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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

ग्यारहवाँ अध्याय २९५
श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रालोकपावनीः ।
गायन्ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः ॥ २३ ॥
मेरी कथा का श्रवण प्रारम्भ करने पर वहाँ काल का भी प्रवेश सम्भव नहीं है फिर दूसरों की क्या बात
की जाय? और वहाँ कर्मबन्धन किस बात का? हरिकथा में जो क्षण व्यतीत होता है उसे काल भी ग्रस नहीं
सकता। इसलिये हरिकथा का श्रवण यदि श्रद्धापूर्वक किया गया तो उसी को 'काल की सार्थकता' समझना
चाहिये। अब कथा का माहात्म्य सुनो। यदि श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की जाय तो उसके प्रत्येक अक्षर से तीनों
लोकों के पातक भस्म हो जाते हैं। अब श्रद्धा किसे कहते हैं यह भी सुनो। हरिकथा श्रवण करते समय जिसके
अर्थ की ओर मन लगा रहता है उसी का अर्थ है श्रद्धापूर्वक श्रवण करना। कथा का प्रतिपादन सुनकर भी
नास्तिक कहते हैं, "भगवान तो है ही नहीं। जो कहते हैं कि ईश्वर है वह केवल अपना पेट भरने के लिये हमें
उस पर जरा भी विश्वास नहीं है।" ऐसे नास्तिकों की बात की चिन्ता न कर जिसकी आस्तिकता बढ़ती जाती
है उसी का नाम है श्रेष्ठ श्रद्धा और उसमें अप्रतिम सुख होता है। श्रवण में अथवा ध्यान में लय, विक्षेप, कषाय
तथा रसास्वाद आदि से बाधा उत्पन्न होती है। इसलिये इन चारों बाधाओं से बचना चाहिये। हरिकथा सुनते
समय भी यदि मन में विषय की चिन्ता लगी रहे तो वह अच्छा है ही नहीं। प्रमुख विक्षेप यही है। स्त्रियों के
हावभाव का वर्णन, उनके नेत्र कटाक्षों का वर्णन एवं श्रृंगार चेष्टाओं का वर्णन सुनने में ही जिसकी श्रद्धा रहती
है उसका नाम है 'रसास्वादन'। अथवा वह हरिकथा सुनने के लिये बैठा अवश्य रहता है किन्तु उस कथा में
उसका मन बिलकुल नहीं रहता। उसका चित्त कहीं अन्यत्र ही भ्रमण करता रहता है। उसे मर्कटरूपी विक्षेप
कहते हैं। अन्यथा अनेक प्रकार के उद्वेग होने के कारण हरिकथा सुनते रहने पर भी उसमें मन नहीं लगता
अथवा नींद आ जाती है। उसे तत्काल लय विक्षेप समझना चाहिये। सुनने अथवा ध्यान में बैठने पर सगुण
अथवा निर्गुण इनमें से कोई भी रूप मन में नहीं उभरता और आँखों के आगे नीले-पीले रंग नाचने लगते हैं।
यही तीन गुणों के क्षोभ का मिश्रण है। इसे 'कषाय' कहते हैं। श्रवण और ध्यान में इस प्रकार के दोष हैं। उसी
प्रकार प्रेम तीन प्रकार का है। चतुर लोग इन तीनों प्रकार के प्रेम को पहचानते हैं। उसके लक्षण बताता हूँ,
सुनो। महान वीरों के समर में पराक्रम अथवा भीषण युद्ध का वर्णन सुनकर मन प्रसन्नता से नाच उठता है, वह
राजस प्रेम है। दुःख शोक का प्रसंग, मरने की वार्ता अथवा शोक कथाओं का सुनना भी जिसे सहन नहीं होता,
उनमें का प्रत्येक प्रसंग सुनकर आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है, सिसकी आने से जिसका बदन
थर-थर काँपने लगता है वह सच्चा तामस है, यह समझ लो। सगुण मूर्ति का ऐश्वर्य, शंख, चक्र, कमल, गदा
तथा पीताम्बर धारण किये गोविन्द का वर्णन सुनकर जो प्रसन्न हो उठता है, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं,
सिसकी रूक नहीं पाती, मन कृष्णमय हुआ रहता है, वह प्रेम सात्त्विक होता है। चौथे प्रकार के प्रेम की
कल्पना भी अतर्क्य है। उद्धव! तुम मेरे अत्यन्त लाडले हो इसलिये तुम्हें उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारा
भक्ति का स्वरूप महान है। उसके कारण मुझे गुप्त बात भी बतानी पड़ती है। तुम्हारे सिवाय दूसरों को देखने
पर दूसरा अधिकारी पुरुष दिखायी नहीं देता। श्रीकृष्ण ने कहा, ध्यान दो। निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप के बारे में
जानकर जिसका मन चित्तस्वरूप में डूब जाता है उसे पुनः होश में आने का भान ही नहीं रहता। नमक का
टुकड़ा समुद्र में डालने पर वह जिस प्रकार समुद्र के आकार का ही हो जाता है उसी प्रकार वह भी साक्षात्
ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। चित्त और चैतन्य का मिलन होने पर और लिंगदेह का बन्धन टूटने पर आँखों में
अश्रुओ की बाढ़ आ जाती है, शरीर रोमांचित हो जाता है, जीव भाव की दशा टूट जाती है और भाव विह्वल

