद, साधु-सज्जनों की बची हुई पवित्र अन्न, यह निर्गुण का आहार तो प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार
श्लो में 'च' अक्षर से ही भगवान ने उच्चार करके बतलाया। हर ग्रास पर 'गोविंद', 'गोविंद' कहने से अन्न शुद्ध
होता है। यही प्रसिद्ध निर्गुण का आहार है। अन्न भी ब्रह्म, मैं भी ब्रह्म और पंगत में उपस्थित रहने वाला भी
पच्चीसवाँ अध्याय ६८९
ब्रह्मस्वरूप ही है। ऐसा जिसका भोजनानुक्रम रहता है, वह भी निर्गुण का ही श्रेष्ठ आहार है। तीन गुणों का सुख
भी तीन प्रकार का होता है और निर्गुण का सुख तो अलौकिक है। उस सुख का प्रकार भी यदुनायक श्रीकृष्ण
बताते हैं।
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तुराजसम्।
तामसं योहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥२९॥
विषयसुख की स्फूर्ति छोड़कर आत्मसुख से ही चित्तवृत्ति आनन्दित होती है, ऐसी जो आत्मसुख प्राप्ति है
वह सचमुच सात्त्विक है। गंगा में जब बाढ़ आती है तो जिस प्रकार नाले आदि पानी से भर जाते हैं, उसी प्रकार
आत्मसुख का लाभ होते ही उस आनन्द से इन्द्रियाँ भी तृप्त हो जाती हैं। नाना प्रकार के विषयों में रुचि, इन्द्रियों
की धमाचौकड़ी, विषयसुख प्रिय लगना, यह सच्चा राजस सुख है और, हे उद्धव! अत्यन्त निन्दनीय और मद
चढ़ने वाला जो सुख होता है, वही बुद्धि को प्रिय लगना यही तामस सुख की सिद्धि है। हृदय में मेरी मूर्ति प्रकट
होते ही, संसार की इच्छा समाप्त हो जाती है और उसके उपरान्त जिस सुख का लाभ होता है वह सचमुच निर्गुण
सुख है। सारे प्राणिमात्र में जो परमेश्वर रहता है वह मैं ही हूँ, यह तत्त्व जानकर, मेरे ऐक्य से जो सुख प्राप्त होता
है वही निर्गुण का सच्चा आत्मसौख्य है। आत्मस्वरूप के सुख का स्वरूप दिखाई पड़ने पर हम स्वयं भी
सुखस्वरूप हो जाते हैं। पाप और पुण्य झड़ जाने पर ही निर्गुण सुख का दीप हाथ लगता है। स्वयं सर्वांग से
सुखस्वरूप होने पर ही स्वयं उस आनन्द का उपभोग प्राप्त होता है। निर्गुण सुख का मार्ग भक्तों को ही अपने
अंतःकरण में भोगना चाहिये। कल्पांतजल प्रलय में जब पूरी तरह ज्वार आ जाता है तो वह नदी, नाले किसी को
नहीं छोड़ता। उसी प्रकार निर्गुण सुख भी देहेन्द्रियों को नहीं छोड़ता। जिस प्रकार मृगजल में जल नहीं होता,
उसी प्रकार परब्रह्म में प्रपंच का स्पर्श भी नहीं है। वह जो भी सुख भोगता है वही निर्गुण है। जिस सुख की कोई
मर्यादा नहीं होती, सदासर्वकाल सुख से सुखस्वरूप होकर रहा जा सकता है, वह सुख-सम्पदा निर्गुण की ही है।
इस प्रकार श्रीहरि के त्रिगुण और निर्गुण के भेद लक्षण बताये। अब ग्रन्थ के अन्त में उसका उपसंहार करते हैं।
द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः।
श्रद्धावस्थाऽऽकृतिनिष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एवहि॥ ३०॥
'द्रव्य' शब्द से तीन प्रकार का आहार, 'देश' शब्द से वन और ग्राम के बीच का भेद, 'फल' शब्द से सुख
का बोध, इस प्रकार सत्त्व से सम्बन्धित विभाग हैं। 'काल' शब्द से भगवद्भजन समझना चाहिये। 'कैवल्य
निष्ठा' का अर्थ है ज्ञान। कर्म का अर्थ है, मुझे अर्पण करना और कर्त्ता अलिप्त है, यह ध्यान में रखो। 'श्रद्धा'
का अर्थ अध्यात्मिकी श्रद्धा समझना चाहिये। 'अवस्था' शब्द से जागरणादिक समझना चाहिये। 'आकृति' से
ऊर्ध्व लोक के देवताओं के विलास समझने चाहिये। देह के अंत में जो गुण बढ़ता है, अथवा उद्धव! जिस गुण
से अंतःस्थिति होती है, उसे वास्तव में निष्ठा कहते हैं। इस प्रकार इसके भिन्न-भिन्न अनेक भाग हैं। उनमें से
एक-एक का वर्णन कैसे करूँ? मेरे भक्त के लिये सारा संसार ही त्रिगुणात्मक है। सारा संसार तीन गुणों से भरा
हुआ है। इसमें निर्गुण एक मैं हूँ। यह रहस्य तुम्हें बताने के लिये मैंने गुणों का निरूपण किया।
सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।
दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१॥
आप जो भी कुछ देखते हैं, सुनते हैं या जिसका चिन्तन करते हैं, वह सब माया के गुणों के कार्य से
६९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिगुणात्मक हुआ है, ऐसा समझना चाहिये। इन तीन गुणों को निर्मूल करने के लिये प्रकृति का नियंता जो पुरुष
है, वह प्रकृति से भिन्न है। वह सदा सर्वांग से निर्गुण रहकर अपनी सत्ता से ही गुणों को चलाता रहता है। उद्धव!
पुरुष के बिना प्रकृति का जो भी कार्य है, उसे मिथ्या समझना चाहिये। उसे त्रिगुणात्मक कहते हैं, यह याद रखो।
यहाँ नरदेह प्राप्त होते हुए भी जो गुणातीततां नहीं साधते वे लुट गये समझो और उनका स्वार्थ डूब गया। लेकिन
तुम्हारी बुद्धि वैसी नहीं है। तुमने भगवद्भक्ति को अंगीकार किया तभी तुमने गुणातीतता प्राप्त कर ली। उद्धव
हरिभक्तों में श्रेष्ठ था इसलिये श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव से कहा, हे पुरुषश्रेष्ठ! भाग्य से एक तुम ही श्रेष्ठ
हो। इन तीन गुणों के विस्तार से ही संसाररूपी वृक्ष खूब फला-फूला है। उसे छेदने का प्रकार श्रीकृष्ण बताते हैं।
एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः।
येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः।
भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२॥
इसमें सत्त्वादि तीनों गुण, शुद्ध हों अथवा मिश्रित हों, वे पुरुष को गुणकर्मों से बद्ध कर संसारी बनाते हैं।
घट का पानी जिस प्रकार सूर्य बिम्ब उसमें अटका हुआ दिखाता है, उसी प्रकार इन तीन गुणकर्मों के कारण जीव
को दृढ़ बन्धन प्राप्त हुआ है। गागर में मटमैला पानी भरा हुआ हो तो बिम्ब भी मटमैला ही दिखायी देता है,
अथवा यदि पानी हिल रहा हो तो बिम्ब भी हिलता हुआ-सा दिखायी देता है। उसी प्रकार तीन गुणों का जो
कर्माचरण है, वही शुद्ध ब्रह्म में जीवत्व लाता है। जीव का वह बन्धन तोड़ने के लिये भगवद्भजन साधना
चाहिये। गुणों के बंधन को जीतने के लिये सद्गुरु की शरण में जाएँ। मेरी ही भावना से सद्गुरु का भजन करने
से अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। पैर में लोहे की बेड़ी पड़ी हो तो जिस प्रकार लुहार उसे लोहे से ही
काटकर निकाल देता है, उसी प्रकार सत्त्वगुण की वृद्धि होने पर गुरुराज ही तीनों गुणों को तोड़ डालता है।
इसलिये यदि गुणातीत होना हो तो गुरुभक्ति अवश्य करें। गुरुभजन पर जो विश्वास करते हैं, चारों मुक्तियाँ उनकी
दासी बन जाती हैं। गुरु चरणों में जिसकी भगवद्भावना रहती है, उसकी सेवा में ब्रह्मभावना भी तत्पर रहती है
और हाँ! ब्रह्मभावना के साथ मैं देवाधिदेव भी अंतर्बाह्य उसकी बाट जोहता खड़ा रहता हूँ। जो अनन्यभाव से गुरु
की शरण में जाता है, तो वह सहज ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। गुरुरूप से मेरा भजन करने से मेरे भक्त को
