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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 714, कुल 869 में से

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पृष्ठ 714

६९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पुरुरवा का यह पश्चात्ताप गीत सुनने से अगम्यागमन पातक का नाश होता है। उसे सुनने वाला निष्पाप हो
जाता है और साधकों को कभी भी मदन की बाधा नहीं होती। मत्त हाथी जिस प्रकार हथिनी के साथ नाना प्रकार
की आपदायें भोगता है, उसी प्रकार उर्वशी की संगति से पुरुरवा भी दुःख भोग कर विरक्त हो गया। जो उर्वशी
पर अत्यधिक लुब्ध हुआ था वही उससे ऊब गया और वैराग्य से पश्चात्ताप पाकर पुरुरवा राजा स्वयं ही बोलने
लगा। मेरे मोह के कारण विषयवासना बहुत बढ़ गयी जिससे उस अमंगल मदन के घर का मैंने ही सेवन किया।
उर्वशी के लालच में मैं अत्यधिक लंपट हो गया। मेरा चित्त काम से व्याप्त हो गया और मैंने बहुत बड़ा अनर्थ
कर दिया। मेरा जीवन मैंने व्यर्थ गँवाया। गले से सटे हुए उर्वशीरूप शस्त्र ने जिसमें जीवन को काटने की तेज
धार है, कितने ही जीवन नष्ट कर दिये हैं। लेकिन मुझ पापी को उसकी स्मृति ही नहीं रही। कामेच्छा के भुलावे
में मैंने कांता-आलिंगनरूपी विष की बेल गले में लटका ली। उसने सारे जीवन की होली जलाकर विचार को
निगल ही लिया। स्त्री का आलिंगन रूपी दावाग्नि मैंने अपने गले में जला लिया जो आयुष्यरूपी वन में भड़क
कर उसने विवेकरूपी भूमि को भी झुलसा दिया। नरदेह का उत्तम से उत्तम जीवन मैंने भस्म कर दिया। मैंने एक
निंदनीय अधर्म ही कर दिया। नरदेह के आयुष्य के सहारे साधक बैकुण्ठ पहुँच जाते हैं, ज्ञानी तो देखते-देखते
ब्रह्मपद प्राप्त कर लेते हैं। उस आयुष्य को मैंने स्त्रीवसन में नष्ट कर दिया।
नाहं वेदाभिनिर्मुक्तः सूर्यो वाभ्युदितोऽमुया।
मुषितो वर्षपूगानां वताहानि गनान्युत॥८॥
नरदेह के आयुष्य का एक क्षण करोड़ों सुवर्ण मुहरें देने पर भी नहीं मिलेगा। वह सारा आयुष्य नष्ट कर
मैंने अपना विनाश कर लिया। साधुओं का हित करने के लिये ही प्रतिदिन सूर्य का उदय होता है। इसीलिये साधु
क्षण-प्रतिक्षण परमार्थ साधते रहते हैं। वही सूर्य स्त्रीलंपट पुरुष की आयु रात-दिन कम करता रहता है। यह बात
जो नहीं जानता वह स्वयं ही नरक पात का असली मूल है। दूसरों की बात क्यों करूँ ? मैं स्वयं ही उर्वशी के
फेर में फँस गया, मेरे जीवन की हानि हो गयी। यह बात किसे बताऊँ ? लोगों का हित करने के लिये ही रोज
सूर्य का उदय होता है यह बात पुरुष होते हुए भी मैंने नहीं जानी। उर्वशी के जाल में फँस कर उन्मत्त हो गया।
सूर्योदय और सूर्यास्त होते हुए वर्ष के वर्ष बीत गये। लेकिन मुझे उसका विचार नहीं आया। उर्वशी के अधरामृत
का पान करते-करते मैं उसी बेहोशी में रहा। शराब की खुमारी अगले दिन उतरती है, धन की मस्ती दरिद्र होने
पर उतरती है; शक्ति क्षीण होने पर यौवन का ज्वार थमता है; लेकिन स्त्री का नशा कभी नहीं उतरता। नरदेह का
जीवन अत्यन्त दुर्लभ है। वह पुनः हाथ नहीं आता। मरे वह देवांगना, उर्वशी ! सचमुच, इसने मेरा सत्यानाश कर
दिया। मैं निर्भय, सबकी रक्षा करने वाला, लेकिन इसने मुझे नंगा कर दिया। यह लज्जास्पद बात बताऊँ तो किसे
बताऊँ ? इतना कह कर वह सुबकने लगा। मेरे हित की चोरी करने वाली उर्वशी है। इसे मार डालना चाहिये।
उसने कहा। लेकिन फिर वह सोचने लगा कि इसमें उसका क्या दोष है ? अविचारी तो मैं हूँ। एक मैं ही अभागा
हूँ, कामचेष्टा में मैंने ही अपने जीवन का विनाश कर लिया। बहुत बड़ी हानि हो गयी। फिर बड़े जोर का
आक्रोश करते हुए बोला, इस मदन ने मुझे नंगा कर दिया। मैंने अपना जीवन गँवाया। वास्तव में इससे अधिक
हानि संसार में और कोई नहीं है।
अहो मे आत्मसम्मोहोयेनात्मायोषितां कृतः।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणिः ॥९॥