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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 869 में से

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पृष्ठ 341

ग्यारहवाँ अध्याय ३२५
रणसंग्राम में चोट लगने पर शत्रु की ओर से उस पर होने वाले प्रहार को बचाने के लिये स्वयं आगे आकर
शत्रुपक्ष का सामना करता है उसी प्रकार जिसके मन में आकुलता रहती है वही वैष्णवों की पूजा की सच्ची विधि
है। स्नेह के बिना केवल तिलक चन्दन लगाने से भगवान को प्रसन्नता नहीं होती है। साधु एक ही पिता के पुत्र
होने के कारण स्वाभाविक बन्धु ही होते हैं। उनमें सौतेला भेदभाव रखना स्नेह का लक्षण नहीं है। वास्तव में
भक्तों की तथा अभक्तों की उत्पत्ति मुझसे ही है। लेकिन मेरे प्रति भक्ति भाव रखने से या न रखने से जो सौतेला
व्यवहार उपस्थित होता है उससे परस्पर विरुद्ध स्थिति उत्पन्न हो जाती है। वैष्णव विष्णु के ही उदर में रहते हैं।
उसी उदर में जाकर हम भी रहें तो सहज ही सगेपन का भाव उत्पन्न होता है और अकृत्रिम प्रेम उत्पन्न होता है।
ऐसे बन्धु भाव से जो व्याकुलता उत्पन्न होती है वही वैष्णव कुल की पूजा है। वैष्णवों की ऐसी पूजा करने वाले
के पास भक्ति में रमा हुआ मैं प्रतीक्षा में खड़ा रहता हूँ। वैष्णवपूजा का जो लक्षण है वही मेरा पाँचवां पूजा स्थान
है। अब आकाश का पूजन सुनो क्योंकि उसमें केवल मेरा ध्यान रहता है। आकाश निर्लेप और निर्विकार है। उसी
प्रकार निरन्तर हृदय में मेरा ध्यान करना चाहिये। शान्त भाव से ध्यानस्थ रहकर जो सारे महदाकाश को अपना
हृदयाकाश बना लेता है, वह मुझ परमेश्वर की पूजा करता है। हृदय में मुझ सूक्ष्म एवं निर्विकार का ध्यान करना
यही मेरी सच्ची पूजा है। मुझ अनन्त की पूजा उसके ही कारण सम्भव हुई ऐसा समझना चाहिये। आकाश में दाग
लगाने का प्रयत्न करने से वह आकाश को कभी नहीं लगता, उसी प्रकार सारे कर्म करते हुए जो अपने को मुक्त
ही समझता है, आकाश सारे पदार्थों में व्याप्त है लेकिन फिर भी वह उन सबसे अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार
जो आकाश में निष्ठा रखते हुए सारे कर्म करते हुए भी कर्मातीत ही रहता है वह आकाश का पूजक है। आकाश
मेरा पूजास्थान है और उसकी पूजा का विधान इस प्रकार है। यह छठवाँ पूजास्थान है। अब वायु का अर्चन
सुनो। जिसकी वायु के प्रति भगवद्बुद्धि कभी नहीं ढलती क्योंकि वायु के कारण ही जीवों में सजीवता आती है
और जगत को धारण करने वाला भी वही है। वायु के रूप में समस्त प्राणिमात्र का प्राण मैं ही हो गया हूँ यह
ध्यान में रखो। प्राण का मुख्य प्राण मैं ही हूँ। इसीलिये वायु मेरा ही स्वरूप है। वायु आकाश में ही उत्पन्न होता
है लेकिन उत्पन्न होते हुए भी वह उससे अलग नहीं होता। सभी प्रकार की हलचल में वह आकाश में ही रहता
है और अन्त में आकाश में ही स्थिर होता है। उसी प्रकार जन्मकर्मों का निर्णय जानते हुए भी अपना अधिष्ठान न
छोड़ना तथा प्राण का भी प्राण बनकर रहना यही वायु का पूजन है। प्राण का आवागमन चालू रहते हुए भी
'ब्रह्मरूप मैं ही हूँ' इसका नित्य ध्यान करना और वह करते समय निरन्तर जागृत रहना यही वायु की पूजा है।
जो मेरे स्वरूप से ही दृढ़ ध्यान करता है, वह उससे होने वाला वायु का पूजन यही सातवाँ पूजा स्थान है। जल
से ही जल की पूजा करनी चाहिये ताकि जल के योग से ईश्वर के प्रति चाह उत्पन्न होती है और वह पूजा
भगवान तक पहुँचती है। वह भक्त मेरा अत्यन्त प्रिय होता है। हे उद्धव ! 'आपो नारायणः साक्षात' इस मंत्र का
यही अर्थ है कि देवता द्वारा ही देवता की पूजा होती है। हे उद्धव! दूध से क्षीरसागर की पूजा करनी चाहिये,
उसी प्रकार द्रव्य से द्रव्य की पूजा करने का ढंग भी वास्तव में जल से जल की पूजा करने का प्रकार है। जीवन
ही जीवन को बचाता है। उस जीवन का भी जीवन मैं हूँ। इसीलिये लहरों से समुद्र का पूजन करना चाहिये उसी
प्रकार जीवन से जीवन की पूजा करनी चाहिये। 'नद्यस्तृप्यंतु' 'समुद्रास्तृप्यंतु' इस मंत्र से जो अर्घ्य देते हैं वे भी
जल से ही जल की पूजा करते हैं। इसमें पूजा और पूजक का एकत्व होता है। यही वेदोक्त विधिवत पूजा है।
जीवन से जीवन की पूजा करना यही आठवाँ पूजास्थल है। अब पृथ्वी के पूजन के सम्बन्ध में सुनो। श्लोकार्थ
के सन्दर्भ में वह सब बताऊँगा।