ब्रह्मसुख प्राप्त होता है। उद्धव! मेरा भजन तुम अच्छी तरह जानते ही हो यह कहकर श्रीकृष्ण ने उसे 'सौम्य' इस
नाम से सम्बोधित किया। अत्यन्त भाग्य से मनुष्यदेह प्राप्त होने पर, आस्थापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये।
तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसन्त्वम्।
गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः ॥ ३३ ॥
जिस मनुष्य देह को प्राप्त करने के लिये देवता भी मन से उत्कंठित रहते हैं, वह प्राप्त होने पर अखण्ड
ज्ञान सम्पादन करना चाहिये। नरदेह प्राप्त हो गया इसलिये ब्रह्मज्ञान अपने आप ही नहीं प्राप्त हो जाता। इसलिये
देहाभिमान छोड़कर मेरा ही भजन करना चाहिये। मेरा अनन्यभाव से भजन करने से सत्त्वगुण सहज ही बढ़ जाता
है। उस सत्त्वगुण से ही विवेकयुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है। विवेकज्ञान से युक्त वृत्ति हो जाने पर रज और तम ये
दोनों अपने आप ही झड़ जाते हैं। शुद्ध सत्त्व की स्थिति में अभेदशक्ति बड़े उल्हास के साथ बढ़ती है। मेरा
अभेद भजन करने से आत्मानंद का आस्वाद प्राप्त होता है और इसी को विज्ञान कहते हैं। वहाँ तीनों ही गुण
मिथ्या है, ऐसा निश्चय होता है। नरदेह प्राप्त होने पर प्राणी को इतना लाभ होता है। इसलिये मनुष्य देह प्राप्त
पच्चीसवाँ अध्याय ६९१
होने पर सबको भक्ति अवश्य करनी चाहिये। भागवत का यही अत्यन्त गुप्त ज्ञान है। वह मुख्यरूप से भक्तिप्रधान
है। भक्तिभाव से मेरा भजन करने से स्त्रियों तथा शूद्रों का भी उद्धार होता है। इसलिये नरदेह प्राप्त होने पर ज्ञाता
लोग मेरी ही भक्ति करते हैं और मेरे भजन से ही गुणों को जीत कर स्वयं परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। पूर्ण
ब्रह्म की प्राप्ति के लिये मेरी निरपेक्ष भक्ति करें। भजन का वही प्रकार श्रीकृष्ण बार-बार लोकार्थ से दृढ़ कर
दिखलाते हैं।
निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।
रजस्तमश्चाभिजयेत् सत्वसंसेवया मुनिः॥ ३४ ॥
विषयों के प्रति विरक्ति रखें और अन्तःकरण में मुक्ति की इच्छा न रखें। इस प्रकार मेरी निरपेक्ष भक्ति
अधिक से अधिक प्रेमपूर्वक करें। इससे अपार प्रेमशुद्धि होती है और समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवद्भक्ति
बढ़ती जाती है। साधकों के लिये ही भजनसिद्धि है। इस प्रकार मेरा भजन करने से विस्मरण की ही मृत्यु हो
जाती है, और सभी इन्द्रियों में सजगता आ जाती है। उस समय रज और तम ये दोनों गुण पूरी तरह नष्ट हो जाते
हैं और उस योग से शुद्ध सत्व की स्फूर्ति से साधकों को पूर्ण आत्मानंद प्राप्त होता है। जब केवल शुद्ध सत्वगुण
शेष रहता है तो साधक को ऐसा स्फुरण होने लगता है कि संसार में एक मैं ही पावन और धन्य हूँ। मुझे शुद्ध
आत्मज्ञान प्राप्त हो गया, मुझमें परमानंद प्रकट हो गया यह सुख सत्व का बोध होने वाले सात्त्विकों को होता है।
लेकिन ऐसा जो सत्वगुण शेष रहता है
६९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को मरण आता ही नहीं है। इतने पर भी प्रारब्ध से आयु शेष होने पर उसे देहाभिमान की बाधा नहीं होती। वह
बाहर के दृश्य पदार्थ नहीं देखता। उसके अंतःकरण में विषय का स्फुरण नहीं होता, और वह देह का देहपन भी
नहीं देखता। यही जीवन्मुक्ति का लक्षण है। बाहर दृश्य सुख का अनुभव लेना और हृदय में विषयों की आसक्ति
रखना, यही है अज्ञान की स्थिति। यह अविद्या की शक्ति है तथा बाधक है। अविद्या का यह बन्धन तोड़ने के
लिये मेरा भजन करना चाहिये। इसीलिये साधु संतों ने भक्ति पर प्राण न्योछावर किये रहते हैं। मेरी भक्ति से
उत्तम कोई गति नहीं है और वह भजन अभेदभाव से करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं। हृदय में विषय
के प्रति विरक्ति हो और तिस पर अभेद भाव से मेरी भक्ति हो और वह भजन अनन्य भाव से किया हुआ हो तो
मैं श्रीकृष्ण उसका आज्ञाधारी हूँ। भक्ति शब्द का अर्थ इतना ही है कि मेरे स्वरूप पर अभेद भाव से श्रद्धा रखना।
इसी योग से परमार्थ का लाभ होता है। शास्त्रों की सफलता यही है। मेरे प्रति भक्ति के कारण मैं जब पशु-
पक्षियों का उद्धार करता हूँ तो मनुष्य यदि भक्तिभाव से मेरा भजन करते हैं तो उन्हें निजधाम तक पहुँचाना मेरा
काम है। इसलिये विद्वत्ता को एक ओर रखकर सभी को श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करनी चाहिये, जिससे अनायास
ही आत्मस्वरूप को लाभ होगा। श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करने से अपने आप ही तीनों गुणों का नाश होता है और
हमारा निर्गुणत्व स्वयमेव प्रकट हो आता है। श्रीकृष्ण ने ही यह तथ्य समझने के लिये कहा। जहाँ गुणों की
उलझन समाप्त होती है, वहाँ आत्मशान्ति प्रकट होती है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में उद्धव
से किया। जहाँ भक्ति होती है, वहाँ वृत्ति को गुणों पर विजय प्राप्त होती है और सहज आत्मशांति प्राप्त हो,
स्वयंसिद्ध आत्मस्वरूप प्राप्त होता है। वही आत्मभक्ति मेरी माँ है। जिस जनार्दन ने मुझे उस भक्ति तक पहुँचाया,
उस जनार्दन के चरणों के पास एकनाथ तल्लीन होकर भजन कर रहा है। अगले अध्याय में ऐल-उर्वशी
उपाख्यान की कथा नितांत मनोहारी है। उस अध्याय का पठन करने से अगम्यागमन के दोष भी समाप्त हो जाते
हैं। उसमें पुरूरवा की जिस विरक्ति का वर्णन श्रीकृष्ण अपने मुख से करेंगे उस विरक्ति के योग से निजात्म प्राप्ति
होती है। केवल भाग्यशाली लोग ही उस वैराग्य को प्राप्त कर सकते हैं। उस वैराग्य का निरूपण श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त रसीले ढंग से किया है। अतः श्रोतागण कृपया ध्यान देकर कथा सुनें। उस कथा पर ध्यान देने से
महापातक जैसे दोष भी जल जाते हैं, ब्रह्म में ही ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है और मनुष्य ज्ञानस्वरूप में रह
पाता है। उस निरूपण का माधुर्य उत्कृष्ट है। एकनाथ पर जनार्दन की असीम कृपा है। वह उसे परात्पर तीर के
पार पहुँचाएगा। भक्ति-भाव से जनार्दन के चरण पकड़ने से दुःख की बाधा नहीं हो सकती। एकनाथ जनार्दन की
शरण में है। आगे रस से पूर्ण निरूपण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
गुण निर्गुण निरूपण नाम पंचविंशतितमोऽध्यायः ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
हे देव जगन्मोहन ! मोहिनी की मोहकता के प्रमुख कारण ! तुम्हें नमस्कार है। कार्यकारणातीत तथा
ज्ञानस्वरूप, जगद्गुरु जनार्दन की जय हो। संसार पर माया की जो मोहरूपी छाया पड़ती है, उसे तुम
ज्ञानस्वरूप होने के कारण दूर करते हो। संसार में सब कुछ जगद्रूप से जनार्दन ही है। वह दीनों के प्रति
