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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

ग्यारहवाँ अध्याय ३१५
को देखकर मैं ही दौड़कर उसकी अगवानी करता हूँ। सभी तरह से अपने भक्त की भक्ति पर आसक्त होने के
कारण मैं दिन-रात उसी के पास रहता हूँ। जो सच्चे भोले भाले भक्त होते हैं वे भगवान को प्रिय हैं। उनकी क्या
बात करें? उनके बिना आधा पहर रहने के ऐवज में कोई मेरी पसन्द के ढेर सारे उपहार दें तो वे भी मुझे नहीं
चाहिये। ऐसे भोले भक्तों को मैं उत्तम भागवत मानता हूँ। स्वयं भगवान होते हुए मैं उनके चरणों पर गिर पड़ता
हूँ। वे सचमुच ही उत्तम हैं। उनके लिये मैं भूखा रहता हूँ। उनके लिये मैं सदासर्वदा सावधान रहता हूँ। उनके
लिये मैं दसों दिशाओं में भटकता रहता हूँ क्योंकि भोला भक्त परम दुर्लभ है। उद्धव! और बात क्या कहूँ? भोले
भक्त को देखते ही मैं उसके प्रेमस्वरूप अपना पद उसे अर्पण करता हूँ। वैसे मोल ही लगाया जाय तो मेरे भक्त
मुझसे भी अधिक श्रेष्ठ हैं। इसीलिये मैं उनके अधीन रहता हूँ और उनके वचन का कभी उल्लंघन नहीं करता।
मैं उनके वचन का उल्लंघन कर ही नहीं सकता। वसुदेव और देवकी की शपथ लेकर कहता हूँ कि भजन के
लिये भक्ति ही प्रमुख है। उद्धव! जिस प्रकार घृत के बिना भोजन व्यर्थ है, वाँझ स्त्री का मैथुन व्यर्थ है उसी
प्रकार भक्ति के बिना भजन सचमुच व्यर्थ है। देखो! जहाँ भाव है वहाँ भाग्य रहता है। जहाँ भाव रहता है वहाँ
निश्चित रूप से मैं रहता हूँ। जहाँ भाव रहता है अपने स्वभाव के अनुसार ईश्वर प्रकट होता है। जहाँ भाव रहता
है वहाँ विरक्ति रहती है। जहाँ भाव होता है वहाँ शान्ति प्रकट होती है। जहाँ भाव होता है वहाँ आत्मबोध से
भक्ति का विकास होता है। इस प्रकार भक्तों में मेरी भक्ति मेरे साथ ही स्वानंदपूर्वक नाचती रहती है। इसलिये जो
भोले और भावार्थी होते हैं वही उत्तम भागवत हैं। जो अनजान भक्त हैं वे इस प्रकार मेरा भजन कर मुझे प्राप्त
करते हैं। अब उत्तम भक्ति कैसी होती है यह तुम्हें बताता हूँ।
मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम्।
परिचर्या स्तुतिः प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम्॥ ३४॥
अनेक प्रकार के अवतारों की तरह शैव अथवा वैष्णवों द्वारा तैयार की गयी अनेक मूर्तियाँ, तीर्थ क्षेत्रों में
जिनका विशेष महत्व है ऐसी मूर्तियाँ या जो मूर्तियाँ ईश्वर ने स्वयं ही बनायी होती है या मनुष्य अथवा किन्नरों
द्वारा स्थापित की रहती हैं अथवा जो स्वयंभू ही उत्पन्न होती हैं, जिन्हें शास्त्रों में गंडकी मूर्ति कहा जाता है, उनमें
से अनेक भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए आयी रहती हैं। अनेक दैत्यों तथा राक्षसों द्वारा बनायी रहती हैं। उनमें
से अनेक तीन वर्णों के लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में पूजन के लिये तैयार करायी रहती है। मेरी ऐसी मूर्ति का
दर्शन लेने के लिये लोग तत्परता से दौड़ कर जाते हैं और उनकी पूजा करने के लिये लोगों के मन में अत्यन्त
चाह उत्पन्न होती है। जो मेरे भक्त हैं वे मेरा ही स्वरूप होते हैं। मेरे संत स्वयं मैं हूँ। कंजूस का मन जिस प्रकार
धन के लिये लालायित रहता है उसी प्रकार मेरा मन उनकी भेंट के लिये उत्कंठित रहता है। उन्हें मेरी मूर्ति की
अपेक्षा संतों के भजन में अधिक संतोष प्राप्त होता है। घरबार छोड़कर साधुओं की संगत में ही उन्हें अत्यन्त
सुख मालूम होता है। चिन्तामणि को जिस प्रकार जतन करके रखा जाता है उसी प्रकार वे सज्जनों की मर्यादा को
जतन करते हैं। निज नये भजन करते हैं और उनकी पूजा करने में तो उनका मन तृप्त ही नहीं होता। पूजा का
साहित्य एकत्र कर बड़ी श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं। एकान्त में मेरी पूजा करते समय यदि कोई साधु पुरुष घर में
आ जाय तो वह उसकी पूजा न कर मेरी ही पूजा करता रहेगा, वह मुझे लात मारे या मेरा घात करने के लिये
उद्यत हो जाय किसी स्त्री को एक ही लड़का हो और कोई उस लड़के के मस्तक पर लात मारे तो माँ को सहज
ही गुस्सा आता है। फिर उस क्रुद्ध माँ का गुस्सा शान्त करने के लिये यदि उसे रेशमी साड़ी भी दी जाय तो भी

३१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसका गुस्सा शान्त नहीं होता। उसी प्रकार मेरे संतों का अपमान कर यदि मेरी पूजा की जाय तो मैं ही क्षुब्ध
होता हूँ। इससे मेरी सेवा बिलकुल नहीं होती, उलटे उसके इस कार्य से मेरा क्षोभ ही बढ़ता है। संत मेरे प्रिय हैं,
उनकी पूजा मुझे अच्छी लगती है। जो संतों के सेवक हैं उनके मनोरथ मैं पूर्ण करता हूँ। मुझ जैसे निरिच्छ को
भी संतों की इच्छा रहती है। मेरी पूजाध्यान छोड़कर जो संतों को दण्डवत करता है वह सहस्र यज्ञों का फल मुझे
ही अर्पण करता है। उसी ने समस्त तीर्थों में स्नान किया तथा जप-तपों का फल प्राप्त किया ऐसा समझना
चाहिये। जिसने ससम्मान साधु को नमस्कार किया उसे सारी पूजाओं का सार प्राप्त हो गया। मेरी प्रतिमाएँ
अचेतन मूर्ति होती हैं लेकिन संत मेरी सचेतन मूर्तियाँ हैं। पूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करने से वह
निश्चयपूर्वक मुझे प्राप्त होती है। प्रतिमाएँ कल्पना के अनुसार उत्तम बनायी जाती हैं, लेकिन संत तो साक्षात
पुरुषोत्तम ही हैं। वे चलते-फिरते परब्रह्म ही हैं। इसलिये साधुसेवा अत्युत्तम है। मेरी मूर्ति तथा सत्पुरुष का इस
प्रकार तत्परता के साथ भजन करते हैं यह निश्चय तो तुम्हें बता ही दिया। अब भजन का प्रकार सुनो। मेरी
प्रतिमा तथा सोज्वल साधु को जिसकी आँखें नहीं देखतीं उन्हें दृष्टि होते हुए भी उनकी आँखें मोरपंख पर बनी
आँखों की तरह अन्धी ही हैं। जिस प्रकार स्त्रियाँ, पुत्र और सम्पत्ति को देखकर आँखों को सुख प्राप्त होता है
उसी प्रकार वह चाव से संत प्रतिमाओं का दर्शन करता है। उनका उत्कंठा से होने वाला दर्शन ही साक्षात सौन्दर्य
है। समझ लो कि उसी से नेत्र सार्थक होते हैं। इस प्रकार नेत्रों से भजन होता है। संत मेरी ही मूर्ति है यह समझ
कर जो उनकी ओर दौड़ कर जाता है और उन्हें आलिंगन करता है और आनन्द के कारण उनसे बाहें नहीं
छुड़ाता, ऐसे संतों का आलिंगन करने से सारा शरीर ही पवित्र हो जाता है अथवा यह समझ लो कि मूर्ति के स्पर्श
से ही शरीर पवित्र हो जाता है। जो तीर्थयात्रा पर नहीं गये, संतों की सेवा में नहीं रहे अथवा श्रीहरि के सभा
मण्डप में नहीं नाचे वे पैर सर्वथा निरर्थक हैं। जो अनेक प्रकार के विषय सुखों के लिये नीच के आगे नाचता है
उसे श्रीहरि के सभा मण्डप में नाचने के लिये कहने पर वह बैल की तरह बैठ जाता है। तीर्थयात्रा में जाते समय
पुण्यक्षेत्र की ओर जाने में, हरिकीर्तन के जागरण में जाते समय, संतों के साथ चलने में अथवा श्रीहरि के
रंगमण्डप में नृत्य करने में पैरों को जो श्रम होता है उसी का नाम 'पैरों का सार्थक' है। अन्य जगह जाने का अर्थ
है अधःपतन की ओर जाना। उद्धव! इसी का नाम चरणों की पवित्रता है यह जान लो। सर्वथा निष्कपट रहकर
कौड़ी से लेकर करोड़ों तक की राशि जिसने मुझे अर्पण कर दी उसके उस अर्पण कार्य को ही मेरा 'अर्चन'
कहते हैं। धनधान्य गुप्तरूप से संग्रह कर बाह्यरूप से मेरी पूजा करना यह मेरा 'अर्चन' नहीं है। वह मेरे साथ
कपट कर रहा है यह जान लो। स्वयं को खाने को मिले इस आशा से जो भगवान की मूर्ति के सामने पकवान
रखता है और अतिथि के आने पर उसे अन्न भी नहीं देता, यह कोई मेरा अर्चन नहीं है। पूजा करते समय हाथ
पवित्र होते हैं और वही हाथ भगवान को अच्छे लगते हैं। जो भगवान की पूजा नहीं करते वे हाथ प्रेत के ही होते
हैं यह जान लो। हाथ से ईश्वरमूर्ति की पूजा न कर तथा सत्पात्र को दान न देकर, यदि उन हाथों में रत्नजड़ित
अँगूठियाँ और आभूषण पहने जाएँ तो वह प्रेत को आभूषण पहनाने की तरह है। हरिकीर्तन करने से अथवा
अखण्ड नामस्मरण से ही वाणी सार्थक होती है। 'जयजयकार' की गर्जना से ही त्रिभुवन पावन हुए हैं। जिसकी
वाणी रामनाम की गर्जना से सदा गरजती रहती है, वहाँ कलिकाल को भी शरण नहीं मिलती। पाप तो दूर भाग
जाते हैं। कर्मदरिद्री लोग हरि का नाम छोड़ व्यर्थ की बातें करते रहते हैं। उनकी बातों को टट्टी के समय
होनेवाली आवाज की तरह समझना चाहिये। हरिनाम के उच्चार से होने वाले सुख का आनन्द जिसके मुँह लग
जाता है उसका मुँह सदा मेरी ओर ही रहता है और मैं सदा उसके पास रहता हूँ। विविध प्रकार के गद्य पद्यात्मक

