श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
चौबीसवाँ अध्याय ६६५
रहता है वही शुद्ध सत्य है। जिस प्रकार लकड़ी की गुड़िया लकड़ी के ही अवयवों से शोभा देती है उसी प्रकार
ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप से एक ही है तथा संसार के रूप में शोभायमान होता है। जिस प्रकार देह एक होकर भी अनेक
प्रकार के अवयवों के कारण भिन्न दिखायी देता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी एक ही होने पर भी वह अनेक स्वरूपों
में भासित होता है। जिस प्रकार पानी में ही क्रीड़ा करते हुए पानी तरंगों की अनेक मालिकायें उत्पन्न करता है,
उसी प्रकार परब्रह्म की लीला से ही संसार आदि वस्तु समुदाय प्रकट होता है। तरंगों के आदि, मध्य और अन्त
में जिस प्रकार पानी के रूप में पानी ही रहता है, उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय में ब्रह्म ब्रह्मरूप से
अविनाशी रहता है। इसलिये ब्रह्म सत्य है और प्रपंच मिथ्या है यह विचार साधकों के समझने के लिये
कार्यकारणों में अभिन्नभाव है, ऐसा देवाधिदेव ने कहा। कार्य यदि कारण से अभिन्न (एकरूप) है तो फिर ब्रह्म
में माया भिन्न कैसे हुई ? इस शंका के समाधान के लिये ही ब्रह्म स्वयं ही जगद्रूप से परिपूर्ण सजा हुआ है, यह
बता दिया है। ब्रह्म, माया और काल की गति अनादि है, ऐसा कहते हैं लेकिन वह भी तर्कसंगत नहीं है। इसी
उद्देश्य से श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः।
सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम्॥१९॥
माया कभी ब्रह्म से अलग नहीं दिखायी देती। वह ब्रह्म के ही आश्रय में बढ़कर गुणों का कार्य बढ़ाती है।
माया का नियंता स्वयं परब्रह्म ही है अतः उसके पास पुरुषत्व है। माया उस पुरुष की अत्यन्त प्रिय है। इसीलिये
उसे प्रकृति कहते हैं। ब्रह्म से पुरुष भिन्न है, यह कहना गलत है। ब्रह्म और पुरुष एक ही के नाम हैं। माया और
प्रकृति ये जो दो नाम हैं, उन दोनों का अर्थ 'माया' ही समझना है। वह माया कुछ अलग ही प्रकार का
अविद्यात्मक कार्य प्रकट करती है, इसलिये उसे 'अविद्या' कहते हैं। यह ध्यान में रखो की माया ब्रह्म की शक्ति
है। लेकिन वह भी ब्रह्म से एकरूप हो चुकी है। वह क्षणार्ध के लिये भी उससे अलग नहीं रहती। वह सदा ब्रह्म
में ही लीन रहती है। शूरों का शौर्य जिस प्रकार शूरों से अलग नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में यह मायाशक्ति सदा
एकरूप रहती है। माया ब्रह्म में ही रहती है लेकिन जब तक उसका क्षोभ नहीं होता तब तक वह दृष्टिगोचर नहीं
होती। माया को क्षुब्ध करने वाला काल है। इस काल से ही लोगों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्म की सत्ता ही काल
है। वह काल स्वयमेव प्रकृति को क्षुब्ध करता है और उत्पत्ति, स्थिति और लय का दर्शन कराता है। वह काल भी
ब्रह्म से एकरूप है। जिस प्रकार राजा के लड़के को राजा ही वश में रख सकता है उसी प्रकार प्रकृति से जो काल
जन्म लेता है उसे वह अपनी सत्ता से नष्ट करती है। वैचारिक दृष्टि से देखें तो काल और परमात्मा दोनों एकरूप
हैं। इसीलिये प्रकृति, पुरुष और काल में एकरूपता रहती है। ब्रह्म, काल और माया का सम्बन्ध ऐसा है कि ये
तीनों मूलरूप से ही एकरूप हैं। उनमें व्यावहारिक दृष्टि से जो भेद है, वह मिथ्यत्व के कारण असंबद्ध ही है।
ब्रह्म एक ही है। प्रकृति और पुरुष के स्वरूप कालरूप से अलग मालूम होते हैं। यदि उन्हें अखण्डत्व से देखें तो
मैं श्रीकृष्ण परमात्मा ही हूँ। उत्पत्ति से पूर्व पूर्ण ब्रह्म मैं हूँ, उत्पत्ति का आदिकारण जो ब्रह्म है वह मैं हूँ और
स्थिति काल में ब्रह्मरूप में मैं ही हूँ। इस प्रकार मैं स्वयं ही एक में अनेक रूप दिखाता हूँ। अपनी ही लीला से
सृष्टि के अन्त में, प्रलयके बाद मैं परिपूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता हूँ। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
सर्गः प्रवर्तते पौर्वापर्यण नित्यशः।
महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥२०॥
६६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पिता, पुत्र इस परम्परा से संसार अत्यन्त विशाल बन गया है। यह बिलकुल अखण्ड निरन्तर रहने वाला
तथा अत्यन्त असाध्य रूप में बढ़ा हुआ है। यह कैसे हुआ ? उसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बता रहे हैं। विषयों
की आसक्ति से वृत्ति वासनानिष्ठ हो जाती है और वह देवभावना से अत्यन्त प्रेम से संसार का स्वरूप बढ़ाती है।
जो देहाभिमान उफन रहा होता है, वह उस परब्रह्म में जीवत्व उत्पन्न करता है और नाना प्रकार की योनियों में
जन्म-मरण मुख्य रूप से बढ़ाता रहता है। इस प्रकार ब्रह्मदेव की आयु तक ऐसे ही कायम रहता है और
महाप्रलय के समय सृष्टि का संहार होता है। एक नित्य प्रलय चल रहा है और एक दैनंदिन प्रलय है। उसी
प्रकार एक कर्मजन्य प्रलय होता रहता है और एक अन्य प्रलय होता है। लेकिन इन सारे प्रलयों से अधिक श्रेष्ठ
ब्रह्मप्रलय है। वह सारी सृष्टि का संहार करता है और संसार में कुछ भी शेष नहीं रहने देता। ब्रह्मप्रलय में सृष्टि
का विनाश करना और फिर नये कल्प के प्रारम्भ में सृष्टि की रचना के लिये ऊँच-नीच नाना प्रकार की योनियों
के लिये तैयार करना, इसका क्या तात्पर्य है ? ब्रह्म प्रलय में सृष्टि का विलय अवश्य होता हे लेकिन पूरी तरह
विनाश नहीं होता। वासनारूप बीज कुछ शेष रह जाता है जो अविद्या के अंग में पूर्ण रूप से रच-बस गया होता
है। उसी वासनारूप बीज से कल्प का प्रारम्भ होता है। ब्रह्मदेव के रूप में मैंने स्वयं ही मुझसे अनुग्रह कर वह
सूक्ष्म कारण दिखलाने को बाध्य किया। जिस प्रकार वर्षारृतु में नानाप्रकार की घास बढ़कर शरद ऋतु में अपने
पूर्णत्व पर पहुँचती है और उसके ही बीजकण गर्मियों में पृथ्वी से मिल जाते हैं। वे चारों ओर बिखरे रहते हैं
लेकिन किसी को दिखायी नहीं देते उसी प्रकार प्रलय के अन्त में संसार वासना बीज के रूप में अव्यक्त शेष
रहता है। जिस प्रकार गर्मियों में इधर-उधर बिखरे हुए बीज वर्षाकाल में बारिश होते ही जोर से बढ़ते हैं और
नाना प्रकार की घास पहले की ही तरह बढ़ती रहती है। उसी प्रकार उत्पत्ति काल में सूक्ष्म वासनारूप बीजांकुरों
से अनेक योनियों में चराचर और स्थावर-जंगमात्मक संसार बढ़ता जाता है। ब्रह्मदेव के प्रलय में भी सृष्टि का
पूर्ण रूप से विनाश नहीं होता। इसीलिये संसार अनंत है ऐसा वेदशास्त्रों ने प्रतिपादन किया है। लेकिन इस प्रकार
संसार अनंत होते हुए भी इसका निःशेष विनाश हो सकता है इसी अर्थ का श्लोक का शब्दार्थ श्रीकृष्ण ने
सुनाया। 'ईक्षण' का अर्थ 'सद्गुरु की पूर्ण कृपादृष्टि' है। जिनके योग से ब्रह्मज्ञान प्रकट होता है, वही मेरा
कृपावलोकन है। यदि ब्रह्मज्ञान पूर्ण प्रकट हो जाय तो संसार का अस्तित्व ही मानो समाप्त हो जाता है। फिर ब्रह्म
ही ब्रह्मरूप से, पूर्ण स्वरूप से रहता है। 'मैं' 'तू' की बात समाप्त हो जाती है। फिर ध्रुव मण्डल की बात ही
समाप्त हो जाती है। 'मैं' 'तू' पन खो जाता है, देवता, भक्त और भजन यह भेद नष्ट हो जाता है। सगुण भक्ति
का भान उड़ जाता है और सदा सर्वदा ब्रह्म ही शेष रहता है। प्रपंच नाम की कोई बात भी मिथ्या लगने लगती
है। या आगे कभी होगा ऐसा कल्पांत में भी नहीं घट सकता। यह अत्यन्त प्रलय का लक्षण है, वह भाग्य के
बिना कभी समझ में नहीं आएगा। जिन्हें सचमुच ही सद्गुरुचरणों का लाभ हुआ है, वे भाग्यवान लोग ही उसे
समझ सकते हैं। अत्यन्त प्रलय की गति सबकी समझ में नहीं आती क्योंकि, उद्धव ! वह वास्तव में परमनिर्वाण
की ही गति है। जिसका अहंकार समाप्त हो जाता है, उसकी कल्पना भी निःशेष होती है और उसी को
आत्मस्वरूप का बोध होने के कारण अत्यन्त प्रलय का लाभ होता है। देहावसान होते ही प्रलय हुआ यह कहना
बिलकुल असत्य है। यदि आत्मनिष्ठा हो तो जीवित अवस्था में ही यह प्रलय प्राप्त हो सकता है। जीवित
अवस्था में यह प्रलय हो जाय तो उसके कारण संसार का बीज ही जल जाता है। अब ब्रह्मप्रलय के सम्पूर्ण
लक्षण बताता हूँ, सुनो। ब्रह्माण्ड प्रलय का जो क्रम है, उसमें अन्त में पूर्ण ब्रह्म शेष रहता ही है। उद्धव को जानने
के लिये पुरुषोत्तम यह मर्म बतलाते हैं।
चौबीसवाँ अध्याय ६६७
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः।
पञ्चत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह॥ २१॥
चौदह लोकों के साथ इस प्रचण्ड ब्रह्माण्ड की रचना काल ने कल्पना से की है। उसके अस्तित्व के समय
से ही उसका पालन-पोषण कर उसके विनाश का प्रयत्न भी काल ही करता है। ऐसा वह काल कौन है? यदि
तुम यह प्रश्न पूछते हो तो समझ लो कि उस काल का आत्मा मैं ही हूँ। उसी कालस्वरूप से मैं सृष्टि की ओर
संहार की दृष्टि से देखता हूँ। पंचमहाभूतों के जो भिन्न-भिन्न विभाग हैं, उनकी रक्षा काल ने ही की है। उस सत्ता
को जब मैं समेट लेता हूँ तो पंचमहाभूतों में अफरातफरी व्याप्त हो जाती है। जिस प्रकार उत्पत्ति का क्रम है,
उसी प्रकार प्रलय का भी क्रम है। भूतों में ही भूतों का सहज विलय हो जाता है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते।
धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२॥
प्रलय की दृष्टि से देखें तो अनावृष्टि छा जाती है और सृष्टि में अन्न की कमी हो जाती है, अन्न क्षीण होने
से शरीर भी क्षीण होता है। यहाँ 'अन्नमय प्राण' होता है यह वचन प्रत्यक्ष है ही। अन्न कम होने पर प्राणियों के
प्राण भी निकल जाते हैं। अन्न की बाढ़ रुक जाने से वह स्वयं बीज रूप में ही रहता है। किन्तु उद्धव! वह
तत्काल पृथ्वी में ही एकरूप हो जाता है। इतने में बारह सूर्यों का समुदाय सूर्यमण्डल में एकत्र होता है। वह
पर्वत, पत्थर आदि को भी भस्म कर देता है और घास को भी शेष नहीं रहने देता। उसके कारण सप्त पाताल
तप्त हो जाते हैं और शेष का मस्तक झुलसने लगता है। वह विषाग्नि की ज्वाला उगलने लगता है और उसकी
ज्वाला भड़कने लगती है। शेष के मुख से निकली उस अग्नि से पृथ्वी पर की सभी वस्तुएँ जल जाती हैं।
तत्काल सारा ब्रह्माण्ड जल जाता है और पृथ्वी पूरी तरह भस्म हो जाती है। उस समय पृथ्वी का अस्तित्व समाप्त