पूर्णरूप से कृपालु है। देवता ही माया स्त्री के रूप में उसके हावभाव और नेत्रकटाक्षों से मोहिनी डाल कर
दीन दुखियों को भुलावे में रखती है। लेकिन स्त्री के मोह जैसे मोहक सारे स्वरूप जनार्दन की कृपा से नष्ट
हो जाते हैं। जहाँ परिपूर्ण वैराग्य की वृद्धि होती है, वहाँ जनार्दन की पूर्ण कृपा समझनी चाहिये। जहाँ वैराग्य
होता है, वहाँ ब्रह्मज्ञान सहज ही होता है। जीव मूलतयः ब्रह्म ही है लेकिन वह माया के गुणों से जीवत्व
पालता है। जिस प्रकार पलंग पर सोया हुआ राजा स्वप्न में स्वयं को भिकारी के रूप में देखता है किन्तु
उसके सेवक उसे राजसिंहासन पर बैठने के लिये जगाते हैं, उसी प्रकार वैराग्य जब त्रिगुणों का नाश करता
है, उस समय जीव स्वयंसिद्ध ही ब्रह्म है। इस प्रकार स्वयंभू ही परब्रह्म प्राप्त होने पर स्त्री और पुरुष यह
ज्ञान मिथ्या हो जाता है और भोग्य और भोक्तापन शेष नहीं रहता। अस्तु ! साधक के पास देवता की माया
स्त्री के रूप में भुलावा देने आती है। उस समय भक्तिपूर्वक गुरुराया का स्मरण करने से उस स्त्री की पीड़ा
समाप्त हो जाती है। सद्गुरु का केवल एक ही नाम बड़े-बड़े दोषों की बाधा को दूर करता है और लौकिक
वैराग्य उत्पन्न करता है, जिससे साधकों को अत्यन्त सुख होता है। सचमुच, हमें अबाध रूप से सुख देने
वाला एक सद्गुरु ही है। उसके चरणों पर मस्तक रखने से साधकों को सुखलाभ होता है। संत वास्तव में
साधकों की सच्ची माता है और शान्ति आत्मसुख की छाया है। जनार्दन के कृपालु चरणों के प्रसाद से यही
कथा यथार्थ रीति से चल रही है। निर्गुण हाथ लगने पर साधक सुखसम्पन्न होते हैं, इसलिये मेरा भजन
करना चाहिये ऐसा श्रीकृष्ण ने पचीसवें अध्याय में कहा था। भक्तिभाव से भगवद्भजन करने से भगवान स्त्री
के रूप में बाधा डालते हैं। उस विघ्न का निवारण करने के लिये मेरा नामस्मरण करना चाहिये। अच्युत नाम
से स्मरण करने से वे अपने प्रभाव से ही कर्माकर्म का नाश करते हैं और समस्त पातकों को भस्म कर
डालते हैं। हरि के नाम में इतना अधिक सामर्थ्य है। नाम से ही मनुष्य निर्मल होता है, नाम से ही चित्त
निर्मल होता है, नाम से ही गुणातीतता प्राप्त होती है और नाम से ही संसारपाश टूटते हैं। नाम से ही, चित्त
आसक्त होने पर संसारभय का प्रवेश नहीं होता। इस प्रकार जहाँ नाम पर विश्वास रहता है, वहाँ भगवान
प्रसन्न है, ऐसा समझना चाहिये। दुष्ट की संगत से यदि विषयासक्त पुरुष विषय में ही पूरी तरह रममाण हो
गया हो, तो उसे पश्चात्ताप होते ही वह आधे क्षण में ही विरक्त हो जाता है। बड़े-बड़े दोषों के लिये सच्चा
पश्चात्ताप यही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। अनुताप हुए बिना प्रायश्चित्त करना केवल उपहास है। लोगों के
लिये संसार में पश्चात्ताप जैसा मित्र नहीं है। एक बार पश्चात्ताप हो जाय तो वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। पश्चात्ताप होते ही वह क्षणार्ध में विरक्त कर छोड़ता है। इसी अर्थ का 'ऐलगीत' श्रीकृष्ण उद्धव
को सुना रहे हैं। यहाँ इस छब्बीसवें अध्याय में जिसका चित्त विषयासक्त से उसे विरक्त होने के लिये यह
'ऐलगीत' की प्रस्तावना है।
६९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थितः ।
आनंदंपरमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम् ॥ १ ॥
ब्रह्म को पूरी तरह जानना यही इस नरदेह का प्रमुख कर्तव्य है। वह यह मानव शरीर तीनों लोकों में पवित्र
है। इस मनुष्य देह को पा कर अधर्म करने से परब्रह्म हाथ नहीं लगता। इसलिये जो परम पावन भागवत धर्म है,
उसका आचरण करना चाहिये। भागवत धर्म के अनुसार भक्ति करने से चित्तवृत्ति निर्मल होती है और जीव ही
ब्रह्म है यह ज्ञान निश्चयपूर्वक मन में अंकित हो जाता है। ब्रह्मस्फूर्ति मन में अंकित होते ही, उससे साधक
परमानन्द में लीन हो जाते हैं। यही मेरी सच्ची प्राप्ति है। मेरी प्राप्ति होने का लक्षण है, प्रत्यक्ष देह में होते हुए भी
विषय का बिलकुल स्मरण न होना। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥
जो मूल अज्ञान की खान है, जो संसार प्रवाह की पंक्ति है, जो तीन गुणों की माँ है, वह अनादि मायारानी
है। अरे देखो! इस मायागुणों के योग से सोलह कलाओं युक्त (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और
मन को मिलाकर कुल सोलह) वासनात्मक लिंगदेह, वही जीव से चिपक कर बैठ जाता है। जिस लिंगदोह के
कारण ही वह जीव नानाप्रकार के सुख-दुःख भोगता है, स्वर्ग-नरक के भवँरे में फँसता है और मिथ्या जन्म-
मरण के फेरों को सहता है, वह संसार जीव के लिये बाँझ के बच्चे के गृहस्थाश्रम जैसा है। देहाभिमान ने उसे
अपार तथा असीम बढ़ाया है। परन्तु गुरुपदेश के कारण ज्ञान का अनुभव आने पर माया का अभाव होता है,
लिंगदेह मिथ्या लगने लगता है और जीव का जीवत्व भी मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही
अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त होती है, उसी प्रकार गुरुपदेश से ज्ञानप्राप्ति होने पर माया का स्वरूप धुँधला पड़ने
लगता है। इस प्रकार गुणों का विकार नष्ट होने पर पुरुष जीवन्मुक्त होता है। जिस प्रकार कुम्हार का पहिया पूर्व
प्राप्त गति से घूमता रहता है, उसी प्रकार पूर्वप्रारब्ध की बची हुई वृत्ति से ज्ञाता भी अपने देह में विचरण करते
रहते हैं। लेकिन इस प्रकार देह में विचरण करते हुए भी उन्हें देह का अभिमान नहीं होता। जिस प्रकार यदि कोई
अपनी छाया को कष्ट दे अथवा उसकी पूजा करे तो किसी को उसमें रुचि नहीं होती, उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देह के विचरण में कोई रुचि नहीं होती। वह भले ही देह के ही भाग्य से विषयों में लिप्त हो, लेकिन उसकी
वृत्ति उस विकार के साथ मलिन नहीं होती। उसके लिये विषयों का दर्शन पूर्णतया मिथ्या रहता है। मृगजल पीने
से किसी के हाथ गीले नहीं होते। यदि आकाशकमल के मकरंद और सुवास का सेवन भ्रमर करेगा तभी ज्ञाता के
शरीर को विषय का स्पर्श होगा। अस्तु। मुक्तों की स्थिति अतर्क्य है। किन्तु श्रीकृष्ण मुमुक्षुओं को आत्मप्राप्ति के
लिये उससे सम्बन्धित नियम बता रहे हैं।
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित् ।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत् ॥ ३ ॥
कामविषय भोग तथा उदरभरण इसी में आसक्त होकर, स्वधर्म का त्याग कर अधर्म में मग्न रहने वाले जो
छब्बीसवाँ अध्याय ६९५
विषयासक्त होते हैं, उन्हें सचमुच असाधु ही समझो। ऐसे जो भी असाधु हों, उनके साथ कभी भी काया, वाचा,
मन के साथ संगत नहीं करनी चाहिये। आवारा मवेशियों के संगत में यदि कोई अच्छी गौ चली जाय तो उस
संगत से उसके गले में जीवनभर के लिये मोटा लक्कड़ पड़ जाता है। इस प्रकार दुर्जनों की क्षणभर की संगत से