ग्यारहवाँ अध्याय ३१७
स्रोत, कुशलता से रचे हुए पद, अनेक वृत्तों में रचे हुए चित्र-विचित्र लीलात्मक चरित्र तथा इसी प्रकार के
स्तुतिसुमन भगवान को अर्पण करने चाहिये। धैर्य, स्थैर्य, उदारता, मेघ की तरह सुन्दर कांतियुक्त सौन्दर्य, शौर्य,
वीर्य, अतीव मधुरता एवं सद्गुणों का गाम्भीर्य आदि गुण ही गोविन्द रूप में एक साथ अवतरित हुए। भगवान
त्रिविक्रम के रूप में बली के द्वार पर द्वारपाल बनकर खड़ा हुआ और उसी द्वार से द्वारका में आकर कुश का
उद्धार किया। वही श्रीहरि आज भी सशरीर समुद्र किनारे पर खड़ा है। श्रीहरिरूप से सजी कोमल शोभा देखकर
राक्षस, देवतागण और मानव भी उसे प्रणाम करते हैं। वही समुद्र में मत्स्य बना, नासिका के द्वार से वही वराह
बना, वही नृसिंह के रूप में खंभे में अवतरित हुआ और यशोदा के मन्दिर में वही पला बढ़ा। वही कठोर पीठ
वाला कछुआ बना और बली का छल करने के लिये वही वामनमूर्ति बना। उसके निःश्वास से होने वाले स्फुरण
से वेदवाद का स्वर उभरता रहता है। चोर पत्नी को लेकर भाग गया इसलिये वह उसके लिये रोता है, जंगलों में
भटकता है, उसके पास एक भी गुण नहीं है। अन्त में वह कुब्जादासी के साथ भी रममाण हुआ। स्तुति करते
समय गुणकर्मों की तरह कीर्तन करना भी उसका ही नाम है यह जान लो। अब प्रह्व अर्थात् नमन का भी
निरूपण सुनो। मेरी प्रतिमा का दर्शन कर अथवा संतजनों को देख देहाभिमान छोड़ जो भक्तिभाव से दण्डवत
करता है, साधुजनों को प्रणाम करने से भी जिसका मन तृप्त नहीं होता और विनीत होकर बार-बार चरणों पर
मस्तक रखता है; यह व्यवहार 'नमन' कहा जाता है। भगवद्भक्तों के चरणों की धूल जो स्वयं होकर माथे से
नहीं लगाता, वह जीवित होते हुए भी प्रेत समान है। प्रेत की ही तरह वह अमंगल रहता है। लौकिक की लाज
छोड़ जो अपनी खुशी से वैष्णवों की चरणधूली में लोटता रहता है, उसका व्यवहार हीं मेरी भक्ति का विकास
है। इस प्रकार प्यार से नमन करने से मान-अपमान सहज ही छूट जाता है। इसके लिये मेरा कीर्तन श्रवण करना
चाहिये। इसके लिये हे उद्धव ! श्रवणादि भक्ति का लक्षण सुनो।
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव।
सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम् ॥ ३५ ॥
दृढ़ आस्तिक्य बुद्धि से अंतःकरण में समाधान होना इसी का नाम शुद्ध श्रद्धा है। आदर के साथ कथा
श्रवण करने से उसमें निहित भावार्थ के कारण मन विचलित नहीं होता। ऐसा श्रोता अपना श्रवणेन्द्रिय तथा मन
वक्ता के भाषण से निबद्ध करके रखता है। श्रवणार्थ बुद्धि की वृद्धि करता हे और वह भावार्थ से कथा में बिक
जाता है। दूध पीने का मौका खोजने के लिये जिस प्रकार बिल्ली ताक लगा कर बैठती है उसी प्रकार कथा का
सार ग्रहण करने के लिये निरन्तर उल्हास रखना चाहिये। कान में रत्नजटित कुण्डल पहनने से कान की शोभा
नहीं बढ़ती बल्कि श्रवण करना यही कान का भूषण है। कथाश्रवण से ही कान का सार्थक होता है। भक्त स्वयं
कितना ही अच्छा वक्ता हो, पुराणों में निष्णात हो फिर भी वह अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक हरिकथा श्रवण करता
है। जो हरिकथा सुनने के लिये श्रवणेन्द्रिय से सावधान रहता है वही भावार्थ का मनन कर सकता है। भले ही
कथा का निरूपण समाप्त हो जाय लेकिन उसका मनन समाप्त नहीं होता। ऐसा मनन हो तो सहज ही मेरा ध्यान
लग जाता है भले ही वह निर्गुण हो या सगुण हो। प्यारा होना ही ध्यान का प्रमाण है। लेकिन उद्धव ! ध्येय, ध्यान
और ध्याता इन तीनों की एक साथ भेंट नहीं होती तभी तक यह ध्यानावस्था रहती है यह जान लो जिसके
अंतःकरण में ध्यान के प्रति चाह होती है, जिसके मन में मेरे प्रति प्रेम भावना होती है और उद्धव ! जब सहस्रों
जन्मों का भाग्य रहता है तभी इतना लाभ प्राप्त होता है। निष्काम मन से जब जन्म-जन्मांतर से साधना की जाती

३१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है तभी दृढ़ विश्वास के साथ मेरा ध्यान लगता है। जब मेरा दृढ़ ध्यान लगता है, अनन्यभाव से मेरा भजन होने
लगता है तभी वह समस्त पदार्थों के साथ मुझे आत्मसमर्पण करता है। वेदों में कही गयी क्रियाओं से अथवा
लौकिक रूढ़ियों से मान्य क्रियाओं से अथवा देहसम्बन्धी क्रियाओं से भले ही अलौकिक लाभ हो जाएँ लेकिन
भाविक भक्त उनका स्वीकार नहीं करते। वैदिक लाभ में तो स्वर्ग से लेकर सत्यलोक तक के सभी दिव्य भोग
प्राप्त होते हैं लेकिन भक्त उन भोगों को हाथ तक नहीं लगाते। वह आनन्दपूर्वक भजन करता है और उसी में
तृप्त रहता है। लौकिक लाभों का समुदाय ही है कल्पतरु, कामधेनु तथा चिन्तामणि। लेकिन भक्त उन्हें भी
कृष्णार्पण कर आनन्द से हरिभजन करता है और उसी में तृप्त रहता है। गजांतलक्ष्मी घर में आये यही दैहिक
लाभ की पराकाष्ठा है। लेकिन भक्त उसे भी कृष्णार्पण करता है और तृप्तिभाव से भजन करके सन्तुष्ट रहता है।
ब्रह्मपद प्राप्त होने तक के सभी लाभ हेय समझ कर जो भक्त अपने प्राण तक बेच देता है और सब कुछ मुझे
अर्पण करता है, जो मेरी सेवा के लिये प्राण बेचता है, वह आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाता। वह मेरी ही कथा,
मेरा ही ध्यान और मेरा ही महोत्सव करता है।
मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वामुमोदनम्।
गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद्गृहोत्सवः ॥ ३६ ॥
ध्यान की स्थिति में ध्यान करता है अन्यथा कथानिरूपण करता है। निरन्तर मेरी ओर ध्यान देने के प्रति
दक्ष रहता है। मन को खाली नहीं रहने देता। मेरे जन्म और लीलाओं का निरूपण करने में उसे परम आनन्द
मिलता है और ऐसी स्थिति में उसका शरीर रोमांचित हो जाने के कारण प्रेम से कथा और भी अधिक उल्हसित
होती है। हरिकथा का रहस्य सुनकर भी जिसका हृदय द्रवित नहीं होता वह जल में रहकर भी शुष्क पाषाण की
तरह है। मेरी भक्ति का लक्षण सुनो। वह पुण्यदिवसों पर व्रत करता है और दीनों के उद्धार के उपाय स्वयं करता
है और दूसरों से कराता है। भागवत धर्म के विशेष पर्व नृसिंहजयन्ती, रामजयन्ती, वामनजयन्ती, कृष्णजन्माष्टमी
तथा शिवरात्रि तो उत्तम से उत्तम हैं। वैष्णवों के लिये शिवरात्रि विरुद्ध है यह कहना अत्यन्त असंगत है। कोई
पुराण उसके विरुद्ध नहीं है ऐसा व्यासजी भी स्पष्ट रूप से कहते हैं। शंकर तमोगुण से काला ही था किन्तु विष्णु
का ध्यान कर वह शुद्ध हो गया और विष्णु शिव के ध्यान से काला हो गया। इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरे के
गुणों से सुशोभित हो रहे हैं। इसलिये शंकर गाय के दूध की तरह श्वेत है और विष्णु अत्यन्त सुन्दर घनश्याम है।
ध्यान का महत्त्व इतना बड़ा है कि उनमें से प्रत्येक जन इस प्रकार दूसरे का ध्यान कर उसके गुणों से व्याप्त हो
गया। जब मूलरूप से ही दोनों में एकता है तो उपासकों को ही उसमें विरोध क्यों मालूम होता है ? इसीलिये
शिवरात्रि का पर्व वैष्णवों के विरुद्ध नहीं। यह व्रत सभी के लिये पवित्र है। जो पर्व भगवान को प्रिय है, जो सारे
कल्याणों की खान है जो दोनों ही पक्षों का तारक है और जो वैष्णवों की जननी है ऐसी यह एकादशी है। यह
एकादशी शुक्ल और कृष्णपक्ष की विधि से भक्तों को कन्धे पर बिठाकर उन्हें सायुज्यसिद्धि देकर मोक्ष पद पर
बिठाती है। यदि कोई शुक्ल एकादशी का व्रत करता है और कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत छोड़ देता है तो
केवल एक ही पक्ष का व्रत उसे सायुज्य तक कैसे पहुँचा सकता है ? दो पक्ष होने से पक्षी उड़ सकता है। उनमें
से एक को उखाड़ देने से वह उड़ नहीं सकता। उसी प्रकार कृष्ण का त्याग करने से सायुज्य तक नहीं पहुँच
सकता। उसी प्रकार एकादशी है। उस एकादशी के दिन जो भी उत्सव किया जाता है वह मुझमें ही आकर
मिलता है इसमें कोई सन्देह नहीं है। जो एकादशी का व्रत करता है उसके घर में मैं सदा विचरण करता रहता हूँ

ग्यारहवाँ अध्याय ३१९
क्योंकि सभी पदों में सर्वश्रेष्ठ मेरी एकादशी ही है। एकादशी का व्रत करने वाला जो मेरा भक्त है वह व्रत, तप
तथा तीर्थों का राजा है। मुझ गरुड़ध्वज को वह प्रिय है। वह मेरे परिवार का ही है। मेरे भक्त जब घर आते हैं
उस समय सभी पर्व उसके द्वार पर आकर खड़े हो जाते हैं। वैष्णवों को तो वह समय दीपावली तथा दशहरे की
तरह आनन्ददायक मालूम होता है। चन्द्रसूर्यादि ग्रहण भी उस दिन पर न्योछावर हो जाते हैं। कपिलाषष्ठी तो
उसकी दासी बनकर रहती है, फिर अर्धोदय को कौन पूछता है? मेरे भक्तों के आगमन से उल्हास मन में नहीं
समाता। उसके लिये सारा धनधान्य खर्च हो जाए तो भी वह नाचता रहता है। ऐसा मेरे भक्तों का प्यार, और
उनकी संगति की जो मधुरता है उसी का नाम है भक्ति का उत्कर्ष। जिस दिन संतों का घर पर आगमन होता है
उस दिन मानों करोड़ों पर्वों का पुण्य ही प्राप्त हो जाता है। संत घर आते हैं वह दिन वैष्णव पर्व ही समझता है,
श्रीहरि का मन्दिर सजाता है, तोरण बंदरवार तथा पताका फहराता है तथा उत्सव मनाता है। संतों को आदर के
साथ बिठा कर बड़े चातुर्य से कीर्तन का प्रारम्भ करते हैं, प्रेम से नाचते-गाते हैं और बड़ी उत्कंठा से
अंगविक्षेपादि का प्रदर्शन करते हैं। टाल, वीणा, मृदंग आदि बड़ी कुशलता से बजाते हैं और अनेक प्रकार के
चरित्रों को गा बजाकर गरजते हैं तथा हरिनाम का जयघोष करते हैं।
यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु।
वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम्॥ ३७॥
अब दीक्षा का लक्षण सुनो। वैदिक तथा तांत्रिक, ये दो प्रकार की दीक्षाएँ हैं, वेदोक्त ग्रहण करना वैदिक
दीक्षा होती है तथा पुराणोक्त ढंग से ग्रहण करने को तांत्रिक दीक्षा कहते हैं। वैष्णव व्रत को ग्रहण करना पड़ता
है। यही मेरा वैष्णवव्रत धारण करने का पुराणोक्त शुद्ध लक्षण है। वैष्णवव्रत धर्म का पालन करने के लिये
प्रतिवर्ष आने वाले पर्वों को यथाविधि मनाना चाहिये। चातुर्मास में बताये गये एकादशी आदि व्रत एवं जयंतियाँ
मनानी चाहिये। शयनी, कटिनी, प्रबोधिनी, पवित्रारोपणी, नीराजनी, वसंतदमनकारोपणी आदि जयंतियाँ अनेक
पर्वकालों में समारोहपूर्वक मनानी चाहिये तथा नाना प्रकार की पूजा, नीरांजन तथा दीपमालाएँ जलाकर, मृदंग
टाल आदि वाद्यों के गजर के साथ करनी चाहिये तथा अत्यन्त उल्हासपूर्वक यात्रा पर निकलना चाहिये। दिंडी,
पताका तथा ध्वज लेकर नामघोष से गर्जना करनी चाहिये। जिस देवता की यात्रा पर निकलना है, उस देवता को
. घर लाना चाहिये। जिस मूर्ति पर भक्ति हो उर्सी मूर्ति की स्थापना करनी चाहिये।
ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः।
उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि॥ ३८॥
मूर्ति उत्तम ढंग से तैयार करवानी चाहिये। वह ठीक-ठाक, सुडौल तथा मनोहर होनी चाहिये। उसे देखकर
वह निर्दोष, भव्य एवं कोमल है ऐसे उद्गार साधु के मुख से निकलने चाहिये। मूर्ति सुघड़ हो पर कृश न हो,
वह अधोमुख न हो, वह स्थूल और ऊर्ध्वमुख भी न हो और न रोती दुर्मुख ही हो। वह स्थूलकाय और विद्रूप
मुँह वाली भी न हो और न अति दीन दीखने वाली ही हो। वह ऊर्ध्वा दृष्टि अथवा अधोदृष्टि वाली भी न हो।
उसका मुख विकराल न हो। शरीर से सुन्दर किन्तु नाक से हीन न हो अथवा ऊपर का भाग पुष्ट और पैर कृश न
हो, मोटी तथा नाटी न हो, अथवा आकार में बहुत बड़ी न हो। मूर्ति नाजुक हो तथा उसकी आँखें सुन्दर हों। सारे
अवयव पुष्ट हों तथा देखने में वह सुप्रसन्न हो। अंग, उपांग में कोई न्यूनता न हो। वह उत्तम चिन्हों से युक्त तथा
सुलक्षणी हो और उसके हाथ में आयुध हों। उसे देखते ही तन-मन तृप्त हो, जिसका दर्शन होते ही भूख-प्यास