हो जाता है और वह केवल गन्धस्वरूप से शेष रहती है। फिर वह गन्ध भी पानी में घुल जाता है, यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे।
लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३॥
उस समय प्रलय मेघों के विराट समुदाय सूँड़ जैसे विशाल धाराओं से भयानक वृष्टि करते हैं। इस प्रकार
सौ वर्ष तक अखण्ड वर्षा होने के कारण सात समुद्रों का समुदाय एकत्र होता है। चारों ओर जल ही जल एकत्र
हो जाता है और उसमें पृथ्वी का बचा-खुचा अंश गन्ध में घुल जाता है। उस समय चारों ओर एकत्र जल प्रलय
की सार्थकता को सिद्ध करता है। सांवर्तक मेघों की पहचान यह है कि वे प्रलयकाल में सभी समुद्र एकत्र करते
हैं और पृथ्वी को उसमें घोलकर स्वयं भी घुल जाते हैं। उस समय अत्यन्त भीषण सांवर्त अग्नि क्षुब्ध होता है
और वह सभी जगह का पानी सुखाकर केवल रस शेष रखता है। फिर रस के रूप में जो पानी शेष रहता है, वह
भी तेज में विलीन हो जाता है और फिर वही तेज दसों दिशाओं में व्याप्त हो जाता है। उस सांवर्ताग्नि का क्या
वर्णन किया जाय? वह केवल पृथ्वी के जल का शोषण कर शान्त नहीं बैठता, अपितु वह अपनी दाहक शक्ति
को स्वयं जलाता है, जिसके कारण उसे सांवर्ताग्नि यह नाम प्राप्त हुआ है। इतना होने के बाद उसी काल के योग
से जोर की हवा चलती है और वह उस तेज को सोख लेती है। उस तेज का पूरी तरह शोषण हो जाने के बाद,
केवल रूप शेष रह जाता है।
६६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।
अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु ॥ २४ ॥
तेज का जो रूप शेष रह जाता है उसका वायु शोषण कर उसे निराकार बना देता है, उस समय चारों ओर
केवल वायु ही भर जाता है। फिर उस चारों ओर भरे हुए वायु को आकाश वहीं निगल लेता है, तब वायु स्पर्श
के रूप में प्रवेश कर केवल स्पर्श के ही रूप में शेष रहता है। वायु के उस शेष बचे हुए स्पर्श स्वरूप का लय
आकाश में तत्काल हो जाता है। फिर आकाश शब्द में प्रवेश करता है और वह शब्दतन्मात्र शेष रहता है। मुट्ठी
बन्द करने पर जिस प्रकार पाँचों उँगलियाँ उसमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार दस इन्द्रियों का यह समुदाय जो
राजसगुण से उत्पन्न होता है, वह अपने गुण में जाकर लुप्त हो जाता है।
योनिवैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥
जो वैकारिक सत्त्वगुण है, वह देवता तथा अंतःकरण भी उत्पन्न करता है। वह भी प्रलय के स्वभाव धर्म
के अनुसार स्वयं मन में प्रवेश करता है। मन सभी इन्द्रियों का राजा है। 'जीवत्व' और 'शिवत्व' भी मन की ही
कल्पना है। श्लोक में वर्णित 'मनसीश्वर' शब्द से श्रीकृष्ण पूर्ण रूप से मन के ही विषय में बोल रहे हैं।
मनोदेवता अंतःकरण के साथ सत्वगुण में प्रविष्ट होती है। कार्य-विशेष का जो कारण होता है वहीं वे जाते हैं।
फिर पहले से बचे हुए शब्दतन्मात्र, तामस में जाकर एकरूप होते हैं। उद्धव! वास्तव में कारण में ही कार्य का
विलय होता है, इसे ध्यान में रखो। तीन गुणों से युक्त अहंकार एकत्र होकर अत्यन्त प्रबल हुआ रहता है। उसकी
महत्ता भी सुन लो। संसार में वह महाकठिन है। वह शिव का महत्त्व बढ़ाता है। जीव को देहात्मा में उलझा देता
है और अहंता से सारे संसार पर मोहिनी डालता है। उसके इस सामर्थ्य के कारण ही उसका महत्त्व है। ऐसा है
अहंकार! वह यदि परमार्थ में सहायक बन जाय तो सोहंभाव (ब्रह्म मैं ही हूँ उस भावना के) के योग से तत्काल
संसार का विनाश कर दे। चोर ही जब विश्वासपात्र मित्र बन जाता है तो वह चोर ही अन्य चोरों का निवारण
करता है। उसी प्रकार जब अभिमान ही सहायक बनता है तो संसारभय की बाधा नहीं होती। उद्धव! इस प्रकार
अभिमान सामर्थ्य सम्पन्न होने के कारण ही मैंने उसकी महत्ता का वर्णन किया। तीन गुणों से उत्पन्न यह
गुणाभिमान, पूर्णरूप से एकत्र होकर महत्तत्त्व में विलीन होता है और उससे एकात्मता प्राप्त करता है।
स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः।
तेऽव्यक्तेसम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
इस समय वह महत्तत्त्व भी कारणगुणों में लीन था और गुण साम्य के कारण सचमुच ही अव्यक्त में (मूल
माया में) लीन था। उस समय जब समस्त आकार-विकार नष्ट हो जाते हैं, तब केवल बीज शेष रह जाता है।
उसे ही 'अव्यक्त' कहते हैं। वट का न आकार है न विकार है, न अग्र है, न मूल है, न पत्र है न पुष्प है, अवशेष
केवल बीज रहता है, उसी प्रकार यह संसार अव्यक्त में ही रहता है। वट का यह बीज आँखों को दिखायी भी
नहीं देता। उसी प्रकार संसार का बीज भी अव्यक्त ही रहता है, वह जीव को सरलता से दिखायी नहीं देता।
अनेक प्रकार के तृण के बीज गर्मी में काल जमींदोज कर देता है, उसी प्रकार अव्यक्त रहने वाला संसार बीज
भी काल से एकरूप हो जाता है। देखिये इसी को अव्यक्त का काल में विलय कहते हैं। काल को ही महाबाहु
कहते हैं। उसका विलय पुरुष में होता है।
चौबीसवाँ अध्याय ६६९
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।
आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७॥
पुरुष की क्षुब्धावस्था को ही वास्तव में काल कहते हैं। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये तीनों अवस्थाएँ काल
की ही हैं। ये तीनों अवस्थाएँ समाप्त होने पर काल का वहाँ कोई काम नहीं रहता। इसलिये वह स्वाभाविक
व्यापार से ही जीव में एकरूप होता है। जो अचेतन को चेतना देने वाला है और जड़ को सजीव करने वाला है,
उस पुरुष को इसी गुण के कारण 'जीव' कहा गया है। प्रकृति के योग से शुद्ध को ही जीव कहते हैं, उसे ही
'पुरुष' की संज्ञा देते हैं। यदि प्रकृति के बारे में विचार करें तो वह केवल मृगजल की तरह है। वह प्रत्यक्ष
दिखायी देती है लेकिन उसमें 'सत्यता' बिलकुल नहीं है। मृगजल में जो गिरेगा, वहाँ जब 'पानी' है ही नहीं तो
वह डूबेगा कैसे ? उसी प्रकार प्रकृति के न होने पर 'जीवत्व' किससे जुड़ेगा ? समुद्र की ओर देखें तो पानी में
आकाश डूबा हुआ दिखायी देता है लेकिन उसे सच मानना मूर्खता है। उसी प्रकार रूप, नाम, गुण, कर्म यह सब
माया का भ्रम है। उद्धव ! प्रकृति के अस्तित्व काल में भी 'जीवत्व' सत्य नहीं है। उस सम्बन्ध की सत्यता भी
पूर्णरूप से बताता हूँ। जब हम दर्पण में देखते हैं तो वहाँ हम स्वयं देखते हैं। लेकिन फिर भी हम अलग से हैं
ही ऐसा हम समझते हैं। उसी प्रकार उद्धव ! प्रकृति के अनुरोध से कर्म करते समय यद्यपि मैं उसके भीतर
दिखायी देता हूँ, फिर भी मैं प्रकृति से भिन्न हूँ, यह ध्यान में रखो। आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है
फिर भी वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार प्रकृति का कर्म मैं भले ही करूँ लेकिन उसमें मेरा अंग लिप्त नहीं
होता। इस प्रकार विचार करने से प्रकृति का ही अभाव हो जाता है और उसके कारण 'जीव' और 'शिव' ये नाम
भी व्यर्थ हो जाते हैं क्योंकि जो 'जीव' है वही परमात्मा है, इसे ध्यान में रखो। 'जीव' का 'जीवत्व' समाप्त होने
पर सहज ही 'शिवत्व' भी समाप्त हो जाता है और दोनों ही आत्मस्वरूप से परिपूर्ण हो जाते हैं। जीव को
आत्मस्वरूप का स्मरण होना इसी का नाम है जीव का परब्रह्म में विलीन हो जाना। वह परमात्मा अजन्मा,
अव्यय, अविनाशी, अद्वय और अनन्त है। ब्रह्म में जब ब्रह्मस्वरूप में ही स्फुरण नहीं होता तो वहाँ 'मैं' और 'तू'
कहेगा कौन ? उद्धव ! उस समय परिपूर्ण परमानन्द ही शेष रहता है। ऐसा परमानन्द कौन है ! जो अज, अव्यय,
आनन्दस्वरूप ऐसा जो श्रीकृष्ण मैं हूँ, वही परमानन्द स्वरूप है, यह जान लो। उस परमानन्द को मेरे सिवा कोई
स्थान ही नहीं है। उद्धव ! और जिस स्वानंद का नाम श्रीकृष्ण है, वही तुम्हारा भी स्वरूप है। उसमें 'मैं' या 'तू'
वाला भाव नहीं है। केवल परमकारण ही शेष रहता है। उद्धव ! तुम्हारे जीव का जो जीव है वह मैं श्रीकृष्ण ही
हूँ। मुझमें और तुझमें कोई अलगाव नहीं है। इसीलिये जीव का परम कारण यह मेरी पहचान मैंने तुम्हें बतायी।
मैं श्रीकृष्ण सारे संसार का आत्मा हूँ और मेरा पूर्ण आत्मा, उद्धव तुम हो। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव
भौंचक्का हो गया। कृष्ण मुझे अपना आत्मा कहता अवश्य है किन्तु कृष्ण की महिमा भी मैं नहीं जानता।
पुरुषोत्तम की लीला अगाध है। वह हमारी समझ में कैसे आयेगी? व्यर्थ का ही उद्धवपन मुझमें आ गया है।
लेकिन कृष्ण की दृष्टि से देखें तो मुझे मेरा 'मैं' पन नहीं दिखायी देता। मैं अपना उद्धवपन छोड़ दूँ तो कृष्ण
सचमुच निजधाम को चले जायेंगे। वह दुःखद प्रेमावस्था मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। उद्धव की यह स्थिति
श्रीकृष्ण की समझ में आ गयी इसलिये उससे सम्बन्धित कथा वह सुनाने लगा।
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः ॥ २८॥
६७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकृति पुरुषों का विवेचन कर मैंने तुम्हें आदि, मध्य और अन्त इन तीनों अवस्थाओं का ऐक्य दिखला
दिया। फिर उनमें व्यर्थ ही भिन्नता क्यों मानते हो ? उत्पत्ति के पूर्व भी पूर्ण ब्रह्म ही रहता है। उत्पत्ति का कारण
वही होता है और यह जो संसार आकार रूप में प्रकट हुआ है, वह भी ब्रह्मस्वरूप ही है, यह भी तुम्हें दिखा
दिया है और प्रलय के अन्त में ब्रह्म जैसा का तैसा शेष रह जाता है, उस सम्बन्ध का अनुभव भी तुम्हें बता
दिया। प्रकृति से पुरुष भिन्न है। प्रकृति को अलग से देखें तो वह मिथ्या है। प्रकृति पुरुष का यह ज्ञान जिसे हो
जाता है उसे 'मैं' और 'तू' पन का आभास नहीं होता। जहाँ 'मैं' पन और 'तू' पन नहीं है, वहाँ विकल्प की
कल्पना कौन करेगा.? सृष्टि के आदि और अन्त में परब्रह्म परिपूर्ण है यह ज्ञान जिसे प्राप्त होता है, प्रकृति पुरुष
का विचार और उनका वह सांख्य दर्शन जिसके मन में जागृत रहता है, उसके मन में हे उद्धव ! कल्पांत में भी
विकल्प की उत्पत्ति नहीं होती। जिसके मन में प्रकृति पुरुषों का विचाररूपी सूर्य पूरी तरह उदित हो चुका है,
वहाँ विकल्परूप अँधेरी रात कैसे रह पायेगी ? जिसे प्रकृतिपुरुष का अत्युत्तम ज्ञान है, उसका मन विकल्प भूल
ही जाता है। उसके अंतःकरण में ज्ञानरूपी सूर्य अज्ञानरात्रि पूर्ण रूप से नष्ट कर उदित होता है। जहाँ का अज्ञान
ही नष्ट हो जाता है वहाँ विकल्प को स्थान कहाँ ? इस प्रकार यह सांख्यतत्त्व विचार साधकों का बहुत उपकार
