श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३२७
की पूजा है। जिसे विभिन्न वस्तुओं में विषमभाव की बाधा नहीं होती वही सच्चा पूजक है। जो भक्ति भाव से
मुझमें एकरूप हो गया, वह स्वयं प्राणिमात्र बन गया। अर्थात्, वह अपने आप ही सबसे एकरूप हो गया और
आत्मभाव से सबकी पूजा करने लगा। वह रंक और राजा दोनों की पूजा करता है लेकिन उसके मन में उन दोनों
में समान परब्रह्म की जो कल्पना है वह नहीं बदलती। वह उन दोनों में जो एकरूपता और समान भाव है उन्हें
खण्डित किये बिना उनकी उचित पूजा करता है। हे उद्धव ! सुनो यदि समस्त भूतों में मेरी पूजा करनी है तो वह
मुझसे तादात्म्य होने पर ही पूरी होती है। ये ग्यारह पूजास्थल मेरी प्राप्ति कराने वाले तथा अत्यन्त पवित्र हैं। मैंने
जैसा वर्णन किया है उसके अनुसार उनकी यथाविधि पूजा करनी चाहिये। मैंने जिस पद्धति से पूजा करने को
कहा है उसी के अनुसार पूजा करनी चाहिये। यदि समझ में न आये तो मेरी मूर्ति का ही चिंतन करना चाहिये।
धिष्ण्येष्वेष्विदिति मद्रूपं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः ।
युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्नर्चेत् समाहितः ॥ ४६ ॥
जो सगुण को निर्गुण की अपेक्षा कम आँकता है वह पक्का मूर्ख है क्योंकि सगुण और निर्गुण दोनों एक
जैसे हैं। उनमें एक कम और एक अधिक जैसी कोई बात नहीं है। घृत पतला हो तो भी वह घृत ही रहता है
लेकिन वह जब जम जाता है तो पतले घृत की अपेक्षा अधिक स्वादिष्ट हो उठता है। उसी प्रकार निर्गुण की
अपेक्षा सगुण स्वरूप से ही मन को त्वरित आनन्द प्राप्त होता है। निर्गुण का बोध होना ही कठिन रहता है
क्योंकि वह मन, बुद्धि और वाणी को दुर्गम रहता है। उनका रहस्य शास्त्रों की समझ में भी नहीं आता। वेद भी
उनके सम्बन्ध में मौन हैं। वायु को नापने जाओ अथवा आकाश को आलिंगन देने का प्रयत्न किया जाय उसी
प्रकार भावना भागने लगती है। कहाँ स्थिर रहना है यही समझ में नहीं आता। लेकिन सगुण मूर्ति वैसी नहीं है
ध्यान में रखो। वह सुलभ और सुन्दर होने के कारण उसे देखते ही भूख और प्यास नष्ट हो जाती है और प्रेम से
मन शान्त हो जाता है। जो नित्यसिद्ध सच्चिदानंद, प्रकृति से भिन्न एवं परमानंद स्वरूप है वही स्वानंद का
मूलकंद गोविन्द अपनी ही लीला से सगुण बना। शर्करा की मिठास की प्रशंसा चारों ओर होती है लेकिन यदि
उसकी मिश्री बनायी जाय तो उसकी मिठास अधिक स्वादिष्ट हो जाती है। यही बात साकार मूर्ति के बारे में है।
शुद्ध सोने की तार यदि दुल्हन को पहना दी जाय तो क्या दुल्हन सुन्दर दिखायी देगी ? लेकिन यदि उसी सोने के
अलंकार बनाकर मस्तक, कंठ, हाथ आदि अंगों पर पहना दिये जाएँ तो वही दुल्हन सुन्दर दिखायी देगी और
लोग उसकी नजर उतारेंगे। उसी प्रकार जो निर्गुण और निराकार रहता है उसी की अपनी इच्छा के अनुसार
सुकोमल, ज्ञानरूप, सुन्दर एवं मनोहर सगुण मूर्ति तैयार होती है। मुकुट, कुण्डल तथा मेखला से विराजित
देदीप्यमान श्यामवर्ण, गले में कौस्तुभमणि तथा वनमाला और कटि पर जरीदार पीताम्बर। श्यामवर्णी, तिस पर
भाल पर लगाया हुआ पीला चन्दन का टीका, दोनों नेत्रों में कमल की पंखुड़ियों को भी लज्जित करने वाली
आरक्त आभा। ज्ञान का सौन्दर्य मानों मूर्ति की आँखों में उतर आया हो। इधर-उधर भटकते हुए जब वायु थक
गया तब मानों उसने श्रीहरि के नाक में श्वासोच्छ्वास के रूप में बसेरा कर लिया। ओंकार में जिस प्रकार श्रुति
होती है उसी प्रकार मुख में दंतपंक्ति शोभा देती है और चारों कोनों पर स्थित दाढ़ें तो सच्चित्प्रकाश की तरह
झलकती हैं। जिस प्रकार जीव और शिव अपने भिन्नत्त्व के साथ एकसाथ रहते हैं उसी प्रकार निचला और ऊपर
का होंठ श्रीहरि के शरीर में एक तरह तथा समान गुणों से जुड़े हुए हैं। कृष्ण का मुख देखकर अर्थात् कृष्णपक्ष
में चन्द्रमा क्षीण होने लगता है। वह केवल पूर्णिमा को ही परिपूर्ण रहता है। लेकिन इस कृष्ण का मुखचंद्र