३२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का स्मरण न हो। साथ ही वह नाजुक हो तथा चेहरे पर कृपा की छटा अंकित हो। जो मूर्ति देखते ही मन में बस
जाय, सबको अच्छी लगे और प्रेमपूर्वक उसकी ओर देखते ही अंतःकरण में प्रेम उमड़ पड़े ऐसी हो। वह
किंचित् हास्यमुख हो, मुद्रा अत्यन्त प्रसन्न हो। जिसके लावण्य के तेज से मन प्रसन्न हो उठता है वही है
सर्वांगसुन्दर मूर्ति। वहाँ बड़े-बड़े साधुओं को एकत्र कर एकनिष्ठा से अग्न्युत्तारणादि विधि करना चाहिये और
उसकी आँखों का आच्छादन निकाल कर किसी महान व्यक्ति के हाथों उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये।
विस्तृत देवालय बनवाना चाहिये। उसके चारों ओर वन, उद्यान तथा उपवन बनवाना चाहिये। खेत, बगीचे,
तालाब तथा कुएँ बनवा कर सारा स्थान रमणीय एवं विश्राम करने योग्य बनाना चाहिये। अनेक प्रकार के वृक्ष
लगाने को 'वन' कहते हैं, केवल भक्ष्य फलों के पेड़ लगाने को 'उपवन' कहते हैं और केवल फूलों के पेड़
लगाने को 'उद्यान' कहते हैं। यह सारी तैयारी कर उसे कृष्णार्पण करना चाहिये। चारों ओर व्यापारी आकर
बाजार का निर्माण कर सकें इसलिये नगर बसाना चाहिये। रात-दिन वेदाध्ययन शास्त्रश्रवण तथा कीर्तन होना
चाहिये। इतना करने का सामर्थ्य न हो तो धनी लोगों से सहायता लेकर, भक्तिपूर्वक कार्य सम्पन्न करना चाहिये
अथवा भगवद्भक्तों को एकत्र बुला कर, उनमें जो श्रीमान हों उनसे सहायता लेकर उस धन से यह कार्य सम्पन्न
कराना चाहिये। एक बार देवता की प्रतिष्ठा करने के बाद जो पुनः उधर नहीं आता वह आलसी तथा अभागा है
यह जान लो। वह सच्चा भक्त नहीं है। जो मूर्ति की प्रतिष्ठा करने का कर्तव्य जानता है, धन खर्च कर भक्ति भी
कायम रखता है, वह छोटे कामों में भी सहभागी होता है और झाडू लगाने से भी पीछे नहीं हटता।
सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः।
गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद् यदमायया ॥ ३९॥
शिष्य तथा सेवक होते हुए भी जो प्रतिष्ठा और सम्मान को छोड़ स्वयं दंभरहित होकर देवालय में सफाई
आदि करता है और बड़े कौशल से रंगोली सजाता है, उनमें नानाप्रकार की आकृतियाँ निकाल कर उनमें अनेक
प्रकार के सुन्दर रंग भरता है उसे मेरे भजन में नितांत प्रेम रहता है। किसी गरीब भिखारी की तरह वह मेरी सेवा
करता है, निम्न स्तर सेवा करने में उसे बड़ा आनन्द आता है। मेरे भजन में वह कृत्रिमता नहीं लाता।
अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्।
अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्निवेदितम्॥४०॥
अनेक प्रकार की सम्पत्ति खर्च कर यहाँ देवालय बनवा कर देवता की प्रतिष्ठा की, मैं एक बहुत बड़ा भक्त
हूँ इस बात का अहंकार नहीं किया। मन में सच्ची भक्ति न होते हुए भी बाह्य रूप से प्रयास कर भक्ति का जो
विस्तार करता है वह ढोंग की कृति है, भक्त उसका स्पर्श भी नहीं करते। भक्त को अभिमान नहीं करना चाहिये।
मान-सम्मान की इच्छा नहीं करनी चाहिये, दांभिक भजन कभी नहीं करना चाहिये और किसी भी विषय की
अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। जो भी अनुभव आये, अथवा देवालय के निर्माण में जो खर्च हुआ हो अथवा जो
भी दान दिया हो उसका कभी उल्लेख नहीं करना चाहिये। यजमान जब अपनी की हुई बातों का स्वयं ही बखान
करता है तो वह सब निष्फल हो जाता है। प्राण निकलने के बाद जिस प्रकार प्रेत शेष रह जाता है उसी प्रकार वे
सारे धर्म निष्प्राण रह जाते हैं। किसान बुआई कर उसे ढँक देता है तभी अच्छी फसल उपजती है। उसी प्रकार
दान का उल्लेख न करने से ही वह फलदायी होता है। हम जब देवता को कुछ अर्पण करते हैं अथवा कोई अन्य
भगवान को कुछ अर्पण करता है तो हमें उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये। वह पुजारीपन का दोष होता है। देवता

ग्यारहवाँ अध्याय ३२१
का प्रसाद ग्रहण करते समय भी लालचवश पूरा प्रसाद नहीं लेना चाहिये। पहले उसे सबको बाँटना चाहिये और
फिर थोड़ा-सा ग्रहण करना चाहिये। श्रीहरि को जो दीपक समर्पित करते हैं उससे अपने घर का काम नहीं करना
चाहिये। पुराणों में तथा ज्ञानसम्पन्न स्मृतिकारों ने ऐसा ही कहा है। यह तो साधारण बाह्यपूजा हुई। लेकिन
अंतःकरण में मुझ पर दृढ़ विश्वास और भक्ति होनी चाहिये। वही भक्ति भगवान को प्रिय है। भाविकों की पूजा
भक्ति से ही पूर्ण होती है। अब भक्ति का रहस्य सुनो। जिस भजन के कारण 'भक्त' कहा जाता है वह भजन ऐसा
है कि इस लोक में जो भी उत्तम और प्रिय वस्तु होती है उसे वे मुझे ही अर्पण करते हैं।
यत् यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः।
तत्तन्निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते॥४१॥
अधिक क्या कहें? यदि भक्त को सचमुच चन्द्रामृत भी प्राप्त हो जाय तो वह सारा का सारा भगवान को ही
अर्पण कर देता है। देह के लोभ के कारण स्वयं सेवन नहीं करता। अमरत्व प्राप्त करने के लोभ से यदि अमृत
का सेवन किया जाय तो देवतागण अमृतपान करते हुए भी यथाकाल मर ही जाते हैं। इसलिये नश्वर देह की
ममता से भक्त अमृतपान नहीं करते। यदि वही भगवान को अर्पण किया जाय तो अक्षय अमरत्त्व प्राप्त होता है।
याचना किये बिना अथवा दैवयोग से पारस अथवा चिन्तामणि भक्त के हाथ में आने पर वह उसे लोभ से अपने
पास नहीं रखता, उसे तत्काल भगवान को अर्पण कर देता है। लोभ से कल्पतरु जतन करने से सहज ही इच्छा
बढ़ती है लेकिन वही कल्पतरु भगवान को अर्पण करने से अपने आप निरिच्छता प्राप्त होती है। स्वार्थवश
चिन्तामणि पास में रखने से वह अंतःकरण में अत्यन्त चिन्ता ही उत्पन्न करता है। वही यदि भगवान को अर्पण
कर दिया जाय तो अंतःकरण निश्चिंत हो जाता है। कामधेनु का प्रतिपालन करने से मन में असीम इच्छा की
वृद्धि होती है लेकिन यदि उसे कृष्णार्पण कर दिया जाय तो देह में पूर्ण निरपेक्षता रहती है। आशा के चक्कर में
पारस पत्थर पास में रखने से वह धनलोभ बढ़ाता है लेकिन उसे भगवान को अर्पण कर देने से मनुष्य स्वार्थ से
मुक्त हो जाता है अथवा देश, काल और ऋतु के अनुसार जो उत्तम फल या पदार्थ उत्पन्न होते हैं या नया अन्न
उत्पन्न होता है उसे भक्तगण भक्तिभाव से मुझे ही अर्पण करते हैं। अपने मन की सारी प्रिय चीजें वे हरिचरणों
की ओर ही प्रस्तुत करते हैं। साथ ही भिन्न-भिन्न पदार्थों का स्वाद भी वे मुझे ही समर्पित करते हैं। मुझ अनन्त
के हाथों में मेरे भक्त प्रेमपूर्वक जो भी अर्पण करते हैं उनके फल का वर्णन करते समय वेद भी मौन हो जाते हैं।
मैं तो वेद का वक्ता हूँ किन्तु मैं भी उनके फल का वर्णन नहीं कर सकता। हे उद्धव! अब यह जान लो कि
उनका फल मैं स्वयं ही हूँ। हे उद्धव! प्राणों से भी अधिक मुझ पर जो प्रेम है उसी का नाम सच्ची भक्ति है यह
ध्यान में रखो। अब जिससे मुझे तत्काल पा सकते हो, वे मेरी पूजा के अत्यन्त पवित्र और कल्याणकारी स्थल
तुम्हें बताऊँगा।
सूर्योऽग्निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णवःखं मरुजलम्।
भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे॥४२॥
एकादश स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय में ग्यारह पूजास्थलों का वर्णन है उनका वर्णन एका जनार्दन ऐक्यरूप
से करेगा। सूर्य, अग्नि और ब्राह्मण; गौ, वैष्णव और आकाश, वायु, जल और पृथ्वी ये नौ स्थल तथा एक स्वयं
इस प्रकार दस स्थल हमें अत्यन्त पूजनीय हैं। सभी पंचमहाभूतों में यह ग्यारहवाँ पूज्य पूजास्थान है, यह जान
लो। अब उनकी पूजा का विधि-विधान और लक्षण सुनो।