करने वाला है। उद्धव ! यह सार का भी सार, यह गुप्त ज्ञान का भण्डार, जो विचाररत्नों का समुद्र है, वही सच्चा
सांख्यशास्त्र है।
एष सांख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः ।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया ॥ २९ ॥
मैं विचारों का विचार हूँ मैं सूर्य का आदि सूर्य हूँ। मैं ज्ञानियों का ज्ञानरूपी मुकुटमणि. हूँ, मेरी वह
पूर्णावस्था, वही सांख्य मत है। मैं वेदों का आदिवेद, मैं उपदेश का आद्य उपदेश और मैं आनन्द का आत्मानंद
हूँ। मेरा ज्ञानोपदेश ही सांख्यतत्त्वज्ञान है। उस श्रीकृष्ण ने आत्मज्ञान स्पष्ट कर सांख्ययोग के साधन से अव्यय
होकर ब्रह्म भी दिखला दिया। जिस प्रकार हथेली पर गोल आँवला स्पष्ट रूप से दिखायी देता है, उसी प्रकार
सांख्ययोग के साधन से साक्षात परब्रह्म तुम्हें तुम्हारी आँखों से दिखा दिया। जो आँखों से ब्रह्म देखने जाता है वह
सर्वांग से ही देखने वाला (तन्मय) हो जाता है, यही सांख्ययोग की चाभी है। यह सांख्ययोग अनुक्रम अन्वय
व्यतिरेक से विचार करके देखें तो ब्रह्म अखण्ड तथा अद्वय है यह रहस्य मालूम हो जाता है। उत्पत्ति, स्थिति
अथवा प्रलय में ब्रह्म अखण्ड एवं स्वयं नित्य है, यही ज्ञान साधकों को सच्चे सांख्ययोग से प्राप्त होता है। जिन्हें
ब्रह्मज्ञान का शौक रहता है उनका वह शौक सांख्ययोग पूरा करता है और लिंगदेह के विशाल और प्रबल वृक्ष को
समूल गिरा देता है। लिंगदेह अत्यन्त कठिन अवश्य है, लेकिन जिस प्रकार अग्नि में घास गिर जाय, उसी प्रकार
सांख्य योग के सामने वह भस्म हो जाता है। लिंगदेह नमक का एक प्रचण्ड पर्वत है तो सांख्य प्रलयकाल का
तूफानी समुद्र है। वह समुद्र जब क्षुब्ध होता है तो अपने जल में उस पर्वत को घोल देता है और अपनी ही तरह
सारा पानी एकाकार कर देता है। उद्धव ! यह ज्ञानसागर जब क्षुब्ध होता है तो संशय के लिये कोई स्थान शेष नहीं
रहता। हे उद्धव ! जो ज्ञान सारे संशयों को काटता है, लिंगदेह का भेद करता है, वह सांख्ययोगज्ञान है इसे
निश्चित रूप से जान लो। अनुलोम तथा प्रतिलोम का विवेचन करना कठिन मालूम होगा लेकिन यह विवेचन
किये बिना ही सांख्य सुलभ ढंग से समझ में आ जाय ऐसी युक्ति बताता हूँ, सुनो। विभिन्न आकारों में दिखायी
देने वाले भेद छोड़कर, समस्त प्राणिमात्र में भगवत्स्वरूप ही भरा हुआ है, इस भाव से जो देखेगा उसे समूल
सांख्य प्राप्त होगा। अथवा कर्माचरण जैसा भी हो रहा हो, उसे होने दीजिये। लेकिन मैं कर्ता हूँ, ऐसा मत कहो।
इतना कर देने से ही तुम पूर्णब्रह्म हो जाओगे। इससे अधिक सुलभ मार्ग मुझे नहीं दिखायी देता। उद्धव! तुम्हारे
आत्मकल्याण के लिये मैंने यह कहा। मेरा यही भाषण पूरी तरह मनन कर अपने कल्याण के लिये हम उसका
आचरण अवश्य करें। देवाधिदेव की इन बातों पर उद्धव की भक्ति स्थिर हो गयी। जरा देखिये। निःशेष अहंता
छोड़ देने से मनुष्य स्वयं ब्रह्म हो जाता है। सांख्यज्ञान का विचार करने से दिखायी देता है कि अहंकार ही संसार
को डुबोता है। 'अहं' भाव के साथ ही जन्म-मरण रहता है। अहंभाव के पास भयंकर दुःख भी रहता है। इस
प्रकार अहंभाव नितान्त कठिन है। उसे छोड़ने का प्रयत्न करने पर भी वह स्वयं नहीं छूटता। लेकिन उसके इस
उलझन का कारण क्या है, यह समझ में नहीं आता। यदि भगवान से पूछने जाओ तो उन्होंने सांख्यशास्त्र को
स्पष्ट करके बतला दिया है। इसीलिये श्रीकृष्ण पचीसवें अध्याय में सगुण और निर्गुण इन दोनों प्रकारों से भेद का
मधुर निरूपण करेंगे। वह कथा सुबोध, रसपूर्ण और मधुर है। जहाँ श्रीकृष्ण जैसा सुनानेवाला और उद्धव जैसा
श्रोता हो, वहाँ स्वाद तो निरुपम होगा ही। उस स्वाद के माधुर्य का वर्णन करने के लिये श्रीकृष्ण समर्थ हैं और
उस माधुरी का सेवन करने के लिये अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न श्रोता उद्धव उपस्थित हैं। भगवान और भक्त के बीच
संवाद का माधुर्य वेदशास्त्रों से भी नहीं प्राप्त होगा। करोड़ों ग्रन्थों का अवलोकन करने पर भी वह माधुर्य प्राप्त
नहीं होगा। वह माधुर्य तभी प्राप्त होगा जब भाग्य से भावार्थ हाथ लग जाय क्योंकि भावार्थ की चाह से भगवान
अपने अंतःकरण का माधुर्य भक्तों को देता है। सारांश, भगवान को भावार्थ के सिवा और कुछ भी प्रिय नहीं है।
वह भाव ही जिनके पास नहीं है वे केवल मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो बालक कंकड़ बिछा कर उन्हें भगवान
कहते हैं, उन बालकों की भक्ति भी धन्य है और वहाँ भी विश्वास करने पर ईश्वर प्रकट होता है। बालक
उपमन्यु जब दूध के लिये भावार्थ से भगवान से हठ करने लगा तो उन्होंने क्षीरसागर को ही कटोरी की तरह
उसके मुँह से लगा दिया। सारांश, जो भाविक है वही भगवान का लाडला होता है और भगवान भी भाविकों का
सेवक होता है। बिना भाव के भगवान कभी किसी से नहीं मिलता। इसलिये जहाँ भावार्थ होता है, वहीं सुख का
लाभ होता है। जहाँ भावार्थ होता है, वहीं परमार्थ भी पूर्णरूप से प्राप्त होता है। इस प्रकार भावार्थ बढ़ाने से
निर्गुण प्राप्ति की इच्छा भी तृप्त होती है। इसी अर्थ का वृतांत श्रीकृष्ण अगले अध्याय में सुनायेंगे। उस कथा के
रसपूर्ण वर्णन के माधुर्य से लोग अमृत की मधुरता भी भूल जायेंगे। श्रीकृष्ण का कथामृत श्रोताओं के श्रवणरूपी
मुख में पड़ेगा। एकनाथस्वरूपी जनार्दन को भी अत्यन्त हर्ष होगा और वह बड़े कौतुक से उसका व्याख्यान
करेंगे। श्रीभागवत ने बड़े सम्मान के साथ श्रीकृष्ण कथा के विस्तार का उत्तम उपहार दिया है और परमार्थरूपी
अलंकार से उसे सुशोभित किया है। उस उपहार के श्रवण के प्रति उत्पन्न सम्मान कर मैं अपने आप्त संत सज्जनों
का गौरव करूँगा। जनार्दन ने एकनाथ पर इतनी कृपा की इसलिये वे अपना सामर्थ्य प्रकट कर रहे हैं। केवल
सम्बन्धी सज्जनों का आदर किया और अन्य लोगों की उपेक्षा की हो ऐसी बात नहीं है। श्री भागवत का जो
ध्यानपूर्वक श्रवण करेगा उसका गौरव परमार्थ से ही होगा। वास्तव में, भावार्थ ही गौरव है। उसे एकनाथस्वरूपी
जनार्दन जानते हैं, इसलिये एकनाथ भी जनार्दन की शरण में जाकर स्वयं ही गौरवान्वित हो रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे श्री कृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
प्रकृति पुरुष सांख्य योग नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।
पच्चीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप निर्गुण देव! तुम्हें नमस्कार है यह कहना चाहें तो गुण कहीं दिखायी नहीं पड़ता और गुण
के बिना निर्गुणपन तो कभी नहीं आयेगा। इसलिये निर्गुणपन कभी नहीं होता। लेकिन सगुणपन भी तुम स्वीकार
नहीं करते। इस प्रकार तुम गुण अथवा अगुण को स्पर्श नहीं करते। इसलिये हे गुरुराया! तुम पूर्णतयः अगुणी हो।
उसी प्रकार तुम अगुणी के विपरीत गुणी हो। लेकिन तुम त्रिगुण के गुणों का विनाश कर देते हो। संसार में
पंचमहाभूतों से मुक्ति दिलानेवाला एक जनार्दन ही है। जिसके योग से दुष्टजनों का संहार होता है, जिसके योग
से लिंगदेह का नाश होता है, जो जीव को जीव से ही जान से मारता है वह जनार्दन कृपालु कैसे होगा? लेकिन
जनार्दन का कृपालुपन लोग बिलकुल नहीं जानते। न समझने का कारण यही है कि वे देहाभिमान नहीं छोड़ते।
जननी के पेट से जन्म होता है इसलिये मनुष्य को 'जन' कहते हैं। उस 'जन' के जन्म का ही संहार करता है,
इसलिये उसे जनार्दन कहते हैं। मृत्यु को ही मारकर आयु बढ़ाता है, जीव को मारकर उसे जीवन प्रदान करता है
और देह में ही विदेह की स्थापना करता है ऐसी जनार्दन की कृपा है। जन जो भी इच्छा करता है, उसे जनार्दन
पूरा करता है। जो पूर्ण समाधान चाहता है, उसका देहाभिमान नष्ट कर डालता है। लेकिन जनार्दन के सामने
अहंकार आया ही कब था? अगर आ जाय तो वह हाथ में शस्त्र लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। जिस
प्रकार सूर्य के प्रकाश से अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार जनार्दन के नाम के सामने
अहंकार कब तक टिक पायेगा? गुरुनाम का घोष होते ही अहंकार पूर्णरूप से विलीन हो जाता है। फिर ऐसे
गुरुनाम के सामने दुःखदायी संसार कब तक टिक पायेगा? इच्छा से जिसके नाम का स्मरण करें तो वह संसार
का बाँध तोड़ डालता है, जीव का जीवबन्धन तोड़ देता है, उसके उस नाम का माधुर्य मोक्ष को भी लज्जित
करता है। जिसका नाम मोक्ष से भी ऊँचा पद दिलाता है उसकी कृपा के बारे में मैं यहाँ क्या कहूँगा? लेकिन वह
नामप्रताप भी जिसकी बराबरी नहीं कर सकता उस सद्गुरु की महिमा हमें किस प्रकार मालूम होगी? निरूपम
को कौन-सी उपमा दी जाय? गुरु की कीर्ति अगाध और गहन है। उसके गुणों की गिनती करना चाहें तो वे
अनंत हैं। वह स्वयं नित्य निर्गुण है। उससे हम क्या लें? यदि दौड़कर उसके पास जाना चाहें तो उसका न कोई
गाँव है न कोई स्थान है। एक सद्भाव के अतिरिक्त उसका लाभ उठाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि सद्भाव
से उसका नामस्मरण करें तो उस स्मरण के साथ ही गुरु प्रकट होता है और जिस प्रकार समुद्र स्वयमेव नमक से
मिलने आया और इसलिये सागर को आलिंगन देने के साथ ही जिस प्रकार नमक का पानी हो जाता है, उसी
प्रकार सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर जन ही जनार्दनस्वरूप हो जाता है। उस समय जन, वन अथवा विजन में
भिन्नता नहीं दिखायी देती। इसलिये जो जन है, वही जनार्दन है और जनार्दन ही सारे जन है। यह उपनिषद् का
सारांश है और यही जनार्दन का सच्चा स्वरूप है। इसी अभेदभाव से यहाँ भगवान ने सांख्यशास्त्र बताया। वह
यही है कि परब्रह्म उत्पत्ति, स्थिति और लय इनमें निरन्तर परिपूर्ण ही रहता है। यह सांख्यमत सुनकर उद्धव मन
ही मन विचार करने लगा कि यदि अहम्भाव ही संसार को बढ़ाता है तो क्यों न उसे छोड़ दिया जाय? लेकिन जो
अहंकार अंतःकरण से चिपका हुआ है उसे छोड़ने जाओ तो वह जल्दी नहीं छूटता। यह बात यदि श्रीकृष्ण से
पूछी जाय तो उसने इसीलिये सांख्य शास्त्र बताया है। समस्त प्राप्ति का रहस्य जो सांख्य है उसी का वर्णन
पच्चीसवाँ अध्याय ६७३
भगवान ने किया है और उसी में अहंभाव छोड़ दिया जाय यह निश्चित किया है। सचमुच, मेरे सामर्थ्य से मेरा