भी अनर्थ हो जाता है। मुमुक्षुओं को ऐसे स्थान पर क्षणभर के लिये भी नहीं जाना चाहिये। लोहार की भट्टी से
कोई भी सहज ही झुलस सकता है, उसी प्रकार दुर्जनों की संगत भावुक लोगों को भ्रम में डालती है। गलती से
भी यदि असाधु की संगति हो जाय तो विषयासक्ति बढ़ती है जिससे विवेक स्फूर्ति को नष्ट करने वाले अधर्म की
प्रीति होती है। विवेकवृत्ति का अस्त होते ही ज्ञानस्फूर्ति अन्धी होकर मेघों से व्याप्त अमावस्या की रात्रि की तरह
हो जाती है और अपनी ही गति नहीं दिखायी देती। अन्धा यदि अन्धे का हाथ पकड़ता है तो दोनों ही खड्ग में
गिर जाते हैं, उसी प्रकार अविवेक की स्थिति के कारण विषयांध लोग 'अंधतम' नामक नरक में गिरते हैं।
कुसंगति से नरकवास प्राप्त होता है। उससे छुड़ाने वाला एक पश्चात्ताप ही है। उस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
'ऐलगीत' सुनाते हैं।
ऐलः सम्राडिमां गाथामगायत् वृहच्छ्रवाः।
उर्वशीविरहान्मुह्यन् निर्विण्णः शोकसंयमे ॥ ४॥
समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी का पालन करने वाला, सभी राजाओं का मुकुटमणि चक्रवर्ती राजा पुरुरवा की
कीर्ति पुराणों में प्रसिद्ध है। तेज, प्रभाव, महाशौर्य, उचित दातृत्व, गांभीर्य, मस्ती, पराक्रम तथा धार्मिक धैर्य आदि
गुणों से राजा पुरूरवा पूरी तरह युक्त था। राजधर्म की नीति के अनुसार वह स्वधर्म से पृथ्वी का पालन करता
था। ब्राह्मण जितना था उतना ही ब्रह्म की मूर्ति था। चाहे प्राण चला जाय लेकिन वह ब्राह्मण की निन्दा नहीं
करता था। गौ के लिये तो प्राण देने के लिये भी तत्पर था। दीनों का रखवाला था। पुरुरवा का दूसरा नाम 'ऐल'
था। ऐसा वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा उर्वशी के फेर में अपनी स्थिति भूल गया। उस समय उसने पश्चात्तापपूर्वक
गीत गाया, उसके बारे में तुम्हें सुनाता हूँ। लेकिन उसकी पूर्व कथा तथा कामासक्तता के बारे में सुनो। वह अपना
बड़प्पन भूलकर, लंपट होकर वेश्या के आगे दीन बन गया। काम मनुष्य को किस प्रकार पागल बना देता है यह
श्रीकृष्ण ऐला के इतिहास से बताते हैं। ऐल (अर्थात् इला से बुध को हुआ पुत्र) पुरुरवा राजा उर्वशी के प्रति
कितना लंपट था और उसे किस प्रकार पश्चात्ताप होकर विरक्ति हुई, यह कथा वेदों में भी बतायी गयी है। उर्वशी
और पुरुरवा का सम्बन्ध नौवें स्कन्ध में विस्तार से आया है। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने वह कथा विस्तार
से नहीं बतायी। उर्वशी, को स्वर्ग के भूषण स्वरूप नारायण ने स्वयं स्वर्ग में भेजा था; लेकिन वहाँ वह स्वयं को
श्रेष्ठ समझ कर अहंकार से फूल गयी। उसी अहंकार में शान से नृत्य करते समय ताल पर पैर गलत पड़ गया
और ब्रह्मदेव ने उसे शाप दिया कि तुम मृत्युलोक में जाओगी और मनुष्य तुम्हारा उपभोग करेंगे। इस पर उसने
उःशाप माँगा। इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि यदि तुम पुरुरवा को नग्न देख लो तो तुम स्वर्ग में आ सकोगी। ऐसा
शाप प्राप्त कर उर्वशी मृत्युलोक में आयी। उसका स्वरूप देखकर राजा पुरुरवा उस पर लट्टू हो गया। अपनी
महानता भूलकर वह उस वेश्या के वश में हो गया। उसके रूप पर वह इतना पागल हो गया कि उसे विचार
करने तक का भान नहीं हुआ। राजा को नग्न स्थिति में देखने के बाद, उर्वशी उसे छोड़कर चली जाय यह करार
मानकर राजा उसे अपने उपभोग के लिये ले आया। वह अपने शाम के परिहार के लिये अपने साथ दो भेड़ ले
आयी थी। उनका पुत्रवत पालन किया जाय इस सम्बन्ध में उसने राजा को कसम दिलाई थी। इस प्रकार उर्वशी
६९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से भेंट होते ही राजा की कामेच्छा भी प्रबल हो गयी। उसके साथ विलास करने में कब सुबह हुई और कब रात
हुई, कुछ समझ में नहीं आया। इसी प्रकार कई दिन बीत गये। उर्वशी के साथ विलास कर्म करने में वह अपना
स्वधर्म कर्म भी भूल गया। उसके नियम-संयम टूटते चले गये, विलासभोग की अति हो गयी। भेड़ों के रूप में
उर्वशी के साथ आये वे दोनों अश्विनीकुमार थे। इन्द्र ने उर्वशी का भोगक्षय करने के लिये उन्हें उसके साथ भेजा
था। पुरुरवा के भोग के अन्त में उर्वशी को स्वर्ग में ले जाने के लिये चोर उन भेड़ों को रात में चुरा ले गये, तब
वे 'ब्याँ', 'ब्याँ' कहकर चिल्लाने लगे। भेड़ों की आवाज सुनकर उर्वशी दुःख से व्याकुल हो उठी और राजा की
भर्त्सना करती हुई बोली, "तुम नपुंसक हो। व्यर्थ ही पुरुषार्थ की शेखी बघारते हो। मेरे बच्चों को चोर उठा कर
ले गये, तुम्हारे काले मुँह में आज लगे।" विलाप करते हुए वह अपना सिर पीटने लगी। उर्वशी का वह शोक
देखकर पुरुरवा ने तत्काल शस्त्र उठाया और चोरों का पीछा करने लगा। दौड़ने में उसका पीताम्बर खुल गया।
उसे उसका भान नहीं रहा। उसने भेड़ों को चोरों से मुक्त कर उन्हें उर्वशी के सामने खड़ा कर दिया। इतने में
बड़े जोर से आकाश में बिजली चमकी और राजा का नग्न शरीर चमक उठा। राजा को नग्न देखते ही उर्वशी
अपनी शर्त के अनुसार स्वर्ग चली गयी और उसके शोक में राजा व्याकुल हो उठा।
त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तींतांनग्नउन्मत्तवन्नृपः।
विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विह्वलः ॥५॥
पृथ्वी का पालन करने में वरिष्ठ; स्वधर्म में श्रेष्ठ धार्मिक, शत्रु का संहार करने में वीर तथा पराक्रम में
महावीर; वेदशास्त्र विवेक जानने वाला, जिसका सभी लोग वन्दन करते हैं, ऐसा व्यक्ति एक वेश्या का दास बन
गया? देवदानवों के सामने भी जिसकी गर्दन नहीं झुकती, जो जरा-सा भी अपमान सहन नहीं कर सकता, वह
अपनी श्रेष्ठता भूलकर एक वेश्या के आगे दीन बन गया? उर्वशी को जाते देख वह वैसा ही नग्न अवस्था में
खड़ा रहा और बेहोश होकर रोते-रोते उसके पीछे लग गया; उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था। जरा एक
बार तुम्हें देख तो लूँ; प्रेम की दो-चार बातें कर लूँ, तुम आँखों से दूर चली जाती हो तो प्राण निकलने लगते हैं।
अपने पूर्वजों की कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे वचन का कभी उल्लंघन नहीं करूँगा, मेरी बात को सच
मानो, तुम्हें मुझ से नाराज होने का कारण ही क्या है? चलते समय तुम्हारे पैरों में कंकड़-पत्थर लगेंगे, तुम कहाँ
जा रही हो? मैं भी आता हूँ, तुम्हारे साथ। एक बार मेरी ओर मुड़कर तो देख लो। कह कर वह उसके पैर
पकड़ने लगा। वह उसकी ओर बिना देखे चली गयी। जिसे बड़े-बड़े राजा साष्टांग दण्डवत किया करते थे, वह
राजाधिराज एक वेश्या के पैर पकड़ रहा है? काम की करनी कितनी अद्भुत है। उसने कहा, तुम्हारे लिये मेरा
चित्त व्याकुल हो रहा है, तुम इतनी पाषाण हृदया कैसे हो गयी हो? मुझ पर इतना गुस्सा भला क्यों करती हो?
