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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 869 में से

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पृष्ठ 340

है। ब्राह्मण की सेवा में शरीर, वाचा, मन, धन आदि का उपयोग यथाशक्ति निष्कपट भाव से करने का ही नाम है
अतिथि पूजन। त्रिपदागायत्री मंत्र का जप कर ब्राह्मण पूर्णतयः पवित्र हो जाते हैं इसलिये वेद भी वहीं निवास
करते हैं। ब्राह्मण मेरा ही स्वरूप होते हैं इसीलिये वे मेरी पूजा का श्रेष्ठ अधिष्ठान भी हैं। ब्राह्मण की आज्ञा का
पालन करने के लिये जिसका मन अत्यन्त तत्पर रहता है और जो उन्हें दान देता या दिलाता है उस वृत्ती का ही
नाम है पूर्ण श्रद्धा। ब्राह्मण की सेवा धन के बिना नहीं होती यह कहना ठीक नहीं है। सेवा में श्रद्धा और भजन
के प्रति पूर्ण उल्हास यही प्रमुख प्रमाणभूत साधन होते हैं। किसी की शरीर से सेवा करें, किसी का वाणी से
पूजन करें, किसी का मन से ही भजन करें, किसी भी प्रकार से भजन करें लेकिन ब्राह्मण से पूर्ण दया प्राप्त होती
है। ब्राह्मण की भक्ति में अंतःकरण का आनन्द से भर जाना तथा परमश्रद्धा और उल्हास से परिपूर्ण रहना इसी का
नाम है 'आतिथ्य'। इस प्रकार ब्राह्मण का भजन यह पूजा का तीसरा अधिष्ठान है। अब गायत्री सेवा के सम्बन्ध
में सुनो। जिस गौ के प्रेम के कारण मैंने सहस्रार्जुन का वध किया और इक्कीस बार पृथ्वी के वीर सैनिक क्षत्रियों
को मार गिराया, रामावतार में मेरा महात्म्य बहुत अधिक था लेकिन उसमें गौसेवा नहीं हुई इसलिये मैंने गोकुल
में अवतार लेकर गाय की सेवा की, गाय की सेवा से ही मैं पुष्ट हुआ इसीलिये मैंने बाल्यावस्था में ही बड़े-बड़े
मल्लों को मार गिराया, कंस, चाणूर सरीखे अदम्य मल्लों का वध किया और उग्रसेन को राजसिंहासन पर
बैठाया। गाय की सेवा मुझे अत्यन्त प्रिय है, उसके ही कारण मेरी कीर्ति फैली। मैंने कंस के राज्य के कारागार
खुलवाये और बन्दी पितरों को मुक्त किया। इसलिये गौ और ब्राह्मण मेरे प्राण हैं। इन दोनों के कारण ही मेरी
पूजा का अधिष्ठान सुलभ हो गया है। जो आपातकाल में गौ का संरक्षण करता है वह मुझे बहुत प्रिय लगता है।
उसके साथ मैं भी गोरक्षण करने लगता हूँ। गौ की सेवा का विधान इस प्रकार है कि उसे रोज गोग्रास देना
चाहिये उसे घास खिलानी चाहिये और उसके शरीर पर हाथ फेर कर उसका बदन सहलाना चाहिये। इतने से ही
मैं प्रसन्न हो जाता हूँ। हे उद्धव ! बिना किसी लोभ के गाय की सेवा करने से मेरी प्राप्ति होती है। अब सद्भक्ति से
वैष्णव की पूजा कैसे की जाय, यह भी सुनो।
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया।
वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥
वैष्णव की सेवा करना बड़ा कठिन काम है। वहाँ जाति प्रमाण नहीं है। भक्ति प्रधान भाव को ध्यान रखते
हुए यह शूद्र है और यह ब्राह्मण है यह भेदभाव मन में नहीं लाना चाहिये। विदुर दासीपुत्र था यह प्रसिद्ध ही है।
लेकिन उसे श्रीकृष्ण भा गया। वह वैष्णवों में अत्यन्त श्रेष्ठ सिद्ध हुआ। उसे निंद्य कैसे माना जाय ? मारुति जो
वानरों की जाति में पैदा हुआ वह वैष्णवों में अत्यन्त श्रेष्ठ था। उसे कनिष्ठ कहने वाला पातकी कौन होगा ?
राक्षसों में विभीषण और दैत्यों में प्रह्लाद भी भगवान की शरण में आया जिसके कारण वह वैष्णव हो गया। जाति
से श्रेष्ठ होते हुए भी यदि वह भक्तिरहित है तो वह वैष्णव नहीं है यह ध्यान में रखो अथवा यदि वह दिखावे के
लिये भजन करता है तो वह भी वैष्णव नहीं हुआ है यह जान लो। जो वैष्णवों में जाति को प्रमाण मानता है,
शालिग्राम को पाषाण समझता है और गुरु को साधारण मनुष्य समझता है वह पूर्णरूप से पातकी है। कौशल,
चातुर्य, ज्ञातापन और जाति का अभिमान छोड़ जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आयेगा वही सच्चा वैष्णव है यह
समझ लो। उस वैष्णव की पूजा करनी चाहिये, लेकिन बाह्य उपचारों से नहीं बल्कि बन्धुत्व भाव से। मन में
सच्ची आकुलता होनी चाहिये। उसी का नाम है सच्ची पूजा। सगे भाई का स्नेह कैसा रहता है, सुनो। जो भाई को