३२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत् माम्।
आतिथ्येन तु विप्राग्रे गोष्वङ्ग यवसादिना ॥ ४३ ॥
सूर्य मेरा अधिष्ठान है। जिस तेज के योग से सारे संसार की आँखें देखने में समर्थ होती हैं वह मेरे ही तेज
से प्रकाशमान होता है। घर में दीपक जलाने पर उसका प्रकाश खिड़की के बाहर दिखायी देता है। उसी प्रकार
मेरे स्वरूप में मेरा जो आत्मतेज होता है वही सूर्य के रूप में बाहर प्रकाशित होता है। आकाश में दिखायी देने
वाला वह सूर्य मैं नारायण ही हूँ यह जान लो। मेरे उसी सूर्य के सौरसूक्त और त्रैविद्या ये उपासनार्मंत्र हैं।
ऋग्वेदादि तीनों वेद, सारे सौरमंत्र तथा सूर्यसूक्त को ध्यान में रख कर सूर्य के समक्ष पठन करते समय सूर्य की
ज्ञानपूर्वक पूजा करनी चाहिये। लेकिन ऐसा कभी नहीं कहना चाहिये कि यह वैदिकों की उपासना है, जो वेदों
का पठन करते हैं उनके ही लिये वह उपयुक्त है और अज्ञानियों के लिये सूर्य की उपासना योग्य नहीं है। अब
जिससे सूर्य तत्काल प्रसन्न होंगे ऐसी एक सरल उपासना तुम्हें बताऊँगा उसका ध्यानपूर्वक श्रवण करो। सभी वेदों
की माता, सारे मंत्रों का मुकुटमणि जो गायत्री है उन्हें श्रेष्ठ वर्णों के ब्राह्मणों को भली-भाँति जान लेना चाहिये।
उसके अर्थ की ओर ध्यान दें तो ज्ञात होगा कि सूर्य उसके अधीन रहता है। उन तीन चरणों के गायत्री मंत्र से
तीन बार अर्घ्य देने को ही 'त्रैविद्या' कहते हैं। अर्धमात्रा, अर्धबिम्ब ध्यान तथा त्रिपदा गायत्री से अर्घ्य प्रदान
करने से चिद्घन परमात्मा को सन्तोष प्राप्त होता है और वह भक्त को अपनी तरह कर लेता है। यह मेरा पहला
अधिष्ठान है। इसी का नाम है 'सूर्यपूजा'। अब अग्निपूजा का जो लक्षण है उसे विस्तारपूर्वक और सम्पूर्ण सुन
लो। शरीर के सब अंगों में मुख श्रेष्ठ है। वह मेरा मुख अग्नि है, यह जान लो। यही बात सारे वेद और पुराण
गरज कर कह रहे हैं। ब्राह्मण मुझे सब में प्रिय हैं, वे मेरे मुख के बल पर श्रेष्ठत्व प्राप्त करें इसलिये मैंने उन्हें
अग्नि की सेवा में लगाया लेकिन वहाँ भी वे चूक गये। मेरे मुख में अवदान डाल कर 'इन्द्राय स्वाहा' कहते हैं।
इस प्रकार ब्राह्मण कर्म मार्ग में फँस गये और मुझे अर्पण करने का शुद्ध मार्ग वे भूल गये। मेरे मुख में अवदान
अर्पण करते समय उनकी योग्यता ही उनके आड़े आयी इसीलिये इन्द्र, यम, वरुण, सूर्य आदि अनेक प्रकार के
विकल्प अवदानों में उत्पन्न हो गये। वे यह भी नहीं मानते कि देवी और देवता मैं ही हूँ। मुझे भूलकर ही उनका
सारा व्यवहार चलता रहता है। त्रिभुवन के लोग जिन-जिन बातों का सेवन करते हैं वह सब मेरे मुख में ही
अर्पण होता है। लेकिन याज्ञिक लोग इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि कर्म के प्रति उनका विकल्प रहता है। इस
प्रकार ये ब्राह्मण विकल्प बुद्धि होकर अभी भी सन्देह में पड़े हुए हैं यह ध्यान में रखो। वेदशास्त्रों का अध्ययन
करने के बाद भी मुझे किस तरह अर्पण करना चाहिये इस सम्बन्ध में वे ठीक से नहीं बताते। उनकी एक समिधा
से भी मेरा मन तृप्त होता है, तिस पर एकाध और होमद्रव्य अर्पण करने से मेरे मुख को अत्यन्त सुख होता है।
उन्हें मैं अपना सर्वस्व अर्पण करता हूँ। मुझे आशारहित से प्रेम है इसलिये मैं निरिच्छ हाथों की प्रतीक्षा करता
रहता हूँ। उनसे मिलने वाले छोटे से छोटे ग्रास की भी मैं प्रतीक्षा करता रहता हूँ। उनके निर्विकल्प हाथों से,
भक्ति भाव से अग्नि को जो कुछ अर्पण होता है, भले ही वह तृण हो, काष्ठ हो या तिल हो या घृत हो, वह
चित्स्वरूप मैं ही सेवन करता हूँ। इस प्रकार मैंने अग्नि की उपासना के रूप में दूसरे स्थल की पूजाविधि
बतायी। अब ब्राह्मण भक्ति कैसे की जाय सुनो। उद्धव! पूजा में अत्यन्त श्रेष्ठ और मेरी प्राप्ति का शीघ्र मार्ग
पूछोगे तो ब्राह्मण मेरी पूजा का श्रेष्ठ स्थान है। उनके भजन का एक आश्चर्य यह है कि उसमें जो भी कोई विघ्न
आता है वह उन्हें देखते ही दूर भाग जाता है। इसलिये उनके चरणों पर मस्तक रखकर उनके चरणों की धूल
शिरसावंद्य करनी चाहिये। आवाहन और विसर्जन के अतिरिक्त शालिग्राम में मेरा अधिष्ठान रहता है लेकिन वे

ग्यारहवाँ अध्याय ३२३

शालिग्राम केवल अचेतन रहते हैं और ब्राह्मण तद्रूप होते हुए सचेतन रहते हैं। मैं जनार्दन वस्तुतः अव्यक्त स्वरूप
हूँ लेकिन वही मैं नारायण रूप में पृथ्वी पर ब्राह्मणरूप में व्यक्त हुआ हूँ। इसीलिये ब्राह्मणों को भूदेव कहते हैं।
ब्राह्मणों के मुख से ही वेदों की महिमा की वृद्धि हुई है। ब्राह्मणों के कारण ही यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि को
श्रेष्ठत्त्व प्राप्त हुआ है, ब्राह्मणों के योग से ही देवताओं में प्रेमभाव उत्पन्न हुआ है और ब्राह्मणों के मुख से ही
ब्रह्मा को ब्रह्मत्व प्राप्त हुआ है। उन ब्राह्मणों का अपमान करने से यज्ञदेवताओं का अपमान होता है। उसी प्रकार
वेद, तप, दान, तीर्थ आदि का भी अपमान होता है। अधिक क्या कहें, वास्तव में परब्रह्म का भी अपमान होता
है। त्रैलोक्य में भी मैं समा नहीं पाता इसलिये मैं त्रैलोक्य से भी बड़ा हूँ, किन्तु ब्राह्मण मुझसे भी बड़े हैं क्योंकि
उनमें मैं वेदरूप नारायण अंतर्भूत कर रहा हूँ। ब्राह्मण का चरण हृदयस्थल पर रखने के कारण ही मुझे अत्यन्त
पवित्रता प्राप्त हुई है। लक्ष्मी की उपेक्षा करने पर भी वह मेरे चरणों के निकट बैठती है और मेरा चरणतीर्थ शंकर
भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। इसलिये ब्राह्मण पूजनीय हैं इसे ध्यान में रखो। उनके चरण धोने का काम
मैं स्वयं करता हूँ। मैं स्वयं होकर उनकी जूठन उठाता हूँ फिर दूसरों की क्या बिसात है ? मेरा प्रमुख आवास और
मेरी सारे उपचारों के साथ पूजा करने का स्थान अथवा दान, मान, मिष्ठान्न आदि सब एक ब्राह्मण की विधियुक्त
पूजा में है। एक को नियम शालिग्राम का तो एक को स्थापित लिंग का होता है, किसी को गणेशजी का नियम
रहता है तो किसी को सूर्य के दर्शन का। किसी को तुलसी का नियम रहता है तो किसी को हाथ में बँधे हुए
अनन्त का किन्तु जिसे ब्राह्मण का नियम रहता है ऐसा भाग्यवान दुर्लभ है। जो नित्य नियम से ब्राह्मण की
षोडशोपचार पूजा करता है वही भक्ति का राजा और मेरी आत्मा है। जो अलग-अलग देवताओं की उपासना नहीं
करता और जीवभाव से ब्राह्मण का ही भक्त रहता है उसे मैं अनर्थ से बचाकर उसका स्वार्थ सिद्ध करता हूँ। ऐसे
ब्राह्मणों के भक्तों से पृथ्वी भी पवित्र होती है। गंगा भी उसके पुनीत पैरों के तीर्थ की इच्छा करती है। मैं तो उन्हें
शिरसावंद्य करता हूँ। देखो तो, मैं बिला मोल लिये उसका सेवक बन गया हूँ। ब्राह्मण की सेवा में मुझे
अलौकिक और असीम सुख प्राप्त होता है। जो नित्य नियमानुसार ब्राह्मण की पूजा करता है वह भगवान का प्रिय
बनता है। इसीलिये चारों बाहें फैलाकर उसे आलिंगन देने से ही मेरा मन शान्त होता है। ब्राह्मणों द्वारा स्नान किये
हुए जल में जो भक्तिभाव से स्नान करता है उसका उसी काल में अवमृथ स्नान हो जाता है। ब्राह्मणों के चरणों
का तीर्थ देखते ही दोष और पातक भाग जाते हैं। इसलिये उसी तीर्थ का भक्तिभाव से सेवन करने से सभी दोष
दूर हो जाते हैं। जो नित्य नियमपूर्वक ब्राह्मण के चरणों का तीर्थ सेवन करता है वह स्वयं तो तीर्थस्वरूप होता ही
है, साथ ही उसके योग से जड़ जीव भी पुनीत हो जाते हैं। उन ब्राह्मणों की पूजा करते समय अभ्यंग तैलस्नान,
पुष्प, चन्दन, आसन, भोजन तथा यथाशक्ति धनधान्य भी देना चाहिये। ब्राह्मण को भोजन प्रिय है और सभी दानों
में अन्नदान श्रेष्ठ है, इसलिये उत्तम पकवान तैयार कर ब्राह्मण मेरा ही स्वरूप है इस भावना से उन्हें भोजन कराना
चाहिये। कुछ लोग ब्राह्मणों का अपमान कर उन्हें भोजन कराते हैं, कुछ ऊब कर देते हैं, कुछ निर्भत्सना करके
देते हैं तो कुछ चिढ़-चिढ़कर देते हैं लेकिन हमें वैसा नहीं करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मण मेरा स्वरूप है इसे ध्यान
में रखो। उनका आदरातिथ्य कर उन्हें यथाशक्ति भोजन कराना चाहिये। अगर भोजन के समय कोई अज्ञानी
अतिथि आ जाय तो उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिये। वह भी मेरा ही रूप होता है इसलिये उसे भी अन्न
देना चाहिये। अतिथि यदि विन्मुख चला जाय तो उसके साथ सारा पुण्य भी चला जाता है इसलिये उसे समय पर
अन्न अवश्य देना चाहिये। कम से कम पानी तो अवश्य पिलाना चाहिये। ब्राह्मण को पंगत में बिठाकर अन्न
परोसने में जो भेदभाव करते हैं वे एक तरह से पाप ही मोल लेते हैं। उन्हें निश्चित रूप से अधोगति प्राप्त होती

है। ब्राह्मण की सेवा में शरीर, वाचा, मन, धन आदि का उपयोग यथाशक्ति निष्कपट भाव से करने का ही नाम है
अतिथि पूजन। त्रिपदागायत्री मंत्र का जप कर ब्राह्मण पूर्णतयः पवित्र हो जाते हैं इसलिये वेद भी वहीं निवास
करते हैं। ब्राह्मण मेरा ही स्वरूप होते हैं इसीलिये वे मेरी पूजा का श्रेष्ठ अधिष्ठान भी हैं। ब्राह्मण की आज्ञा का
पालन करने के लिये जिसका मन अत्यन्त तत्पर रहता है और जो उन्हें दान देता या दिलाता है उस वृत्ती का ही
नाम है पूर्ण श्रद्धा। ब्राह्मण की सेवा धन के बिना नहीं होती यह कहना ठीक नहीं है। सेवा में श्रद्धा और भजन
के प्रति पूर्ण उल्हास यही प्रमुख प्रमाणभूत साधन होते हैं। किसी की शरीर से सेवा करें, किसी का वाणी से
पूजन करें, किसी का मन से ही भजन करें, किसी भी प्रकार से भजन करें लेकिन ब्राह्मण से पूर्ण दया प्राप्त होती
है। ब्राह्मण की भक्ति में अंतःकरण का आनन्द से भर जाना तथा परमश्रद्धा और उल्हास से परिपूर्ण रहना इसी का
नाम है 'आतिथ्य'। इस प्रकार ब्राह्मण का भजन यह पूजा का तीसरा अधिष्ठान है। अब गायत्री सेवा के सम्बन्ध
में सुनो। जिस गौ के प्रेम के कारण मैंने सहस्रार्जुन का वध किया और इक्कीस बार पृथ्वी के वीर सैनिक क्षत्रियों
को मार गिराया, रामावतार में मेरा महात्म्य बहुत अधिक था लेकिन उसमें गौसेवा नहीं हुई इसलिये मैंने गोकुल
में अवतार लेकर गाय की सेवा की, गाय की सेवा से ही मैं पुष्ट हुआ इसीलिये मैंने बाल्यावस्था में ही बड़े-बड़े
मल्लों को मार गिराया, कंस, चाणूर सरीखे अदम्य मल्लों का वध किया और उग्रसेन को राजसिंहासन पर
बैठाया। गाय की सेवा मुझे अत्यन्त प्रिय है, उसके ही कारण मेरी कीर्ति फैली। मैंने कंस के राज्य के कारागार
खुलवाये और बन्दी पितरों को मुक्त किया। इसलिये गौ और ब्राह्मण मेरे प्राण हैं। इन दोनों के कारण ही मेरी
पूजा का अधिष्ठान सुलभ हो गया है। जो आपातकाल में गौ का संरक्षण करता है वह मुझे बहुत प्रिय लगता है।
उसके साथ मैं भी गोरक्षण करने लगता हूँ। गौ की सेवा का विधान इस प्रकार है कि उसे रोज गोग्रास देना
चाहिये उसे घास खिलानी चाहिये और उसके शरीर पर हाथ फेर कर उसका बदन सहलाना चाहिये। इतने से ही
मैं प्रसन्न हो जाता हूँ। हे उद्धव ! बिना किसी लोभ के गाय की सेवा करने से मेरी प्राप्ति होती है। अब सद्भक्ति से
वैष्णव की पूजा कैसे की जाय, यह भी सुनो।
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया।
वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥
वैष्णव की सेवा करना बड़ा कठिन काम है। वहाँ जाति प्रमाण नहीं है। भक्ति प्रधान भाव को ध्यान रखते
हुए यह शूद्र है और यह ब्राह्मण है यह भेदभाव मन में नहीं लाना चाहिये। विदुर दासीपुत्र था यह प्रसिद्ध ही है।
लेकिन उसे श्रीकृष्ण भा गया। वह वैष्णवों में अत्यन्त श्रेष्ठ सिद्ध हुआ। उसे निंद्य कैसे माना जाय ? मारुति जो
वानरों की जाति में पैदा हुआ वह वैष्णवों में अत्यन्त श्रेष्ठ था। उसे कनिष्ठ कहने वाला पातकी कौन होगा ?
राक्षसों में विभीषण और दैत्यों में प्रह्लाद भी भगवान की शरण में आया जिसके कारण वह वैष्णव हो गया। जाति
से श्रेष्ठ होते हुए भी यदि वह भक्तिरहित है तो वह वैष्णव नहीं है यह ध्यान में रखो अथवा यदि वह दिखावे के
लिये भजन करता है तो वह भी वैष्णव नहीं हुआ है यह जान लो। जो वैष्णवों में जाति को प्रमाण मानता है,
शालिग्राम को पाषाण समझता है और गुरु को साधारण मनुष्य समझता है वह पूर्णरूप से पातकी है। कौशल,
चातुर्य, ज्ञातापन और जाति का अभिमान छोड़ जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आयेगा वही सच्चा वैष्णव है यह
समझ लो। उस वैष्णव की पूजा करनी चाहिये, लेकिन बाह्य उपचारों से नहीं बल्कि बन्धुत्व भाव से। मन में
सच्ची आकुलता होनी चाहिये। उसी का नाम है सच्ची पूजा। सगे भाई का स्नेह कैसा रहता है, सुनो। जो भाई को