इस प्रकार राजा का चित्त अत्यन्त विरहातुर और शोक से भर गया। वह अत्यन्त ग्लानियुक्त हो गया। श्रीकृष्ण
उसकी ग्लानि का वर्णन कर रहे हैं।
कामान्तृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः।
न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः ॥६॥
उर्वशी का कामभोग में राजा का चित्त बिलकुल तल्लीन हो गया था। सूर्य कब उदित होता है और कब
अस्त होता है इसका भी उसे पता नहीं चलता था। मदन ने उसे इतना पागल कर दिया था। एक बार भोग की हुई
स्त्री को प्रतिदिन भोगते रहने से उसके प्रति प्रेम बढ़ जाता है। उसी प्रकार उसकी अवस्था हुई और वह उसका
छब्बीसवाँ अध्याय ६९७
आसक्त हो गया। उर्वशी का भोग करते कितने दिन, मास और वर्ष बीत गये कुछ पता ही नहीं चला। जीवन का
नाश हुआ इसका भी स्मरण नहीं रहा। अग्नि में घृत पड़ने पर उसकी ज्वालायें अधिकाधिक तीव्र हो जाती हैं,
उसी प्रकार स्त्री का बार-बार भोग करने से काम भी बढ़ जाता है। स्त्री विषय का विचार करने पर वह अत्यन्त
तुच्छ मालूम होता है किन्तु रात-दिन भोग करते हुए भी राजा के मन में वैराग्य नहीं उत्पन्न हुआ। उर्वशी में
उसके प्राण बसे हुए थे इसलिये उसने उससे करुणा की गुहार की। लेकिन राजा की ओर मुड़कर देखे बिना ही
वह तेजी से चली गयी। जब उर्वशी सामने नहीं दिखायी दी तो राजा विरह शोक से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
फिर उठकर इधर-उधर देखने लगा। जोर-जोर से रोते हुए उसने ताण्डव मचा दिया। इस प्रकार दसों दिशाओं में
भटकते हुए वह एकाएक कुरुक्षेत्र आ गया। वहाँ अन्तरिक्ष में बैठी हुई उर्वशी उसे दिखायी दी। उसे देखते ही
वह चिल्लाया, "दौड़ो उर्वशी ! मुझे अपने आलिंगन में ले लो।" तब वह बोली, हे विषयांध ! यह सारी मूर्खता
अब त्याग दो; भूपते, हम स्त्रियों की आसक्ति कभी अच्छी नहीं होती। हे महाराज ! स्त्रियाँ स्वभाव से ही दुष्ट
होती हैं। विशेष रूप से वेश्याएँ तो स्वच्छंद होती हैं। अपने मन के अनुसार व्यवहार करती हैं, और परपुरुष से
स्वेच्छा से संग करती हैं; इसलिये हे राजा ! तुम मन में हमारा कभी भी विश्वास न करना। हे राजा! हम स्त्रियों
की संगत से आज तक कितने लोग फँसे हैं इसका कोई पता नहीं है; तुम अब हमारी आसक्ति छोड़कर परमार्थ
मार्ग का अनुसरण करो। इतने दिन तक तुमने मेरा भोग किया लेकिन तुम्हें अभी वैराग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये
अब तुम कामासक्ति समूल छोड़ दो और अपने सच्चे स्वार्थ की साधना में लग जाओ। लेकिन उसका वह भाषण
उसे अच्छा नहीं लगा। वह पुनः उसके पैर पकड़ कर उसकी प्रार्थना करने लगा। कहने लगा, "तुम कुछ भी
करो लेकिन एक बार अपना अंग संग दो। हे सुन्दरी ! एक बार तुम अपना सुख संभोग दो।" उसकी वह ग्लानि
देखकर उर्वशी का मन पसीज उठा। वह राजा को अपना पूर्व वृत्तांत सुनाने लगी। मैं अत्यन्त सुन्दर स्वर्गांगना हूँ,
मुझे ब्रह्मदेव ने शाप दिया था; किन्तु तुम अत्यन्त पुण्यवान राजा होने के कारण तुम्हारी संगति से मैं उस पाप से
मुक्त हो गयी। तुम्हारी संगत से मैं निष्पाप हुई, मेरे शाप का निवारण हो गया। अब तुम्हारा और मेरा संग इस
लोक में असम्भव है। मैं अब स्वर्ग जा रही हूँ। उर्वशी का यह भाषण सुनकर राजा उसके विरह में रोने लगा।
उर्वशी का मन व्याकुल हो उठा और उसने उसे एक अच्छा उपाय बतलाया। पहले उसने गन्धर्व की प्रार्थना कर
एक अग्निपात्र प्राप्त किया और उसे राजा को देकर बोली, इस अग्निपात्र पर यज्ञ करो, जिससे तुम्हें मेरी प्राप्ति
होगी। उर्वशी के वियोग में व्याकुल होने के कारण राजा अग्निपात्र वहीं छोड़कर अपने मन्दिर में चला आया।
उस समय अत्यन्त शोक से व्याप्त होने के कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया था। उसके मन में उर्वशी का दुःख
था इसलिये वह उसे स्वप्न में दिखायी दी। वह जागृत होकर तत्काल अग्निपात्र देखने पहुँचा। तो उसे वहाँ
अश्वत्थ के वृक्ष पर शमी का पेड़ दिखाई दिया। उसने उस अश्वत्थ की ही अरणी तैयार की और यज्ञ के लिये
पवित्र अग्नि तैयार किया और विधिपूर्वक यज्ञ कर कामसुखभोगेच्छा के कारण वह उर्वशी के लोक में पहुँचा।
उस उर्वशी से विलास करते-करते राजा को विरक्ति हुई और उसने क्या कहा, तुम्हें बताता हूँ। वह निरूपण राजा
ने अठारह श्लोकों में किया है। उसमें के आठ श्लोकों में उसका सच्चा पश्चात्ताप है। वही श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डाइमेस्मृताः ॥ ७॥
६९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुरुरवा का यह पश्चात्ताप गीत सुनने से अगम्यागमन पातक का नाश होता है। उसे सुनने वाला निष्पाप हो
जाता है और साधकों को कभी भी मदन की बाधा नहीं होती। मत्त हाथी जिस प्रकार हथिनी के साथ नाना प्रकार
की आपदायें भोगता है, उसी प्रकार उर्वशी की संगति से पुरुरवा भी दुःख भोग कर विरक्त हो गया। जो उर्वशी
पर अत्यधिक लुब्ध हुआ था वही उससे ऊब गया और वैराग्य से पश्चात्ताप पाकर पुरुरवा राजा स्वयं ही बोलने
लगा। मेरे मोह के कारण विषयवासना बहुत बढ़ गयी जिससे उस अमंगल मदन के घर का मैंने ही सेवन किया।
उर्वशी के लालच में मैं अत्यधिक लंपट हो गया। मेरा चित्त काम से व्याप्त हो गया और मैंने बहुत बड़ा अनर्थ
कर दिया। मेरा जीवन मैंने व्यर्थ गँवाया। गले से सटे हुए उर्वशीरूप शस्त्र ने जिसमें जीवन को काटने की तेज
धार है, कितने ही जीवन नष्ट कर दिये हैं। लेकिन मुझ पापी को उसकी स्मृति ही नहीं रही। कामेच्छा के भुलावे
में मैंने कांता-आलिंगनरूपी विष की बेल गले में लटका ली। उसने सारे जीवन की होली जलाकर विचार को
निगल ही लिया। स्त्री का आलिंगन रूपी दावाग्नि मैंने अपने गले में जला लिया जो आयुष्यरूपी वन में भड़क
कर उसने विवेकरूपी भूमि को भी झुलसा दिया। नरदेह का उत्तम से उत्तम जीवन मैंने भस्म कर दिया। मैंने एक
निंदनीय अधर्म ही कर दिया। नरदेह के आयुष्य के सहारे साधक बैकुण्ठ पहुँच जाते हैं, ज्ञानी तो देखते-देखते
ब्रह्मपद प्राप्त कर लेते हैं। उस आयुष्य को मैंने स्त्रीवसन में नष्ट कर दिया।
नाहं वेदाभिनिर्मुक्तः सूर्यो वाभ्युदितोऽमुया।
मुषितो वर्षपूगानां वताहानि गनान्युत॥८॥
नरदेह के आयुष्य का एक क्षण करोड़ों सुवर्ण मुहरें देने पर भी नहीं मिलेगा। वह सारा आयुष्य नष्ट कर
मैंने अपना विनाश कर लिया। साधुओं का हित करने के लिये ही प्रतिदिन सूर्य का उदय होता है। इसीलिये साधु
क्षण-प्रतिक्षण परमार्थ साधते रहते हैं। वही सूर्य स्त्रीलंपट पुरुष की आयु रात-दिन कम करता रहता है। यह बात
जो नहीं जानता वह स्वयं ही नरक पात का असली मूल है। दूसरों की बात क्यों करूँ ? मैं स्वयं ही उर्वशी के
फेर में फँस गया, मेरे जीवन की हानि हो गयी। यह बात किसे बताऊँ ? लोगों का हित करने के लिये ही रोज
सूर्य का उदय होता है यह बात पुरुष होते हुए भी मैंने नहीं जानी। उर्वशी के जाल में फँस कर उन्मत्त हो गया।
सूर्योदय और सूर्यास्त होते हुए वर्ष के वर्ष बीत गये। लेकिन मुझे उसका विचार नहीं आया। उर्वशी के अधरामृत
का पान करते-करते मैं उसी बेहोशी में रहा। शराब की खुमारी अगले दिन उतरती है, धन की मस्ती दरिद्र होने
पर उतरती है; शक्ति क्षीण होने पर यौवन का ज्वार थमता है; लेकिन स्त्री का नशा कभी नहीं उतरता। नरदेह का
जीवन अत्यन्त दुर्लभ है। वह पुनः हाथ नहीं आता। मरे वह देवांगना, उर्वशी ! सचमुच, इसने मेरा सत्यानाश कर
दिया। मैं निर्भय, सबकी रक्षा करने वाला, लेकिन इसने मुझे नंगा कर दिया। यह लज्जास्पद बात बताऊँ तो किसे
बताऊँ ? इतना कह कर वह सुबकने लगा। मेरे हित की चोरी करने वाली उर्वशी है। इसे मार डालना चाहिये।
उसने कहा। लेकिन फिर वह सोचने लगा कि इसमें उसका क्या दोष है ? अविचारी तो मैं हूँ। एक मैं ही अभागा
हूँ, कामचेष्टा में मैंने ही अपने जीवन का विनाश कर लिया। बहुत बड़ी हानि हो गयी। फिर बड़े जोर का
