श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३२३
शालिग्राम केवल अचेतन रहते हैं और ब्राह्मण तद्रूप होते हुए सचेतन रहते हैं। मैं जनार्दन वस्तुतः अव्यक्त स्वरूप
हूँ लेकिन वही मैं नारायण रूप में पृथ्वी पर ब्राह्मणरूप में व्यक्त हुआ हूँ। इसीलिये ब्राह्मणों को भूदेव कहते हैं।
ब्राह्मणों के मुख से ही वेदों की महिमा की वृद्धि हुई है। ब्राह्मणों के कारण ही यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि को
श्रेष्ठत्त्व प्राप्त हुआ है, ब्राह्मणों के योग से ही देवताओं में प्रेमभाव उत्पन्न हुआ है और ब्राह्मणों के मुख से ही
ब्रह्मा को ब्रह्मत्व प्राप्त हुआ है। उन ब्राह्मणों का अपमान करने से यज्ञदेवताओं का अपमान होता है। उसी प्रकार
वेद, तप, दान, तीर्थ आदि का भी अपमान होता है। अधिक क्या कहें, वास्तव में परब्रह्म का भी अपमान होता
है। त्रैलोक्य में भी मैं समा नहीं पाता इसलिये मैं त्रैलोक्य से भी बड़ा हूँ, किन्तु ब्राह्मण मुझसे भी बड़े हैं क्योंकि
उनमें मैं वेदरूप नारायण अंतर्भूत कर रहा हूँ। ब्राह्मण का चरण हृदयस्थल पर रखने के कारण ही मुझे अत्यन्त
पवित्रता प्राप्त हुई है। लक्ष्मी की उपेक्षा करने पर भी वह मेरे चरणों के निकट बैठती है और मेरा चरणतीर्थ शंकर
भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। इसलिये ब्राह्मण पूजनीय हैं इसे ध्यान में रखो। उनके चरण धोने का काम
मैं स्वयं करता हूँ। मैं स्वयं होकर उनकी जूठन उठाता हूँ फिर दूसरों की क्या बिसात है ? मेरा प्रमुख आवास और
मेरी सारे उपचारों के साथ पूजा करने का स्थान अथवा दान, मान, मिष्ठान्न आदि सब एक ब्राह्मण की विधियुक्त
पूजा में है। एक को नियम शालिग्राम का तो एक को स्थापित लिंग का होता है, किसी को गणेशजी का नियम
रहता है तो किसी को सूर्य के दर्शन का। किसी को तुलसी का नियम रहता है तो किसी को हाथ में बँधे हुए
अनन्त का किन्तु जिसे ब्राह्मण का नियम रहता है ऐसा भाग्यवान दुर्लभ है। जो नित्य नियम से ब्राह्मण की
षोडशोपचार पूजा करता है वही भक्ति का राजा और मेरी आत्मा है। जो अलग-अलग देवताओं की उपासना नहीं
करता और जीवभाव से ब्राह्मण का ही भक्त रहता है उसे मैं अनर्थ से बचाकर उसका स्वार्थ सिद्ध करता हूँ। ऐसे
ब्राह्मणों के भक्तों से पृथ्वी भी पवित्र होती है। गंगा भी उसके पुनीत पैरों के तीर्थ की इच्छा करती है। मैं तो उन्हें
शिरसावंद्य करता हूँ। देखो तो, मैं बिला मोल लिये उसका सेवक बन गया हूँ। ब्राह्मण की सेवा में मुझे
अलौकिक और असीम सुख प्राप्त होता है। जो नित्य नियमानुसार ब्राह्मण की पूजा करता है वह भगवान का प्रिय
बनता है। इसीलिये चारों बाहें फैलाकर उसे आलिंगन देने से ही मेरा मन शान्त होता है। ब्राह्मणों द्वारा स्नान किये
हुए जल में जो भक्तिभाव से स्नान करता है उसका उसी काल में अवमृथ स्नान हो जाता है। ब्राह्मणों के चरणों
का तीर्थ देखते ही दोष और पातक भाग जाते हैं। इसलिये उसी तीर्थ का भक्तिभाव से सेवन करने से सभी दोष
दूर हो जाते हैं। जो नित्य नियमपूर्वक ब्राह्मण के चरणों का तीर्थ सेवन करता है वह स्वयं तो तीर्थस्वरूप होता ही
है, साथ ही उसके योग से जड़ जीव भी पुनीत हो जाते हैं। उन ब्राह्मणों की पूजा करते समय अभ्यंग तैलस्नान,
पुष्प, चन्दन, आसन, भोजन तथा यथाशक्ति धनधान्य भी देना चाहिये। ब्राह्मण को भोजन प्रिय है और सभी दानों
में अन्नदान श्रेष्ठ है, इसलिये उत्तम पकवान तैयार कर ब्राह्मण मेरा ही स्वरूप है इस भावना से उन्हें भोजन कराना
चाहिये। कुछ लोग ब्राह्मणों का अपमान कर उन्हें भोजन कराते हैं, कुछ ऊब कर देते हैं, कुछ निर्भत्सना करके
देते हैं तो कुछ चिढ़-चिढ़कर देते हैं लेकिन हमें वैसा नहीं करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मण मेरा स्वरूप है इसे ध्यान
में रखो। उनका आदरातिथ्य कर उन्हें यथाशक्ति भोजन कराना चाहिये। अगर भोजन के समय कोई अज्ञानी
अतिथि आ जाय तो उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिये। वह भी मेरा ही रूप होता है इसलिये उसे भी अन्न
देना चाहिये। अतिथि यदि विन्मुख चला जाय तो उसके साथ सारा पुण्य भी चला जाता है इसलिये उसे समय पर
अन्न अवश्य देना चाहिये। कम से कम पानी तो अवश्य पिलाना चाहिये। ब्राह्मण को पंगत में बिठाकर अन्न
परोसने में जो भेदभाव करते हैं वे एक तरह से पाप ही मोल लेते हैं। उन्हें निश्चित रूप से अधोगति प्राप्त होती