ग्यारहवाँ अध्याय ३२५
रणसंग्राम में चोट लगने पर शत्रु की ओर से उस पर होने वाले प्रहार को बचाने के लिये स्वयं आगे आकर
शत्रुपक्ष का सामना करता है उसी प्रकार जिसके मन में आकुलता रहती है वही वैष्णवों की पूजा की सच्ची विधि
है। स्नेह के बिना केवल तिलक चन्दन लगाने से भगवान को प्रसन्नता नहीं होती है। साधु एक ही पिता के पुत्र
होने के कारण स्वाभाविक बन्धु ही होते हैं। उनमें सौतेला भेदभाव रखना स्नेह का लक्षण नहीं है। वास्तव में
भक्तों की तथा अभक्तों की उत्पत्ति मुझसे ही है। लेकिन मेरे प्रति भक्ति भाव रखने से या न रखने से जो सौतेला
व्यवहार उपस्थित होता है उससे परस्पर विरुद्ध स्थिति उत्पन्न हो जाती है। वैष्णव विष्णु के ही उदर में रहते हैं।
उसी उदर में जाकर हम भी रहें तो सहज ही सगेपन का भाव उत्पन्न होता है और अकृत्रिम प्रेम उत्पन्न होता है।
ऐसे बन्धु भाव से जो व्याकुलता उत्पन्न होती है वही वैष्णव कुल की पूजा है। वैष्णवों की ऐसी पूजा करने वाले
के पास भक्ति में रमा हुआ मैं प्रतीक्षा में खड़ा रहता हूँ। वैष्णवपूजा का जो लक्षण है वही मेरा पाँचवां पूजा स्थान
है। अब आकाश का पूजन सुनो क्योंकि उसमें केवल मेरा ध्यान रहता है। आकाश निर्लेप और निर्विकार है। उसी
प्रकार निरन्तर हृदय में मेरा ध्यान करना चाहिये। शान्त भाव से ध्यानस्थ रहकर जो सारे महदाकाश को अपना
हृदयाकाश बना लेता है, वह मुझ परमेश्वर की पूजा करता है। हृदय में मुझ सूक्ष्म एवं निर्विकार का ध्यान करना
यही मेरी सच्ची पूजा है। मुझ अनन्त की पूजा उसके ही कारण सम्भव हुई ऐसा समझना चाहिये। आकाश में दाग
लगाने का प्रयत्न करने से वह आकाश को कभी नहीं लगता, उसी प्रकार सारे कर्म करते हुए जो अपने को मुक्त
ही समझता है, आकाश सारे पदार्थों में व्याप्त है लेकिन फिर भी वह उन सबसे अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार
जो आकाश में निष्ठा रखते हुए सारे कर्म करते हुए भी कर्मातीत ही रहता है वह आकाश का पूजक है। आकाश
मेरा पूजास्थान है और उसकी पूजा का विधान इस प्रकार है। यह छठवाँ पूजास्थान है। अब वायु का अर्चन
सुनो। जिसकी वायु के प्रति भगवद्बुद्धि कभी नहीं ढलती क्योंकि वायु के कारण ही जीवों में सजीवता आती है
और जगत को धारण करने वाला भी वही है। वायु के रूप में समस्त प्राणिमात्र का प्राण मैं ही हो गया हूँ यह
ध्यान में रखो। प्राण का मुख्य प्राण मैं ही हूँ। इसीलिये वायु मेरा ही स्वरूप है। वायु आकाश में ही उत्पन्न होता
है लेकिन उत्पन्न होते हुए भी वह उससे अलग नहीं होता। सभी प्रकार की हलचल में वह आकाश में ही रहता
है और अन्त में आकाश में ही स्थिर होता है। उसी प्रकार जन्मकर्मों का निर्णय जानते हुए भी अपना अधिष्ठान न
छोड़ना तथा प्राण का भी प्राण बनकर रहना यही वायु का पूजन है। प्राण का आवागमन चालू रहते हुए भी
'ब्रह्मरूप मैं ही हूँ' इसका नित्य ध्यान करना और वह करते समय निरन्तर जागृत रहना यही वायु की पूजा है।
जो मेरे स्वरूप से ही दृढ़ ध्यान करता है, वह उससे होने वाला वायु का पूजन यही सातवाँ पूजा स्थान है। जल
से ही जल की पूजा करनी चाहिये ताकि जल के योग से ईश्वर के प्रति चाह उत्पन्न होती है और वह पूजा
भगवान तक पहुँचती है। वह भक्त मेरा अत्यन्त प्रिय होता है। हे उद्धव ! 'आपो नारायणः साक्षात' इस मंत्र का
यही अर्थ है कि देवता द्वारा ही देवता की पूजा होती है। हे उद्धव! दूध से क्षीरसागर की पूजा करनी चाहिये,
उसी प्रकार द्रव्य से द्रव्य की पूजा करने का ढंग भी वास्तव में जल से जल की पूजा करने का प्रकार है। जीवन
ही जीवन को बचाता है। उस जीवन का भी जीवन मैं हूँ। इसीलिये लहरों से समुद्र का पूजन करना चाहिये उसी
प्रकार जीवन से जीवन की पूजा करनी चाहिये। 'नद्यस्तृप्यंतु' 'समुद्रास्तृप्यंतु' इस मंत्र से जो अर्घ्य देते हैं वे भी
जल से ही जल की पूजा करते हैं। इसमें पूजा और पूजक का एकत्व होता है। यही वेदोक्त विधिवत पूजा है।
जीवन से जीवन की पूजा करना यही आठवाँ पूजास्थल है। अब पृथ्वी के पूजन के सम्बन्ध में सुनो। श्लोकार्थ
के सन्दर्भ में वह सब बताऊँगा।

३२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि।
क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम्॥ ४५॥
जल में पृथ्वी निराधार रहती हैं इसलिये वह घुल कर उसका पानी होने लगता है इसलिये उसे धारण करने
वाला मैं (धराधर) उसमें जाकर रहता हूँ। इसलिये वह मूल रूप से निराधार होते हुए भी साधार हुई। इसलिये
पृथ्वी मेरा पूजास्थान है। अब उसकी पूजा की विधि सुनो। गौ के आकार का स्थंडिल बनाकर उस पर मेरा
आवाहन करना चाहिये। इसका कारण यह हैं कि पृथ्वी गौ की तरह है। इसलिये जब उसकी पूजा का प्रसंग हो
तो उसी के आकार का स्थंडिल बनाना चाहिये। उस स्थंडिल पर पृथ्वी की पूजा करने के लिये धराधर का
आवाहन करना चाहिये। फिर उसके लिंग की और हृदयमंत्र की मंत्रोक्त पूजा करनी चाहिये। हृदय, कवच,
शिखा, नेत्र, शक्ति, बीज आदि लक्षणों से युक्त यंत्र स्थंडिल पर बनाकर धराधर की महापूजा करनी चाहिये। अब
स्वयं अपनी पूजा करना यह दसवाँ पूजा स्थान है। उसके भी लक्षण सुनो। पहले एक और उसके बाद पूर्ण
अर्थात् शून्य यही दसवाँ लक्षण है। अपना पूजास्थान स्वयं होना यह पूजा का आश्चर्यकारक साधन है। शून्य के
आगे कितने ही शून्य क्यों न हो लेकिन उनकी गिनती नहीं होती। लेकिन यदि पहले शून्य के नीचे एक भी रेखा
आती है तो गणित लगाते-लगाते मनुष्य परेशान हो जायेगा। शून्य में शाखा निकलने पर उसे एक कहते हैं। जो
एकपन से ही पूर्ण हो वह सहज ही परिपूर्ण रहता है। शून्य के आगे शून्य ही आ जाये तो गणित क्या होगा?
निरिच्छा में जब इच्छा उत्पन्न होती है तभी वह अपनी पूजा स्वयं करने लगता है। एक में एक मिलाने पर दोपन
से दूजा उत्पन्न होता हैं और एक में से एक घटाने पर शून्य ही देखने को मिलता है। अपना देवता वह स्वयं रहता
है। जरा देखो, अपना पुजारी भी वह स्वयं ही होता है और भक्त भी वह स्वयं ही ! इस पूजा का चमत्कार कितना
आश्चर्यजनक है, देखो। हृदय में ही चैतन्यघन आत्माराम है यह भावना रख, स्वयं तद्रूप हो वह जो भी भोग
भोगता है वे सब सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाते हैं। वह अपने मुख में कौर डालता है तो उसके मुख से ही मैं सुखी
हो उठता हूँ और परमपुरुष भी तृप्त हो उठता है। यही मेरी योग्य पूजा है। वह जो भी भोग भोगता है वे सब मुझे
ही अर्पण होते हैं। उसके आनन्द में स्वयं मैं ही तन्मय होने के कारण वह पूजा भगवान को ही पहुँचती है। मेरी
पूजा में यही प्रमुख पूजा है। जो यह पूजा करता है उसने अपनी स्वेच्छा से यह पूजा की यही उसका अर्थ
निकलता है। पूजा के बहाने उसने गरुजध्वज, अधोक्षज को वश किया यही समझना चाहिये। यह मेरी प्रिय पूजा
है। गरुड़ध्वज को भी यह प्रिय है। ऐसी भक्ति अधोक्षज को प्रिय है। वही मेरा प्रिय भक्त है। सगुण हो या
निर्गुण, दोनों मेरे ही स्वरूप हैं। उनके प्रति जो अपने भोग अर्पण करता है वही मेरी सच्ची पूजा है। आत्मभोग से
ही भगवान की जो पूजा की जाती है वह यही है अथवा सभी प्राणिमात्र समान हैं यह मानकर समान भाव से
समस्त प्राणिमात्र की जो पूजा की जाती है वह भी भगवान की ही पूजा है। ग्यारहवीं पूजा का विचार करें तो उस
संख्या में आगे और पीछे एक ही होता है क्योंकि जो ग्यारहों इन्द्रियों को देखे वही समस्त प्राणिमात्र का पुजारी
होगा। एक के एक बाद रखने से ग्यारह होता है। यह विचार जिसने जान लिया उसने समझ लो समस्त प्राणिमात्र
की पूजा कर ली। आत्मभोग अर्पण करने से अपने ही देह में परब्रह्म होने का ज्ञान होता है। वही परब्रह्म सभी
प्राणियों में, देह में, विदेह में, समान रूप से रहता है। सारे देहों को चलाने वाला आत्मा सचमुच मैं ही हूँ।
इसलिये भिन्न-भिन्न प्राणियों को देखकर जिसका मेरे प्रति प्रेम कम नहीं होता, प्राणिमात्र में ऊँच-नीच का भेद
होते हुए भी जो परब्रह्म में कोई भेद नहीं देखता वह देखता है कि प्राणिमात्र में समानता की भावना एक सी है।
मेरे साथ ऐक्य प्राप्त कर लेने के कारण उसे समस्त प्राणिमात्र में समानता दिखायी देती है। वही समस्त प्राणिमात्र

