श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 349, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय
ॐ नमो सद्गुरु वसंत ! भेदभाव तोड़ कर जब एकता का काल आता है, तभी तुम्हारा ऋतु आता है और
इस ऋतु में बहने वाला वायु जब ज्ञानवन में प्रवेश करता है तब अविद्या के पुराने पत्ते तत्काल गिर पड़ते हैं और
विरक्त भाव से आरक्त नये पल्लव सुशोभित हो उठते हैं। वैराग्य की ऊष्मा अत्यन्त प्रखर होती है, उससे सारे
वृक्ष शुष्क हो जाने पर भी वसन्तु ऋतु के आगमन से उनमें कोमल पत्ते फूट पड़ते हैं। वसन्त ऋतु प्राप्त होने पर
उन वृक्षों में तिरछी टहनियाँ निकल पड़ती हैं और उस ऋतु के कारण ही सोहंभाव (मैं ही ब्रह्म हूँ इस भावना
के) के पुष्प उन वृक्षों पर विकसित हो गये। कृष्णस्वरूप से तदाकार होने के कारण काले भ्रमर मँडराते हुए
तीव्रता से वहाँ पहुँचे और अत्यन्त मृदुता से मकरंद सेवन करने लगे ताकि पराग कुचलने न पाये। सद्भक्तिरूप
मकरंद का प्राशन करते-करते उन भ्रमरों को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, वे हृदय कमल में प्रविष्ट होकर स्थिर हो गये
और सुषुम्ना द्वार से आगे निकले। छहों कमलों और द्विदल आदि को भेद कर वे और आगे झुके और मलय वायु
के झोंके के साथ झूमते हुए सहस्रदल में जाकर मिल गये। शुभ्र सफेद पराग का सेवन कर वे भ्रमर दल उन्मत्त
हो गये और आनन्द के उन्माद में उन्होंने कोलाहल प्रारम्भ कर दिया। आत्मानंद के कारण उन्होंने सुख का
कोलाहल मचाना प्रारम्भ किया। इतने में उन्हें अनुहत का स्वर सुनायी पड़ा। वह दस प्रकार से रुनझुन कर रहा
था। उस नाद का भी प्राशन कर वे निःशब्द होकर बैठ गये। वहाँ मोक्ष सुख के गुच्छ अत्यन्त सुन्दर डोल रहे थे
इससे जीवों की वासना पूर्ण हो गयी और वे 'सोहं' का नाद करने लगे। इतने में मुमुक्षुरूपी मोर अत्यन्त प्रेम से
पंख पसार कर नाचने लगे और वसन्त ऋतु की बहार से खिले वन में आकर उन्होंने गुरुनाम का शोर मचाना
प्रारम्भ किया। यम-नियम रूपी कोकिलाओं ने मौन व्रत का विसर्जन कर मधुर स्तवन प्रारम्भ कर दिया। भक्ति
के सरोवर में निर्मल पानी रहता है इसलिये विकसित नवविध कमलिनी प्रफुल्लित हो उठीं। भक्त उस निर्मल
जल में अखण्ड डुबकी लगाकर स्नान का आनन्द ले रहे थे। दो चक्रवाक जीव और शिव उस सरोवर के जल
का सेवन करते समय सद्गुरुरूपी ज्ञानसूर्य को वसन्त द्वारा सुशोभित वन में उदित हुआ देख एक साथ मिल गये।
वसन्त ऋतु से उल्हसित होकर बड़े-बड़े वृक्ष पल्लवित हुए और उनसे स्वानंद की धारा बहने लगी। उनकी जड़ें
धरती को भेद कर धराधर में मिल गयी। वहाँ ज्ञानरूप मलय पर्वत पर वायु बहने लगा जिससे वनश्री प्रफुल्लित
हो गयी और मोक्षमार्ग के पथिकों ने वहाँ आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक निद्रा ली। ऐसा सद्गुरु वसंतराज अपने
भक्तरूप वन को आनन्द प्रदान करता है। भागवत भजन का वह अध्याय भगवान उद्धव को बता रहे हैं। बारहवें
अध्याय में सत्संग की अगाध महिमा का निरूपण है। उसमें इसका भी निरूपण है कि कर्म का कर्त्ता कौन है
और कर्मत्याग का स्वरूप क्या है? ग्यारहवें अध्याय की समाप्ति पर भगवान ने उद्धव से गुह्य बताने को कहा
था, उसे सुनने के लिये उद्धव भगवान के मुख की ओर देखने लगा। तो वे अब कौन-सी गुह्य बात बतायेंगे,
उनके होठों से कौन से शब्द बाहर आयेंगे, उन वचनों को अंगीकार करने के लिये उद्धव के अंतःकरण में
उत्कंठा प्रारम्भ हो गयी। जिस प्रकार चातक मेघ का उदक ऊपर ही ऊपर निगल जाता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण के
भाषण के लिये उद्धव ने भी अपना मुँह फैला दिया। स्नान, संध्या और भोजन एक ही साथ हो उसी प्रकार ज्ञेय,
ज्ञाता और ज्ञान लेने के लिये उद्धव ध्यानपूर्वक बैठा रहा। उद्धव की ऐसी उत्कंठा देखकर श्रीकृष्ण भी तैयार हो
गये। भक्त के प्रति कृपालु और अत्यन्त उदार श्रीकृष्ण अपनी गुह्य बात का तात्पर्य सुनाने लगे।