श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३३१
हरिभक्ति प्रिय थी इसलिये वह सुनते ही उसकी प्रसन्नता बढ़ गयी। अपने मन की बात श्रीकृष्ण ने बतलायी इससे
उद्धव प्रसन्नता से नाचने लगा। उसने प्राण श्रीकृष्ण पर न्योछावर कर दिये और कहा, "जब तुम्हारी भक्ति इतनी
सुलभ है तो सब लोग तुम्हारी भक्ति क्यों नहीं करते?" इस पर भगवान ने कहा, "उद्धव! बिना प्रारब्ध के यह
भक्ति किसी को प्राप्त नहीं हो सकती। यदि करोड़ों वर्षों के संचित पुण्य की कमाई किसी के पास होगी तभी
उनका मेरे संतों के साथ संग होता है और उस संगति से ही मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। उद्धव! सत्संग से ही
भक्ति प्राप्त होती है। मेरी भक्ति संतों के पास प्रतीक्षा करती रहती है।''' 'संतों को यदि तुम अपना कहते हो तो
फिर बाकी लोग किसकी शरण में जायेंगे? तुम्हारी भक्ति दिन-रात संतों के ही पास क्यों रहती है?' उद्धव! मन
में ऐसा विकल्प लाने की आवश्यकता नहीं है। संतों के भजन पर मेरी असीम श्रद्धा है, फिर भक्ति की क्या
बिसात है? लेकिन यह तुम संतों की सेवा करने का कारण पूछोगे तो मैं अनन्त जिस पर किसी का भी नियंत्रण
नहीं है, ऐसे मुझको उन्होंने अपनी भक्ति के पाश में बाँध लिया है। उन्होंने क्यों बाँधा है इसका कारण भी बताता
हूँ। वे संसार में मेरे सिवा कोई अर्थ ही नहीं जानते। उन्होंने अपना स्वकर्म मुझे ही अर्पण किया रहता है। उन्होंने
अपना सारा धर्म, देह, घर, रूप, नाम, आश्रमधर्म सब मुझे ही अर्पित किया रहता है। कल्पांत समय में बिजली
की गड़गड़ाहट के भय से सारा विश्व भयाक्रांत हो उठता है और उसका विलय हो जाता है, ऐसे संकट आने पर
भी वे मेरे पास से नहीं हटते। आकाश टूट पड़ने पर भी वे मेरे सिवा किसी और की राह नहीं देखते। इसीलिये
मैं श्रीकृष्ण उनका दास हो गया हूँ। भावार्थ की महिमा अत्यन्त विस्मयकारी है। मुझ विश्वात्मा की भी वे आत्मा
बन गये हैं। उनमें और मुझमें ऐसी एकता है इसीलिये मुझ पुरुषोत्तम को उन्होंने अपने वश में किया है। संतों में
और मुझमें कल्पांत में भी भिन्न भाव नहीं है यह ध्यान में रखो। अपने जीवन की यह सबसे गुह्य बात मैंने तुम्हें
बतायी। मेरी भक्ति से ही संत मेरे अपने हो गये हैं। अन्य लोग मुझे नहीं भजते इसलिये मैंने उन्हें अष्टपाश में
बाँध कर काल के हवाले कर दिया है। काल को मेरे संतों के पास आने का सामर्थ्य नहीं है क्योंकि मैं सदा
उनका रक्षक बना रहता हूँ। इसलिये वे कलिकाल के भी पाश में नहीं फँसते। इस प्रकार संतों का काम करने में
मुझे संकोच नहीं होता। उद्धव! अब मैं अपना एक अत्यन्त गोपनीय मनोगत तुम्हें बताऊँगा।
अथैतत् परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन।
सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत् सखा ॥ ४९ ॥
हे यदुवंश कुलभूषण उद्धव! सुनो तुम स्वगोत्र हो, सेवक हो, सुहृद हो और प्रिय मित्र हो, इसलिये तुमसे
अपना गुह्य बचाने का धैर्य मुझमें नहीं है। इसलिये मेरे गुह्य का गुह्यसार; अपितु उस सार का भी गुप्त भण्डार और
उस भण्डार का भी गुप्त तत्त्व अब सचमुच ही तुम्हें बताऊँगा। सचमुच मैंने यह गुप्त से भी गुप्त बात किसी को
नहीं बतायी। लेकिन तुम मेरे जीवश्चकंठश्च और सखा हो और मुझ पर तुम्हारा अप्रतिम प्रेम है और तुम्हारा वह
प्रेम शुष्क नहीं है, लेकिन तुम्हारे प्रति मेरे मन में अनन्य भक्ति है और उस भक्ति के साथ तुम्हारे मन में विरक्ति
भी है। तुम्हारी वृत्ति निष्कपट है। देखो! इस यादवकुल में मेरे जैसे एक तुम ही हो। उद्धव! तुम समान योग्यता
वाले, मेरे गोत्रज होने के साथ मेरे सेवक हो, यही अभूतपूर्व है और केवल साधारण सेवक नहीं, अपितु
विश्वासपात्र हो। तुम्हारे गुणों का कितना वर्णन करूँ? सचमुच यह बताते समय मुझे अपार हर्ष हो रहा है।
इसलिये यह गोपनीय बात तुमसे बचाकर रखने का मुझे धैर्य नहीं हो रहा है। यह कह कर जब भगवान ने उद्धव
को अपने सीने से लगाकर उसे आलिंगन में बाँध लिया तब कहीं चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण संतुष्ट हुए। फिर कृष्ण