होने के कारण गला रुंध जाता है, शब्द मुँह से बाहर नहीं आ पाते। शरीर से पसीना बहने लगता है, नेत्र
अधोन्मीलित हो जाते हैं, आश्चर्य अपरिमित हो उठता है और वह स्वानंद से भर जाता है। इसे चौथा प्रेम जान
लो। यही उत्तम भागवत की स्थिति है। वही मैंने यथार्थ रीति से बतायी। इस स्थिति को जानने वाला बस मैं ही
हूँ। निर्गुण में प्रेम होना यह शुद्ध सात्त्विक लक्षण है। इसके लक्षण या तो मैं जानता हूँ या जो ब्रह्मस्वरूप हैं वे
जानते हैं। उद्धव! श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ है, यह ध्यान में रखो। श्रद्धा से श्रवण करने का
माहात्म्य त्रैलोक्य में बहुत अधिक है। विवेकी और इच्छारहित वक्ता मिले तो उसे श्रद्धापूर्वक श्रवण करना
चाहिये या श्रोता यदि ज्ञानसम्पन्न हो उसे भी कथा कहनी चाहिये। जब श्रोता और वक्ता में से कोई भी न हो तो
अपने मन का ही आश्रय लेना चाहिये और मेरे अवतार, अवतार कार्य आदि का अकेले में ही विचार करना
चाहिये। विषयों की आस्था त्याग कर तथा काल को टक्कर देकर, मेरे कीर्तन में अत्यन्त उल्हास धारण करना
चाहिये। वासना का त्याग कर तथा लौकिक की लज्जा न कर श्रीकृष्ण का नामस्मरण करते हुए नृत्य के साथ
कीर्तन करना चाहिये। रामकृष्ण, हरि, गोविन्द आदि का काव्य गायन करते हुए उनमें के अनेक प्रकार के
छन्दबंद पदों से कीर्तन में आनन्द की वर्षा कर देनी चाहिये। जिनसे आत्मज्ञान का लाभ हो ऐसे प्रिय पदों का
कीर्तन में गायन करना चाहिये तथा ऐसे समय संत समुदाय को सामने बैठाना चाहिये। वीणा, मृदंग, करताल
आदि वाद्य लेकर तथा वैष्णवों के समुदाय एकत्र कर कीर्तन में जयघोष करना चाहिये। काल-प्रहर की चिन्ता
नहीं करनी चाहिये। दशमी को धार्मिक उत्सव के उपलक्ष्य में जागरण करना चाहिये तथा सुमधुर गायन करना
चाहिये और मेरे अवतार कार्यों का स्मरण कर उनका हावभाव के साथ प्रदर्शन करना चाहिये। राम ने धनुष की
प्रत्यंचा खींचकर किस प्रकार शंकर का धनुष तोड़ा इसका हावभाव के साथ प्रदर्शन कर, वह राम मैं ही हूँ
ऐसी जो गर्जना करता है वह कीर्तन में रंग जमा देता है। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत किस प्रकार उठाया, किस तरह
दावाग्नि प्राशन किया, वह सब अपने हावभाव से प्रदर्शित कर तथा राम ने सेतु कैसे बाँधा इसका भी अनुकरण
करके दिखाता है, आलस त्याग कर जो अहंकार को दूर भगा कर रात-दिन कीर्तन का घोष करता है, उसमें भी
मैं अच्छा गायक हूँ इस बात का गर्व नहीं करता, गायन की प्रौढ़ता, ज्ञान का अभिमान तथा चतुराई के गर्व को
जो न्योछावर कर देता है और शुद्ध प्रेम तथा सादगी से कथा का गौरव करता है, उससे मुझे अत्यन्त आनन्द
प्राप्त होता है। नामसंकीर्तन का जयघोष जब अपनी चरम सीमा पर रहता है और नामोच्चार के साथ सबकी
एक साथ ताली बजती है, उससे महान पातक भी भस्म हो जाते हैं। वैष्णवों के उस समुदाय में मैं भी खड़ा
रहता हूँ। क्षीरसागर में भी जो सुख मुझे नहीं प्राप्त होता, वैकुण्ठ में जो सुख देखने को भी नहीं मिलता वह
सुख मुझे कीर्तन में मिलता है। कीर्तन के वश में मैं डोलता रहता हूँ। प्यारे भक्तों को मैं बहुत चाहता हूँ। भक्तों
की भक्ति के कौशल से मैं भी कीर्तन के ताल पर आनन्द से नाचता रहता हूँ। इस प्रकार के कीर्तन में अनेक
पाप-प्रायश्चित्त विलीन हो गये, यमदूतों का मार्ग अवरुद्ध हो गया और पापों का तो उन्मूलन ही हो गया।
नामस्मरण की चाह से करोड़ों मंत्र बीज लज्जित हो उठे और तपादिक साधन तो हरिनाम से पागल हो गये।
हरिनाम का जयघोष सुनते ही योगयाग मुँह छिपाने लगते हैं। उस हरिनाम के भय से विषयसुखों का तो
पलायन ही हो गया और अधर्म अपने स्थान पर ही जम से गये। हरिनाम का, गर्जन सुनकर समस्त दोषों का
दिगंत में पलायन हो गया और तीर्थों का गर्व भी चूर-चूर हो गया। ऐसा यह कीर्तन कौशल हरि को अत्यन्त
प्रिय लगता है। मेरे प्रेम में मदमस्त होकर जो रात-दिन कीर्तन करते रहते हैं वे मन से तथा वाणी से अनेक
प्रकोर के कार्य करते हुए भी मेरे सिवा और कुछ नहीं जानते।

ग्यारहवाँ अध्याय २९७
मदर्थे धर्मकामार्थान्नाचरन् मदपाश्रयः।
लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४॥
मेरे जो उत्तम भक्त हैं उनका धर्म, अर्थ और काम मैं ही हूँ। उनका मनोधर्म मेरे अतिरिक्त और कोई कार्य
करना ही नहीं जानता। मेरा भजन यही उनका उत्तम कर्म है मुझे जो धर्म अर्पण होता है वही उनका पवित्र धर्म है
मेरी चाह करना यही उनकी शुद्ध इच्छा है और उस इच्छा का विश्राम भी मुझमें ही है। वे अनेक प्रकार का धन
खर्च कर परमार्थ का ही संग्रह करके रखते हैं। अशाश्वत रूप सम्पत्ति का संग्रह मेरे भक्तगण नहीं करते। धन में ही
जिसका चित्त लगा रहता है वे अभक्त हैं, इसे याद रखो। वे जो भी भजन आदि करते हैं वह किसी नट द्वारा पैसों
के लिये किये नाटक की तरह है। मन और वाणी से किये गये जो कर्म मुझे अर्पण नहीं होते वह सब ढोंग रहता
है। वह केवल पेट भरने के लिये होता है। वह भक्ति के विरुद्ध होता है। उस विरुद्ध धर्म का लक्षण भी बताऊँगा।
मेरे भजन को कम कर जो पैसा कमाने निकलता है उस भक्त का यह लक्षण प्रमुखता से भजन के विरुद्ध है। पास
का धन खर्च करना नहीं जानता और मेरा सूखा ही भजन करता है, इस प्रकार जिसने मुझे ठगा है यह कार्य
मुख्यतः विरोधी लक्षण है। इसी को 'अर्थविरुद्धता' कहते हैं। अब जो भक्त दुष्ट वासना से कर्म करता है, और मैं
भगवान का भजन कर रहा हूँ इसलिये मुझे कोई दोष नहीं लगेगा इस भावना में जो दुष्ट वासनाओं में ही लिपटा
रहता है उसका वह आचरण भजन के विरुद्ध लक्षण है। वह भजन भक्तों को अभक्त अवश्य बना देते हैं। मुझे
अर्पण न कर जो भी श्राद्ध करता है उसकी कल्पना भी श्राद्ध के विरुद्ध है। श्राद्ध का जो संकल्प है वह मुझे अर्पण
करने से ही विरुद्ध नहीं होता ऐसा वेद भी कहते हैं। 'पितरस्वरूपी जनार्दन' यह श्राद्ध का प्रमुख संकल्प है और
ऐसा होते हुए मुझे नैवेद्य भी अर्पण नहीं करते। अन्न भी ब्रह्म है और मैं भी ब्रह्म हूँ और यही श्राद्ध का गूढ़ रहस्य
है। लेकिन इस शुद्ध कर्म को न समझ वे व्यर्थ ही भ्रम बढ़ाते हैं। सारे जगत को उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त
पितरों का मुख्य पिता भी मैं हूँ, ऐसे मुझको कर्म अर्पण न कर श्राद्ध करना सभी दृष्टियों से विरुद्ध है। मुझे अर्पण
किये बिना जो भी कुछ किया जाता है, वह सब अभक्त के ही रूप में होता है। ऐसे विरुद्ध धर्म का जो आचरण
करता है उसे अत्यन्त भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उत्तम भक्तों का लक्षण यही है कि वे संकल्प के बिना ही मुझे
अन्नपानादि अर्पण करते हैं और उसका रहस्य जानते हैं। जो मेरे प्रति ध्रुव की तरह अटल भजनशील रहते हैं उन्हें
मेरी स्थिर और अटल भक्ति प्राप्त होती है। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इन तीनों को जो प्राप्त नहीं होता, उद्धव !
वह मेरी चौथी भक्ति है जो उन्हें उनके मेरे प्रति प्रेम के कारण प्राप्त होती है। आर्त अपनी पीड़ा दूर करने के लिये
मुझे भजता है, जिज्ञासु ज्ञानप्राप्ति के लिये मेरा भजन करता है और तीसरा जो अर्थार्थी है वह मेरा भजन कर पर्याप्त
धन पाने की कामना करता है। लेकिन इनके सिवा चौथा एक ज्ञानी होता है जिसके मन में इन कल्पनाओं का
अंशमात्र भी नहीं होता इसलिये चौथी भक्ति उसके पास घर समझ कर रहती है। जिसे भक्ति में चारों ओर मैं ही मैं
दिखायी पड़ता हूँ उसकी वैसी स्थिति मेरे भजन के ही कारण होती है। बिना संकल्प किये सब कुछ मुझे अर्पण
होता है यह चौथी भक्ति का लक्षण है। उस भक्ति में मेरा भजन अतर्क्य है। उसमें जो भी कर्म किया जाता है वही
मेरी पूजा होती है, वहाँ जो बातें होती हैं वही मेरा जप है, वहाँ जो भी दिखायी देता है वह अधोक्षजा का ही दर्शन
होता है। वहाँ चलना वही मेरी यात्रा है, वह जो भक्षण करता है वही यज्ञ में मुझे अर्पित की हुई आहुति होती है।
उसकी निद्रा ही मेरी समाधि होती है। इस प्रकार वह मुझमें ही भजन करता रहता है। इस प्रकार उसके सारे कर्म
सहज रूप में अनायास ही मुझे प्राप्त होते हैं। उद्धव ! यह सनातन चौथी भक्ति उसे पूरी तरह प्राप्त होती है। उद्धव !
अब शायद तुम्हारे मन में यह विचार आये कि यह पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी भक्ति मूल रूप में चली आ

