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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 869 में से

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पृष्ठ 718

७०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतसः।
रज्जुस्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रियः ॥ १७॥
मैं भी मूर्खतावश अब तक उर्वशी को ही अपराधी मान रहा था। लेकिन ठीक तरह से विचार करने पर
देखा कि मैं ही सकाम और मतिमंद हूँ। उर्वशी को देखते ही मैं कामासक्त हो गया और अपनी ही लंपटता के
कारण मैंने स्वयं को कष्ट दिया। शाम को रस्सी दिखायी देने पर भीरु व्यक्ति को वह बड़ा सर्प ही मालूम होता है
और अगर ठीक से न देखो तो वह एक भयानक अजगर मालूम होता है। साँप के भय से दौड़ने में रस्सी उसके
पैर में फँस जाती है और उसे वह साँप की कुण्डली समझ लेता है। इसमें उसकी कल्पना ही उसे बाधक सिद्ध
होती है। उसी प्रकार मेरी कामभ्रांति से उर्वशी मुझे सुन्दर स्त्री लगी और मेरी ही कामासक्ति से भी रतिविलास में
नग्न हो गया। इस प्रकार मैं ही अविचारी प्राणी उस उर्वशी के काम पर लुब्ध हो गया था, ऐसी स्थिति में उस पर
नाराज होना अधर्म है। स्त्री देखने पर विषयलंपट पुरुष को वह अत्यन्त रमणीय मालूम होती है, किन्तु विचारी
पुरुष को वही अत्यन्त गन्दी और नरक की खान लगती है। सुअर को जिस प्रकार विष्ठा से प्रेम रहता है, उसी
प्रकार विषयी पुरुष को स्त्री का संग रमणीय मालूम होता है किन्तु विचारी लोग उसकी ओर देखकर थूकते हैं,
यही बात राजा श्लोकरूप में बता रहे हैं।
कायं मलीमसः कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोऽशुचिः।
क्व गुणाः सौमनस्याद्या ह्यध्यासोऽविद्यया कृतः ॥ १८॥
स्त्री, पुरुष ये जो नाम हैं वे केवल देह के ही लिये हैं। उसमें, स्त्रीदेह के गुणधर्म देखने से उसमें
मलीनता ही भरी हुई है। जो नित्य नये स्राव की खान है, रजस्वला के प्रवाह की वह नाली, दुर्गंधि का स्रोत
और विष्ठा से भरी हुई गठरी जो दोषों का जन्मस्थान है, विकल्प का आश्रय है, जो महादुःख का पात्र है
और जिसके कारण अधःपतन होता है। वह मन का उद्वेग बढ़ाने वाली, जिसके योग से मन को क्षयरोग की
बाधा होती है, अत्यन्त निर्लज्जता के कारण जिसका अंगसंग त्रस्त कर देता है। जिस प्रकार गन्दे मटके का
गोल किनारा बिल्ली के गले में फँस जाने पर वह घर-घर में उसी अवस्था में जाती है और पवित्र घरों के
बर्तनों को अपवित्र कर देती है उसी प्रकार स्त्रियों की संगत है। वह जिसके गले में फँस जाती है, वापस
नहीं जाती। स्त्री काम में लंपट कितने लोगों की दुर्दशा हो चुकी है, उसका कोई अन्त नहीं है। वह बिल्ली
जिस बर्तन में भी मुँह लगाती है, उसे वह किनारा अवरोध कर देता है; उसी प्रकार स्त्रीसंगति से अपार दुःख
होता है, लेकिन पुरुष उसमें सुख ही मानते हैं। मृगजल का कमल अत्यन्त मनोहर दिखाई देता है उसी
प्रकार स्त्री का मुख सुन्दर, सुहास्य, रमणीय और सुकुमार है ऐसा विषयी पुरुष वर्णन करते हैं किन्तु यदि
उनके मुँह की वास्तविक स्थिति देखें तो वहाँ नाक में सदा कफ की बस्ती रहती है। ऐसी स्थिति में वे विष
को अमृत की उपमा देते हैं। स्त्रियों के मुख से लार झरती रहती है, उसे वे अधरामृत कहते हैं। अविद्या का
बल भी धन्य है। ऐसे स्त्री देह पर देव-दानव दोनों ही लुब्ध दिखायी देते हैं। स्त्री और पुरुष इन दोनों में
आत्मा एक है। लेकिन स्त्री का रूप अविद्यात्मक है। विषयी पुरुष उसके भुलावे में आ जाते हैं। सारांश,
माया का गुण प्रबल है। स्त्री संभोग के समय आत्मा नित्यमुक्त होकर अलिप्त रहता है। यदि स्त्री संयोग में
देह को भोक्ता कहें तो देह जड़ है। वहाँ विषय-भोग का कारण मुख्य रूप से देहाभिमान है। लेकिन उसमें
भी कई हिस्सेदार हैं।