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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 869 में से

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पृष्ठ 335

ग्यारहवाँ अध्याय ३१९
क्योंकि सभी पदों में सर्वश्रेष्ठ मेरी एकादशी ही है। एकादशी का व्रत करने वाला जो मेरा भक्त है वह व्रत, तप
तथा तीर्थों का राजा है। मुझ गरुड़ध्वज को वह प्रिय है। वह मेरे परिवार का ही है। मेरे भक्त जब घर आते हैं
उस समय सभी पर्व उसके द्वार पर आकर खड़े हो जाते हैं। वैष्णवों को तो वह समय दीपावली तथा दशहरे की
तरह आनन्ददायक मालूम होता है। चन्द्रसूर्यादि ग्रहण भी उस दिन पर न्योछावर हो जाते हैं। कपिलाषष्ठी तो
उसकी दासी बनकर रहती है, फिर अर्धोदय को कौन पूछता है? मेरे भक्तों के आगमन से उल्हास मन में नहीं
समाता। उसके लिये सारा धनधान्य खर्च हो जाए तो भी वह नाचता रहता है। ऐसा मेरे भक्तों का प्यार, और
उनकी संगति की जो मधुरता है उसी का नाम है भक्ति का उत्कर्ष। जिस दिन संतों का घर पर आगमन होता है
उस दिन मानों करोड़ों पर्वों का पुण्य ही प्राप्त हो जाता है। संत घर आते हैं वह दिन वैष्णव पर्व ही समझता है,
श्रीहरि का मन्दिर सजाता है, तोरण बंदरवार तथा पताका फहराता है तथा उत्सव मनाता है। संतों को आदर के
साथ बिठा कर बड़े चातुर्य से कीर्तन का प्रारम्भ करते हैं, प्रेम से नाचते-गाते हैं और बड़ी उत्कंठा से
अंगविक्षेपादि का प्रदर्शन करते हैं। टाल, वीणा, मृदंग आदि बड़ी कुशलता से बजाते हैं और अनेक प्रकार के
चरित्रों को गा बजाकर गरजते हैं तथा हरिनाम का जयघोष करते हैं।
यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु।
वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम्॥ ३७॥
अब दीक्षा का लक्षण सुनो। वैदिक तथा तांत्रिक, ये दो प्रकार की दीक्षाएँ हैं, वेदोक्त ग्रहण करना वैदिक
दीक्षा होती है तथा पुराणोक्त ढंग से ग्रहण करने को तांत्रिक दीक्षा कहते हैं। वैष्णव व्रत को ग्रहण करना पड़ता
है। यही मेरा वैष्णवव्रत धारण करने का पुराणोक्त शुद्ध लक्षण है। वैष्णवव्रत धर्म का पालन करने के लिये
प्रतिवर्ष आने वाले पर्वों को यथाविधि मनाना चाहिये। चातुर्मास में बताये गये एकादशी आदि व्रत एवं जयंतियाँ
मनानी चाहिये। शयनी, कटिनी, प्रबोधिनी, पवित्रारोपणी, नीराजनी, वसंतदमनकारोपणी आदि जयंतियाँ अनेक
पर्वकालों में समारोहपूर्वक मनानी चाहिये तथा नाना प्रकार की पूजा, नीरांजन तथा दीपमालाएँ जलाकर, मृदंग
टाल आदि वाद्यों के गजर के साथ करनी चाहिये तथा अत्यन्त उल्हासपूर्वक यात्रा पर निकलना चाहिये। दिंडी,
पताका तथा ध्वज लेकर नामघोष से गर्जना करनी चाहिये। जिस देवता की यात्रा पर निकलना है, उस देवता को
. घर लाना चाहिये। जिस मूर्ति पर भक्ति हो उर्सी मूर्ति की स्थापना करनी चाहिये।
ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः।
उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि॥ ३८॥
मूर्ति उत्तम ढंग से तैयार करवानी चाहिये। वह ठीक-ठाक, सुडौल तथा मनोहर होनी चाहिये। उसे देखकर
वह निर्दोष, भव्य एवं कोमल है ऐसे उद्गार साधु के मुख से निकलने चाहिये। मूर्ति सुघड़ हो पर कृश न हो,
वह अधोमुख न हो, वह स्थूल और ऊर्ध्वमुख भी न हो और न रोती दुर्मुख ही हो। वह स्थूलकाय और विद्रूप
मुँह वाली भी न हो और न अति दीन दीखने वाली ही हो। वह ऊर्ध्वा दृष्टि अथवा अधोदृष्टि वाली भी न हो।
उसका मुख विकराल न हो। शरीर से सुन्दर किन्तु नाक से हीन न हो अथवा ऊपर का भाग पुष्ट और पैर कृश न
हो, मोटी तथा नाटी न हो, अथवा आकार में बहुत बड़ी न हो। मूर्ति नाजुक हो तथा उसकी आँखें सुन्दर हों। सारे
अवयव पुष्ट हों तथा देखने में वह सुप्रसन्न हो। अंग, उपांग में कोई न्यूनता न हो। वह उत्तम चिन्हों से युक्त तथा
सुलक्षणी हो और उसके हाथ में आयुध हों। उसे देखते ही तन-मन तृप्त हो, जिसका दर्शन होते ही भूख-प्यास