२९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रही है यह बात काल्पनिक है। तो मेरी जो सहज प्रकाशस्थिति है उसी को 'भागवति शक्ति' कहा गया है। वेदांत में
इसी को 'संविति' कहते हैं और शैवों के अनुसार इसी का नाम 'शक्ति' है। बौद्ध इसे 'जिनेश', 'नेमिनाथ' कहते
हैं, जोगी 'आदिनाथ' कहते हैं, कोई 'भैरव', कोई 'खंडेराव', कोई 'गाणपत्य' कहते हैं तो कोई इसे 'अव्यक्त' भी
कहते हैं। कोई कहते हैं कि यह 'आदिमाता' है। सौर कहते हैं कि यही 'सविता' है। उपासना के भेदों की तरह
इसके नामों में भी अनेक भेद हैं। तो यह जो प्रकाश की स्थिति है उसी को 'भक्ति' कहते हैं। उसी के प्रकाश से
त्रिभुवन में उत्पत्ति, स्थिति और लय का भास होता है। मेरी जो अनेक अवतार मालिकायें हैं, वे इसी प्रकार से
उज्ज्वल रीति से प्रकाशित हैं। देवी, देवतागण सब इसी प्रकार से प्रकाशित दिखाई देते हैं। मेरे अवतारों की
उत्पत्ति भी उसी प्रकाश से होती है और मेरे अनेक चरित्र उसी प्रकाश में प्रवेश करते हैं। इस प्रकाश की जो प्राप्ति
है वही मेरी सनातन भक्ति है यह जान लो। उद्धव ! मैंने उसे यथार्थ रूप में समझाया। निश्चल भक्ति सनातन है यह
मूल श्लोक में है। इसीलिये मैंने सनातन भक्ति का सविस्तार वर्णन किया। मूल श्लोक के पद तथा पद का अर्थ
छोड़कर व्यर्थ की बात नहीं की। अब श्रोतागण सावधान रहें क्योंकि आगे की कथा अत्यन्त रमणीय है। लेकिन हे
उद्धव ! मेरी यह भक्ति कैसे प्राप्त होगी यह पूछोगे तो उत्तर यही है कि भक्तिभाव से सत्संगति करने से मेरी भक्ति
प्राप्त होती है।
सत्सङ्गलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।
स वै मे दर्शितं सद्भिरञ्जसा विन्दते पदम् ॥ २५॥
मुख्य रूप से संतों की सेवा यही साधन भगवान को भाता है। वह जब साध्य होता है तो संतवचन की ही
तरह वह आत्मभाव और आत्मभक्ति प्रदान करता रहता है। जिसे सत्संगति के मेले में रहना अच्छा लगता है, जो
साधुवचनों का भूखा रहता है, साधु के मुख से निकले शब्द को अमान्य करना जो नहीं जानता, वही आत्मभक्ति
का भाग्यवान पुरुष है। साधुवचनों पर उसकी अपार श्रद्धा है यह देख कर ही सद्गुरु उस पर कृपा करता है।
साधु चराचर में श्रेष्ठ गुरु है। सचमुच गुरु के अलावा संसार से तारने वाला कोई अन्य नहीं है। गुरुवचन से भक्तों
को आत्मभक्ति देने वाला सर्वथा मैं ही हूँ। संसार में जो सद्गुरु है उसकी आज्ञा मैं माथे से लगाता हूँ। वह जिस
पर कृपा करता है उसका मैं तत्काल उद्धार करता हूँ। उस सद्गुरु में मेरा स्वरूप है यह जानकर जो भजन करता
है उसे मैं कितना लाड़ करता हूँ यह कहना मेरे लिये भी कठिन है। उसका इहलोक और परलोक दोनों चलाने
वाला मैं ही हूँ। उसके कारण मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है और उसके आनन्द से मेरे आनन्द को भी उफान
आता है। उसके गुरु ने उसे जो मार्ग दिखाया है उस पर चलने में उसे जरा भी प्रयास या परिश्रम नहीं करना
पड़ता। अगर कोई संकट सामने आता है तो मैं श्रीकृष्ण दौड़कर सशरीर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ। उसे जो
पद प्राप्त करना है वह पद ही मैं उसके पास ले आता हूँ। संतों की सेवा के प्रति कितना प्रेम है इसे श्रीकृष्ण बता
रहे हैं। ऐसा भाषण सुनकर उद्धव भाव विह्वल हो गये और मन ही मन विचार करने लगे कि ऐसा साधु पुरुष
कौन होगा? उसके स्वरूप के बारे में क्यों न पूछा जाय? उस भक्ति का लक्षण भी क्या होगा? भजन की वह
पहचान कौन-सी है? इसे सविस्तार जानने के लिये उद्धव ने प्रश्न किया।
उद्धव उवाच
साधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो।
भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भििरादृता ॥ २६॥