'मैं'पन नहीं जाएगा और निर्लज्ज की तरह श्रीकृष्ण से कितनी बार पूछें? उद्धव के मन की यह चिन्ता श्रीकृष्ण ने
जान ली। श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु होने के कारण वह अहंता नष्ट करने के उपाय बताने
लगा। आज उद्धव का भाग्य पूर्णरूप से प्रकट हो गया। संसार में उद्धव ही अत्यन्त धन्यवाद का पात्र है। जिस
पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो उठा उसे प्रश्न किये बिना ही अपना रहस्य बताने लगा। क्या बालक बताता है कि उसे
भूख लगी है? और तब माँ उसे स्तनपान कराती है? नहीं। वह तो अपने अंतःकरण की व्यथा से स्वयं ही
दौड़कर उसके पास जाती है और उसे स्तनपान कराने लगती है। लेकिन श्रीकृष्ण के मन में उद्धव के प्रति
व्याकुलता उससे कई गुना अधिक थी। अपने भक्तों के भक्ति का महत्त्व मन में आते ही श्रीकृष्ण का अंतःकरण
व्याकुल हो उठता था। बच्चे को अपनी चिन्ता नहीं होती लेकिन माँ ही उसका हित करने की ओर प्रवृत्त होती
है। उसी प्रकार उद्धव का हेतु पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण व्याकुल थे। उद्धव में जो कोई कमी हो उसे पूरा करने
के लिये श्रीकृष्ण तैयार थे। उसने उसे अपने निर्गुण का उपदेश किया। पचीसवें अध्याय में गुणों पर किस प्रकार
विजय प्राप्त की जाय इसका लक्षण बताकर वह अपना निर्गुण भी दिखला देगा। यही एकनिष्ठा का निरूपण है।
प्रकृति पुरुषों का बुद्धिपूर्वक विचार हो गया लेकिन जब तक गुणों पर विजय नहीं प्राप्त होती तब तक सुख-
दुःख और अहंभाव तो बढ़ेगा ही। तीनों गुणों से देह तैयार हुआ है। इसलिये देह में गुणों की विजय नहीं होती
क्योंकि अपने ही मूल का उच्छेद करने के लिये कोई तैयार नहीं होता। डंडा वृक्ष में ही उत्पन्न होता है लेकिन
वह कुल्हाड़ी के साथ मिलकर उससे वृक्ष का उच्छेद करवाता है। उसी प्रकार विवेक से सद्गुण मिलता है और
तीनों गुणों का समूल उच्छेद कर डालता है। इससे मूल का निर्गुणत्व अपने आप प्रकट होता है। तब गुणों का
छेदन भी मिथ्या ही है। तीनों गुण ही मिथ्या हैं और निर्गुणत्व ही नित्य और सत्य है। इसी अर्थ का निरूपण
श्रीकृष्ण स्वमुख से कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।
तन्मे पुरुषवर्यैदमुपधारय शंसतः ॥ १ ॥
जिसके चरणस्पर्श से सारी पृथ्वी पवित्र होती है; जिसके नाम से त्रैलोक्य का उद्धार होता है, जिसके गुणों
की कीर्ति श्रवण करने से महापातकों का भी विनाश हो जाता है; जिनके मृदु, मधुर एवं विपुल नाम का उच्चार
करने से परम संतोष होता है, वह पुरुषोत्तम परम प्रीति से उद्धव से बात करने लगा। सत्व, रज और तम ये तीनों
गुण मिले बिना जब भिन्न-भिन्न रहते हैं उस समय पुरुष के पास जो भिन्न-भिन्न एक गुण होता है, उससे कौन-सा
चिह्न दिखायी पड़ता है, उसे सुनें। मेरा यह भाषण जो निःसन्देह, सावधान और निर्विकल्प होकर सुनेगा वह स्वयं
ही परिपूर्ण पुरुषोत्तम हो जायेगा। मेरे स्वरूप के प्रति सद्भावना रखना यही पुरुष की उत्तम अवस्था होगी। मेरे
भाषण पर विश्वास करने से पुरुषोत्तम स्वयं घर पर आते हैं। ऐसा यह उत्तम से उत्तम निरुपम और निर्गुण स्थान
को यदि तुम मुझ पर विश्वास करो तो मैं तुम्हें सौंपता हूँ। उद्धव भक्ति भावार्थ में अत्यन्त श्रेष्ठ, वचन पर विश्वास
करने में तो अग्रगण्य हैं इसलिये श्रीकृष्ण अपने मुख से उसे 'हे पुरुषश्रेष्ठ' कह कर बुलाने लगे। इस संसार में
अनेक योनियाँ हैं। उनमें मनुष्य सबसे उत्तम है। उसमें भी सुदृढ़, अव्यंग, सम्पूर्ण अवयवों से युक्त तथा किसी भी
प्रकार की कोई कमी न हो ऐसा देह होना चाहिये। ऐसे सारे देहों में पुरुष देह ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उसमें भी
६७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विचारशील, वेदशास्त्र जानने वाला और मुमुक्षु जैसा पुरुष होना चाहिये और ऐसा पुरुष वेद, शास्त्र, विवेक आदि
में सम्पन्न होकर मेरा भजन भी करता हो और अनन्य भाव से पूरी तरह मेरी शरण में आता हो तो ऐसे भक्तों पर
मेरी पूर्ण कृपा रहती है। मेरी ही कृपा से वह मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरे भजन में रममाण रहता है। ऐसे गुणों के
सम्बन्ध में विचार करने पर, ऐसा सर्वगुणसम्पन्न एक उद्धव ही दिखाई देता है। इसीलिये यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने
'पुरुषश्रेष्ठ' इस संबोधन से उद्धव पर पुरुषत्व का अभिषेक किया। इस प्रकार उद्धव को सम्बोधित कर, तीन गुणों
का स्वभाव बताते समय श्रीकृष्ण पहले सत्वगुण का प्रतिपादन करने लगा। सत्वगुण के लक्षण अनेक हैं, किन्तु
उनमें से केवल पन्द्रह ही श्रीकृष्ण ने बतलाये। वे लक्षण जो श्रीकृष्ण ने अपने निरूपण में सुनाये, उन्हें सुनें।
शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।
तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः ॥ २ ॥
बाह्य स्फूर्ति को छोड़ अपनी चित्तवृत्ति अखण्ड आत्मा में केन्द्रित करना इसी का नाम 'शम' है। बाह्य
इन्द्रियों की चड़फड़ का शान्ति से ऐक्य कराकर विषय की इच्छा को काबू में रखना यही दम का सच्चा स्वरूप
है। उद्धव! जितने आनन्द से हम सुख भोगते हैं, उतनी ही संतोषवृत्ति से दुःख भी सहन करना, इसी का नाम
शुद्धसत्वात्मक तितिक्षा है। मैं कौन हूँ? कहाँ का हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? मैं निष्कर्म हूँ या कर्मबद्ध हूँ इस
प्रकार आत्मविचार करने का नाम है ईक्षापरिपाक ! जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों स्थितियों में भगवत्प्राप्ति
के लिये अंतःकरण का कुढ़ना इसी का नाम 'तप' है। कोई चाह कर विष प्राशन नहीं करता, उसी प्रकार प्राणांत
होने पर भी जो झूठ नहीं बोलता, सदा सत्य ही बोलता है, यही सात्विक का सत्य है। उद्धव ! जो स्वयं स्वप्न में
भी प्राणिमात्र पर निष्ठुर नहीं होता वही उसकी सच्ची परिपूर्ण भूतदया है, ऐसा समझ लो। मेरा हित किस बात में
है? मैं कौन-सा धर्माचरण करता हूँ? ऐसा जो पूर्वस्मरण है, इसी का नाम स्मृति है। हे संसार के भक्तश्रेष्ठ
उद्धव ! अत्यधिक प्रयास किये बिना जो कुछ भी मिले, उतने से ही अंतःकरण में सुखी रहना, इसी का नाम
आत्मतुष्टि है। उपजीविका के लिये अन्न आदि जो कुछ प्राप्त हुआ हो, उसमें से कुछ सत्पात्र को दान देना तथा
सारी विषयममता छोड़कर रहना इसी का नाम है त्याग। अर्थ और स्वार्थ में इच्छा बढ़ती ही जाती है, धन मिलने
पर तो वह और भी अधिक बढ़ती है। ऐसी इच्छा का यदि मन से ही त्याग कर दिया जाय तो इससे निस्पृहता
बढ़ती है। जहाँ पूर्णरूप से सर्वलक्षणयुक्त निस्पृहता रहती है उसी का नाम दृढ़ वैराग्य है। यही परमार्थ का सच्चा
भाग्य है और इसी के योग से श्रीहरि की प्राप्ति होती है। जो गुरु के वचन पर विश्वास करता है, जो अंतर्बाह्य
उसके ही प्रति समर्पित रहता है, उसकी ही देवब्राह्मणों के प्रति भक्ति जड़ती है और उसके मन में पूर्ण श्रद्धा का
वास रहता है। नरदेह में ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है। ऐसा होते हुए भी जो उसके लिये सत्कर्म नहीं करता,
विषय के लिये धर्म-अधर्म का जैसा भी मन चाहे वैसा आचरण करता है, उसकी यह कृति अत्यन्त निंद्य और
लज्जास्पद है। जिससे हमें दुःख होता है वह दूसरे को न दे, बल्कि दुःख के स्थान पर सुख ही दे, यही दया मैं
श्रीकृष्ण वंदनीय मानता हूँ। दूसरे को दुःख न देकर स्वयं सारे प्राणियों को सुख प्रदान करना, इसी का नाम
पारमार्थिक दया है। इसीलिये इसका दूसरी बार उल्लेख किया। जिस प्रकार पहले चीनी खाने के बाद कोई घास
खाये तो वह अच्छी नहीं लगती उसी प्रकार जो विषयों को गौण समझ कर ब्रह्मानंद में निमग्न हो जाता है,
उसकी उस वृत्ति को आत्मनिवृत्ति कहते हैं। कोई भिखारी जब पालकी में बैठता है तो वह अपने पहले के फटे-
पुराने वस्त्र उपेक्षा से फेंक देता है, उसी प्रकार वह विषयों की उपेक्षा कर ब्रह्मसुख को पकड़े रहता है। अन्न कण
पच्चीसवाँ अध्याय ६७५
का विकास भूसे में छिपा रहता है और भूसे के साथ ही वह पुष्ट होता रहता है। लेकिन उसी दाने को प्राप्त करने
के लिये भूसे को छाँट देना पड़ता है। उसी प्रकार ब्रह्मसुख की ही तरह देह का भी मोह होता है, लेकिन वही
ब्रह्मसुख जब हाथ तक पहुँचता है तो देह का विषयरूपी भूत खराब लगने लगता है। उसी प्रकार विषय प्रेम
छोड़कर जिसे ब्रह्मसुख में सुखप्राप्ति होती है, उसे ही हे उद्धव! सच्ची 'आत्मनिवृत्ति' कहते हैं। इन पन्द्रह
लक्षणों की स्थिति जिसमें रहती है, वही शुद्ध सत्त्व की मूर्ति है। अब 'आदि' शब्द से शोधित सत्त्व की सत्त्वृत्ती
भी श्रीकृष्ण बताते हैं। समस्त प्राणीमात्र के प्रति भगवान की भावना रखकर उनके प्रति निष्कपट बुद्धि रखना
इसी का नाम है सारे गुणों की अवस्था का छेदन करने वाली शुद्ध सात्त्विकता। इस प्रकार सात्त्विक के पास
सत्त्वगुण पूर्णरूप से रहता है। अब रज का लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।
मदोत्साहो यशः प्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः ॥ ३ ॥
काम का अर्थ है विषयों की हवस। जिस प्रकार काष्ठ आदि से अग्नि बढ़ता है उसी प्रकार काम की इच्छा
पूरी करते-करते काम की हवस भी बढ़ती जाती है। इसका नाम काम है। काम की जो क्रिया हे, वही पूर्ण ईर्षा
है। सम्पादित विद्या का अत्यन्त गर्व होना ही मद का लक्षण है। अर्थप्राप्ति होने पर भी वासना की तृप्ति नहीं
होती। ऐसी निरन्तर बढ़ती जाने वाली आसक्ति का ही वास्तविक नाम तृष्णा है। उद्धव! अत्यन्त अहंकार से जो
स्तब्धता आती है, आँखों के सामने कोई दिखायी नहीं देता, इसी का नाम स्तंभावस्था है। पैसा प्राप्त करने के
लिये इष्टदेवता की प्रार्थना करना और उसके पास प्रापंचिक सुख माँगना इसी का नाम आशा है। भिदा का अर्थ
है, भेद। प्रपंच का भान होना और 'यह मेरा' और 'यह तेरा' इस भाषण का नाम भिदा है। राजस सुख की एक
बात अद्भुत है। वह यह कि विषयसुख के जो सारे भोग हैं उसे ही लोग उत्तम सुख मानते हैं। वीर को युद्ध में
वीरश्री का संचार होना अथवा साधारण मनुष्य का पुत्रप्राप्ति के कारण उत्साहित होना अथवा परिवारजनों के
विवाह आदि समारोहों में इष्टमित्रों का उत्साहित होना, इसे 'महोत्साह' कहते हैं। शास्त्रवाद में विजयी होना
अथवा युद्ध में शत्रु को पराजित करना और इससे लौकिक दृष्टि से प्रसिद्ध होना, इसी का नाम यश है। उद्धव!
