श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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श्री भगवानुवाच
न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥ १॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।
यथावरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् ॥ २॥
अष्टांग योग में मुझे वश करने का सामर्थ्य नहीं है। संसार के नित्यानित्य विचार भी मुझ तक नहीं आ
सकते अथवा मन में निरन्तर प्रकृति पुरुषों का विचार करते रहने से भी मेरे स्थान तक पहुँचने का सामर्थ्य उस
व्यक्ति को नहीं प्राप्त होता यह ध्यान में रखो। अहिंसा के साथ जो सारे धर्म हैं वे तथा सत्य आदि से भी मैं प्राप्त
नहीं होता। यथाविधि वेदों का सांगोपांग अध्ययन करने से भी मेरी प्राप्ति नहीं होती। फिर उनके सामने बेचारों की
क्या बिसात है? पंचाग्नि साधन तो निरर्थक है। कृच्छ्र चांद्रायण व्रत भी व्यर्थ सिद्ध हुए क्योंकि उन्हें करने से भी
मैं प्राप्त नहीं होता। जो घरबार छोड़कर विरक्त होता है या 'विरजा' होम (संन्यास लेने से पूर्व किया जाने वाला
होम) कर अपने सर्वस्व का हवन करता है अथवा सारे साधनों में श्रेष्ठ संन्यास ग्रहण करता है उसे भी मैं
परमेश्वर वश नहीं होता। श्रौतस्मार्त कर्म करते-करते कर्मठ लोग पागल हो गये फिर भी मैं उन्हें प्राप्त नहीं होता।
हाँ, होम करते समय उन्हें कष्ट अवश्य भोगने पड़ते हैं। गौओं का दान करें, भूमि का दान करें, धनधान्य का दान
करें लेकिन जब तक उनका दानाभिमान नहीं छूटता, मैं उन्हें वश नहीं होता। अथवा संकटचतुर्थी, ऋषिपंचमी,
विष्णु पंचक, बुधाष्टमी आदि अनेक व्रत नियमित रूप से करने से भी उन कर्मों से मैं प्राप्त नहीं होता। या सर्वस्व
खर्च कर अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञ यथासांग करने पर भी वे मेरी प्राप्ति के योग्य सिद्ध नहीं होते। उनके योग से
मैं श्रीकृष्णवश नहीं होता। तालाब, कुएँ, बगीचे तैयार करने से मार्ग पर पेड़ लगाने से जंगल में पथिकों के लिये
विश्रामस्थल बनाने से अथवा स्मार्त कर्मों का आचरण करने से भी मैं आत्माराम उन्हें नहीं प्राप्त होता। अनेक
प्रकार के वेदमंत्र हों, अनेक प्रकार के गुरुमंत्र हों अथवा अत्यन्त विचित्र प्रकार के विधिविधान हों और उनका
सामर्थ्य कितना ही बड़ा और पवित्र क्यों न हो फिर भी वे मेरी प्राप्ति कराने में स्वतंत्र रूप से समर्थ नहीं हो पाते।
पुष्कर आदि अनेक तीर्थ हैं और पातकों का नाश करने में वे अत्यन्त समर्थ हैं लेकिन मुझ तक पहुँचने का
सामर्थ्य उनमें नहीं होता अथवा जो रात-दिन यमनियम करते हैं या नानाप्रकार के साधन करके थक जाते हैं
उनका भी मेरे द्वार तक पहुँचने का सामर्थ्य उन यमनियमों में नहीं है। उद्धव ! उन यमनियमों का निर्णय मैं तुम्हें
उन्नीसवें अध्याय में विस्तारपूर्वक बताऊँगा। यह बारहवाँ अध्याय संक्षिप्त स्वरूप का है। वे बारह यमनियम
अथवा और सारे साधनों को मेरे नगर (वैकुण्ठ) तक आने का मार्ग ही नहीं मिल पाता। लेकिन यदि वे साधु का
आश्रय लेकर संतों के द्वार पर जायें तो समझ लो वे मेरे ही घर आ गये। ऐसी परम्परा से मेरी प्राप्ति होती है
लेकिन सत्संगति वैसी नहीं है। वह अपने संग से अन्य संगों का विनाश करती है और मेरी प्राप्ति होती है। सत्संग
करने वाले भक्त मेरी प्राप्ति के लिये किसी पर निर्भर होकर नहीं रहते। कीड़े की चींटी से संगति होने से उसके
देह की स्थिति बदल जाती है। उसी प्रकार संतों की संगत करने से भक्त भी बदल कर मद्रूप हो जाते हैं। जरा
देखो। चन्दन के पेड़ के इर्द-गिर्द जो निर्गंध और अनुपयोगी वृक्ष होते हैं वे भी चन्दन की संगत से सुगन्धी होकर
मूल्यवान हो जाते हैं। वे अचेतन काष्ट भी देवताओं और ब्राह्मणों के मस्तक पर चन्दन के रूप में विराजमान रहते
हैं। उसकी आवश्यकता धनवानों को भी होती है। राजा लोग भी उन्हें वन्दनीय समझते हैं। उसी प्रकार सत्संग