ग्यारहवाँ अध्याय २९९
ज्ञानी और वक्ता अनेक हैं, पर वे रजतमगुणयुक्त हैं। वे अपने-अपने गुणों के अनुसार निरूपण करते हैं
: इसलिये उन्हें पूछना मन को स्वीकार नहीं होता और अति सात्विक पुरुष सत्वगुण से ही व्याप्त रहता है इसलिये
वह जब बोलने लगता है तो उसका वाक् प्रवाह गलत दिशां की ओर होने लगता है। इससे शुद्ध आत्मज्ञान नहीं
हो पाता। लेकिन हे कृष्णनाथ ! तुम वैसे नहीं हो। सच्चे गुण तुम्हारे ही पास हैं। तुम केवल लीला से देह धारण
करते हो और आत्मज्ञान देने वाले एक तुम ही हो। इसीलिये तुम्हें त्रिभुवन में 'उत्तमश्लोक' (जिसकी कीर्ति
पवित्र है) कहते हैं। इसलिये तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई हमें स्वीकार नहीं है। हे कृष्णनाथ मेरे प्रश्न का उत्तर
देने वाले एक तुम ही हो। तो तुम्हें जो सर्वथा मान्य हो ऐसा साधु कौन है? जो जो साधु पुरुष तुम्हें मान्य है
उनके लक्षण बताओ। कौन-सी भक्ति तुम्हें प्रिय है? उसके भी लक्षण बताओ। जो तुम्हें प्राप्त करा दे, अत्युत्तम,
श्रेष्ठों में श्रेष्ठ तथा संतों ने आदरपूर्वक जिसे स्वीकार किया हो ऐसी श्रेष्ठ भक्ति कौन-सी है? तुम कहोगे, संतों
ने किस भक्ति को आदर से स्वीकार किया है इसे संतों से ही पूछो, तो मेरा सारा विश्वास तुम्हारे भाषण पर है।
इसलिये दूसरे से पूछना मुझे स्वीकार्य नहीं है। जो लोग अलग-अलग देवताओं का भजन करते हैं, वे अपने ही
देवता की भक्ति को उत्तम कहते हैं। लेकिन हे श्रीकृष्ण! आपको जो मान्य हो वही मुझे बतायें। कुल, शील और
भाषण जिनका समान होता है उस पुरुष को ही साधु कहते हैं। लेकिन तुम अपने मुख से जिसे शुद्ध कहोगे वही
मेरे लिए वन्दनीय है। अगले श्लोक में उद्धव ने शार्ङ्गधर श्रीकृष्ण की तीन सम्बोधनों से प्रार्थना की है। उन तीन
सम्बोधनों में नियोजित तीन विशेषणों से उसने अपने विचार श्रीकृष्ण को समर्पित किये और मैं श्रवण करने का
अधिकारी हूँ यह भी बताया।
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।
प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् ॥ २७॥
पुरुषों में उत्तम पुरुष तुम हो, सारे कर्मों का तथा धर्मों का विचार करने वाले तुम हो इसीलिये हे सर्वसाक्षी
गोविन्द ! तुम्हें 'पुरुषाध्यक्ष' कहते हैं। जैसा कर्म रहता है उसी के अनुसार उसका फल देने वाले तुम हो इसीलिये
तुम्हारा वर्णन लोकाध्यक्ष के रूप में होता है। उसी प्रकार ब्रह्मादिकों के नियंता और संसार का प्रतिपालन करने
वाले तुम ही हो। हे श्रीकृष्ण! "यदि संसार का पालन करने वाला मैं ही हूँ, और उस संसार में तुम भी हो तो
तुम्हें ही मैं ज्ञानकथा सुनाऊँ ऐसी कौन सी विशेषता तुझमें है?" ऐसा तुम कहोगे। लेकिन तुम्हारे यह कहने पर
भी तुम सर्वज्ञ और सर्वेश्वर हो, तुम अन्तरात्मा तथा सबका नियमन करने वाले ईश्वर हो इसलिये यदि तुम्हें मेरा
अधिकार ठीक लगता हो तो मुझे ज्ञान का निर्धार बताओ। मुझे अधिकार न भी हो तो भी मैं तुम्हारी शरण/में
आया हूँ। तुम्हारे यहाँ तो शरणागत की उपेक्षा कभी नहीं होती। विषयवासना में दारुण दुःख है यह जानकर ही
तुम्हारे चरणों में आया हूँ। अत्यन्त दीन होने के कारण मैं तुम्हारा भिखारी हो गया हूँ। इसलिये मुझ पर अवश्य
कृपा करो। मेरी वासनाएँ असीम हो गयी हैं उनका निस्तारण करना मेरे बस में नहीं है। हे कृष्ण! उनका तुम
निवारण करो। इसलिये मैं तुम्हारे चरणों में आया हूँ। मैं तुम्हारा लाडला भक्त हूँ यह कहने में भी अहंकार मालूम
होता है। लेकिन हे अनन्त ! तुम सर्वज्ञ हो और दीनों के प्रति कृपालु हो। हे श्रीकृष्ण! मैं ही एक श्रवण का
अधिकारी हूँ यह भी मैं नहीं कह सकता। इसलिये हे कृपानिधे ! मुझ पर कृपा करें। यह कहकर उसने उनके पैर
पकड़ लिये। "हम दोनों एक ही कुल में पैदा हुए नैसर्गिक मित्र हैं इसलिये मेरा पैर पकड़ना ठीक नहीं है।"
ऐसा यदि तुम कहोगे तो हे गोविन्द ! यह कहने का मर्म भी मैंने जान लिया है।

३०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वं ब्रह्म परं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।
अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥
तुम निर्गुण और सर्वत्र समान हो, तुम चित्स्वरूप और चिदाकाश हो, पुरुषों में उत्तम तथा वन्दनीय ऐसे
एक तुम ही हो। प्रकृति-पुरुषों से भी महान जो परब्रह्म है वह तुम हो। वेदशास्त्र तुम्हारी थाह नहीं लगा पाते।
तुम इन्द्रियों के लिये अगोचर हो। अब हमारे भाग्य का स्वरूप देखो। तुम्हें हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख रहे
हैं। मुकुट, कुण्डल तथा वनमाला धारण की हुई तुम्हारी मेघ श्यामल मूर्ति कैसे शोभायमान हो रही है। तुम्हारे ये
सुन्दर कमलनेत्र, पीताम्बर धारण किया हुआ तुम्हारा ऐसा स्वरूप देखकर तन-मन बिलकुल तृप्त हो जाता है।
तुम सारे जगत का ही जीवन हो। तुम्हारा दर्शन अत्यन्त मधुर है। उस दर्शन से संसार की इच्छा पूर्ण हो जाती है।
लेकिन ऐसे उस देह की भी तुम्हें इच्छा नहीं है। भगवन! तुम इतने निरिच्छ हो। फिर भी भक्तों पर कृपा करने
की प्रबल इच्छा से तुम अनेक अवतार धारण करते हो। भक्तों की ही इच्छा के लिये तुम अपनी लीला से देह का
नाटक दिखाते हो। हे कृष्णनाथ! सचमुच, भक्तों पर कृपा करने के लिये ही तुमने अवतार लिया है, इसलिये मेरे
प्रार्थना किये बिना ही तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर देना स्वीकार किया है। जिस प्रकार बछड़े की हुंकार सुनते ही
गाय के स्तनों से दूध बहने लगता है उसी प्रकार देखो, उद्धव के प्रश्न से भगवान भी आत्मज्ञान से सराबोर हो
गये। सुबह शाम गृहस्वामी को दूध मिलता है वह बछड़े के कारण ही। वत्स को देखते ही जिस प्रकार गाय को
दूध उतर आता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण उद्धव के वश हो गये। उद्धव श्रीकृष्ण के प्रेम के कारण ही अच्छा लगता
था इसलिये उद्धव के प्रश्न उसे अत्यन्त प्रिय लगते थे। श्रीकृष्ण का साथ मिलने के कारण उद्धव का भाग्य
कितना महान है। उद्धव जो भी प्रश्न पूछते, उसे सादर स्वीकार करने के लिये श्रीकृष्ण अंजुली आगे बढ़ाकर
तैयार रहते थे। श्रीकृष्ण उसकी भक्ति पर इतने मुग्ध हो गये थे कि वे उसे चाटने के लिये उद्यत थे। जिसके पंख
भी अभी नहीं निकले हैं ऐसे बच्चों को चिड़िया जिस प्रकार अपनी चोंच से चारा चुगाती है, उसी प्रकार
आत्मज्ञान की गूढ़ बात श्रीकृष्ण उद्धव के हृदय में उड़ेलने लगे। अब श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में उद्धव के प्रश्नों
का उत्तर देंगे और उनमें साधुओं के अत्यन्त पवित्र लक्षण बतायेंगे। साधुओं के लक्षण अपार हैं लेकिन श्रीकृष्ण
उनमें से तीस लक्षण चुनकर उद्धव को बतला रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ २९ ॥
कृपा का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है। वह जिसके प्रति उत्पन्न होती है वही साधु है। कृपा संतों की ही देह
में रहती है। इसी कारण उसे सारे संसार में मान्यता प्राप्त हुई है। कृपा को उनके ही कारण महत्त्व प्राप्त हुआ,
उनकी ही कृपा पर दया जीवित रही, उन्होंने ही कठोरता का काँटा दूर किया और उन्होंने ही निष्ठुरता का
समूल उखाड़ फेंका। साधु की कृपा समस्त प्राणिमात्र पर एक सी रहती है। यहाँ कुछ तथा वहाँ कुछ इस
प्रकार का भेदभाव वहाँ नहीं होता। उनके हृदय में अवकृपा नहीं रहती। दयालु मनुष्य का हृदय बड़ा विचित्र
रहता है। वह प्राणिमात्र का जीवन अपने जीवन में समाहृत कर लेता है और उनका दुःख हरण कर सुख देता
है। इस प्रकार उसकी कृपा अद्भुत रहती है। जिसके कारण उसे दुःख होता है उसे वह दूसरों को कदापि नहीं
देता और जिसके कारण उसे सुख मिलता है उसे वह प्राणिमात्र को अवश्य देता है। इसी का नाम है कृपा। यह

