श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३२९
है। हे उद्धव ! इससे यह ज्ञात होता है कि सगुण और निर्गुण ये दोनों एक हैं। सच्चिदानन्द का सुख भी दोनों से
समान रूप से प्राप्त होता है। सुवर्ण की छड़ के लिये जो कसौटी है, वही एक तोला सोने के लिये भी है। उसी
प्रकार सगुण अथवा निर्गुण की उपासना से आत्मानंद में कोई अन्तर नहीं आता। शर्करा के ढेर में भी वही मिठास
है जो एक छटांक शर्करा में है। यह मेरे अंतःकरण का ध्यान है, यहाँ भक्तों को मन को निरन्तर जागृत रखकर
हर्षपूर्वक मेरी पूजा करनी चाहिये। हे उद्धव ! अब तुम मन ही मन विचार करोगे कि यह भक्ति किस उपाय से
साध्य हो सकती है ? तो मैं वे साधन तुम्हें बताऊँगा।
इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः।
लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया ॥४७॥
नाना प्रकार के योगयाग, वापी, कूप, वन, सरोवर, उत्तम से उत्तम श्रौत और स्मार्त कर्म करते समय
जिन्होंने वे कर्म मुझे अर्पण कर दिये वही पूर्ण हुए। मुझे अर्पण किये बिना ये कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। कर्म मुझे
अर्पण करते समय भी कभी-कभार उस भक्त का मन किसी विघ्ननिवारक फल की इच्छा करता है इसलिये मैं
उस भक्त को कभी कोई विघ्न नहीं आने देता। सकाम कर्मकर्त्ता को भी जो अत्यन्त प्रयास से नहीं प्राप्त हो पाता
वह उत्तम लोक मैं अपने भक्तों को भोगों के साथ. देता रहता हूँ। अंतःकरण से जो मेरा भक्त है और भोगों के प्रति
विरक्त है वह भोगों का सेवन करते समय भी मेरा स्मरण करता रहता है इसलिये वह भोगों के प्रति आसक्त नहीं
होता। कोई साधु मन्दिर में जाते समय मूसलाधार बारिश से बचने के लिये यदि किसी वेश्या के घर में घुसता है
तो वह वहाँ रहकर भी वेश्या को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार भक्त दिव्य भोगों से ऊब जाता है और पश्चात्ताप
करता हुआ हरि का स्मरण करता है। उस अनुताप की स्थिति में सारे भोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं और जिस घर
में मेरी भक्ति का वास रहता है उस घर में महान ज्ञानी जन्म लेता है। पूर्व संस्कारों के कारण उसे विषयों के प्रति
विरक्ति प्राप्त होती है, वह जन्म लेते ही भक्तिमार्ग पर चल पड़ता है और भक्तों से प्राणों से भी अधिक प्रेम करता
है। वह मुक्ति को लात मार कर अपने सर्वस्व से मुझे भजता रहता है। इस प्रकार मैं अपने भक्तों को बाधाओं का
स्पर्श नहीं होने देता। इस प्रकार जिन्हें विषयों से विरक्ति होती है वे भी तालाब, कुएँ आदि परोपकार के काम
करते हैं अथवा जब योग-याग और त्याग के साधन करते हैं तब उनमें मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। मन की
समदृष्टि कर श्रौत स्मार्त कर्मों का अनुष्ठान अथवा योग, याग, त्यागवृत्ति आदि का साधन जो एकनिष्ठा से करते
हैं तभी उनकी चित्तवृत्ति शुद्ध होती है और उसके योग से मेरे प्रति उत्तम भक्ति उत्पन्न होती है। लेकिन इतना
परिश्रम किये बिना भी मेरी सद्गति प्राप्त हो ऐसा एक गुप्त उपाय तुम्हें बताऊँगा। हे उद्धव ! सारे साधन छोड़
कर जो साधु का भजन करेगा तभी उसका मन सचमुच शुद्ध होगा यह ध्यान में रखो। अब तुम पूछोगे कि साधु
कैसा रहता है ? और साधु कौन कहलाता है ? तो उसका लक्षण पहले ही बता चुका हूँ। जो साधु है वही सद्गुरु
है, यह ध्यान में रखो। उस सद्गुरु का भजन जो पूरे भाव से करता है उसकी समस्त शुद्धि का कारण सद्गुरु ही
है यह जान लो। उनके मुख से निकला शब्द ही ब्रह्मसाक्षात्कार तक पहुँचाता है। उस सद्गुरु के भाग्यशाली
चरणों की सेवा करने पर कौन-सी शुद्धि नहीं होगी ? गुरु का नाम लेने पर उसकी ओर कलिकाल भी नहीं देख
सकता। प्रसन्नतापूर्वक उसकी सेवा करने से मोक्षसुख भी चरणों पर आ जाता है। जिसके मन में सद्गुरु की प्रीति
है, सद्गुरु के भजन में जिसकी आस्था है, उस पर मेरी भक्ति आसक्त हो उठती है। भक्त के साथ गठबन्धन
करने के लिये वह आतुर हो उठती है। गुरुभजन के साथ जो जुड़ता है वही अपना स्वार्थ सिद्ध कर पाता है यह