श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय ७०१
मदन का ताप किससे नष्ट होगा, इसका उसे स्मरण हुआ। कामिक पुरुष विषय का त्याग करे, फिर भी उसकी
वासना बिलकुल नहीं छूटती और जब रुचि से विषय सेवन कर रहा हो तो फिर विरक्ति कैसे उत्पन्न होगी ?
उसका क्या उपाय है इसका विचार कर स्त्रीविषय त्याग का सच्चा विचार राजा बता रहा है।
पुंश्चल्याहतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५॥
पुरुष सदा ही स्त्री पर अनुरक्त रहता है; लेकिन वह एकाएक उससे अति प्रसंग नहीं कर सकता। इसलिये
वेश्या की संगत मिलने पर वह उसके हावभाव से कामपीड़ित होता है। वेश्या के नेत्रकटाक्ष ही पुरुष को बन्धन
में डालने के लिये पर्याप्त हैं। स्त्री विषय का यह बन्धन नारायण के अलावा और कौन छुड़ाएगा ? स्त्रीविषय से
मुक्त करने वाला केवल एक ईश्वर ही समर्थ है। आत्माराम भगवंत से उससे निश्चित रूप से छुड़ा सकता है।
काम का संचार माया के गुणों से होता है; अविद्या उसकी वृद्धि करती रहती है। इसलिये माया का नियंता जो
ईश्वर है, वही मदन की पीड़ा दूर कर सकता है। आत्मस्वरूप में लीन, आनन्दस्वरूप रहने वाला वह आत्माराम,
वही सारे विषयों का निवारण कर आत्मस्वरूप विषयक भ्रम को दूर करता है। भोग करते हुए भी वह अभोक्ता
रहता है, उस अनंत की शरण में जाने से ही विषय विकार बाधा नहीं कर पायेंगे। स्त्रीसंग से छुड़ाने वाला एक
वही है। अधोगति से छुड़ाने वाला जो अधोक्षज है, वह भक्तों का पालन करने वाला होने के कारण, उसकी शरण
में जाने से वही कामासक्ति का निवारण करता है। राजा कामासक्ति से अत्यन्त त्रस्त हो गया, विषय के प्रति
अंतर्बाह्य उदासीन हुआ, लेकिन हृदय की वासनाओं का त्याग वह नहीं कर पा रहा था। सर्वोपरि हरि की शरण
में जाने से ही सारी वासनाओं का निवारण अपने आप होता है। कुछ लोग ऐसा भी मत प्रतिपादित करते हैं कि
वेदाध्ययन कर इन्द्रादि देवताओं के प्रीत्यर्थ यज्ञायाग करने से हृदय की वासनाओं की निवृत्ति होती है। लेकिन जो
ज्ञानी ऐसा कहते हैं, वे अज्ञानी हैं क्योंकि श्रीहरि की शरण में गये बिना कामबाधा का शमन नहीं होता। इन्द्रादि
देवताओं की भी कामासक्ति के कारण कितनी दुर्दशा हुई इसका उन्हें पता नहीं है। ऐसा होते हुए, उनके भजन से
काम की निवृत्ति होती है, ऐसा जो कहते हैं वे अतिमूर्ख हैं।
बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मतेः।
मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मनः॥ १६॥
काम्य कर्म से सुख होगा यह कहना ही बिलकुल मिथ्या है क्योंकि काम्य कर्म में अधिक दुःख होता है।
लेकिन उन मूर्ख सकाम लोगों की समझ में यह बात नहीं आती। मैंने याग कर इन्द्रादि देवताओं का यजन कर
उर्वशी का उपभोग किया फिर भी मैं अत्यन्त दुःखी हुआ। नारायण ऋषि के ऊरू अर्थात् जंघा से उत्पन्न हुई
इसलिये उसका नाम 'उर्वशी' पड़ा। उसने मुझे निष्काम भाव से शुद्ध वेदवाक्य से उपदेश किया। श्रुति का
निष्कामवचन श्रवण करने पर भी मेरी सकाम भूल नष्ट नहीं हुई। जब तक श्रीहरि की कृपा नहीं होगी, तब तक
काम की चाल नहीं रुकेगी। भक्तिभाव से श्रीहरि की शरण जाने से हृदयस्थ नारायण प्रकट होता है तब हृदय के
सारे काम अपने आप भाग जाते हैं। उर्वशी की आसक्ति के कारण मैंने तो अत्यधिक कष्ट सहन किये लेकिन
इसमें उसका क्या दोष है ? मुझे स्वयं ही श्रीहरि का विस्मरण हो गया था। यदि मैंने ही श्रीहरि का स्मरण किया
होता तो बेचारा काम क्या मुझे बाधा पहुँचाने वाला था ? यदि मुझे ही मेरा स्मरण रहता, तो उर्वशी मुझे बिलकुल
तुच्छ लगी होती।