ग्यारहवाँ अध्याय ३०१
संतों का प्रथम लक्षण है। दूसरा लक्षण है अद्रोहता। उसके बारे में भी बताता हूँ। अद्रोहता लोगों के बीच भटक
रही थी, उसे रहने के लिये स्थान नहीं मिल पा रहा था। तब वह साधु संतों की शरण में आयी। वहाँ उसे रहने
के लिये पर्याप्त स्थान मिला। साधु शरणागत पर दया करते हैं इसलिये उन्होंने अद्रोहता का प्रतिपालन किया।
वे प्राणिमात्र में भगवान का ही दर्शन करते हैं अतः उनमें द्रोह का नामोनिशान भी नहीं रह जाता। उनमें
व्याघ्रसर्प आदि के प्रति भी द्वेष उत्पन्न नहीं होता। वे उन्हें उपद्रव दें तो भी साधु उनका द्वेष नहीं करते। देह पर
कोई विपदा आ जाय तो उससे प्रारब्ध कर्म का ही नाश होता है इसलिये साधु उस आपत्ति के प्रति मन में द्वेष
नहीं आने देता और आत्मज्ञान के कारण क्रोध का स्पर्श भी नहीं करता। इसी को अद्रोहता कहते हैं। यह दूसरा
लक्षण है। अब तितिक्षा के सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो। इसका अर्थ है साधुओं के मन में होने वाली
सहनशीलता। शान्ति परदेसी हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती वह उसे लौटा देता था। तब वह अत्यन्त
दीन होकर संतों के घर आयी। संतों ने अत्यन्त प्रेम से उसका प्रतिपालन किया इससे वह भगवान की भी
लाडली हो गयी और उन्होंने सारा वैभव उसके सुपुर्द किया। वह सारा वैभव लेकर शान्ति संतों के ही पास ही
निरन्तर रहती है। इसीलिये उनमें दिन रात शान्ति दिखाई देती है। समस्त प्राणिमात्र भी यदि उन्हें त्रस्त करें तो
भी वे किसी को 'भला' या 'बुरा' नहीं कहते। वह आत्मशान्ति के आधार पर नाचता रहता है। वह उत्तम संत
है। ऐसी जो सहनशीलता होती है उसी का नाम 'तितिक्षा' है यह ध्यान रखो। यह संतों का तीसरा लक्षण है।
अब सत्य की सत्यता सुनो। सत्य इस जग में अल्पायु ही होता है, वह यहीं जन्म लेता है और यहीं मर जाता
है। उसका कहीं विकास नहीं होता था इसलिये वह संतों के पास आया। सत्य और संत की भेंट होते ही दोनों
का सत्यस्वरूप में विलय हो गया, सत्य संतरूप हो गया और सृष्टि में चिरंजीव हो गया। इस प्रकार सत्य संतों
की कृपादृष्टि से ही सत्यत्त्व से पुष्ट हो गया। वह संतों के बल से ही संसार में सर्वत्र फैल गया। इसीलिये
सत्य के योग से परब्रह्म से भेंट होती है। संतों के इस उपकार से उपकृत होने के लिये सत्य उनके चरणों पर
गिर पड़ा इसलिये सत्य को संतों के चरणों के सिवा कोई ठौर नहीं है। इस प्रकार जो सत्य का आधारस्वरूप
रहते हैं, जिनके पंखों के नीचे सत्य जीवित रहता है, जिनके बल से सत्य समर्थ होता है, जिनकी दृष्टि सत्य से
तृप्त होती है और जिनका व्यवहार सत्य भाषण से ही होता है, यही श्रेष्ठ की महानता है। वही संतों का घर
है। ऐसे ही संतों का मैं सम्मान करता हूँ। मैं निरन्तर उनके ही पास रहता हूँ। जिन्होंने असत्य आचरण न करने
का निश्चय किया रहता है, जिनके पास सत्य सप्रमाण उपस्थित रहता है, जो निरन्तर सत्य से सम्पन्न रहते हैं
उनका आचरण साधु का प्रमुख लक्षण है। इसी का नाम है 'सत्यसार'। यही संतों का सच्चा लक्षण है। यह
संतों का चौथा प्रमुख लक्षण है। अब शुद्ध और अपार गुण बताता हूँ, सुनो। जिसने निन्दा, मत्सर आदि सारे
दोषों को आत्मज्ञान से धो दिया और अनिंदित आत्मज्ञान से चित्त को अत्यन्त पवित्र कर लिया, जिसने गुरु
आज्ञारूप तीर्थ में स्नान किया और जिसके कारण सर्वांग रूप से शान्ति प्राप्त की, उसी प्रकार जो त्रिविध तापों
से मुक्त हो गया और मत्स्वरूप से पवित्र हो गया उसकी पवित्रता का क्या वर्णन किया जाय ? स्वयं तीर्थ भी
उसके चरणों के तीर्थ की इच्छा करते हैं। मैं स्वयं भी उसके पदरज की आकांक्षा करता हूँ फिर दूसरों की क्या
कथा कही जाय ? श्रीकृष्ण ने कहा, "हे उद्धव ! यह 'अनवद्य' नाम का पाँचवाँ गुण है। अब सबको समान
दृष्टि से देखने के छठवें गुण के बारे में सुनो। आत्मस्वरूप के कारण साधु को सर्व समता प्राप्त रहती है
इसलिये वह प्राणिमात्र को समान दृष्टि से ही देखता है। समुद्र में नमक का ढोंका डालने से जिस प्रकार वह
उसमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार उस साधु के अंतर में विषमता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। अनेक

३०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार के सुवर्ण के अलंकार खरीदने पर यदि उन्हें बाद में तोड़ा न जाय तो वे स्वाभाविक रूप से सुवर्ण ही
बने रहते हैं उसी प्रकार विविध प्रकार के आकार और नाम के कारण संसार विषम दिखायी देता है किन्तु साधु
चित्तस्वरूप होने के कारण जग को समान स्वरूप में देखता है। आत्मज्ञान के कारण वह विषमता को नहीं
देखता। ऐसी समसमान स्थिति में, दैवयोग से सुख-दुःख प्राप्त होते हुएं भी वह साम्यावस्था तद्रूपता के
स्वाभाविक ऐक्यभाव के कारण द्वंद्वभाव से मुक्त रहती है। दाहिनी ओर से आ मिली महानदी तथा बायीं ओर से
मिले गाँव के नाले को गंगा नदी उनके सारे गुणदोष त्याग कर अपने में एकरूप कर लेती है। फिर वहाँ यह
पवित्र है और वह अपवित्र है यह कहना बिलकुल ही सम्भव नहीं है। मधुरता तथा कटुता के भेद को गंगा
अपने स्वरूप से समरूपता प्रदान करती है। उसी प्रकार समदृष्टि होने के कारण साधु को सुख-दुःख की
भावना एक ही जैसी होती है। सदा आत्मज्ञान से परिपूर्ण रहना यही संतों का महान लक्षण है। बहुरूपिया एक
होते हुए भी गाय, बाघ के अलग-अलग रूप लेता है लेकिन उस स्वांग में एक बार बहुरूपिये को पहचान लेने
पर स्वांग का भ्रम दूर हो जाता है। उसी प्रकार भय अथवा अभय यह भाषा केवल द्वैत की भावना के कारण
होती है। साधु द्वैत की दृष्टि से एकरूपता से परिपूर्ण होने के कारण भय और निर्भय का भेद नहीं जानता। द्वंद्व
के समय समत्व से परिपूर्ण रहना यह साधु का छठवाँ लक्षण है। अब 'परोपकार' उसका सातवाँ लक्षण है।
वृक्ष अपने पत्ते, फूल, छाया, फल, छाल, लकड़ी, जड़ आदि से लोगों के लिये फलदायी होता है और सभी पर
सदा उपकार करता रहता है। जो वृक्ष का पालन-पोषण करता है अथवा उसे तोड़ने के लिये उसकी जड़ पर
जो प्रहार करता है उन दोनों को वह पुष्प, फल आदि से समान रूप से संतुष्ट करता है। वृक्ष फलों से लदा
रहता है लेकिन उनमें से एक भी फल वृक्ष चख कर नहीं देखता। उसी प्रकार जो कर्मफल का स्पर्श नहीं
करता वह अनायास ही परब्रह्मस्वरूप हो जाता है। उसी प्रकार साधु की काया, वाचा तथा मन से उपकार करने
के लिये ही होती है, अपना पराया का भेद वह जानता ही नहीं। सब पर उपकार करना ही वह जानता है। उसी
प्रकार जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश में उदित होकर सारे संसार का अन्धकार दूर करता है, विश्व का ताप दूर
करता है और अपने किरणों से सबको शान्त कर देता है। उससे निकलने वाला अमृत केवल चकोर ही प्राशन
करे अन्य कोई न करें ऐसा भेद चन्द्रमा नहीं करता। जो भी जिस भावना से भजन करता है, उसी प्रकार उसे
सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार साधु के प्रति जो जैसी श्रद्धा रखता है, उसे वैसा ही सुख प्राप्त होता है। इस
प्रकार साधु सब पर उपकार करता है। कौए चन्द्रमा का धिःकार करते हैं और चकोर चन्द्रामृत प्राशन करते हैं।
उसी प्रकार दुष्ट साधुओं का धिःकार करते हैं और भक्तिवान साधु समागम से आत्मलाभ प्राप्त करते हैं। सातवें
गुण का विस्तार बताते समय परोपकार का वर्णन किया। अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण साधु के लक्षणों में से
ग्यारह और गुणों का लक्षण बता रहे हैं।
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः ।
अनीहो मितभुक्शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ ३० ॥
शय्या पर उर्वशी भी आ जाय लेकिन फिर भी वह काम से क्षुब्ध नहीं होता, दिन रात स्वानंद में रमण
करते रहने के कारण वह विषयवासना को प्रायः भूल जाता है। भिखारी जब पालकी में बैठता है तो उसे पहले
के वाहनों का जिस प्रकार विस्मरण होता है उसी प्रकार यह भी आत्मानंद से तृप्त होने के कारण विषयवासना
उसे तुच्छ मालूम होती है और उसे उसका विस्मरण होता है। कोई वस्तु प्राप्त करने में असम्भव हो तो उसकी