आक्रोश करते हुए बोला, इस मदन ने मुझे नंगा कर दिया। मैंने अपना जीवन गँवाया। वास्तव में इससे अधिक
हानि संसार में और कोई नहीं है।
अहो मे आत्मसम्मोहोयेनात्मायोषितां कृतः।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः ॥९॥
छब्बीसवाँ अध्याय ६९९
बड़े-बड़े वीर पराक्रमी मुकुटमणि राजा भी मेरी शरण में आते हैं और मैं एक तुच्छ वेश्या के चरण पकड़
रहा था, इससे अधिक निर्लज्जता और क्या होगी? मुझ पुरूरवा की आज्ञा पर सारे राजा कठपुतली की तरह
नाचते रहते हैं और मैं स्वयं एक वेश्या की आज्ञा से श्वान की तरह लांगूलचालन कर रहा था। मदारी के बन्दर
की तरह मैं स्त्री के इशारों पर नाचता रहा। मेरे चक्रवर्ती होने का ऐसा निंद्य फल मुझे प्राप्त हुआ? सारे राजा मुझे
बहुत सम्मान देते हैं, भूपति मेरे चरणों का वंदन करते हैं और मैं एक स्त्री का दास बनकर हीन, दीन, भिखारी
बन गया। स्त्री को प्रसन्न रखने के लिये उसके पैरों पर गिरना उचित है ऐसा कहने वाले कामी पुरुषों के मुँह में
आग लगे क्योंकि वह मदन का बहुत बड़ा प्रहार है। मैं समुद्रवलयोक्ति पृथ्वी का सार्वभौम हूँ और उसे एक
वेश्या ने भँवर जाल में फँसाया? उसी भँवर जाल का वर्णन राजा स्वयं कर रहे हैं।
सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम्।
यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद् रुदन्॥१०॥
स्त्री केवल साकार-माया-भ्रम है। इसीलिये स्त्री को 'प्रमदा' कहते हैं। इन स्त्रियों के मोह में बड़े-बड़े
लोग फँस चुके हैं। स्त्रियाँ, वस्त्र और अलंकार ये माया के प्रमुख तत्त्व हैं; जिसके भुलावे में बड़े-बड़े लोग आ
चुके हैं। उसी प्रकार मैं भी स्त्री की संगति में पापी बना मुझे स्वयं ही अपना कार्य दीन-हीन लगता है क्योंकि
उर्वशी तो वैसे भी एक वेश्या थी। उसे कितने ही लोगों ने भोगा होगा। ऐसी कामासक्ति के कारण मैं सब कुछ
भूल गया। अपनी भूलने की कथा पश्चात्तापपूर्वक राजा स्वयं बता रहा है। धर्मपत्नी के साथ कामोपभोग करने से
सहसा स्वधर्म की हानि नहीं होती किन्तु मेरा दुष्कर्म आड़े आया और मैं वेश्या के जाल में फँस गया। जो परस्त्री
की अभिलाषा करते हैं वे तो निश्चित रूप से नरक में जाते ही हैं, लेकिन जो अपनी पत्नी पर भी आसक्त होते हैं
उन्हें भी अधोगति नहीं छोड़ती। स्त्रियों ने हरिहर पर भी मोहिनी डाली है, स्त्रियों ने बड़े-बड़े ऋषियों को भी
भुलावा दिया हे, स्त्रियों ने बड़ों-बड़ों को अपने पाश में उलझाया है, उसी प्रकार मुझे भी स्त्रियों ने दास बनाया।
राज्य और राजवैभव मैंने वेश्या के हवाले किया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके लिये मैंने अपना जीवन भी अर्पण
किया। सारे राजाओं का मैं मुकुटमणि था, लेकिन मैं उसके चरणों का दास बन गया। मदन की करनी अद्भुत
है। उसने मुझे स्त्री के वश में कर दिया। मुझ राजराजेश्वर को उस वेश्या ने लात मार कर, मेरी उपेक्षा कर मेरा
बहिष्कार किया, मेरे सामने मुझे छोड़कर चली गयी। उसे जाता देख मैं नग्न अवस्था में उसके पीछे दौड़ा,
लाज-लज्जा छोड़कर रोया लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। किसी उन्मत्त ब्रह्मपिशाच की तरह, मैं
नग्नावस्था में रोता हुआ उसके पीछे दौड़ रहा था लेकिन उसका चित्त द्रवित नहीं हुआ। फिर भी मैं रोता हुआ,
लड़खड़ाते हुए किसी निर्लज्ज की तरह उसके पीछे दौड़ रहा था, मेरे मोह के कारण हुए अनर्थ के कारण मैं
अपमानग्रस्त हो गया।
कुतस्तस्यानुभावः स्यात्तेज ईशत्वमेव वा।
योऽन्वगच्छं स्त्रियं यान्तीं खरवत् पादताडितः॥११॥
मैं बहुत बड़ा राजराजेश्वर हूँ, ऐसा असाध्य अहंकार मुझे था। लेकिन मैं स्वयमेव वेश्या का नौकर और
दास बन गया। नौकर की तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था, फिर भी उसने मेरा अंगीकार नहीं किया, बल्कि
जिस प्रकार गदही लात मार कर गधे को दूर भगा देती है, उसी प्रकार उसने मुझे भगा दिया। गदही को देखकर
जिस प्रकार गधा उसकी खुशामद करता है लेकिन गदही उसे लात मारती रहती है। उसकी लातें सिर पर लगती
७०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहती हैं, फिर भी गधा पीछे नहीं मुड़ता। उस गधे की ही तरह मूर्खता मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
कामदृष्टि से वह उदासीन थी लेकिन मैं ही आसक्त होकर उसके पीछे पड़ा हुआ था। मेरे पराक्रम की बात सुनाते
हुए मुझे स्वयं भी लज्जा होती है। इस प्रकार, जिसका मन स्त्री के विषय में लंपट हुआ उसका सारा योग, याग,
अनुष्ठान, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा।
किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ १२॥
जिसका मन स्त्रीकाममय हो जाता है, उसकी विद्या, तप, धन, त्याग और संन्यास वगैरह सब कुछ व्यर्थ हो
जाता है। उसका एकांतवास व्यर्थ, उसका मौन व्यर्थ उसी प्रकार राख में हवन करने की तरह उस स्त्रैण का
अनुष्ठान सब कुछ व्यर्थ है। जिसका चित्त कामासक्त हुआ हो उसके सारे नियम भी व्यर्थ हैं। इस प्रकार अपने
पूर्व आचरण की निन्दा करता हुआ राजा पश्चात्ताप कर रहा है।
स्वार्थस्याकोविदं धिङ्मां मूर्खपण्डितमानिनम्।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः ॥ १३॥
चारों पुरुषार्थों का अधिष्ठान जो पावन नरदेह है, उसका योगपूर्वक भजन करने से सनातन ब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है। नरदेह का एक-एक क्षण भी जन्म-मरण का विनाश करता है, भक्तिभाव से हरि का स्मरण करने
से बड़े-बड़े पातक भी नष्ट हो जाते हैं। ऐसे नरदेह का लाभ लेकर नृपश्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बना और वेश्या के
भुलावे में आ गया। मैं स्वयं को श्रेष्ठ और ज्ञानी कहता था किन्तु अज्ञों से भी अधिक अज्ञानी था। मेरा सच्चा
हित किसमें है यह मेरी समझ में नहीं आया और मैं वेश्या के अधीन हो गया। नरदेह जैसी निधि मिलने पर भी
मैंने मन में ज्ञान का अभिमान किया और स्वहित का कोई साधन नहीं किया यह मेरी मूर्खता है। बैल, उल्लू
होकर गाय के पीछे दौड़ता रहता है, आगे क्या अनर्थ होगा, यह वह नहीं जानता। जिस प्रकार गदही के पीछे
गधा दौड़ता है, उसी प्रकार मैं कामासक्त और निर्लज्ज बन गया था। गदही गधे को लात मारती रहती है फिर भी
वह आगे बढ़ता रहता है। उसी प्रकार मैं भी विषय की इच्छा से वेश्या के पीछे पागल था। 'काम भोग के अन्त
में विरक्ति उत्पन्न होती है' ऐसा विचारी लोग कहते हैं, लेकिन वे मूर्ख हैं। वे अधःपात की ही ओर ले जाते हैं,
यह मेरा अपना अनुभव है।
सेवतो वर्षपूगान् में उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निरहुतिभिर्यथा ॥ १४॥
सत्ययुग का मेरा आयुष्य, ऐश्वर्य तो सार्वभौम राजा का। उर्वशी अपने स्वर्ग के स्वार्थ के लिये मुझसे
अनेक प्रकार के भोग भोग रही थी। ऐसा विलासपूर्ण सुख भोगते-भोगते करोड़ों वर्ष बीत गये। किन्तु मुझमें
विरक्ति की बात नहीं आयी। 'भोग के अंत में वैराग्य आता है' ऐसा कुछ लोग कहते हैं लेकिन वह मूर्खों की
बकवास है। स्त्री के अधरपान को 'अमृत' कहते हैं वे भी मूर्ख ही हैं। वह अमृत तो नहीं ही है, अपितु नशा
लाने वाली शराब है और वह चित्त को भ्रमित करती है। स्त्री के अधरपान की जो माधुरी है, उसके आगे सारे
मद्य बेकार हैं क्योंकि वह तत्काल अनर्थ में ढकेलती है और निजस्वार्थ को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार घृत की
करोड़ों आहुतियों से भी अग्नि की तृप्ति नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रीसंग से कभी विरक्ति नहीं होती। इस प्रकार
राजा ने अपना पश्चात्ताप आठ श्लोकों में व्यक्त कर दिया क्योंकि जब हृदय में विवेकदीप प्रज्ज्वलित हुआ, तो
छब्बीसवाँ अध्याय ७०१
मदन का ताप किससे नष्ट होगा, इसका उसे स्मरण हुआ। कामिक पुरुष विषय का त्याग करे, फिर भी उसकी
वासना बिलकुल नहीं छूटती और जब रुचि से विषय सेवन कर रहा हो तो फिर विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी ?
