श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३१७
स्रोत, कुशलता से रचे हुए पद, अनेक वृत्तों में रचे हुए चित्र-विचित्र लीलात्मक चरित्र तथा इसी प्रकार के
स्तुतिसुमन भगवान को अर्पण करने चाहिये। धैर्य, स्थैर्य, उदारता, मेघ की तरह सुन्दर कांतियुक्त सौन्दर्य, शौर्य,
वीर्य, अतीव मधुरता एवं सद्गुणों का गाम्भीर्य आदि गुण ही गोविन्द रूप में एक साथ अवतरित हुए। भगवान
त्रिविक्रम के रूप में बली के द्वार पर द्वारपाल बनकर खड़ा हुआ और उसी द्वार से द्वारका में आकर कुश का
उद्धार किया। वही श्रीहरि आज भी सशरीर समुद्र किनारे पर खड़ा है। श्रीहरिरूप से सजी कोमल शोभा देखकर
राक्षस, देवतागण और मानव भी उसे प्रणाम करते हैं। वही समुद्र में मत्स्य बना, नासिका के द्वार से वही वराह
बना, वही नृसिंह के रूप में खंभे में अवतरित हुआ और यशोदा के मन्दिर में वही पला बढ़ा। वही कठोर पीठ
वाला कछुआ बना और बली का छल करने के लिये वही वामनमूर्ति बना। उसके निःश्वास से होने वाले स्फुरण
से वेदवाद का स्वर उभरता रहता है। चोर पत्नी को लेकर भाग गया इसलिये वह उसके लिये रोता है, जंगलों में
भटकता है, उसके पास एक भी गुण नहीं है। अन्त में वह कुब्जादासी के साथ भी रममाण हुआ। स्तुति करते
समय गुणकर्मों की तरह कीर्तन करना भी उसका ही नाम है यह जान लो। अब प्रह्व अर्थात् नमन का भी
निरूपण सुनो। मेरी प्रतिमा का दर्शन कर अथवा संतजनों को देख देहाभिमान छोड़ जो भक्तिभाव से दण्डवत
करता है, साधुजनों को प्रणाम करने से भी जिसका मन तृप्त नहीं होता और विनीत होकर बार-बार चरणों पर
मस्तक रखता है; यह व्यवहार 'नमन' कहा जाता है। भगवद्भक्तों के चरणों की धूल जो स्वयं होकर माथे से
नहीं लगाता, वह जीवित होते हुए भी प्रेत समान है। प्रेत की ही तरह वह अमंगल रहता है। लौकिक की लाज
छोड़ जो अपनी खुशी से वैष्णवों की चरणधूली में लोटता रहता है, उसका व्यवहार हीं मेरी भक्ति का विकास
है। इस प्रकार प्यार से नमन करने से मान-अपमान सहज ही छूट जाता है। इसके लिये मेरा कीर्तन श्रवण करना
चाहिये। इसके लिये हे उद्धव ! श्रवणादि भक्ति का लक्षण सुनो।
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव।
सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम् ॥ ३५ ॥
दृढ़ आस्तिक्य बुद्धि से अंतःकरण में समाधान होना इसी का नाम शुद्ध श्रद्धा है। आदर के साथ कथा
श्रवण करने से उसमें निहित भावार्थ के कारण मन विचलित नहीं होता। ऐसा श्रोता अपना श्रवणेन्द्रिय तथा मन
वक्ता के भाषण से निबद्ध करके रखता है। श्रवणार्थ बुद्धि की वृद्धि करता हे और वह भावार्थ से कथा में बिक
जाता है। दूध पीने का मौका खोजने के लिये जिस प्रकार बिल्ली ताक लगा कर बैठती है उसी प्रकार कथा का
सार ग्रहण करने के लिये निरन्तर उल्हास रखना चाहिये। कान में रत्नजटित कुण्डल पहनने से कान की शोभा
नहीं बढ़ती बल्कि श्रवण करना यही कान का भूषण है। कथाश्रवण से ही कान का सार्थक होता है। भक्त स्वयं
कितना ही अच्छा वक्ता हो, पुराणों में निष्णात हो फिर भी वह अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक हरिकथा श्रवण करता
है। जो हरिकथा सुनने के लिये श्रवणेन्द्रिय से सावधान रहता है वही भावार्थ का मनन कर सकता है। भले ही
कथा का निरूपण समाप्त हो जाय लेकिन उसका मनन समाप्त नहीं होता। ऐसा मनन हो तो सहज ही मेरा ध्यान
लग जाता है भले ही वह निर्गुण हो या सगुण हो। प्यारा होना ही ध्यान का प्रमाण है। लेकिन उद्धव ! ध्येय, ध्यान
और ध्याता इन तीनों की एक साथ भेंट नहीं होती तभी तक यह ध्यानावस्था रहती है यह जान लो जिसके
अंतःकरण में ध्यान के प्रति चाह होती है, जिसके मन में मेरे प्रति प्रेम भावना होती है और उद्धव ! जब सहस्रों
जन्मों का भाग्य रहता है तभी इतना लाभ प्राप्त होता है। निष्काम मन से जब जन्म-जन्मांतर से साधना की जाती