ग्यारहवाँ अध्याय ३०३

इच्छा की जाती है। लेकिन साधु को कोई वस्तु प्राप्त न हो सके यह सम्भव ही नहीं है। वह प्राप्त होने की
स्थिति में ही आनन्दपूर्वक आत्मानंद में सुखी रहता है। सूर्य जब जुगनूँ से मिलने जाता है तो वह जुगनू को देख
नहीं सकता और जुगनू भी सूर्य से भेंट नहीं कर पाता उसी प्रकार साधुओं की भी दुर्लभता से भेंट नहीं हो पाती।
इस प्रकार दोनों ओर से देखने पर उसकी विषयवासना पूरी तरह नष्ट हो जाती है। साधु की यही निरिच्छता
उसका आठवाँ गुण है। सावधानी से मन पर नियंत्रण करने से वही नियंत्रण बाह्य इन्द्रियों में अपने आप हो जाता
है। जिस प्रकार बेटी को सिखलाते समय बहू थर-थर काँपने लगती है, मुख्य सेनापति हाथ में आते ही बाकी
सेना बिना युद्ध किये ही पराजित हो जाती है या वृक्ष की जड़ काटने से टहनियाँ अपने आप मर जाती है उसी
प्रकार जो मनोवृत्ति का नियमन है वही बाह्येन्द्रियों का नियमन होता है। ऐसी स्थिति में जो कर्म होता है वह
निःसन्देह निष्काम होता है। जब मन आत्मस्वरूप में लग जाता है और बाह्येन्द्रिय मेरी भक्ति में लीन हो जाते हैं
उस समय जो भी कर्म होते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप होते हैं। अथवा बाह्येन्द्रियों का संयमन करने से मनोमय कर्म में
भी परब्रह्म प्रकट होता है। बाह्येन्द्रियों का यह नियमन आत्मा में रमण करने वाले पुरुष ही जानते हैं। इस प्रकार
बाह्येन्द्रियों का नियमन करने का गुण यही साधु की निग्रहशक्ति है। यही वास्तव में नववाँ गुण है। अब दसवाँ
गुण सुनिये। आकाश सभी को आवृत्त करता है लेकिन वह किसी को कठोर नहीं मालूम होता। उसी प्रकार साधु
भी सर्वांग से सभी को मृदु लगता है। जिस प्रकार धुनी हुई रुई के गोले से किसी का सिर नहीं फूटता उसी
प्रकार साधु का अंतःकरण सभी को अत्यन्त कोमल लगता है। जरा देखो, जिस प्रकार गंगा का जल गाय और
बाघ दोनों को समान रूप से शान्त करता है, उसी प्रकार साधु भी सबके प्रति मृदु और मधुर रहता है। इसी को
साधु की अत्यन्त मृदुलता कहा गया है, इसे ध्यान में रखो। यह दसवें गुण की योग्यता है। अब ग्यारहवाँ लक्षण
सुनो। साधु को जो पवित्रता प्राप्त होती है वह वास्तव में भगवद्भजन के कारण ही। व्रत, तप, ज्ञान, तीर्थ आदि
को जो पवित्रता प्राप्त हुई है वह उन्हें साधुओं से प्राप्त हुई है। परस्त्री और पराया धन इन्हें जिसका मन स्पर्श
नहीं करता उन्हीं के चरणस्पर्श की इच्छा गंगादिकतीर्थ करते हैं। मेरी स्त्री, मेरा धन आदि के लोभ का अर्थ ही है
अधोगति की ओर जाना। अतः स्त्री को धन की इच्छा न करना ही साधुओं की पवित्रता है। ऐसी पवित्रता होते
हुए भी वह व्रत, तप, तीर्थ आदि की निन्दा नहीं करता। उन व्रतादिकों का विधिपूर्वक आचरण करते समय
अत्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सा सदाचरण करता है। मगर के पाश में आने वाला पुरुष जिस प्रकार प्राणसंकट आने
पर भी उस पाश से नहीं छूटता उसी प्रकार वह जीवब्रह्म को गले लगाता है। उस ब्रह्म को आगे करके ही वह
गृहस्थ धर्म का उत्तम रीति से पालन करता है और उस कर्म में उसे साक्षात ब्रह्म का ही अनुभव होता है। लोगों
के अनुसार वह कर्म करता रहता है लेकिन वास्तव में वह ब्रह्मस्वरूप में ही विचरण करता रहता है। इसे वही
जानता है। इसका अनुभव दूसरों को नहीं होता। कुम्हार मटकी तैयार हो जाने पर उसे चाक पर से उतार लेता है
किन्तु चाक पहले की ही गति से घूमता रहता है। उसी प्रकार साधु पूर्व संस्कार के अनुसार कर्म करता रहता है
लेकिन उसकी प्रवृत्ति शून्य रहती है। साधु का यह बहुत महान लक्षण है। यह सुनने में आसान है किन्तु आचरण
करने के लिये कठिन है। यह ग्यारहवाँ लक्षण अत्यन्त पवित्र है। अब बारहवाँ विचित्र लक्षण सुनो। किसी भी
वस्तु का संग्रह करने अथवा उसे स्वीकार करने का विचार मन को स्पर्श ही नहीं करता ऐसी वृत्ति साधु की
'अपरिग्रहता' है। देह की अथवा घरबार की भी संगति न करना इसी का नाम है 'अकिंचनता'। स्फटिक को
काजल पर रखा जाय तो वह काला दिखायी देता है, लाल रंग पर रखो तो उत्तम लाल रंग का दिखाई देता है,
नीले रंग पर रखो तो नीले रंग का ही लगता है, लेकिन उसका शुद्ध स्वरूप निराला ही होता है। उसी स्फटिक