ग्यारहवाँ अध्याय ३२७
की पूजा है। जिसे विभिन्न वस्तुओं में विषमभाव की बाधा नहीं होती वही सच्चा पूजक है। जो भक्ति भाव से
मुझमें एकरूप हो गया, वह स्वयं प्राणिमात्र बन गया। अर्थात्, वह अपने आप ही सबसे एकरूप हो गया और
आत्मभाव से सबकी पूजा करने लगा। वह रंक और राजा दोनों की पूजा करता है लेकिन उसके मन में उन दोनों
में समान परब्रह्म की जो कल्पना है वह नहीं बदलती। वह उन दोनों में जो एकरूपता और समान भाव है उन्हें
खण्डित किये बिना उनकी उचित पूजा करता है। हे उद्धव ! सुनो यदि समस्त भूतों में मेरी पूजा करनी है तो वह
मुझसे तादात्म्य होने पर ही पूरी होती है। ये ग्यारह पूजास्थल मेरी प्राप्ति कराने वाले तथा अत्यन्त पवित्र हैं। मैंने
जैसा वर्णन किया है उसके अनुसार उनकी यथाविधि पूजा करनी चाहिये। मैंने जिस पद्धति से पूजा करने को
कहा है उसी के अनुसार पूजा करनी चाहिये। यदि समझ में न आये तो मेरी मूर्ति का ही चिंतन करना चाहिये।
धिष्ण्येष्वेष्विदिति मद्रूपं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः ।
युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्नर्चेत् समाहितः ॥ ४६ ॥
जो सगुण को निर्गुण की अपेक्षा कम आँकता है वह पक्का मूर्ख है क्योंकि सगुण और निर्गुण दोनों एक
जैसे हैं। उनमें एक कम और एक अधिक जैसी कोई बात नहीं है। घृत पतला हो तो भी वह घृत ही रहता है
लेकिन वह जब जम जाता है तो पतले घृत की अपेक्षा अधिक स्वादिष्ट हो उठता है। उसी प्रकार निर्गुण की
अपेक्षा सगुण स्वरूप से ही मन को त्वरित आनन्द प्राप्त होता है। निर्गुण का बोध होना ही कठिन रहता है
क्योंकि वह मन, बुद्धि और वाणी को दुर्गम रहता है। उनका रहस्य शास्त्रों की समझ में भी नहीं आता। वेद भी
उनके सम्बन्ध में मौन हैं। वायु को नापने जाओ अथवा आकाश को आलिंगन देने का प्रयत्न किया जाय उसी
प्रकार भावना भागने लगती है। कहाँ स्थिर रहना है यही समझ में नहीं आता। लेकिन सगुण मूर्ति वैसी नहीं है
ध्यान में रखो। वह सुलभ और सुन्दर होने के कारण उसे देखते ही भूख और प्यास नष्ट हो जाती है और प्रेम से
मन शान्त हो जाता है। जो नित्यसिद्ध सच्चिदानंद, प्रकृति से भिन्न एवं परमानंद स्वरूप है वही स्वानंद का
मूलकंद गोविन्द अपनी ही लीला से सगुण बना। शर्करा की मिठास की प्रशंसा चारों ओर होती है लेकिन यदि
उसकी मिश्री बनायी जाय तो उसकी मिठास अधिक स्वादिष्ट हो जाती है। यही बात साकार मूर्ति के बारे में है।
शुद्ध सोने की तार यदि दुल्हन को पहना दी जाय तो क्या दुल्हन सुन्दर दिखायी देगी ? लेकिन यदि उसी सोने के
अलंकार बनाकर मस्तक, कंठ, हाथ आदि अंगों पर पहना दिये जाएँ तो वही दुल्हन सुन्दर दिखायी देगी और
लोग उसकी नजर उतारेंगे। उसी प्रकार जो निर्गुण और निराकार रहता है उसी की अपनी इच्छा के अनुसार
सुकोमल, ज्ञानरूप, सुन्दर एवं मनोहर सगुण मूर्ति तैयार होती है। मुकुट, कुण्डल तथा मेखला से विराजित
देदीप्यमान श्यामवर्ण, गले में कौस्तुभमणि तथा वनमाला और कटि पर जरीदार पीताम्बर। श्यामवर्णी, तिस पर
भाल पर लगाया हुआ पीला चन्दन का टीका, दोनों नेत्रों में कमल की पंखुड़ियों को भी लज्जित करने वाली
आरक्त आभा। ज्ञान का सौन्दर्य मानों मूर्ति की आँखों में उतर आया हो। इधर-उधर भटकते हुए जब वायु थक
गया तब मानों उसने श्रीहरि के नाक में श्वासोच्छ्वास के रूप में बसेरा कर लिया। ओंकार में जिस प्रकार श्रुति
होती है उसी प्रकार मुख में दंतपंक्ति शोभा देती है और चारों कोनों पर स्थित दाढ़ें तो सच्चित्प्रकाश की तरह
झलकती हैं। जिस प्रकार जीव और शिव अपने भिन्नत्त्व के साथ एकसाथ रहते हैं उसी प्रकार निचला और ऊपर
का होंठ श्रीहरि के शरीर में एक तरह तथा समान गुणों से जुड़े हुए हैं। कृष्ण का मुख देखकर अर्थात् कृष्णपक्ष
में चन्द्रमा क्षीण होने लगता है। वह केवल पूर्णिमा को ही परिपूर्ण रहता है। लेकिन इस कृष्ण का मुखचंद्र

३२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

सदासर्वदा परिपूर्ण रहता है। चन्द्रमा का तेज दिन में क्षीण हो जाता है लेकिन इस मुखचन्द्र की शोभा अप्रतिम है।
उसके सामने चन्द्रसूर्य का तेज भी फीका पड़ता है लेकिन हरि का मुख सदासर्वदा स्वयंप्रकाश ही रहता है।
सगुण स्वरूप में वह नारायण आर्तरूपी चकोरों को अमृतपान, मुमुक्षुरूपी चातकों को स्वानंदघन तथा सर्वभूषणों
का भूषण बन गया है। चारों खदानों के प्राणियों की क्रियाएँ चार प्रकार की होती हैं, उसी प्रकार चारों हाथों के
चारों आयुधों की स्थिति है। वेदों को देवता समझ नहीं आये तब वे लज्जित हुए थे उस समय जगत में अपना
प्रताप दिखाने के लिये वे हरि के हाथों के आयुध बन गये। सामवेद शंख बना, यजुर्वेद चक्र हुआ अथर्ववेद तेज
धार की गदा बना और ऋग्वेद कोमल सा कमल बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने चारों वेदों को चार हाथ में
संतुष्ट कर दिया। तब उपनिषद भी जग में नाम कमाने के लिये भगवान के बाहूभूषण और बाजूवंद बने और
हाथ के कंगन 'ब्रह्म मैं हूँ' इस शब्द ध्वनि का स्वर निकालने लगे। उसी प्रकार उनके नाखून, केश, उँगलियाँ
तथा उँगलियों में धारण की हुई तिकोनी, षटकोनी आदि विविध आकारों की रत्नजड़ित अँगूठियाँ उपासकों के
लिये उपासना का साधन बन गये हैं। हृदय पर स्थित पदक का तेज तो अपूर्व ही है। पेट पर त्रिगुण की तीन
रेखायें शोभायमान हैं और कमर की मेखला में लगाये घागरे में का कलश कितना उत्तम शोभायमान है। दोनों पैर
स्फटिक के खम्भों की तरह सुन्दर लगते हैं। लेकिन स्फटिक के पैर तो निर्जीव होते हैं। लेकिन हरि के पैर शरीर
का अंग होने के कारण सचेतन हैं। दोनों पैरों पर ध्वज, वज्र, अंकुश, ऊर्ध्वरेखा तथा पद्म आदि चिह्न तथा
यवांकित सामुद्रिक लक्षण होने के साथ पैरों की आकृति अत्यन्त सुन्दर है। पैर के तलवों की रक्तिम आभा और
उस पर घनश्याम वर्ण की छटा—मानों आकाश में इन्द्र धनुषों का समुदाय उमड़ पड़ा हो। जगन्नायक को इस
प्रकार सगुण हुआ देख दसों दिशाओं ने उनके चरणों के पास आने का साहस किया और अपना आत्मसुख साधने
के लिये वे हरि के पैरों की दस उँगलियाँ बन गयीं। चन्द्रमा भी कृष्णपक्ष में क्षीण हो रहा था इसलिये उसने भी
हरि के चरण धर लिये और वह उनके पैरों के नाखून बनकर स्वयं अत्यन्त पवित्र हो गया। यह मालूम होते ही
शंकर ने उस चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया तो सहज ही भगवान के चरणों का तीर्थ उसके
मस्तक पर से बहने लगा और उसी जल से संसार का उद्धार हुआ। देवता को इस प्रकार सगुण हुआ देख चारों
मुक्तियाँ उसके चरणों के पास आकर नम्र हो गयीं, इसीलिये संत देवमूर्ति के आगे सदा तत्पर रहते हैं। उन चार
मुक्तियों में सलोकता और समीपता ये दोनों दो पैरों के बीच में पैंजन के रूप में गरजते ही सरूपता पद का भूषण
बन गयी और सायुज्यता पैंजन बनी। बड़े-बड़े राक्षस भी उस पैंजन का भय खाते हैं। सर्वसुख हरिचरणों में है
और उसी के चरणों में समाधि भी है। हे उद्धव ! धैर्य, वीर्य, उदार, कीर्ति, गुणगांभीर्य, शौर्य ख्याति इसका कारण
मेरी सगुण मूर्ति ही है इसे अच्छी तरह ध्यान में रखो। मेरी इस मूर्ति के दर्शन से आँखों की प्यास मिटती है,
जन्म-मरण का बन्धन टूटता है और विषयों का पूरी तरह नाश हो जाता है। मेरी मूर्ति का दर्शन करने के बाद
योग-याग का श्रम नहीं करना पड़ता, गिरि-कन्दराओं में नहीं जाना पड़ता और न किसी प्रकार के संकट का
सामना करना पड़ता है। आसन, पात्र आदि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और न समाधि के साधन ही जरूरी
हैं। हे उद्धव ! मुझे प्राप्त करने का मुख्य साधन मेरी भक्ति ही है इसे ध्यान में रखो। मेरी पूजा के स्थान ग्यारह हैं,
वहाँ मेरा आवाहन कर मैंने बतायी हुई मूर्ति का ध्यान करना चाहिये। मेरी पूजा करें, मेरा ध्यान, कीर्तन करें, मेरा
नामकरण करें तथा मेरे गुणों का वर्णन करें। रात दिन मेरी कथा कथन करें, रात दिन मेरे चरित्र की बातें सुनायें,
इस प्रकार जो मेरा ध्यान करता है उसे ही मेरा सच्चा भक्त कहना चाहिये। दीपक की ज्योति हाथ में आते ही पूरे
घर में प्रकाश फैलता है उसी प्रकार जब मेरी मूर्ति की ओर ध्यान एकाग्र हो जाता है तभी सारा ज्ञान प्राप्त होता