उसका क्या उपाय है इसका विचार कर स्त्रीविषय त्याग का सच्चा विचार राजा बता रहा है।
पुंश्चल्याहतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५॥
पुरुष सदा ही स्त्री पर अनुरक्त रहता है; लेकिन वह एकाएक उससे अति प्रसंग नहीं कर सकता। इसलिये
वेश्या की संगत मिलने पर वह उसके हावभाव से कामपीड़ित होता है। वेश्या के नेत्रकटाक्ष ही पुरुष को बन्धन
में डालने के लिये पर्याप्त हैं। स्त्री विषय का यह बन्धन नारायण के अलावा और कौन छुड़ाएगा ? स्त्रीविषय से
मुक्त करने वाला केवल एक ईश्वर ही समर्थ है। आत्माराम भगवंत से उससे निश्चित रूप से छुड़ा सकता है।
काम का संचार माया के गुणों से होता है; अविद्या उसकी वृद्धि करती रहती है। इसलिये माया का नियंता जो
ईश्वर है, वही मदन की पीड़ा दूर कर सकता है। आत्मस्वरूप में लीन, आनन्दस्वरूप रहने वाला वह आत्माराम,
वही सारे विषयों का निवारण कर आत्मस्वरूप विषयक भ्रम को दूर करता है। भोग करते हुए भी वह अभोक्ता
रहता है, उस अनंत की शरण में जाने से ही विषय विकार बाधा नहीं कर पायेंगे। स्त्रीसंग से छुड़ाने वाला एक
वही है। अधोगति से छुड़ाने वाला जो अधोक्षज है, वह भक्तों का पालन करने वाला होने के कारण, उसकी शरण
में जाने से वही कामासक्ति का निवारण करता है। राजा कामासक्ति से अत्यन्त त्रस्त हो गया, विषय के प्रति
अंतर्बाह्य उदासीन हुआ, लेकिन हृदय की वासनाओं का त्याग वह नहीं कर पा रहा था। सर्वोपरि हरि की शरण
में जाने से ही सारी वासनाओं का निवारण अपने आप होता है। कुछ लोग ऐसा भी मत प्रतिपादित करते हैं कि
वेदाध्ययन कर इन्द्रादि देवताओं के प्रीत्यर्थ यज्ञायाग करने से हृदय की वासनाओं की निवृत्ति होती है। लेकिन जो
ज्ञानी ऐसा कहते हैं, वे अज्ञानी हैं क्योंकि श्रीहरि की शरण में गये बिना कामबाधा का शमन नहीं होता। इन्द्रादि
देवताओं की भी कामासक्ति के कारण कितनी दुर्दशा हुई इसका उन्हें पता नहीं है। ऐसा होते हुए, उनके भजन से
काम की निवृत्ति होती है, ऐसा जो कहते हैं वे अतिमूर्ख हैं।
बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मतेः।
मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मनः॥ १६॥
काम्य कर्म से सुख होगा यह कहना ही बिलकुल मिथ्या है क्योंकि काम्य कर्म में अधिक दुःख होता है।
लेकिन उन मूर्ख सकाम लोगों की समझ में यह बात नहीं आती। मैंने याग कर इन्द्रादि देवताओं का यजन कर
उर्वशी का उपभोग किया फिर भी मैं अत्यन्त दुःखी हुआ। नारायण ऋषि के ऊरू अर्थात् जंघा से उत्पन्न हुई
इसलिये उसका नाम 'उर्वशी' पड़ा। उसने मुझे निष्काम भाव से शुद्ध वेदवाक्य से उपदेश किया। श्रुति का
निष्कामवचन श्रवण करने पर भी मेरी सकाम भूल नष्ट नहीं हुई। जब तक श्रीहरि की कृपा नहीं होगी, तब तक
काम की चाल नहीं रुकेगी। भक्तिभाव से श्रीहरि की शरण जाने से हृदयस्थ नारायण प्रकट होता है तब हृदय के
सारे काम अपने आप भाग जाते हैं। उर्वशी की आसक्ति के कारण मैंने तो अत्यधिक कष्ट सहन किये लेकिन
इसमें उसका क्या दोष है ? मुझे स्वयं ही श्रीहरि का विस्मरण हो गया था। यदि मैंने ही श्रीहरि का स्मरण किया
होता तो बेचारा काम क्या मुझे बाधा पहुँचाने वाला था ? यदि मुझे ही मेरा स्मरण रहता, तो उर्वशी मुझे बिलकुल
तुच्छ लगी होती।
७०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतसः।
रज्जुस्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रियः ॥ १७॥
मैं भी मूर्खतावश अब तक उर्वशी को ही अपराधी मान रहा था। लेकिन ठीक तरह से विचार करने पर
देखा कि मैं ही सकाम और मतिमंद हूँ। उर्वशी को देखते ही मैं कामासक्त हो गया और अपनी ही लंपटता के
कारण मैंने स्वयं को कष्ट दिया। शाम को रस्सी दिखायी देने पर भीरु व्यक्ति को वह बड़ा सर्प ही मालूम होता है
और अगर ठीक से न देखो तो वह एक भयानक अजगर मालूम होता है। साँप के भय से दौड़ने में रस्सी उसके
पैर में फँस जाती है और उसे वह साँप की कुण्डली समझ लेता है। इसमें उसकी कल्पना ही उसे बाधक सिद्ध
होती है। उसी प्रकार मेरी कामभ्रांति से उर्वशी मुझे सुन्दर स्त्री लगी और मेरी ही कामासक्ति से भी रतिविलास में
नग्न हो गया। इस प्रकार मैं ही अविचारी प्राणी उस उर्वशी के काम पर लुब्ध हो गया था, ऐसी स्थिति में उस पर
नाराज होना अधर्म है। स्त्री देखने पर विषयलंपट पुरुष को वह अत्यन्त रमणीय मालूम होती है, किन्तु विचारी
पुरुष को वही अत्यन्त गन्दी और नरक की खान लगती है। सुअर को जिस प्रकार विष्ठा से प्रेम रहता है, उसी
प्रकार विषयी पुरुष को स्त्री का संग रमणीय मालूम होता है किन्तु विचारी लोग उसकी ओर देखकर थूकते हैं,
यही बात राजा श्लोकरूप में बता रहे हैं।
कायं मलीमसः कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोऽशुचिः।
क्व गुणाः सौमनस्याद्या ह्यध्यासोऽविद्यया कृतः ॥ १८॥
स्त्री, पुरुष ये जो नाम हैं वे केवल देह के ही लिये हैं। उसमें, स्त्रीदेह के गुणधर्म देखने से उसमें
मलीनता ही भरी हुई है। जो नित्य नये स्राव की खान है, रजस्वला के प्रवाह की वह नाली, दुर्गंधि का स्रोत
और विष्ठा से भरी हुई गठरी जो दोषों का जन्मस्थान है, विकल्प का आश्रय है, जो महादुःख का पात्र है
और जिसके कारण अधःपतन होता है। वह मन का उद्वेग बढ़ाने वाली, जिसके योग से मन को क्षयरोग की
बाधा होती है, अत्यन्त निर्लज्जता के कारण जिसका अंगसंग त्रस्त कर देता है। जिस प्रकार गन्दे मटके का
गोल किनारा बिल्ली के गले में फँस जाने पर वह घर-घर में उसी अवस्था में जाती है और पवित्र घरों के
बर्तनों को अपवित्र कर देती है उसी प्रकार स्त्रियों की संगत है। वह जिसके गले में फँस जाती है, वापस
नहीं जाती। स्त्री काम में लंपट कितने लोगों की दुर्दशा हो चुकी है, उसका कोई अन्त नहीं है। वह बिल्ली
जिस बर्तन में भी मुँह लगाती है, उसे वह किनारा अवरोध कर देता है; उसी प्रकार स्त्रीसंगति से अपार दुःख
होता है, लेकिन पुरुष उसमें सुख ही मानते हैं। मृगजल का कमल अत्यन्त मनोहर दिखाई देता है उसी