३०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को यदि अड़हुल के फूल पर रखें तो वह लाल रंग का हो जाता है लेकिन वह फूल से बिलकुल अलिप्त रहता
है। वह उस फूल के रंग में रंग नहीं जाता। उसी प्रकार साधु वस्तुओं का संग्रह करने वालों के बीच रहता है,
ऐसा भी आभास होता है कि वह संग्रहकर्ता है, किन्तु जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति किसी अवस्था में भी वह संग्रही
भाव का स्पर्श नहीं करता। पारस जिन धातुओं को स्पर्श करता है उन धातुओं को वास्तव में सुवर्ण बना देता है
लेकिन वह सुवर्ण के अलावा दूसरे धातुओं को स्पर्श ही नहीं करता। उसी प्रकार साधु जिस चीज को अपना
कहता है वह उसे दूसरे का मालूम ही नहीं होता। श्रीकृष्ण द्वारा ही अंकित होने के कारण वह ऐक्यभाव का ही
महत्त्व बढ़ाता रहता है। जब चैतन्यस्वरूप में मन लग जाता है, सारा विश्व चैतन्यमय मालूम होता है, परिग्रह का
विस्मरण हो जाता है, ऐसी स्थिति को 'अकिंचनभाव' कहते हैं। गृहस्थी त्याग कर जंगल में गया और वहाँ भी
स्त्री का चिंतन करने लगा उस समय वह त्याग ही बाधक बना और वह पुनः परिग्रह में आ गया। कीट दीवार
पर चढ़ता रहता है लेकिन उसका यह परिश्रम व्यर्थ है क्योंकि वह पहले से भी अधिक नीचे गिर पड़ती है और
दुःख भोगती है लेकिन चींटी की बात वैसी नहीं है। वह कीट को लेकर पेड़ पर चढ़ती है उसी प्रकार सत्संग से
मूर्ख उद्धार कर सकता है लेकिन वे मूर्ख उपाय ही नहीं करते। देखा जाय तो चींटी छोटी और कीट बड़ा होता है
फिर भी चींटी कीट का उद्धार कर सकती है। उसी प्रकार जो अकिंचन पुरुष होते हैं वे भी सबका उद्धार करते
हैं। अस्तु! मूर्ख का त्याग करने का जो ढंग है वह अत्यन्त बाधक और कष्टदायक होता है क्योंकि जब तक
सत्संगति नहीं होती तब तक त्याग की स्थिति समझ में नहीं आती। मूर्ख गृहस्थी को छोड़कर जंगल में जाता है
लेकिन वहाँ भी वह देह के प्रपंच में फँस जाता है। लेकिन देह में रहते हुए भी जो देह को मिथ्या कर देता है
वही सचमुच अकिंचन बनता है। मूर्ख को त्याग भी बाधक होता है और साधु परिग्रह में रहते हुए भी मुक्त रहता
है। अंतर्बाह्य त्याग करके ही शुक और नारद तीनों लोकों में अत्यन्त पवित्र हो गये। लेकिन वे दोनों जनक राजा
के चरणों पर गिर पड़े क्योंकि जनक राज्य करते हुए भी विदेही था। मैं भी उसका सम्मान करता हूँ। देखो, साधु
का माहात्म्य कितना आश्चर्यजनक है। इसी का नाम अकिंचनता है। यह बारहवाँ लक्षण है। अब 'अनीहा' के
बारे में सुनो। अनीहा (अर्थात् निरिच्छता) दीन हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती, वह उसे लौटा देता।
कोई उसे पलभर के लिये भी अपने पास नहीं रहने देता था। इस प्रकार निराश्रित हो जाने के कारण वह
तिलमिला रही थी। तीनों लोक घूमते रहने पर भी उसे बैठने के लिये तिलमात्र की जगह तो नहीं ही मिली उलटे
'ईहा' (इच्छा) वैरन उसके पीछे लग गयी और जहाँ भी वह जाती वहाँ वह उसे मार खिलाती थी। उस अनीहा
को कोई द्वार पर पैर भी धरने नहीं देता था। तब वह बेचारी अत्यन्त दीन दुःखी होकर रोने लगी और अपनी
स्थिति का दुखड़ा रोने संतों के पास पहुँची। स्वभाव से ही दयालु होने के कारण उन्हें उस पर दया हो आयी और
उन्होंने हल्के हाथों से उसकी आँखें पोंछी और अपने हित के लिये उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार वह
संतों के बल पर बढ़ी और पुराना बैर याद कर उस ईहा का (अर्थात् इच्छा का) बदला लेने के लिये संतों से
उसका उपाय पूछ कर वह उसका छल करने के लिये प्रवृत्त हो गयी। अहं और ममता ईहा की सहेलियाँ थीं।
ईहा के साथ अनेक प्रकार के खेल खेलते हुए उसने उसे काम के हवाले किया और वह काम की स्त्री बनी।
काम का अनुमोदन मिलते ही इच्छा अत्यन्त प्रबल हो गयी और वह घर-घर में पहुँच गयी। तब उसका बदला
लेने के लिये निरिच्छा शीघ्रता से चल पड़ी। उसने संतों से असंग होने का शस्त्र माँग लिया और इच्छा पर प्रहार
करने के लिये वह पहले 'अहं' और 'ममता' इन दोनों को मारने के लिए दौड़ पड़ी। वे दोनों भय के कारण वहीं
की वहीं मर गयीं। निरिच्छा ने पीछा करते ही अहं-ममता को वृद्धावस्था प्राप्त हो गयी अर्थात् उनका अन्त हो