ग्यारहवाँ अध्याय ३२९
है। हे उद्धव ! इससे यह ज्ञात होता है कि सगुण और निर्गुण ये दोनों एक हैं। सच्चिदानन्द का सुख भी दोनों से
समान रूप से प्राप्त होता है। सुवर्ण की छड़ के लिये जो कसौटी है, वही एक तोला सोने के लिये भी है। उसी
प्रकार सगुण अथवा निर्गुण की उपासना से आत्मानंद में कोई अन्तर नहीं आता। शर्करा के ढेर में भी वही मिठास
है जो एक छटांक शर्करा में है। यह मेरे अंतःकरण का ध्यान है, यहाँ भक्तों को मन को निरन्तर जागृत रखकर
हर्षपूर्वक मेरी पूजा करनी चाहिये। हे उद्धव ! अब तुम मन ही मन विचार करोगे कि यह भक्ति किस उपाय से
साध्य हो सकती है ? तो मैं वे साधन तुम्हें बताऊँगा।
इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः।
लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया ॥४७॥
नाना प्रकार के योगयाग, वापी, कूप, वन, सरोवर, उत्तम से उत्तम श्रौत और स्मार्त कर्म करते समय
जिन्होंने वे कर्म मुझे अर्पण कर दिये वही पूर्ण हुए। मुझे अर्पण किये बिना ये कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। कर्म मुझे
अर्पण करते समय भी कभी-कभार उस भक्त का मन किसी विघ्ननिवारक फल की इच्छा करता है इसलिये मैं
उस भक्त को कभी कोई विघ्न नहीं आने देता। सकाम कर्मकर्त्ता को भी जो अत्यन्त प्रयास से नहीं प्राप्त हो पाता
वह उत्तम लोक मैं अपने भक्तों को भोगों के साथ. देता रहता हूँ। अंतःकरण से जो मेरा भक्त है और भोगों के प्रति
विरक्त है वह भोगों का सेवन करते समय भी मेरा स्मरण करता रहता है इसलिये वह भोगों के प्रति आसक्त नहीं
होता। कोई साधु मन्दिर में जाते समय मूसलाधार बारिश से बचने के लिये यदि किसी वेश्या के घर में घुसता है
तो वह वहाँ रहकर भी वेश्या को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार भक्त दिव्य भोगों से ऊब जाता है और पश्चात्ताप
करता हुआ हरि का स्मरण करता है। उस अनुताप की स्थिति में सारे भोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं और जिस घर
में मेरी भक्ति का वास रहता है उस घर में महान ज्ञानी जन्म लेता है। पूर्व संस्कारों के कारण उसे विषयों के प्रति
विरक्ति प्राप्त होती है, वह जन्म लेते ही भक्तिमार्ग पर चल पड़ता है और भक्तों से प्राणों से भी अधिक प्रेम करता
है। वह मुक्ति को लात मार कर अपने सर्वस्व से मुझे भजता रहता है। इस प्रकार मैं अपने भक्तों को बाधाओं का
स्पर्श नहीं होने देता। इस प्रकार जिन्हें विषयों से विरक्ति होती है वे भी तालाब, कुएँ आदि परोपकार के काम
करते हैं अथवा जब योग-याग और त्याग के साधन करते हैं तब उनमें मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। मन की
समदृष्टि कर श्रौत स्मार्त कर्मों का अनुष्ठान अथवा योग, याग, त्यागवृत्ति आदि का साधन जो एकनिष्ठा से करते
हैं तभी उनकी चित्तवृत्ति शुद्ध होती है और उसके योग से मेरे प्रति उत्तम भक्ति उत्पन्न होती है। लेकिन इतना
परिश्रम किये बिना भी मेरी सद्गति प्राप्त हो ऐसा एक गुप्त उपाय तुम्हें बताऊँगा। हे उद्धव ! सारे साधन छोड़
कर जो साधु का भजन करेगा तभी उसका मन सचमुच शुद्ध होगा यह ध्यान में रखो। अब तुम पूछोगे कि साधु
कैसा रहता है ? और साधु कौन कहलाता है ? तो उसका लक्षण पहले ही बता चुका हूँ। जो साधु है वही सद्गुरु
है, यह ध्यान में रखो। उस सद्गुरु का भजन जो पूरे भाव से करता है उसकी समस्त शुद्धि का कारण सद्गुरु ही
है यह जान लो। उनके मुख से निकला शब्द ही ब्रह्मसाक्षात्कार तक पहुँचाता है। उस सद्गुरु के भाग्यशाली
चरणों की सेवा करने पर कौन-सी शुद्धि नहीं होगी ? गुरु का नाम लेने पर उसकी ओर कलिकाल भी नहीं देख
सकता। प्रसन्नतापूर्वक उसकी सेवा करने से मोक्षसुख भी चरणों पर आ जाता है। जिसके मन में सद्गुरु की प्रीति
है, सद्गुरु के भजन में जिसकी आस्था है, उस पर मेरी भक्ति आसक्त हो उठती है। भक्त के साथ गठबन्धन
करने के लिये वह आतुर हो उठती है। गुरुभजन के साथ जो जुड़ता है वही अपना स्वार्थ सिद्ध कर पाता है यह

३३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सच है। उसके पास मेरी भक्ति राह देखती रहती है। सद्‌भक्ति ही क्यों, लेकिन गुरुप्रेम के कारण स्वयं मैं भी
दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक उसके पास खड़ा रहता हूँ। मुझे अपने भक्तों से जितना प्रेम नहीं है उतना अपने गुरुभक्तों
से है। लेकिन सत्संगति के बिना उत्तम भक्ति कभी भी नहीं प्राप्त होगी।
प्रायेण भक्तियोगेन सत्सङ्गेन विनोद्धव।
नोपायो विद्यते सध्यङ्प्रायणं हि सतामहम् ॥ ४८ ॥
मुझे प्राप्त करने के लिये भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग ये दो मार्ग हैं। उसमें ज्ञानमार्ग अत्यन्त कठिन है लेकिन
भक्तिमार्ग बिना किसी बाधा के भक्त को मुझ तक पहुँचाता है। इस संसार को पार करने के लिये अनेक लोगों ने
अनेक साधन बतलाये हैं लेकिन उन्हें व्यर्थ समझो। अनुभव से मेरा भक्तिमार्ग ही उत्तम दिखाई देता है। सारे
उपायों में जो अत्यन्त सरल, निर्विघ्न, नित्य और पवित्र है वह केवल मेरा भक्तिमार्ग है। ज्ञानमार्ग भक्त को बीच
रास्ते में ही व्याकुल कर देता है। खेत सींचने के लिये मोट और नहर यही दो उपाय हैं। मोट से कुएँ में एकत्र
पानी निकालते हैं और वह भी काफी परिश्रम के बाद कम मात्रा में ही मिलता है। पहले मोट, नाड़ा और बैलों
की जोड़ी इतनी तैयारी चाहिये, फिर उन बैलों को डंडे से पीटना पड़ता है और फिर उन्हें खींचना पड़ता है तब
कहीं जमीन का छोटा-सा भाग गीला हो पाता है। तिस पर भी कभी मोट फट जाती है या नाड़ा टूट जाता है
अथवा सहसा बैल बीमार पड़ जाता है या मर जाता है और ऐसा होते ही पानी का आना रुक जाता है और तैयार
फसल सूख जाती है। लेकिन नदी से निकले नाले की स्थिति वैसी नहीं है। एक बार नाली बना देने पर पानी का
प्रवाह अखण्ड चलता रहता है। ज्ञान भी मोट के पानी की तरह है। वेदशास्त्र पढ़कर मार्मिक पण्डित नित्य और
अनित्य का विचार करते हैं। उनमें से एक का झुकाव कर्म की ओर रहता है, एक संन्यास की ओर मुड़कर
मुण्डन करवाता है तो कोई इन दोनों को ही अनुचित ठहराता है। उनका कहना है कि देह को इस प्रकार के
संकट में नहीं डालना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि प्रारब्ध नाम की जो चीज है वही सच है। कोई कहता है
शब्दज्ञान ही सच है तो कोई कहता है इस सम्बन्ध में मौन ही रहना चाहिये। कुछ विद्वत्ता का त्याग करने की
बात करते हैं। जिसकी जितनी कल्पना चलती है वही बुद्धिमान कहलाते हैं। मूर्खों को कितना समझाया जाय?
कोई तप को श्रेष्ठ कहता है तो कोई मंत्रों के पुरश्चरण को तो कोई वेदाध्ययन को ही श्रेष्ठ मानते हैं। कुछ लोग
दान को श्रेष्ठ मानते हैं तो कुछ इन सबको खारिज कर देते हैं और मनुष्य को योगसाधना में फँसा देते हैं। वह
साधक को आसनों तथा मुद्राओं की लत लगाता है और वायु पीकर रहता है। बड़े पण्डितों को ज्ञान का अहंकार
होने के कारण सच्चे ज्ञान का कोई ज्ञान नहीं होता। ज्ञान मार्ग की यह अवस्था है। उसमें अनेक प्रकार के विघ्न
आते हैं। विकल्प से ही विद्वत्ता नष्ट होती है इसलिये विद्वत्ता से मेरी प्राप्ति नहीं होती। लेकिन मेरी भक्ति वैसी
नहीं है। भक्तिसम्पन्न लोग मेरा नाम लेकर ही मुझे प्राप्त करते हैं। नाम से कितनों का उद्धार हुआ इसकी गिनती
करना कठिन है। भागवत में यही कहा गया है। मेरे गुणों का वर्णन करने से अथवा हरिकथा नाम संकीर्तन करते
समय विघ्न का प्रवेश नहीं हो सकता। हरिनाम की गर्जना किले की तरह है। जहाँ हरिनाम का घोष होता है वहाँ
भला विघ्न का प्रवेश कैसे हो सकता है? मेरे भक्तों को देखकर वह भाग जाता है और मोक्ष के द्वार खुल जाते
हैं। मेरे भक्त पूरी तरह इच्छारहित रहते हैं। वे मोक्ष की आशा नहीं करते इसलिये मैं श्रीकृष्ण उनके भाव पर
लुब्ध रहता हूँ। सारांश बिना किसी विघ्न के मेरे पास आने के लिये भक्ति के सिवा कोई मार्ग नहीं है। सचमुच
भक्ति ही मेरी पसन्द है। इसलिये भगवान ने अपनी प्रिय भक्ति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया। उद्धव को

ग्यारहवाँ अध्याय ३३१
हरिभक्ति प्रिय थी इसलिये वह सुनते ही उसकी प्रसन्नता बढ़ गयी। अपने मन की बात श्रीकृष्ण ने बतलायी इससे
उद्धव प्रसन्नता से नाचने लगा। उसने प्राण श्रीकृष्ण पर न्योछावर कर दिये और कहा, "जब तुम्हारी भक्ति इतनी
सुलभ है तो सब लोग तुम्हारी भक्ति क्यों नहीं करते?" इस पर भगवान ने कहा, "उद्धव! बिना प्रारब्ध के यह
भक्ति किसी को प्राप्त नहीं हो सकती। यदि करोड़ों वर्षों के संचित पुण्य की कमाई किसी के पास होगी तभी
उनका मेरे संतों के साथ संग होता है और उस संगति से ही मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। उद्धव! सत्संग से ही
भक्ति प्राप्त होती है। मेरी भक्ति संतों के पास प्रतीक्षा करती रहती है।''' 'संतों को यदि तुम अपना कहते हो तो
फिर बाकी लोग किसकी शरण में जायेंगे? तुम्हारी भक्ति दिन-रात संतों के ही पास क्यों रहती है?' उद्धव! मन
में ऐसा विकल्प लाने की आवश्यकता नहीं है। संतों के भजन पर मेरी असीम श्रद्धा है, फिर भक्ति की क्या
बिसात है? लेकिन यह तुम संतों की सेवा करने का कारण पूछोगे तो मैं अनन्त जिस पर किसी का भी नियंत्रण
नहीं है, ऐसे मुझको उन्होंने अपनी भक्ति के पाश में बाँध लिया है। उन्होंने क्यों बाँधा है इसका कारण भी बताता
हूँ। वे संसार में मेरे सिवा कोई अर्थ ही नहीं जानते। उन्होंने अपना स्वकर्म मुझे ही अर्पण किया रहता है। उन्होंने
अपना सारा धर्म, देह, घर, रूप, नाम, आश्रमधर्म सब मुझे ही अर्पित किया रहता है। कल्पांत समय में बिजली
की गड़गड़ाहट के भय से सारा विश्व भयाक्रांत हो उठता है और उसका विलय हो जाता है, ऐसे संकट आने पर
भी वे मेरे पास से नहीं हटते। आकाश टूट पड़ने पर भी वे मेरे सिवा किसी और की राह नहीं देखते। इसीलिये
मैं श्रीकृष्ण उनका दास हो गया हूँ। भावार्थ की महिमा अत्यन्त विस्मयकारी है। मुझ विश्वात्मा की भी वे आत्मा
बन गये हैं। उनमें और मुझमें ऐसी एकता है इसीलिये मुझ पुरुषोत्तम को उन्होंने अपने वश में किया है। संतों में
और मुझमें कल्पांत में भी भिन्न भाव नहीं है यह ध्यान में रखो। अपने जीवन की यह सबसे गुह्य बात मैंने तुम्हें
बतायी। मेरी भक्ति से ही संत मेरे अपने हो गये हैं। अन्य लोग मुझे नहीं भजते इसलिये मैंने उन्हें अष्टपाश में
बाँध कर काल के हवाले कर दिया है। काल को मेरे संतों के पास आने का सामर्थ्य नहीं है क्योंकि मैं सदा
उनका रक्षक बना रहता हूँ। इसलिये वे कलिकाल के भी पाश में नहीं फँसते। इस प्रकार संतों का काम करने में
मुझे संकोच नहीं होता। उद्धव! अब मैं अपना एक अत्यन्त गोपनीय मनोगत तुम्हें बताऊँगा।
अथैतत् परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन।
सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत् सखा ॥ ४९ ॥
हे यदुवंश कुलभूषण उद्धव! सुनो तुम स्वगोत्र हो, सेवक हो, सुहृद हो और प्रिय मित्र हो, इसलिये तुमसे
अपना गुह्य बचाने का धैर्य मुझमें नहीं है। इसलिये मेरे गुह्य का गुह्यसार; अपितु उस सार का भी गुप्त भण्डार और
उस भण्डार का भी गुप्त तत्त्व अब सचमुच ही तुम्हें बताऊँगा। सचमुच मैंने यह गुप्त से भी गुप्त बात किसी को
नहीं बतायी। लेकिन तुम मेरे जीवश्चकंठश्च और सखा हो और मुझ पर तुम्हारा अप्रतिम प्रेम है और तुम्हारा वह
प्रेम शुष्क नहीं है, लेकिन तुम्हारे प्रति मेरे मन में अनन्य भक्ति है और उस भक्ति के साथ तुम्हारे मन में विरक्ति
भी है। तुम्हारी वृत्ति निष्कपट है। देखो! इस यादवकुल में मेरे जैसे एक तुम ही हो। उद्धव! तुम समान योग्यता
वाले, मेरे गोत्रज होने के साथ मेरे सेवक हो, यही अभूतपूर्व है और केवल साधारण सेवक नहीं, अपितु
विश्वासपात्र हो। तुम्हारे गुणों का कितना वर्णन करूँ? सचमुच यह बताते समय मुझे अपार हर्ष हो रहा है।
इसलिये यह गोपनीय बात तुमसे बचाकर रखने का मुझे धैर्य नहीं हो रहा है। यह कह कर जब भगवान ने उद्धव
को अपने सीने से लगाकर उसे आलिंगन में बाँध लिया तब कहीं चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण संतुष्ट हुए। फिर कृष्ण

