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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 719, कुल 869 में से

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पृष्ठ 719

छब्बीसवाँ अध्याय ७०३
पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः श्वगृध्रयोः।
किमात्मनः किं सुहृदामिति योनावसीयते ॥ १९ ॥
माँ गर्भ धारण करती है, उसका पोषण करती है और स्वयं कष्ट सह कर उसका पालन-पोषण करती है
अतः वह देह 'माता' का है। लेकिन यदि माता अकेली ही हो तो उसे पुत्र की बात स्वप्न में भी नहीं लानी
चाहिये क्योंकि वहाँ वीर्य का निक्षेप करने वाला पिता होता है। इसलिये वास्तव में यह देह पिता का है और
अग्नि-ब्राह्मण की साक्षी से जिसे शपथ दिलाकर भार्या बनाकर लाया रहता है और जो प्राण देकर भी सेवा के
लिये तत्पर रहती है, जिसे उसके कारण ही सुख और शोभा, जिसे इसके ही कारण इहलोक और परलोक है; इन
सबका सूक्ष्म रीति से विचार करने पर यह देह सचमुच 'स्त्री' का ही है। 'सुहृद-बंधु-मित्र' भी इस देह के लिये
आवश्यक हैं। उन्हें भी इस देह के सुख से सुख प्राप्त होता है, इसलिये एक दृष्टि से यह देह उनका भी है। उसी
प्रकार स्वयं वेतन लेकर स्वयं ही जिसे देह विक्रय किया रहता है, जिसकी आज्ञा के बिना क्षणभर के लिये भी