चारणों के माध्यम से अपनी यशगाथा का दिगंत में प्रसार करना इसी का नाम यशःप्रीति है। उद्धव! कविताबद्ध
भाषण सुनकर, अथवा उपहास से विनोद चलता देख राजस को हँसी आ जाती है। वह 'हास्य' प्रसिद्ध ही है।
वीर्य अर्थात् अत्यन्त प्रबल शरीर-सामर्थ्य का प्रदर्शन, इसी का नाम वीर्यशाली होना है। राजा के बल पर व्यापार
करना, सीनाजोरी का व्यवहार करना, न्याय को छोड़ स्वार्थ साधना, इसी का नाम 'बलोध्यम्' अर्थात् सीनाजोरी
है। जिसके पास ये सभी पन्द्रह लक्षण हों, उसे जीवभाव से 'राजस' समझना चाहिये। जो केवल अविचार की
ही सम्पत्ति है, उसे 'तामस' की वृत्ति समझना चाहिये। सोलह लक्षणों में उसकी स्थिति बताता हूँ।
क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः।
शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यमः ॥ ४ ॥
क्रोध काम की परिपूर्ण तथा बढ़ी हुई स्थिति लोभ का अर्थ है कंजूसी। अमृत का अर्थ है मिथ्या भाषण।
हिंसा का अर्थ है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाना। याच्ञा का अर्थ है जी हुजुरी करना। दंभ का अर्थ है अतिसम्मान प्राप्त
करने के लिये किया हुआ ढोंग। वलम का अर्थ है अत्यन्त परिश्रम के कारण आने वाली थकावट और बिना
किसी कारण के झगड़ा-बखेड़ा करने का अर्थ है कलि। शोक का अर्थ है हाहाकार। मोह का अर्थ है भ्रम की
६७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाढ़। विषाद का अर्थ है ऐसे दुःख का संचार जिससे अंतःकरण को कष्ट हो। 'आर्ति' का अर्थ है, अत्यन्त
संताप। निन्दा का अर्थ है मिथ्या आरोप लगाना। आशा का अर्थ है अत्यन्त लोभ। भी का अर्थ है भय से शरीर
काँपना। अब निद्रा का मर्म सुनो। जो आलस्य का मायका है और जो असली लम्बी सुस्ती है, वही असीम
तामसी निद्रा है। सारे उद्योग त्याग कर सुखी रहना इसी का नाम 'अनुद्यम' है। 'तम' इसी में सुखपूर्वक रहता है।
इस तमोगुण की सोलह कलाएँ हैं। वे जिस व्यक्ति के शरीर में बसती हैं, वही उस तमोगुणी रात्रि का चन्द्रमा है।
वह तामस पुरुष अविचार से अन्धा हुआ रहता है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से परिचित कराने के लिये
उनका अलग-अलग वर्णन किया। अब उनके मिले-जुले लक्षण सुनो।
सत्त्वस्य रजश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वशः।
वृत्तयो वर्णितप्रायाः संनिपातमथो शृणु॥५॥
तीन गुणों की स्थिति तुम्हें बतायी। प्रत्येक की अनंत वृत्ति है। वे भी अनंत प्रकार की होती हैं। इसीलिये
जीव को यहाँ गुणों की उलझन में फँसना पड़ता है। स्त्रियों के माथे पर केश एक-दूसरे में उलझे रहते हैं लेकिन
वे स्वयं उन्हें नहीं छुड़ा पातीं, उसी प्रकार यह त्रिगुणों की उलझन जीव नहीं छुड़ा पाता। सहेलियाँ, माँ, बहनें
एक साथ मिलकर तेल और कंघी लेकर उन उलझे बालों को छुड़ाने का प्रयत्न करती हैं, उसी प्रकार यह जीव
त्रिगुणों की चोटी है। यदि जीव के सामर्थ्य से ही त्रिगुणों के विभाग होते तो वह जीव शुद्ध सत्त्व में रहकर, बाद
में गुणातीत अवस्था में गया होता। लेकिन अपने ही इन गुणों को सुलझाना जीव के लिये संभव नहीं है इसलिये
जो भाग्यवान हैं वे गुरुचरणों पर ही एकनिष्ठ भक्ति रखते हैं। जो संसार में भाग्य से भाग्यवान बनते हैं, सद्गुरु
ही जिनकी वास्तविक माँ रहती है वे सद्गुरु विवेक वैराग्य की कंघी लेकर त्रिगुणों की चोटी सुलझाते हैं।
जिनके गुणों की उलझन एक बार सुलझ जाती है वे फिर कभी उलझन पैदा न हो इसलिये गुणों का समूल मुंडन
कर उन्हें संन्यासी बना देते हैं। कुछ का तो और ही चमत्कार होता है। उनके वैराग्य की स्थिति अत्यन्त प्रखर
होती है। वे उलझन छुड़ाने के फेर में फँसते ही नहीं। वे समूल पूरा मुण्डन करा देते हैं। विवेकरूपी कंघी जब
वैराग्यबल से चलने लगती है तो जब भक्तिबल में दुर्बल होते हैं वे बीच ही में उठकर भाग जाते हैं। ऐसे दुर्बल
लोगों को दूर भागते हुए देखने पर कितने ही अन्य लोग मोहरूपी अँधेरे में ही दौड़ने लगते हैं। कुछ तो केशों की
उलझन माथे पर वैसे ही रखकर उस उलझन में ही फँसे रहते हैं। कुछ जो बिल्कुल ही अभागे होते हैं उनकी
गुरु माँ से कभी भेंट ही नहीं होती। संसार में ऐसे अनेक बच्चे त्रिगुणों से उत्पन्न होने वाले दुःख भोगते रहते हैं।
जिनकी आयु दो परार्ध से भी अधिक है ऐसे ब्रह्मदेव भी गुणों के विभाग नहीं कर पाते। फिर गुणों का सच्चा
चयन करने का सामर्थ्य औरों में कैसे होगा? त्रिगुणों की ऐसी वृत्तियों का वर्णन मैं भी पूरी तरह नहीं कर पाता।
अतः वैसा ध्वनितार्थ निकलने वाले शब्दों में संक्षेप में वर्णन किया।
संनिपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।
व्यवहारः संनिपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः ॥६॥
गुणसन्निपात का यह प्रकार है कि एक ही अहंकार गुणों की संगति से तीन प्रकार का हो जाता है। उसके
सम्बन्ध में भी सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार व्यवहार करना, वेदाज्ञा का पालन अवश्य करना और मैं ही ज्ञानस्वरूप
आत्मा हूँ यह मानना, यह अहंकार सात्त्विक है। मैं स्वधर्म कर्म करने वाला, मैं स्वर्गादि सुखों का भोग करने
वाला, नानाप्रकार के सुख विलास मुझे ही प्राप्त होते हैं, यह समझना राजस अहंता का लक्षण है। मैं देहधारी
पच्चीसवाँ अध्याय ६७७
महान योद्धा हूँ, मैं ही शत्रु का संहारकर्त्ता हूँ, मैं सब में अजेय हूँ, यह समझना तामस अहंकार है। ममता का
स्फुरण गुणानुरूप तीन प्रकार के स्वरूपों से होता है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। 'मेरे
हृदय में जो भगवान है, वही भगवान सभी प्राणियों के हृदय में है। समस्त प्राणी मेरे ही हैं' ऐसा समझना यही
शुद्ध सात्विक गुण की ममता है। उद्धव ! जो भक्त संत, साधु, सज्जन हैं, वही मेरे सगे सम्बन्धी हैं ऐसी जो पूर्व
ममता होती है वही सात्विक ममता है, यह जान लो। जीव से अधिक प्रेम सद्गुरुचरणों पर करना यह जो ममता
का प्रकार है वह भी सात्विक ही है। जिस देवता की उपासना करनी हो उसके अनुसार शैव अथवा वैष्णव की
दीक्षा लेना अथवा देवधर्मों पर परिपूर्ण ममता रखना, यह भी सात्विक ममता ही है। शैव अथवा वैष्णव धर्म पर
ढोंग न कर उस पर इच्छा रहित ममता रखना यह सात्त्विक ममता है। अब राजस की स्थिति सुनो। निवृत्ति मार्ग
को मिथ्या समझना, केवल लौकिक भाग को ही मानना, लौकिक में मान-सम्मान की इच्छा रखना, ऐसी ममता
राजसी है। प्रपंच से प्रेम रखना, लौकिक में चाह होना, नामरूप का झंडा फहराना, यह सच्ची राजसी ममता है।
पत्नी, बच्चे मेरे हैं, शरीर संबंधी आप्तजन एवं परिवारजन को अपना समझना, धन का लोभ करना, ऐसी बुद्धि
को राजस समझना चाहिये। जिन देवताओं की भक्ति करने से नाम, रूप और धन प्राप्त होता है, वे देवता अच्छे
लगते हैं ऐसी ममता रजोगुणी है। काम्यकर्मों की चाह रखना, सकाम कर्म करने वालों को अपना समझना,
स्वर्गादि विषय सुख को सच्चा मानना यह ममता राजस है। रजोगुण की यह ममता मैंने तुम्हें यथार्थ रीति से
समझायी। अब तमोगुण का जो स्वरूप है उसकी व्यवस्था भी बताता हूँ, सुनो। जो अपने देह का अपमान करता
है अथवा जो पूर्वजों से द्वेष करता है, उनके बाल-बच्चों से बैर करता है उसकी वह निष्ठुर बुद्धि तामस है। आगे
बच्चों के भी बच्चों से जो हमारी जमीन जायदाद की देखभाल कर अपनी उपजीविका चलायेंगे उनसे तामसी बैर
करता है, ऐसे मेरे पूर्व के शत्रुओं को मैं जान से मारूँगा और इसके लिये जारण मारण अभिचार कर्म करता है,
उसकी ममता सचमुच तामसी है। अभिचार कर्म का मंत्र जानने वालों को वह अपना इष्ट और सगा समझता है,
शाकिनी, डाकिनी आदि की उपासना करता है, यह पूर्णरूप से तामसी ममता है। यह वर्णन पर्याप्त हो गया।
प्रत्येक गुण में अनेक शक्ति है। ये तीनों गुण जहाँ मिल जाते हैं उसे 'सन्निपात वृत्ति' कहते हैं। कफ, वात और
पित्त जहाँ एकत्र होते हैं, वही सन्निपात उत्पन्न होता है। उसी प्रकार यहाँ भी तीन गुणों का सन्निपात होता है।
संकल्प विकल्पात्मक मन, पंचविषय, पंचप्राण आदि दशेन्द्रियों का सम्पूर्ण व्यवहार इसी में तीन गुणों का
सन्निपात होता है। उसी सन्निपात का निरूपण अर्थात् तीन गुणों का मिश्र लक्षण-जिसे मिश्रगुण सन्निपात कहते
हैं- उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठतः।
गुणानां संनिकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः ॥७॥
पुरुष में क्षण-प्रतिक्षण, क्रिया, कर्म, स्वधर्म, काम धन प्राप्त करने का उद्योग जैसी भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों
का उद्भव होना, यही त्रिगुणों का सन्निपात है। गुणों का यह मिश्रण क्या करता है ? तो इन तीन गुणों से धर्म तीन
प्रकार का होता है, काम तीन प्रकार को होकर रहता है और अर्थ, स्वार्थ और निर्वाह ये भी तीन प्रकार के हो
जाते हैं। इसमें कर्म का दोष नहीं है। दोष कर्त्ता की बुद्धि में होता है। वह जो कुछ भी कल्पना करता है, उसका
फल स्वयं भोगता है। सुवर्ण अपने सोने के रूप में ही सम्माननीय है, यदि उसका श्वान बना दिया जाय तो वह
उसका उपहास होगा। उसी प्रकार स्वकर्म गुणबुद्धि से दूषित होता है। भूमि मूलतः शुद्ध है। उसमें जैसा बीज
६७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बोयेंगे वैसा फल प्राप्त होगा। उसी प्रकार स्वकर्म स्वयं मूलतया शुद्ध है किन्तु गुणों की वृत्ति के कारण उसका