प्रकार स्त्री का मुख सुन्दर, सुहास्य, रमणीय और सुकुमार है ऐसा विषयी पुरुष वर्णन करते हैं किन्तु यदि
उनके मुँह की वास्तविक स्थिति देखें तो वहाँ नाक में सदा कफ की बस्ती रहती है। ऐसी स्थिति में वे विष
को अमृत की उपमा देते हैं। स्त्रियों के मुख से लार झरती रहती है, उसे वे अधरामृत कहते हैं। अविद्या का
बल भी धन्य है। ऐसे स्त्री देह पर देव-दानव दोनों ही लुब्ध दिखायी देते हैं। स्त्री और पुरुष इन दोनों में
आत्मा एक है। लेकिन स्त्री का रूप अविद्यात्मक है। विषयी पुरुष उसके भुलावे में आ जाते हैं। सारांश,
माया का गुण प्रबल है। स्त्री संभोग के समय आत्मा नित्यमुक्त होकर अलिप्त रहता है। यदि स्त्री संयोग में
देह को भोक्ता कहें तो देह जड़ है। वहाँ विषय-भोग का कारण मुख्य रूप से देहाभिमान है। लेकिन उसमें
भी कई हिस्सेदार हैं।
छब्बीसवाँ अध्याय ७०३
पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः श्वगृध्रयोः।
किमात्मनः किं सुहृदामिति योनावसीयते ॥ १९ ॥
माँ गर्भ धारण करती है, उसका पोषण करती है और स्वयं कष्ट सह कर उसका पालन-पोषण करती है
अतः वह देह 'माता' का है। लेकिन यदि माता अकेली ही हो तो उसे पुत्र की बात स्वप्न में भी नहीं लानी
चाहिये क्योंकि वहाँ वीर्य का निक्षेप करने वाला पिता होता है। इसलिये वास्तव में यह देह पिता का है और
अग्नि-ब्राह्मण की साक्षी से जिसे शपथ दिलाकर भार्या बनाकर लाया रहता है और जो प्राण देकर भी सेवा के
लिये तत्पर रहती है, जिसे उसके कारण ही सुख और शोभा, जिसे इसके ही कारण इहलोक और परलोक है; इन
सबका सूक्ष्म रीति से विचार करने पर यह देह सचमुच 'स्त्री' का ही है। 'सुहृद-बंधु-मित्र' भी इस देह के लिये
आवश्यक हैं। उन्हें भी इस देह के सुख से सुख प्राप्त होता है, इसलिये एक दृष्टि से यह देह उनका भी है। उसी
प्रकार स्वयं वेतन लेकर स्वयं ही जिसे देह विक्रय किया रहता है, जिसकी आज्ञा के बिना क्षणभर के लिये भी
७०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिसकी आसक्ति होती है वे कीड़ों की ही तरह हैं। इस प्रकार विचार करें तो स्त्रियों का देह अत्यन्त गन्दा है।
उसे वस्त्रालंकार से सुशोभित कर पुरुष उस पर आसक्त होते हैं। बहेलिया जाल लगाकर हिरनों को पकड़ता है
लेकिन पुरुष स्त्रियों का श्रृंगार कर स्वयं ही उस जाल में फँसता है। इसलिये विरक्तों को स्त्री की संगत कभी
नहीं करनी चाहिये, गृहस्थाश्रमियों को भी उसकी आसक्ति छोड़नी चाहिये। इसके सम्बन्ध में राजा बता रहे हैं।
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा ॥ २२॥
स्त्रियों का यह देह यदि वास्तव में सुन्दर होता, तो वस्त्रालंकार के बिना भी सुन्दर लगता। लेकिन वह
अत्यन्त निंद्य और गन्दा होने के कारण वस्त्रों के बिना बिलकुल अच्छा नहीं लगता इसीलिये स्त्रियाँ अपना देह
वस्त्रालंकारों में लपेटती हैं। जिस प्रकार धोखेबाज ब्राह्मण का स्वांग बनाकर विश्वास जता कर घात करते हैं,
उसी प्रकार यह स्त्रियों की संगत है। स्त्रियों की संगत नाना प्रकार के तरीकों से दास्यत्व कराती है और अन्त में
अपने साथ नरक ले जाती है। इसलिये विरक्तों को उधर नहीं जाना चाहिये। यदि स्त्री विरक्त हो तो भी साधक
को उसकी संगत नहीं करनी चाहिये। अग्नि के संग से जिस प्रकार घी पिघलता है, उसी प्रकार स्त्री की संगत से
भी वृत्तियों में विकार उत्पन्न होता है। अमृत के स्थान पर विष खा लेने से मृत्यु अवश्यंभावी है, उसी प्रकार स्त्री
सात्त्विक है यह जानकर सेवन करने पर भी वह दुःख ही देती है। यदि अग्नि में घृत बहुत समय तक रह पाता
तो स्त्री की संगत से भी पारमार्थिक लोग आत्मस्वरूप प्राप्त करते। घृत समाप्त होकर यदि साठ वर्ष भी हो गये
हों तो भी अग्नि के संगत से घृत की गागर द्रवित हो उठती है। उसी प्रकार स्त्रियों के सहवास से वृद्धावस्था में
भी काम विकार प्रबल होता है। कपूर अगर अग्नि में बिना जले रह गया होता तो स्त्री की संगत से सबको
परब्रह्म का लाभ हुआ होता। अग्नि हाथ में लेते ही, वह जलाता है वैसी ही स्त्रियों की संगत है। उसकी संगति
से आसक्ति बढ़ती है और वह पुरुष को अनर्थ में डालती है। स्त्री से भी ज्यादा यदि स्त्रैण की संगति मिले तो वह
करोड़ों अनर्थ का मूल है। उसकी संगति से अधःपतन ही होगा। स्त्रीलंपट पुरुष से यदि भेंट हो जाय तो वह
सारा ब्रह्मानन्द स्त्री सुख में ही है, ऐसा आदेश विरक्त को देता है। इससे तत्काल स्त्री कामना उत्पन्न होती है।
फिर वह स्वदारा और परदारा का विचार ही नहीं करने देती और स्वेच्छाचार की ओर प्रवृत्ति मुड़ती है। इसलिये
स्त्रैण ही वास्तव में घातकी है। स्त्रैण जहाँ प्रवेश करता है, वहाँ अनाचार की बेल बढ़ी ही समझिये। अधर्म सर्वांग
से फलता-फूलता है और वह बाधक बनकर अनर्थ के फल देता है। इसलिये जिसे परमार्थ साधना हो उसे स्त्री
की अथवा स्त्रैण की संगत कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि उनकी संगत अनर्थ में डालती है। लेकिन यदि स्त्रैण
को ही वर्जित कर दिया जाय तो फिर स्त्रीसंग रह ही कहाँ जाता है ? सारांश यह संगत ही परमार्थ के लिये
उपयोगी नहीं है। इसलिये साधक को स्त्रियों की ओर नहीं देखना चाहिये और बातें तो नहीं ही करनी चाहिये
और एकान्त में भी कभी नहीं बैठना चाहिये। अब आप यह कहेंगे कि जो विचारी है उसे स्त्रीसंगति क्या करेगी ?
तो भाई ! इस स्त्री की संगत के पीछे बड़े-बड़े ज्ञाताओं ने भी आघात सहे हैं। पराशर ऋषि को नाव में क्षणभर के
लिये नाविक की कन्या मिली, लेकिन उतने ही क्षणों के लिये उन पर अपयश का आघात हुआ। ऋष्यशृंग बहुत
बड़ा तपस्वी था किन्तु वह भी वेश्या के वश में हो गया, औरों की क्या बात करें ? साक्षात महादेव पर भी
मोहिनी ने मोहिनी डाली। विषय और इन्द्रियों की संगत से चित्तवृत्ति निश्चित रूप से क्षुब्ध होती है। सज्ञान भी
जब उनमें बँध जाते हैं तो अज्ञानों की क्या कथा ? लेकिन, स्त्रियों की प्रत्यक्ष संगत न होते हुए भी स्त्री के स्मरण
मात्र से भी काम विकार उत्पन्न होता है। इसी का स्पष्टीकरण राजा कर रहे हैं।