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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 715, कुल 869 में से

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पृष्ठ 715

छब्बीसवाँ अध्याय ६९९
बड़े-बड़े वीर पराक्रमी मुकुटमणि राजा भी मेरी शरण में आते हैं और मैं एक तुच्छ वेश्या के चरण पकड़
रहा था, इससे अधिक निर्लज्जता और क्या होगी? मुझ पुरूरवा की आज्ञा पर सारे राजा कठपुतली की तरह
नाचते रहते हैं और मैं स्वयं एक वेश्या की आज्ञा से श्वान की तरह लांगूलचालन कर रहा था। मदारी के बन्दर
की तरह मैं स्त्री के इशारों पर नाचता रहा। मेरे चक्रवर्ती होने का ऐसा निंद्य फल मुझे प्राप्त हुआ? सारे राजा मुझे
बहुत सम्मान देते हैं, भूपति मेरे चरणों का वंदन करते हैं और मैं एक स्त्री का दास बनकर हीन, दीन, भिखारी
बन गया। स्त्री को प्रसन्न रखने के लिये उसके पैरों पर गिरना उचित है ऐसा कहने वाले कामी पुरुषों के मुँह में
आग लगे क्योंकि वह मदन का बहुत बड़ा प्रहार है। मैं समुद्रवलयोक्ति पृथ्वी का सार्वभौम हूँ और उसे एक
वेश्या ने भँवर जाल में फँसाया? उसी भँवर जाल का वर्णन राजा स्वयं कर रहे हैं।
सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम्।
यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद् रुदन्॥१०॥
स्त्री केवल साकार-माया-भ्रम है। इसीलिये स्त्री को 'प्रमदा' कहते हैं। इन स्त्रियों के मोह में बड़े-बड़े
लोग फँस चुके हैं। स्त्रियाँ, वस्त्र और अलंकार ये माया के प्रमुख तत्त्व हैं; जिसके भुलावे में बड़े-बड़े लोग आ
चुके हैं। उसी प्रकार मैं भी स्त्री की संगति में पापी बना मुझे स्वयं ही अपना कार्य दीन-हीन लगता है क्योंकि
उर्वशी तो वैसे भी एक वेश्या थी। उसे कितने ही लोगों ने भोगा होगा। ऐसी कामासक्ति के कारण मैं सब कुछ
भूल गया। अपनी भूलने की कथा पश्चात्तापपूर्वक राजा स्वयं बता रहा है। धर्मपत्नी के साथ कामोपभोग करने से
सहसा स्वधर्म की हानि नहीं होती किन्तु मेरा दुष्कर्म आड़े आया और मैं वेश्या के जाल में फँस गया। जो परस्त्री
की अभिलाषा करते हैं वे तो निश्चित रूप से नरक में जाते ही हैं, लेकिन जो अपनी पत्नी पर भी आसक्त होते हैं
उन्हें भी अधोगति नहीं छोड़ती। स्त्रियों ने हरिहर पर भी मोहिनी डाली है, स्त्रियों ने बड़े-बड़े ऋषियों को भी
भुलावा दिया हे, स्त्रियों ने बड़ों-बड़ों को अपने पाश में उलझाया है, उसी प्रकार मुझे भी स्त्रियों ने दास बनाया।
राज्य और राजवैभव मैंने वेश्या के हवाले किया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके लिये मैंने अपना जीवन भी अर्पण
किया। सारे राजाओं का मैं मुकुटमणि था, लेकिन मैं उसके चरणों का दास बन गया। मदन की करनी अद्भुत
है। उसने मुझे स्त्री के वश में कर दिया। मुझ राजराजेश्वर को उस वेश्या ने लात मार कर, मेरी उपेक्षा कर मेरा
बहिष्कार किया, मेरे सामने मुझे छोड़कर चली गयी। उसे जाता देख मैं नग्न अवस्था में उसके पीछे दौड़ा,
लाज-लज्जा छोड़कर रोया लेकिन उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। किसी उन्मत्त ब्रह्मपिशाच की तरह, मैं
नग्नावस्था में रोता हुआ उसके पीछे दौड़ रहा था लेकिन उसका चित्त द्रवित नहीं हुआ। फिर भी मैं रोता हुआ,
लड़खड़ाते हुए किसी निर्लज्ज की तरह उसके पीछे दौड़ रहा था, मेरे मोह के कारण हुए अनर्थ के कारण मैं
अपमानग्रस्त हो गया।
कुतस्तस्यानुभावः स्यात्तेज ईशत्वमेव वा।
योऽन्वगच्छं स्त्रियं यान्तीं खरवत् पादताडितः॥११॥
मैं बहुत बड़ा राजराजेश्वर हूँ, ऐसा असाध्य अहंकार मुझे था। लेकिन मैं स्वयमेव वेश्या का नौकर और
दास बन गया। नौकर की तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था, फिर भी उसने मेरा अंगीकार नहीं किया, बल्कि
जिस प्रकार गदही लात मार कर गधे को दूर भगा देती है, उसी प्रकार उसने मुझे भगा दिया। गदही को देखकर
जिस प्रकार गधा उसकी खुशामद करता है लेकिन गदही उसे लात मारती रहती है। उसकी लातें सिर पर लगती