फल भोगना पड़ता है। वाणी स्वाभाविक रूप से सरल और शुद्ध है। रामनाम से उसे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त होता है।
लेकिन यदि वह व्यर्थ की बकवास करती है तो वह व्यर्थ हो जाता है और यदि वह निंदा करे तो उसके कारण
बाद में महापाप भोगना पड़ता है। उसी प्रकार श्रद्धायुक्त बुद्धि से स्वधर्माचरण करें तो वह मनुष्य को विरक्त करें
देता है किन्तु यदि त्रिगुणों का सन्निपात हो जाय तो वही श्रद्धा छल करने लगती है। उसके बारे में भी सुनो।
स्वधर्म कर्म में श्रद्धा उत्पन्न होती है और उसके कारण मनुष्य क्षणभर में विरक्ति की ओर मुड़ता है (क्षणभर में
उसकी भोगफल की आशा बढ़ने लगती है अथवा क्षण भर में वह ममता के साथ जुड़ जाता है। काम की भी
वैसी ही स्थिति है। एक क्षण निष्कामता में प्रेम रहता है, क्षणभर में स्त्रीभोग के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है
अथवा क्षणभर में परस्त्री के प्रति ही कामवासना उत्पन्न होती है। यही स्थिति धन की भी है। एक ही क्षण में धन
की आशा छोड़ देता है, दूसरे ही क्षण धन के प्रति चाह उत्पन्न होती है अथवा क्षण भर में दूसरे का धन हड़प
लेता है। धर्म तीन प्रकार का, कर्म तीन प्रकार का और धन प्राप्त करने में भी तीन भेद हैं। गुणवृत्ति के इस भेद
के कारण लोग स्वधर्म छोड़कर अकर्म करते रहते हैं (धर्म सात्विक, अर्थ तामस और काम राजस है। श्रद्धा, रति
और धन ये उनके क्रमानुसार फल हैं। मनुष्य धर्म-अर्थ काम इन तीनों में आसक्त होता है यह सन्निपात का काम
है) इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम इनमें अनंत गुणों के सन्निपात हैं। यदि उन सबका यहाँ उल्लेख करें तो ग्रन्थ
का विस्तार अत्यधिक बढ़ जायगा। इसलिये त्रिगुणों का सन्निपात संक्षेप में बताया। श्रीकृष्ण भी पुनः उसी अर्थ
का निरूपण संक्षेप में सुना रहे हैं।
प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे ।
स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा ॥ ८ ॥
पुरुष को जो गृहस्थाश्रम है वह केवल काम है ऐसा समझना चाहिये। उसमें चित्तशुद्धि के लिये नित्य
नैमित्तिक करना यही स्वधर्म है। गृहस्थ के घर में चक्की चलाने में, ऊखल में अनाज कूटने, चूल्हा सुलगाने,
पानी भरने और झाड़ू लगाने में जाने-अनजाने जीव हिंसा होती है, वही पंचसूना दोष हैं। गृहस्थाश्रम के कारण ये
दोष होते हैं इसलिये उसमें तमोगुण ही प्रमुख होता है और घर में गृहस्थ स्त्रीसुख का उपभोग करता है इसलिये
उसमें रजोगुण है। नित्य नैमित्तिक कर्म करना और स्वधर्म का पालन करना यही गृहस्थ का प्रमुख कर्तव्य है।
यही चित्तशुद्धि का रहस्य है इसलिये गृहस्थाश्रम में सत्त्वगुण भी सुलभ है। गृहस्थाश्रम की जो प्रवृत्ति है वह सदा
इन तीन गुणों से मिश्रित है। उन गुणों ने ही उसे गुणयुक्त बनाया है और वे उससे कर्माचरण करवाते हैं। किसी
भी रंग से रंगे बिना ही स्फटिक उस रंग का दिखायी देने लगता है। उसी प्रकार गुणों की संगत से गुणात्मक
आत्मा भी गुणकर्मों में विचरने लगता है। जिस प्रकार कसौटी स्वयमेव सोने का वर्ण स्पष्ट रूप से दिखाती है,
उसी प्रकार पुरुष की क्रिया भी गुणलक्षण के विभाग प्रदर्शित करती हैं।
पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः।
कामीदिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम् ॥ ९ ॥
जो उचित ढंग से इन्द्रिय निग्रह करता है, जो शमदम में निरन्तर खेलता रहता है, जिसके अंतःकरण में शान्ति
रहती है, वही सच्चा सात्त्विक है ऐसा मान लो। जो सदा फल की इच्छा से लोभी बना रहता है, संसार भोग के सुख
की इच्छा करता है, धन के लिये चाहे जैसा ढोंग करता है, वह मनुष्य रजोगुणी है, इसे ध्यान में रखो। स्वधर्म में
पच्चीसवाँ अध्याय ६७९
जिसकी रुचि नहीं होती, अधर्मप्रवृत्ति ही अच्छी लगती है, क्रोध और लोभ ने जिसका उत्साह निगल लिया रहता
है, वह सचमुच तामस है, ऐसा समझ लो। इस प्रकार पुरुष का कर्माचरण देखकर उसका लक्षण पहचानना चाहिये।
इसका नाम है अनुमान। विचारशील पुरुष इसे जानते हैं। सामान्य ढंग से इन तीनों गुणों का निरूपण किया। लेकिन
यदि यह भी समझ में न आ रहा हो तो उन्हीं गुणों की भिन्न-भिन्न वृत्तियों का श्रवण करो।
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥१०॥
स्वकर्म का आचरण करते समय फल की इच्छा करना यही माया का परदा है लेकिन जो फल की आशा
छोड़, मुझसे मत्स्वरूप होकर मेरे ही भजन में निमग्न रहते हैं, फल की आशा छोड़ स्वधर्म से ही मेरा भजन
करते हैं, फिर वे पुरुष हों या स्त्री हों उन्हें सत्त्वगुण सम्पन्न समझना चाहिये। देह के अवयवों का जो स्वरूप होता
है उसके अनुसार उसे स्त्री या पुरुष यह नाम प्राप्त होता है। लेकिन स्त्री-पुरुषों में आत्मा या आत्मी यह भेद नहीं
होता। उनमें जीवभाव एक ही जैसा होता है। चित्त को एकाग्र कर जिस क्रिया का आचरण होता है, उसका नाम
है कर्म। उसमें निरपेक्ष दृष्टि से मेरा भजन करना यही सम्पूर्ण स्वधर्म है। यहाँ ऐसी आशंका उत्पन्न होती है कि
यदि कर्म करते समय फल की आशा बढ़ती चली जाय तो उस फल का भोग भोगना पड़ता है। फिर ऐसे स्वकर्म
से भक्ति कैसे होगी ? अर्थात् वह फल अत्यन्त खराब है। कर्म करने पर उसका फल बाधक होता है और न करने
पर नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार इस संसार में कर्म से ही लोग बँधे हुए हैं। जो जीव स्वतंत्र था, उसे कर्म ने
ही पराधीन किया। इस कर्म का चरित्र इतना विचित्र और अत्यन्त बाधक है। तब स्वकर्म से ही भक्ति किस
प्रकार सम्भव है ? इस शंका के उत्तर के रूप में भगवान उसका ही प्रकार बताते हैं यदि दौड़ कर सर्प का मुँह
पकड़ा जाय तो वह पूरे शरीर को घेर लेता है और उससे बचने के लिये यदि उसका मुँह छोड़ दें तो वह दंश कर
अपने प्रखर विष से प्राणनाश कर देता है। उस सर्प दंश का निवारण जिस प्रकार मंत्रवादी अथवा मदारी करता
है, उसी प्रकार कर्म में ही उत्पन्न कर्म की बाधा गुरुराज तत्काल नष्ट कर देता है। सद्गुरु की शरण जाने से वह
सारा कर्म ब्रह्मार्पण करा देता है और उद्धव! निष्काम बुद्धि से भगवत्सेवा करने का यही सच्चा लक्षण है, यह
जान लो। ब्रह्म ही कर्म का प्रकाशक है अतः सारा कर्म ब्रह्मात्मक ही है। ऐसी भावना धारण करना यही सचमुच
मुझे कर्म अर्पण करना है। इसी ढंग से मेरा भजन करना चाहिये। सारी इन्द्रियों में ज्ञान की स्फूर्ति होना, यही
ब्रह्मा की ब्रह्मशक्ति है। ऐसे निश्चय से कर्म का आचरण करना, इसी का नाम स्वकर्म भक्ति है। इस प्रकार के
स्वकर्म से स्वाभाविक रूप से जो भक्त मेरा भजन करते हैं वे सारे लोग हे उद्धव! शुद्ध सात्त्विक हैं, ऐसा
निश्चयपूर्वक समझो। जो लोग स्वधर्म को पूरी तरह निष्फल मानते हैं, वे केवल मूर्ख हैं। स्वधर्म ही चित्त के
मैल को स्वच्छ करता है और सारे कर्मों को समूल नष्ट करता है। स्वधर्म से होने वाले ऐसे लाभ को छोड़ जो
लोग विषय माधुरी की इच्छा करते हैं वे बेचारे राजस हैं। वे विषयसुख में ही पागल दिखायी देते हैं। विषय फल
की इच्छा करने से उसके लिये देह धारण करना पड़ता है और देहधारण करना दुःखदायी होने के कारण उसके
योग से स्वर्ग, नरक आदि फल भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार संसार में राजस और तामस प्रकृति दुःखदायक ही है।
उन दोनों प्रकारों की गुणवृत्ति सुनो। तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ।
यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः।
तं रजःप्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥११॥
६८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वधर्म का आचरण कर जो नाना प्रकार के फलों की इच्छा करता है, वह उसका कर्म काम्य है, यह जान
लो। उसे राजस धर्म कहते हैं। जो अंतःकरण में अत्यन्त लोभी होता है वह जो भी कर्म-धर्म-आचरण करता है
वह सब लोभवश ही होता है क्योंकि उस कर्म का फल मिले यही उद्देश्य रहता है। कर्म के मूल स्वरूप में
काम्यत्व बिलकुल नहीं होता। कामना उस कर्म को काम्य बनाती है। सुवर्ण वास्तव में अपने मूल स्वरूप में स्थिर
रहता है किन्तु हम बड़े परिश्रम से उसके अलंकार बनाते हैं। उसी प्रकार स्वकर्म स्वभाव से पवित्र ही है। स्वधर्म
से मेरा शुद्ध भजन घटता है लेकिन उसमें फल की इच्छा कर हम स्वयं ही उसे काम्य बना देते हैं। फल की इच्छा
से मेरी जो उपासना की जाती है, वह मेरा भजन नहीं बल्कि केवल मेरे फल का भजन है। इस प्रकार जो सकाम
स्वधर्माचरण किया जाता है, वह प्रकृति राजस है यह मान लो। इस प्रकार की प्रकृति का खेल जहाँ दिखायी दे,
फिर वह स्त्री हो या पुरुष हो, वे सारे लोग राजस हैं, यह समझ लो। अब तामस की गुणवृत्ति सुनो। अंतःकरण
क्रोध से भरा होता है और उसी से उसका स्वधर्माचरण होता है इसलिये वह अपने शत्रु के लिये मृत्यु के फल की
ही इच्छा करता है। वह प्रकृति तामस है। जिसके अंतःकरण में द्वेष ने घर बनाया होता है, जिसके मन में असीम
क्रोध रहता है, जो प्राणिमात्र के प्रति निष्ठुर होता है, जिसकी प्रकृति सदा क्रूर रहती है, ऐसे स्वभाव का पुरुष हो
या स्त्री हो, उद्धव! वे लोग संसार में तामसी हैं यह निश्चयपूर्वक जान लो। देखो, "जीव यदि स्वरूपतः ब्रह्म ही
है, तो फिर भगवान उसे 'मेरी (भगवान की) भक्ति करो' ऐसा क्यों कहते हैं ? जीव ही सेवक क्यों बन गया ?