३३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बोले, "सावधान होकर आदरपूर्वक मेरा भाषण सुनो। मेरा यह गुप्त ज्ञान तुम्हें मिलने से तुम्हारे वंश का उद्धार
होगा क्योंकि जिस वंश में कोई ब्रह्मज्ञानी उत्पन्न होता है तो वह वंश उसके कारण पावन हो जाता है। मेरा यह
भाषण बिलकुल सत्य है। यह जान लो। इस विषय में मन में कोई विकल्प न आने दो। लेकिन तुम कहोगे, "तुम
पूर्णब्रह्म नारायण स्वयं ही इस वंश में अवतरित हुए हो, अतः तुम्हारे ही कारण इस वंश का उद्धार हो गया। तुम्हारे
आगे मेरा ज्ञान है ही कितना ?'' तो नाम, रूप, जाति, गोत्र इन सबसे मैं अलिप्त ही हूँ। संसार के सभी कुलों से मैं
कुलीन हो गया हूँ क्योंकि सारा जगत ही मेरा गोत्र है। यह सब ध्यान में रखकर ही मैं अपनी गुप्त बात का सार
तुम्हें बताऊँगा। उसके योग से सारे संसार का उद्धार होगा। यह गुप्त ज्ञान सुनने के लिये उद्धव ने मन ही मन कान
खोले और श्रीकृष्ण के मुख की ओर एकटक देखते ही उसके नेत्रों की ओर उद्धव की दृष्टि अटक गयी। श्रीकृष्ण
का वह अत्यन्त गहन और रसाल निरूपण अगले अध्याय में है। इसलिए एका जनार्दन विनती करता है कि संत
मेरी ओर ध्यान दें और श्रोतागण सावधान हो जाएँ। आपके चरणों का मैंने मस्तक से वन्दन किया है। आपके
चरणों के प्रसाद से श्रीभागवत के श्लोकों का सुबोध अर्थ मैं वर्णन करूँगा ताकि संत सन्तुष्ट हो जाएँ। इसीलिए
एका जब जनार्दन की शरण में पहुँचा तब वह समुद्र की लहरों की तरह सुशोभित हो गया।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां श्रीकृष्णोद्धवसंवादे
एकादशपूजाविधानयोगो नाम एकादशो अध्याय ॥ ११ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।

बारहवाँ अध्याय
ॐ नमो सद्गुरु वसंत ! भेदभाव तोड़ कर जब एकता का काल आता है, तभी तुम्हारा ऋतु आता है और
इस ऋतु में बहने वाला वायु जब ज्ञानवन में प्रवेश करता है तब अविद्या के पुराने पत्ते तत्काल गिर पड़ते हैं और
विरक्त भाव से आरक्त नये पल्लव सुशोभित हो उठते हैं। वैराग्य की ऊष्मा अत्यन्त प्रखर होती है, उससे सारे
वृक्ष शुष्क हो जाने पर भी वसन्तु ऋतु के आगमन से उनमें कोमल पत्ते फूट पड़ते हैं। वसन्त ऋतु प्राप्त होने पर
उन वृक्षों में तिरछी टहनियाँ निकल पड़ती हैं और उस ऋतु के कारण ही सोहंभाव (मैं ही ब्रह्म हूँ इस भावना
के) के पुष्प उन वृक्षों पर विकसित हो गये। कृष्णस्वरूप से तदाकार होने के कारण काले भ्रमर मँडराते हुए
तीव्रता से वहाँ पहुँचे और अत्यन्त मृदुता से मकरंद सेवन करने लगे ताकि पराग कुचलने न पाये। सद्भक्तिरूप
मकरंद का प्राशन करते-करते उन भ्रमरों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, वे हृदय कमल में प्रविष्ट होकर स्थिर हो गये
और सुषुम्ना द्वार से आगे निकले। छहों कमलों और द्विदल आदि को भेद कर वे और आगे झुके और मलय वायु
के झोंके के साथ झूमते हुए सहस्रदल में जाकर मिल गये। शुभ्र सफेद पराग का सेवन कर वे भ्रमर दल उन्मत्त
हो गये और आनन्द के उन्माद में उन्होंने कोलाहल प्रारम्भ कर दिया। आत्मानंद के कारण उन्होंने सुख का
कोलाहल मचाना प्रारम्भ किया। इतने में उन्हें अनुहत का स्वर सुनायी पड़ा। वह दस प्रकार से रुनझुन कर रहा
था। उस नाद का भी प्राशन कर वे निःशब्द होकर बैठ गये। वहाँ मोक्ष सुख के गुच्छ अत्यन्त सुन्दर डोल रहे थे
इससे जीवों की वासना पूर्ण हो गयी और वे 'सोहं' का नाद करने लगे। इतने में मुमुक्षुरूपी मोर अत्यन्त प्रेम से
पंख पसार कर नाचने लगे और वसन्त ऋतु की बहार से खिले वन में आकर उन्होंने गुरुनाम का शोर मचाना
प्रारम्भ किया। यम-नियम रूपी कोकिलाओं ने मौन व्रत का विसर्जन कर मधुर स्तवन प्रारम्भ कर दिया। भक्ति
के सरोवर में निर्मल पानी रहता है इसलिये विकसित नवविध कमलिनी प्रफुल्लित हो उठीं। भक्त उस निर्मल
जल में अखण्ड डुबकी लगाकर स्नान का आनन्द ले रहे थे। दो चक्रवाक जीव और शिव उस सरोवर के जल
का सेवन करते समय सद्गुरुरूपी ज्ञानसूर्य को वसन्त द्वारा सुशोभित वन में उदित हुआ देख एक साथ मिल गये।
वसन्त ऋतु से उल्हसित होकर बड़े-बड़े वृक्ष पल्लवित हुए और उनसे स्वानंद की धारा बहने लगी। उनकी जड़ें
धरती को भेद कर धराधर में मिल गयी। वहाँ ज्ञानरूप मलय पर्वत पर वायु बहने लगा जिससे वनश्री प्रफुल्लित
हो गयी और मोक्षमार्ग के पथिकों ने वहाँ आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक निद्रा ली। ऐसा सद्गुरु वसंतराज अपने
भक्तरूप वन को आनन्द प्रदान करता है। भागवत भजन का वह अध्याय भगवान उद्धव को बता रहे हैं। बारहवें
अध्याय में सत्संग की अगाध महिमा का निरूपण है। उसमें इसका भी निरूपण है कि कर्म का कर्त्ता कौन है
और कर्मत्याग का स्वरूप क्या है? ग्यारहवें अध्याय की समाप्ति पर भगवान ने उद्धव से गुह्य बताने को कहा
था, उसे सुनने के लिये उद्धव भगवान के मुख की ओर देखने लगा। तो वे अब कौन-सी गुह्य बात बतायेंगे,
उनके होठों से कौन से शब्द बाहर आयेंगे, उन वचनों को अंगीकार करने के लिये उद्धव के अंतःकरण में
उत्कंठा प्रारम्भ हो गयी। जिस प्रकार चातक मेघ का उदक ऊपर ही ऊपर निगल जाता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण के
भाषण के लिये उद्धव ने भी अपना मुँह फैला दिया। स्नान, संध्या और भोजन एक ही साथ हो उसी प्रकार ज्ञेय,
ज्ञाता और ज्ञान लेने के लिये उद्धव ध्यानपूर्वक बैठा रहा। उद्धव की ऐसी उत्कंठा देखकर श्रीकृष्ण भी तैयार हो
गये। भक्त के प्रति कृपालु और अत्यन्त उदार श्रीकृष्ण अपनी गुह्य बात का तात्पर्य सुनाने लगे।

३३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्री भगवानुवाच
न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ १॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।
यथावरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥ २॥
अष्टांग योग में मुझे वश करने का सामर्थ्य नहीं है। संसार के नित्यानित्य विचार भी मुझ तक नहीं आ
सकते अथवा मन में निरन्तर प्रकृति पुरुषों का विचार करते रहने से भी मेरे स्थान तक पहुँचने का सामर्थ्य उस
व्यक्ति को नहीं प्राप्त होता यह ध्यान में रखो। अहिंसा के साथ जो सारे धर्म हैं वे तथा सत्य आदि से भी मैं प्राप्त
नहीं होता। यथाविधि वेदों का सांगोपांग अध्ययन करने से भी मेरी प्राप्ति नहीं होती। फिर उनके सामने बेचारों की
क्या बिसात है? पंचाग्नि साधन तो निरर्थक है। कृच्छ्र चांद्रायण व्रत भी व्यर्थ सिद्ध हुए क्योंकि उन्हें करने से भी
मैं प्राप्त नहीं होता। जो घरबार छोड़कर विरक्त होता है या 'विरजा' होम (संन्यास लेने से पूर्व किया जाने वाला
होम) कर अपने सर्वस्व का हवन करता है अथवा सारे साधनों में श्रेष्ठ संन्यास ग्रहण करता है उसे भी मैं
परमेश्वर वश नहीं होता। श्रौतस्मार्त कर्म करते-करते कर्मठ लोग पागल हो गये फिर भी मैं उन्हें प्राप्त नहीं होता।
हाँ, होम करते समय उन्हें कष्ट अवश्य भोगने पड़ते हैं। गौओं का दान करें, भूमि का दान करें, धनधान्य का दान
करें लेकिन जब तक उनका दानाभिमान नहीं छूटता, मैं उन्हें वश नहीं होता। अथवा संकटचतुर्थी, ऋषिपंचमी,
विष्णु पंचक, बुधाष्टमी आदि अनेक व्रत नियमित रूप से करने से भी उन कर्मों से मैं प्राप्त नहीं होता। या सर्वस्व
खर्च कर अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञ यथासांग करने पर भी वे मेरी प्राप्ति के योग्य सिद्ध नहीं होते। उनके योग से
मैं श्रीकृष्णवश नहीं होता। तालाब, कुएँ, बगीचे तैयार करने से मार्ग पर पेड़ लगाने से जंगल में पथिकों के लिये
विश्रामस्थल बनाने से अथवा स्मार्त कर्मों का आचरण करने से भी मैं आत्माराम उन्हें नहीं प्राप्त होता। अनेक
प्रकार के वेदमंत्र हों, अनेक प्रकार के गुरुमंत्र हों अथवा अत्यन्त विचित्र प्रकार के विधिविधान हों और उनका
सामर्थ्य कितना ही बड़ा और पवित्र क्यों न हो फिर भी वे मेरी प्राप्ति कराने में स्वतंत्र रूप से समर्थ नहीं हो पाते।
पुष्कर आदि अनेक तीर्थ हैं और पातकों का नाश करने में वे अत्यन्त समर्थ हैं लेकिन मुझ तक पहुँचने का
सामर्थ्य उनमें नहीं होता अथवा जो रात-दिन यमनियम करते हैं या नानाप्रकार के साधन करके थक जाते हैं
उनका भी मेरे द्वार तक पहुँचने का सामर्थ्य उन यमनियमों में नहीं है। उद्धव ! उन यमनियमों का निर्णय मैं तुम्हें
उन्नीसवें अध्याय में विस्तारपूर्वक बताऊँगा। यह बारहवाँ अध्याय संक्षिप्त स्वरूप का है। वे बारह यमनियम
अथवा और सारे साधनों को मेरे नगर (वैकुण्ठ) तक आने का मार्ग ही नहीं मिल पाता। लेकिन यदि वे साधु का
आश्रय लेकर संतों के द्वार पर जायें तो समझ लो वे मेरे ही घर आ गये। ऐसी परम्परा से मेरी प्राप्ति होती है
लेकिन सत्संगति वैसी नहीं है। वह अपने संग से अन्य संगों का विनाश करती है और मेरी प्राप्ति होती है। सत्संग
करने वाले भक्त मेरी प्राप्ति के लिये किसी पर निर्भर होकर नहीं रहते। कीड़े की चींटी से संगति होने से उसके
देह की स्थिति बदल जाती है। उसी प्रकार संतों की संगत करने से भक्त भी बदल कर मद्रूप हो जाते हैं। जरा
देखो। चन्दन के पेड़ के इर्द-गिर्द जो निर्गंध और अनुपयोगी वृक्ष होते हैं वे भी चन्दन की संगत से सुगन्धी होकर
मूल्यवान हो जाते हैं। वे अचेतन काष्ट भी देवताओं और ब्राह्मणों के मस्तक पर चन्दन के रूप में विराजमान रहते
हैं। उसकी आवश्यकता धनवानों को भी होती है। राजा लोग भी उन्हें वन्दनीय समझते हैं। उसी प्रकार सत्संग