सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 716, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 716

७०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहती हैं, फिर भी गधा पीछे नहीं मुड़ता। उस गधे की ही तरह मूर्खता मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
कामदृष्टि से वह उदासीन थी लेकिन मैं ही आसक्त होकर उसके पीछे पड़ा हुआ था। मेरे पराक्रम की बात सुनाते
हुए मुझे स्वयं भी लज्जा होती है। इस प्रकार, जिसका मन स्त्री के विषय में लंपट हुआ उसका सारा योग, याग,
अनुष्ठान, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा।
किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ १२॥
जिसका मन स्त्रीकाममय हो जाता है, उसकी विद्या, तप, धन, त्याग और संन्यास वगैरह सब कुछ व्यर्थ हो
जाता है। उसका एकांतवास व्यर्थ, उसका मौन व्यर्थ उसी प्रकार राख में हवन करने की तरह उस स्त्रैण का
अनुष्ठान सब कुछ व्यर्थ है। जिसका चित्त कामासक्त हुआ हो उसके सारे नियम भी व्यर्थ हैं। इस प्रकार अपने
पूर्व आचरण की निन्दा करता हुआ राजा पश्चात्ताप कर रहा है।
स्वार्थस्याकोविदं धिङ्मां मूर्खपण्डितमानिनम्।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जितः ॥ १३॥
चारों पुरुषार्थों का अधिष्ठान जो पावन नरदेह है, उसका योगपूर्वक भजन करने से सनातन ब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है। नरदेह का एक-एक क्षण भी जन्म-मरण का विनाश करता है, भक्तिभाव से हरि का स्मरण करने
से बड़े-बड़े पातक भी नष्ट हो जाते हैं। ऐसे नरदेह का लाभ लेकर नृपश्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बना और वेश्या के
भुलावे में आ गया। मैं स्वयं को श्रेष्ठ और ज्ञानी कहता था किन्तु अज्ञों से भी अधिक अज्ञानी था। मेरा सच्चा
हित किसमें है यह मेरी समझ में नहीं आया और मैं वेश्या के अधीन हो गया। नरदेह जैसी निधि मिलने पर भी
मैंने मन में ज्ञान का अभिमान किया और स्वहित का कोई साधन नहीं किया यह मेरी मूर्खता है। बैल, उल्लू
होकर गाय के पीछे दौड़ता रहता है, आगे क्या अनर्थ होगा, यह वह नहीं जानता। जिस प्रकार गदही के पीछे
गधा दौड़ता है, उसी प्रकार मैं कामासक्त और निर्लज्ज बन गया था। गदही गधे को लात मारती रहती है फिर भी
वह आगे बढ़ता रहता है। उसी प्रकार मैं भी विषय की इच्छा से वेश्या के पीछे पागल था। 'काम भोग के अन्त
में विरक्ति उत्पन्न होती है' ऐसा विचारी लोग कहते हैं, लेकिन वे मूर्ख हैं। वे अधःपात की ही ओर ले जाते हैं,
यह मेरा अपना अनुभव है।
सेवतो वर्षपूगान् में उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निरहुतिभिर्यथा ॥ १४॥
सत्ययुग का मेरा आयुष्य, ऐश्वर्य तो सार्वभौम राजा का। उर्वशी अपने स्वर्ग के स्वार्थ के लिये मुझसे
अनेक प्रकार के भोग भोग रही थी। ऐसा विलासपूर्ण सुख भोगते-भोगते करोड़ों वर्ष बीत गये। किन्तु मुझमें
विरक्ति की बात नहीं आयी। 'भोग के अंत में वैराग्य आता है' ऐसा कुछ लोग कहते हैं लेकिन वह मूर्खों की
बकवास है। स्त्री के अधरपान को 'अमृत' कहते हैं वे भी मूर्ख ही हैं। वह अमृत तो नहीं ही है, अपितु नशा
लाने वाली शराब है और वह चित्त को भ्रमित करती है। स्त्री के अधरपान की जो माधुरी है, उसके आगे सारे
मद्य बेकार हैं क्योंकि वह तत्काल अनर्थ में ढकेलती है और निजस्वार्थ को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार घृत की
करोड़ों आहुतियों से भी अग्नि की तृप्ति नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रीसंग से कभी विरक्ति नहीं होती। इस प्रकार
राजा ने अपना पश्चात्ताप आठ श्लोकों में व्यक्त कर दिया क्योंकि जब हृदय में विवेकदीप प्रज्ज्वलित हुआ, तो