और भगवान ही 'सेव्य' (जिसकी सेवा की जाती है) कैसे बन गया ?'' यह शंका नष्ट हो इसलिये श्रीकृष्ण इसी
अर्थ का निरूपण करते हैं कि यह सेव्य-सेवक भाव गुण सम्बन्धों के कारण उत्पन्न हुआ है।
सत्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।
चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते ॥ १२ ॥
जिस प्रकार छाया देह के साथ बँधी न होने पर भी सदा देह के साथ ही रहती है, उसी प्रकार माया
भगवान के अधीन रहकर, उसे स्पर्श किये बिना ही वह अपने साथ चलाता रहता है। सचमुच माया को साथ
चलाने वाला और उसे अदृश्य करने वाला प्रभु भगवान ही है। लेकिन वेद उसे ही माया का नियंता कहते हैं।
सूर्य अँधेरे को नष्ट करता है, किन्तु वह अँधेरा जिस प्रकार उसके सामने कभी नहीं आता, उसी प्रकार माया का
नियंता यद्यपि हरी है, फिर भी माया भगवान को नहीं दिखायी देती। मेरा केवल देखना यही माया का मुख्य
लक्षण है। मेरे पास माया अपने गुणाभिमान के साथ नहीं रहती। माया में प्रतिबिम्बित जो चैतन्य होता है उसे ही
जीवत्व कहते हैं। तीन गुणों ने उसे देह को आबद्ध कर देहाभिमान को दृढ़ कर दिया है। जीव को यदि
देहाभिमान चिपका हुआ हो तो वह माया के अधीन होता है। अतः माया का नियंता मैं नारायण, वही जीव का
भी स्वामी हो गया यह समझ लो। जीव गुणों के अभिमान से बद्ध रहता है इसलिये वह सेवक हो गया और
आत्मा गुणों से अलिप्त अर्थात् निर्मल होने के कारण, वही जीव को जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाने वाला हो
गया। देखो ! इस प्रकार सेव्य सेवक भाव का विभाग दिखाकर तीन गुणों का सम्बन्ध भगवान स्वयं स्पष्ट करके
बता रहे हैं। तीन गुण समान ही हैं किन्तु उनमें जिन-जिन गुणों का क्षोभ होकर वे अधिक बढ़ जाते हैं उनका
स्वरूप श्रीहरि बताते हैं। ब्रह्म अपनी पवित्रता के लिये प्रसिद्ध है। कर्म भी अपनी निर्मलता के कारण अत्यन्त
शुद्ध है। फिर भी कर्म में जो कर्म का बन्धन उत्पन्न होता है वह गुण क्षोभ के योग से विकृत हुए चित्त का संबंध
है। कर्म और ब्रह्म में कोई दोष नहीं है। दोष चित्तवृत्ति में है और वह भी गुणक्षोभ के कारण होता है। वही पुरुष
पच्चीसवाँ अध्याय ६८१
को अनर्थ में फँसाता है। इस अर्थ का निरूपण कर मैंने गुणों का मिश्र लक्षण बताया। अब प्रत्येक गुण बढ़ने पर
उस गुण का स्वरूप कैसा हो जाता है, सुनो। जो गुण अत्यधिक बढ़ता है, उसकी आज्ञा में अन्य गुण विचरण
करते हैं। उस समय पुरुष की स्थिति कैसी रहती है वह श्रीहरि उद्धव को बताते हैं।
यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।
तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान् ॥ १३॥
जो पुरुष फल की आशा समूल छोड़कर निर्विकल्प, अभिमानरहित होकर स्वधर्माचरण करने लगता
है,उसका सत्त्वगुण रज और तम इन दोनों गुणों पर विजय प्राप्त करता है। जब भाग्य का भण्डार खुलता है, उस
समय हरिकथा श्रवण का सुअवसर प्राप्त होता है, मुख से हरिनाम कीर्ति का वर्णन करना अच्छा लगता है और
इस प्रकार अत्यन्त शुद्ध सत्त्व की वृद्धि होती है अथवा यदि ईश्वरकृपा से सत्संगति का लाभ प्राप्त हो जाय तो
भगवान के गुणानुवाद सुनने के लिये कान आतुर हो उठते हैं और वाणी अत्यन्त प्रेम से रात दिन भगवान की
नामकीर्ति का वर्णन करने में लीन हो जाती है। इस प्रकार के आचरण से रज और तम ये दोनों गुण क्षीण हो जाते
हैं और सत्त्वगुण अत्यन्त उत्साह से बढ़ता है। उस सत्त्व की साद्यंत स्थिति सुनो। तेजरूप से अत्यन्त प्रकाशयुक्त,
स्वच्छता से अत्यन्त निर्मल, शिव का अर्थ है शांत और सरल, यह सत्व का प्रमुख स्वरूप है। सत्व की यह
सत्त्ववृत्ति जिसके हाथ लगती है, उस साधक पुरुष की स्थिति उस समय कैसी होती है, सुनाता हूँ। उसे उस
समय विवेक की नौका मिल जाती है। उसे वैराग्य का आत्मरहस्य प्राप्त होता है। समस्त इन्द्रियों पर प्रकाश
पड़ता है और स्वधर्म तो अपने शिखर पर पहुँच जाता है। उस समय लोग उसे ज़बर्दस्ती से अधर्म, अहंकार,
अभिमान, झूठ आदि की शिक्षा भले ही देते हों लेकिन वह अधर्म के कृत्य बिलकुल नहीं करता। दुःख का
साधन सन्त्रिकट होने पर भी सात्त्विक वृत्ति का पुरुष सदा सुखसम्पन्न ही रहता है। सात्त्विक का मन बलात्कार से
क्षुब्ध होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता। ऐसी आत्मसत्त्व की दृष्टि से सुख ही सुख से मिलने आने पर, सारी सृष्टि
आत्मानंद से भर गयी है ऐसा उसे लगता है। यही शुद्ध सत्व की बाढ़ है। जिसके पास ऐसा शुद्ध सत्त्व रहता है,
उसकी सेवा शम और दम करते हैं। वैराग्य उनके चरणों पर गिर पड़ता है। उद्धव! ऐसा सात्त्विक पुरुष मानों
सत्त्व गुण का भण्डार ही है। उसी प्रकार सत्व और तम को जीत कर जब रजोगुण बढ़ता है, उस समय का
राजस का लक्षण सुनो। इतना कहकर श्रीकृष्ण आगे कहने लगे।
यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः सङ्गं भिदा बलम्।
तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४॥
रजोवृद्धि का कारण है, देह में ज्ञानाभिमान उत्पन्न होना। ऐसा पुरुष पग-पग पर दूसरों के गुण और दोषों
को देखता रहता है और सम्मान तथा प्रतिष्ठा की इच्छा करता है। रजोगुण की कीर्ति अद्भुत है। ऐसे मनुष्य को
ज्ञान होते हुए भी कामासक्ति रहती है। वह मन में अनेक प्रकार के भोगों की इच्छा रखता है। इससे रज की बाढ़
अमर्यादित हो उठती है। इस प्रकार रजोगुण की बाढ़ प्रबल होकर वह सत्त्व और तम को जमीनदोस्त कर देती
है। अब, जिससे रज का भी स्वरूप नष्ट हो जाता हो, ऐसी बात बताता हूँ। मूल श्लोक में रजोगुण 'सङ्ग-भिदा-
बलम्' इन तीन शब्दों में कहे गये तीन प्रकार से प्रबल होता है, यह केवल रजोगुण का वर्णन है। उसे ही
श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। संग का अर्थ है—देहाभिमान। भेद का अर्थ है 'मैं और मेरा' यह भेदभाव। बल
का अर्थ है प्रबल इच्छा और प्रवृत्ति का पूर्व आग्रह। देहाभिमान से दुःख उत्पन्न होता है। भेद से भय पीछा करता
६८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है और ऐसा मनुष्य उस नश्वर देह के बल से काम्य कर्म का आचरण शुरु करता है। जिस कर्म के योग से यश
और अकूत धन प्राप्त हो ऐसा कर्म वह करता ही जाता है। रजोगुण से ऐसा आचरण घटता है। त्रिभुवन में मैं ही
अकेला पवित्र हूँ। मेरा ही कर्माचरण श्रेष्ठ है, इस प्रकार की प्रवृत्ति, मान्यता और आसक्ति का होना, यही राजस
स्थिति समझनी चाहिये। रज का बल बड़ा अद्भुत रहता है। उसके कारण मनुष्य अद्भुत काम करना स्वीकार
कर लेता है और अपने उद्योग का दायरा बढ़ाता है। इसे श्रेष्ठ राजस गुण समझना चाहिये। ऊपर से उसकी वृत्ति
सात्त्विक लगती है किन्तु अंतःकरण में कर्म की वासना और धन का लोभ रहता है और जिसके मन में स्त्री की
चाह होती है, वह सचमुच राजस है। अब सत्त्व और रजोगुण इन दोनों को जीतकर जब तमोगुण पूरी तरह बढ़ता
है, उस समय के उस पुरुष के लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।
युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५ ॥
सत्त्व और रज का लोप कर तमोगुण जब प्रबल होता है तो वह उस पुरुष को पूरी तरह जड़, मूढ़ और
अत्यन्त स्तब्ध कर देता है। जब अत्यन्त विश्वास जताकर पराया धन डुबाने का कार्य होता है, अथवा परस्त्रीगमन
होता है, उस समय उस घटना से तमोगुण बढ़ गया ऐसा समझना चाहिये। अपने ही मुख से दूसरों के दुःखों का
उच्चार करना, स्वयं साधु की निंदा करना, संतसज्जनों का द्वेष करना, ये लक्षण जहाँ दिखायी दें वहाँ तमोगुण ने
अड्डा जमा लिया है, ऐसा समझना चाहिये। कोहरा छाने पर सूर्य ढँक जाता है, उसी प्रकार विवेक के अस्तित्व
को भी तमोगुण ढँक देता है। सत्त्वगुण प्रकाश देता है, रजोगुण प्रवृत्ति बढ़ाता है और इन दोनों को निगल कर
तमोगुण की वृद्धि अधर्म के योग से बढ़ती ही जा रही है। श्रेष्ठ जनों का अपमान करने से अथवा साधु का
गुणदोष देखने से तमोगुण किस प्रकार क्षुब्ध होता है उसका स्वरूप सुनो। तमोगुण जब पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है
तो स्फूर्ति मंद होती है और तमोगुण बुद्धिनाश कर जीव को जड़ बना देता है। कार्य कौन सा और अकार्य कौन-
सा इस विचार का ज्ञान, उसकी स्फूर्ति पूर्ण रूप से अन्धी हो जाती है। इसका नाम है, मूढ़ता। अब लय का
लक्षण सुनो। चित्त जागृत अवस्था में होते हुए भी जब अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ अथवा कृत्य-अकृत्य कुछ नहीं
सूझता, इसी का नाम है लय। उद्योग न करने से सारे इन्द्रियों के व्यापार कुंठित हो जाते हैं और ज्ञानशक्ति पूरी
तरह लुप्त हो जाती है, इसका नाम है जड़त्वप्राप्ति। मूढ़त्व के कारण शोक और दुःख प्राप्त होता है। जड़त्व से
