सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

३१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसका गुस्सा शान्त नहीं होता। उसी प्रकार मेरे संतों का अपमान कर यदि मेरी पूजा की जाय तो मैं ही क्षुब्ध
होता हूँ। इससे मेरी सेवा बिलकुल नहीं होती, उलटे उसके इस कार्य से मेरा क्षोभ ही बढ़ता है। संत मेरे प्रिय हैं,
उनकी पूजा मुझे अच्छी लगती है। जो संतों के सेवक हैं उनके मनोरथ मैं पूर्ण करता हूँ। मुझ जैसे निरिच्छ को
भी संतों की इच्छा रहती है। मेरी पूजाध्यान छोड़कर जो संतों को दण्डवत करता है वह सहस्र यज्ञों का फल मुझे
ही अर्पण करता है। उसी ने समस्त तीर्थों में स्नान किया तथा जप-तपों का फल प्राप्त किया ऐसा समझना
चाहिये। जिसने ससम्मान साधु को नमस्कार किया उसे सारी पूजाओं का सार प्राप्त हो गया। मेरी प्रतिमाएँ
अचेतन मूर्ति होती हैं लेकिन संत मेरी सचेतन मूर्तियाँ हैं। पूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करने से वह
निश्चयपूर्वक मुझे प्राप्त होती है। प्रतिमाएँ कल्पना के अनुसार उत्तम बनायी जाती हैं, लेकिन संत तो साक्षात
पुरुषोत्तम ही हैं। वे चलते-फिरते परब्रह्म ही हैं। इसलिये साधुसेवा अत्युत्तम है। मेरी मूर्ति तथा सत्पुरुष का इस
प्रकार तत्परता के साथ भजन करते हैं यह निश्चय तो तुम्हें बता ही दिया। अब भजन का प्रकार सुनो। मेरी
प्रतिमा तथा सोज्वल साधु को जिसकी आँखें नहीं देखतीं उन्हें दृष्टि होते हुए भी उनकी आँखें मोरपंख पर बनी
आँखों की तरह अन्धी ही हैं। जिस प्रकार स्त्रियाँ, पुत्र और सम्पत्ति को देखकर आँखों को सुख प्राप्त होता है
उसी प्रकार वह चाव से संत प्रतिमाओं का दर्शन करता है। उनका उत्कंठा से होने वाला दर्शन ही साक्षात सौन्दर्य
है। समझ लो कि उसी से नेत्र सार्थक होते हैं। इस प्रकार नेत्रों से भजन होता है। संत मेरी ही मूर्ति है यह समझ
कर जो उनकी ओर दौड़ कर जाता है और उन्हें आलिंगन करता है और आनन्द के कारण उनसे बाहें नहीं
छुड़ाता, ऐसे संतों का आलिंगन करने से सारा शरीर ही पवित्र हो जाता है अथवा यह समझ लो कि मूर्ति के स्पर्श
से ही शरीर पवित्र हो जाता है। जो तीर्थयात्रा पर नहीं गये, संतों की सेवा में नहीं रहे अथवा श्रीहरि के सभा
मण्डप में नहीं नाचे वे पैर सर्वथा निरर्थक हैं। जो अनेक प्रकार के विषय सुखों के लिये नीच के आगे नाचता है
उसे श्रीहरि के सभा मण्डप में नाचने के लिये कहने पर वह बैल की तरह बैठ जाता है। तीर्थयात्रा में जाते समय
पुण्यक्षेत्र की ओर जाने में, हरिकीर्तन के जागरण में जाते समय, संतों के साथ चलने में अथवा श्रीहरि के
रंगमण्डप में नृत्य करने में पैरों को जो श्रम होता है उसी का नाम 'पैरों का सार्थक' है। अन्य जगह जाने का अर्थ
है अधःपतन की ओर जाना। उद्धव! इसी का नाम चरणों की पवित्रता है यह जान लो। सर्वथा निष्कपट रहकर
कौड़ी से लेकर करोड़ों तक की राशि जिसने मुझे अर्पण कर दी उसके उस अर्पण कार्य को ही मेरा 'अर्चन'
कहते हैं। धनधान्य गुप्तरूप से संग्रह कर बाह्यरूप से मेरी पूजा करना यह मेरा 'अर्चन' नहीं है। वह मेरे साथ
कपट कर रहा है यह जान लो। स्वयं को खाने को मिले इस आशा से जो भगवान की मूर्ति के सामने पकवान
रखता है और अतिथि के आने पर उसे अन्न भी नहीं देता, यह कोई मेरा अर्चन नहीं है। पूजा करते समय हाथ
पवित्र होते हैं और वही हाथ भगवान को अच्छे लगते हैं। जो भगवान की पूजा नहीं करते वे हाथ प्रेत के ही होते
हैं यह जान लो। हाथ से ईश्वरमूर्ति की पूजा न कर तथा सत्पात्र को दान न देकर, यदि उन हाथों में रत्नजड़ित
अँगूठियाँ और आभूषण पहने जाएँ तो वह प्रेत को आभूषण पहनाने की तरह है। हरिकीर्तन करने से अथवा
अखण्ड नामस्मरण से ही वाणी सार्थक होती है। 'जयजयकार' की गर्जना से ही त्रिभुवन पावन हुए हैं। जिसकी
वाणी रामनाम की गर्जना से सदा गरजती रहती है, वहाँ कलिकाल को भी शरण नहीं मिलती। पाप तो दूर भाग
जाते हैं। कर्मदरिद्री लोग हरि का नाम छोड़ व्यर्थ की बातें करते रहते हैं। उनकी बातों को टट्टी के समय
होनेवाली आवाज की तरह समझना चाहिये। हरिनाम के उच्चार से होने वाले सुख का आनन्द जिसके मुँह लग
जाता है उसका मुँह सदा मेरी ओर ही रहता है और मैं सदा उसके पास रहता हूँ। विविध प्रकार के गद्य पद्यात्मक