मिथ्या मोह उत्पन्न होता है और मोह के कारण अधर्म में अत्यन्त अविचारी होकर पाप हो जाता है। अब लय का
चमत्कार सुनो। अहोरात अत्यन्त निद्रा आती है। तामस् को निद्रा के सिवा ब्रह्मानन्द का सुख भी नहीं भाता।
तमोगुण पूरी तरह बढ़ने पर पुरुष की ऐसी स्थिति होती है। अब सत्त्वादि गुण बढ़ने पर कौन-सा फल प्राप्त होता
है, उसे श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।
देहेऽभयं मनोऽसङ्गं तत्सत्व विद्धि मत्पदम्॥ १६॥
सत्त्वगुण बढ़ने पर अंतःकरण सदासर्वदा प्रसन्न रहता है और काम, क्रोध और लोभ का बिलकुल स्फुरण
नहीं होता। विषय भोग के लिये जो चित्त व्याकुल रहता था, वही अब विषयोपभोग में उदास रहता है। विषय
भले ही देह पर गिर पड़े लेकिन वह उनसे नहीं उलझता। जिस प्रकार पानी में रहकर भी कमलिनी का पत्ता
पानी से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार मेरे ज्ञान के कारण चित्त विषय में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है।
पच्चीसवाँ अध्याय ६८३
देह को मृत्यु का भय तो सदा का लगा हुआ है। वह मृत्यु देह के पास आने पर भी सात्त्विक के मन में भय नहीं
उत्पन्न होता क्योंकि ऐसे सात्त्विक लोग मेरे चरणों पर भक्तिरस में डूबे रहते हैं। जब तक 'मैं तुम' का भास होता
है, तब तक मृत्यु अवश्य बाधक होती है। लेकिन सात्विक भक्त मेरे अधिकार से भिन्न नहीं होता इसलिये उसे
मृत्यु का भय नहीं है। जो सात्विक है वह अनन्य भाव से मेरी शरण में आया रहता है इसलिये उसे जन्म-मरण
बाधक नहीं होता। सत्त्वगुण मनुष्य से इस प्रकार का व्यवहार कराता है। अब रज का लक्षण सुनो।
विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्च चेतसाम्।
गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्नीशामय॥ १७॥
जब रजोगुण उफनता है तो विषय की भयंकर चिन्ता उत्पन्न होती है। अतः कर्मेंन्द्रियों से नाना प्रकार के
ठाठ-बाट प्रारम्भ कर देता है। शरीर स्वस्थ होते हुए भी मन चिंतात्तुर और भ्रांत रहता है। विषयों का स्वार्थ बढ़ा
कर वह सदा दुःखी रहता है। पत्नी, बच्चे, धन, सम्पत्ति आदि होते हुए भी वह रजोगुण मन का स्वार्थ और भी
अधिक बढ़ाता है। राजस की चित्तवृत्ति क्षणभर के लिये भी निवृत्ति नहीं चाहती। हे उद्धव ! विकार का कारण न
रहते हुए भी हम मन में विकार का चिंतन करते हैं यही राजस का प्रमुख लक्षण है। न घना अँधेरा हो और
प्रकाशयुक्त दिन भी न हो, ऐसी जो इन दोनों के बीच की हलकी अँधेरी शाम रहती है, ठीक वैसा ही रजोगुण
होता है। अब तमोगुण का लक्षण सुनो। उसका लक्षण जड़त्व है।
सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।
मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८॥
चित्त में गहन चिन्ता उत्पन्न होकर उस चिन्ता के असाध्य मोह में चित्त डूब जाता है और किसी भी प्रकार
के ज्ञान का उसके हृदय में उदय नहीं होता। प्रगाढ़ निद्रा के अलावा जितना भी कुछ अज्ञान रहता है वह सब
ज्ञान को देखकर भागने लगता है, लेकिन उसमें एक चमत्कार होता है और वह यह कि वह अज्ञान उस ज्ञान को
निगल लेता है। तामस पुरुष जगा रहने पर भी सोया हुआ-सा लगता है। जिस प्रकार कोई अन्धा अमावस की
रात जब आकाश बादलों से घिरा हो, उस समय किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चलता है उसी प्रकार वह कर्म तो
करता है लेकिन पर्याप्त उत्साह नहीं होता। पूरा आलस का गोला बना गठरी की तरह पड़ा रहता है। तमोगुण की
ग्लानि की पीड़ा ऐसी होती है। उसके कारण चित्तवृत्ति की दृष्टि पर परदा पड़ा रहता है। मनोवृत्ति सदा संकल्पों
और विकल्पों की कल्पना कर ऊँची उड़ान भरती है किन्तु तमोगुण के कारण उस मन की स्थिति जड़ हो जाती
है और संकल्प का उत्साह भी नहीं रहता। इस प्रकार मनोवृत्ति का लय करने वाली ऐसी तमोवृत्ति की वृद्धि होती
है। इस प्रकार जब तम का बाल बढ़ जाता है उस समय अज्ञान ही मन को खा जाता है। मन नष्टप्राय होकर मूढ़
होकर बेहोश पड़ा रहता है। लेकिन मन यदि पूरी तरह नष्ट ही हो जाता तो फिर महादुःख कौन भोगता ?
इसलिये तम से ही एकरूप होकर मन जड़मूढ़ होकर पड़ा रहता है। उद्धव! इस प्रकार की जो स्थिति होती है
वह अत्यन्त दुःखदायी होती है। इसी को तम की स्थिति समझ लो। गुणों की वृद्धि बढ़ाते समय किस गुण से
कौन सी वृद्धि बढ़ती है इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
एधमाने गुणे सत्वे देवानां बलमेधते।
असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९॥
दैवी, आसुरी और राक्षसी यही तीन प्रकार के गुणों की सम्पत्ति है। इन्द्रियों की जो स्थिति ब्रह्माण्ड में रहती
६८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वही स्थिति पिण्ड में रहती है। ब्रह्माण्ड के सारे देवता महापुरुष के अवयव हैं। पिण्ड में भी वे सब एक
होकर रहते हैं। स्वधर्मशास्त्र के अनुसार उचित निष्कर्म की ओर जो प्रवृत्ति होती है, ऐसी इन्द्रिय प्रवृत्ति जहाँ
होगी, वही दैवी या सत्वस्थ सम्पत्ति है। मन में दृढ़ कामासक्ति और स्वधर्म के अनुसार आचरण करने की जो
इन्द्रिय प्रवृत्ति रहती है, वह राजस अर्थात् आसुरी सम्पत्ति है। लोभ और मोह के वश में होने के कारण मन में
क्रोध का होना और अधर्म की ओर प्रवृत्ति होना, ऐसी जो इन्द्रियों की स्थिति होगी, वह तामसी और राक्षसी
सम्पत्ति है। क्षण में इच्छारहित होना, ऐसा स्वधर्म जहाँ बढ़ता है उसे वह राक्षसी वृत्ति समझनी चाहिये। वह दैवी
और आसुरी वृत्ति का विनाश करती है। सकाम-निष्काम मोहभ्रम में फँस कर जिसकी वृत्ति व्यवहार करती है,
वहाँ देवता, असुर और राक्षस इन सब में भयंकर झगड़ा चलता रहता है। क्षणभर के लिये परमार्थ मे रुचि,
क्षणभर के लिये द्रव्य की इच्छा, क्षणभर के लिये अनर्थ करने में रुचि, क्षण में पराया धन और परायी स्त्री में
रुचि। ऐसी चित्तवृत्ति में सच्ची शांति कभी नहीं प्राप्त होगी। फिर परमार्थ की प्राप्ति किस ढंग से होगी? साधक
लोग हमेशा पूछते रहते हैं कि चित्तवृत्ति में कौन-सी पीड़ा होती है? उसी पीड़ा की स्थिति तुम्हें स्पष्ट करके
बतलायी। यदि एक ही गुण पूर्ण रूप से स्थिर हो जाय तो एक ही प्रकार की वृत्ति बढ़नी चाहिये, लेकिन वैसा
होता नहीं है। गुण एक-दूसरे का अपमान करते हुए झगड़ते रहते हैं। एक ही गुणावस्था प्राप्त नहीं होती इसलिये
एकविधता नहीं हो पाती और अमर्याद भवपीड़ा की बाधा होती रहती है। तमोगुण अधर्म की ओर बढ़ता रहता है,
रजोगुण देहकर्म में लगता है और सत्त्वगुण की वृद्धि ही नहीं होती। फिर जीव की मुक्ति कैसे हो? रज और तम
इन दोनों के चंगुल में सत्त्व फँसा रहता है। वह बढ़ ही नहीं सकता। उस सत्त्व गुण की बाढ़ केवल आशा को
समूल नष्ट करने से होती है। तीन गुणों की त्रिकुटी हमने अपने अंतःकरण में कल्पना के ही बल पर खड़ी की
रहती है और अंत में वही संसार भय के रूप में बाधक बनकर खड़ी रहती है। सत्त्व के योग से देवताओं को
बल प्राप्त होता है, रजोगुण से दैत्य प्रबल होते हैं और तमोगुण से केवल राक्षसों का जोर बढ़ता है। इन तीन गुणों
की वृत्तियों की व्यवस्था तुम्हें बतायी। अब तीन अवस्थाओं के सम्बन्ध में भी बताऊँगा।
सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत् ।
प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु संततम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण देह में हो तो जीव को स्वप्न और सुषुप्ति स्पर्श नहीं करती और जीव में जो निरन्तर जागृति रहती
है, उससे इन्द्रिय प्रवृत्ति सचेत रहती हैं। रजोगुण प्रबल होने पर स्वप्न चित्तवृत्ति पर विजय प्राप्त करता है।
जागृति और सुषुप्ति दूर चली जाती हैं और वह राजस पुरुष बैठे-बैठे ही स्वप्न देखने लगता है। तमोगुण जब
बढ़ जाता है तो वह जागृति और स्वप्न इन दोनों को दूर भगाता है और जीव पर गहरी निद्रा का प्रभाव छा जाता
है। उसे सभा में बैठाने पर वह बात करते-करते ही झपकी लेने लगता है। खाना खाते-खाते ही वह गहरी निद्रा
में सो जाता है। हे उद्धव ! क्षण में जागृति, क्षण में सुषुप्ति अर्थात् निद्रा, क्षण में स्वप्न का अनुभव; यह वास्तव में
तीन गुणों की मिश्र वृत्ति है। अब जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को प्रकट करने वाला जो
आत्मतत्त्व है, उस चौथी अवस्था को ज्ञाता लोग तुर्यावस्था कहते हैं। उद्धव ! जो जागृति को जगाती है, जो स्वप्न
में स्वप्न को परिचालित करती है और जो निद्रा को भी सुलाती है, उस अवस्था को तुरीय अवस्था कहते हैं। जो
तीनों अवस्थाओं में होते हुए भी उनमें भासित नहीं होती, जो निर्गुण होते हुए नित्य रहती है, उस अवस्था को ही
तुरीय कहते हैं। जिस प्रकार पुत्र के जन्म के कारण पुरुष को 'पिता' यह नाम प्राप्त होता है, उसी प्रकार तीनों