ग्यारहवाँ अध्याय ३०५

गया। वह दोनों थर-थर काँपने लगीं और बिना घाव लगे ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया। अनीहा (निरिच्छा) को
देखते ही काम बारहों बार दौड़ पड़ा। संकल्प का आखिरी गुट गिर पड़ा। इस प्रकार काम का रणक्षेत्र में पतन
होते ही क्रोधादि योद्धा भी एक-एक करके गिर पड़े। अन्त में इच्छा का साथ देने वाला कोई नहीं रहा क्योंकि
एक-एक को खोज-खोज कर मार दिया गया। अन्ततोगत्वा निरिच्छा के सामने खड़ा रहने वाला कोई वीर नहीं
बचा, उसने सबको मार कर चकनाचूर कर दिया। उनकी अन्तिम क्रिया करने वाला भी कोई नहीं रहा। काम का
नाश होते ही इच्छा सचमुच ही विधवा हो गयी। वह संतों से मुँह छिपाती भाग गयी। इसलिये जिसने इच्छा से
संगति की उसकी अधोगति समझनी चाहिये और जो निरिच्छा का अंकित हुआ वह गोविन्द का प्रिय हुआ ऐसा
समझना चाहिये। तुम कहोगे, यह 'अनीहा' अर्थात् 'निरिच्छता' कौन है और 'ईहा' का क्या लक्षण है? तो
जिससे उनकी भी पहचान हो सके वह सब बताऊँगा। काम्यकर्मादि के जाल से 'ईहा' (इच्छा) अत्यन्त चपल है
और जो अंतःकरण में अटल रहती है वही 'अनीहा' (निरिच्छता) है। जिससे अंतःकरण में इच्छा का गन्ध भी
उत्पन्न नहीं होता अथवा कर्म की कर्मावस्था उत्पन्न नहीं होती, उद्विग्नता का अणुमात्र भी प्राप्त नहीं होता वही
वास्तव में 'अनीहा' (अर्थात् निरिच्छता) है। ऐसी निरिच्छता जिसे प्राप्त होती है उसकी आज्ञा देवता भी मानते
हैं। वही निरिच्छता रात दिन जिसकी दासी बन कर रहती है वह अनीहा अत्यन्त गौरवपूर्ण साधु का तेरहवाँ
लक्षण बनकर रह रही है। अब चौदहवाँ लक्षण 'मितभोजन'। उसकी महत्ता का श्रवण करो। जो जिह्वा की इच्छा
से बंध नहीं जाता, कभी क्षुधा के पाश में नहीं फँसता और पसंदगी का ख्याल न कर जो भोजन के लिये तैयार
हो जाता है; अन्न की इच्छा प्राप्त करता है, जठराग्नि अन्न का भक्षण करता है और वह स्वयं साक्ष्य के रूप में
उपस्थित है यह जानकर सारे रसों का सेवन करता है, भोजन में जो भी कुछ आता है उसको दोषदृष्टि से दूर
करता है और उसे अत्यन्त पवित्र बना कर आत्मैक्य से उसका सेवन करता है। खाने लायक पदार्थ कौन से हैं
यह जो देखता ही नहीं अथवा मैं एक खाने वाला हूँ इसका जिसे स्मरण ही नहीं होता वह मितभोजी साधु प्रत्येक
कौर श्रीकृष्ण में समरस हुआ है यह मान कर सब कुछ खाकर भी बिन खाये जैसा रहता है। जिस प्रकार अग्नि
आहार को पहले अपने जैसा बनाता है और फिर उसका अंगीकार करता है उसी प्रकार साधु पहले द्वैत का
निवारण कर फिर आहार का स्वीकार करता है। इसी का नाम 'मितभोजन' है और यही साधु के आहार का
लक्षण है। योजना के बिना कम खाना रोगी के पथ्य के समान होता है। हर ग्रास पर जो अन्न ब्रह्मार्पण हो रहा,
उसी का नाम है 'परिमित भोजन' है उद्धव ! यह साधु का चौदहवाँ लक्षण है इसे ध्यान में रखो। मलिन जल का
प्रवाह लेकर अनेक नदियाँ समुद्र में मिलती हैं लेकिन वह तिल भर भी मलिन नहीं होता। वह निर्मल और
निर्विकार ही रहता है। उसी प्रकार नाना उर्मी आने पर भी जिनके मनोधर्म में चल विचल नहीं होती ऐसे संतों
की पराक्रमी शान्ति उनकी आत्मशक्ति को प्रेरित करती रहती है। जिस प्रकार नागबेल की लतर बिना आधार के
वृक्ष पर नहीं चढ़ती, उसी प्रकार संतों के बल के आधार पर ही शान्ति बढ़ती है और चित्स्वरूप के मण्डप पर
फैलती है। दसों दिशाओं को ढाँप कर बादल आकाश में छा जाते हैं लेकिन आकाश उनसे विकृत नहीं होता।
वह उन बादलों को स्पर्श भी नहीं करता। जिस प्रकार ठंडक, धूप और वर्षा की धारायें आकाश को स्पर्श नहीं
करती उसी प्रकार साधु की स्थिरता अनेक द्वंद्वों के होते हुए भी निर्द्वंद्व ही रहती है। उसी प्रकार ऊँच-नीच जैसी
अनेक अवस्थाएँ प्राप्त होने पर भी अथवा मोहममता कितनी भी प्रबल क्यों न हो फिर भी जिसमें क्षोभ उत्पन्न ही
नहीं होता उसी का नाम है, 'आत्मशांति'। संतों के कारण ही शान्ति का महत्त्व है और शान्ति के कारण.ही संत
पावन होते हैं। यह 'परस्पर लक्षण' संतों का पन्द्रहवाँ गुण है। जहाँ 'अहं' का नाम ही नहीं होता, वहीं अपने

३०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

पूर्वजों का मूल निवास होता है। अपना सबसे उत्तम आधार वही है। वहीं जिसका मनोधर्म स्थिर रहता है और
मेरा जन्म ही नहीं हुआ है, मैंने मृत्यु देखी ही नहीं है यह भावना मन में स्थिर हुई रहती है उस स्थिति को
'स्थिरता' कहते हैं। अपने आश्रम को चारों आश्रमों में श्रेष्ठ समझता है तथा अपना मनोधर्म स्थिर कर वर्णाश्रम
चलाता है तथा चारों वर्णों में जिसे पवित्रता प्राप्त हुई है, जिसके कारण ब्राह्मणों को ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ है ऐसे
ब्रह्म के स्थान पर जिसका मन स्थिर हुआ है, उसी स्थिति को 'स्थिरता' कहा जायगा। त्रिभुवन में स्थिरता
बिलकुल मरने जैसी स्थिति में आ गयी थी। उसका हाथ थामने वाला और उसका पालन करने वाला कोई
दिखायी नहीं दे रहा था। उसे कोई द्वार पर खड़ा नहीं करता था फिर पथ्य आदि कौन देता ? सबने उसे लावारिस
की तरह छोड़ दिया था, तब सज्जनों ने उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार स्थिरता संतों के बल पर अच्छी
तरह हृष्ट-पुष्ट हुई, वर्णाश्रमादि झूठे भेद नष्ट कर तथा अकारादि मातृकों का भेद कर एकदम बड़ी हो गयी और
स्वस्वरूप में एकत्व प्राप्त कर स्थिरता वहीं स्थिर हो गयी। तब उसने सहज ही संतों को मार्ग प्रशस्त कर दिया।
तब स्वस्वरूप से ही स्वकर्म करना स्वस्वरूप से ही वर्णाश्रम चलाना तथा स्वस्वरूप से ही स्वधर्म का पालन
करना यही स्थिरता का स्वरूप है ऐसा जो हमारे धर्म कर्म का आचरण है, उसी का नाम उत्तम स्थिरता है। अब
'मेरी शरण में आना' यह जो सोलहवाँ लक्षण है उसके सम्बन्ध में सुनो। नदी जब समुद्र की शरण में आती है तो
वह उससे एकरूप होकर समुद्र स्वरूप ही हो जाती है। उसी प्रकार जो वृत्ति मेरी शरण में आती है वह मत्स्वरूप
ही हो गयी ऐसा समझना चाहिये। नमक पानी की शरण में आता है तो उसका तत्काल पानी हो जाता है, उसी
प्रकार जो अनन्य भाव से मेरी शरण में आता है वह मेरे ही रूप में रहता है यह ध्यान में रखो। मेरी शरणआकर
जो मान-सम्मान अथवा कीर्ति की अपेक्षा करता है वह गुड़ में कंकड़ की तरह होता है। गुड़ से सना हुआ पत्थर
गुड़ से लिपटा रहता है लेकिन खाना बनाते समय उसका असली स्वरूप मालूम होता है। उसी प्रकार जो बाह्य
रूप से मेरा भजन करता है और मन में विषय की अभिलाषा करता है, वह वास्तव में अनन्यभाव से मेरी शरण
में नहीं आया है। उसे लालच का बहुत बड़ा कलंक लगा हुआ है। कोई लड़की सर्वांग सुन्दर हो किन्तु उसकी
नाक पर कोढ़ का सफेद दाग हो तो जैसे कोई पुरुष उससे शादी नहीं करेगा उसी उसी प्रकार मेरे भजन में विषय
लोभ दोष है यह ध्यान में रखो। या जैसे विधवा सुहाग की बिन्दी माथे पर लगाती है तो लोग उस पर थूकते हैं
या जैसे 'कै' को लोग अत्यन्त घृणित मानते हैं, उसी प्रकार विषय की अभिलाषा अत्यन्त निन्दनीय है। त्रैलोक्य
के साम्राज्यवैभव का विस्तार कर जो मेरी शरण में आता है वह ऐक्य भाव से मेरे जैसा हो जाता है। फिर उसे
मान-अपमान कैसा ? इसी का नाम है मेरी शरण में आना। उद्धव ! यह सत्रहवाँ लक्षण है इसे ध्यान में रखो। अब
'मनन' नामक गुण के बारे में सुनो। वेदशास्त्र अथवा गुरुवचनों का निरूपण श्रवण करने अथवा अद्वैत का श्रवण
करने के उपरान्त युक्तिपूर्वक साधक बाधक विचारों से मन में विचार करने का नाम है 'मनन' । अग्नि और कपूर
का मिलन होने पर वह कपूर अग्निरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार मेरे स्वरूप में मन रखने पर वह मन
चित्स्वरूप हो जाता है। जिस प्रकार जल में उत्पन्न नमक जल में मिलते ही जलस्वरूप हो जाता है, उसी प्रकार
मन भी चित्स्वरूप का ही अंशभूत रहता है, मनन के योग से वह चित्स्वरूप हो जाता है। अस्तु ! मनन के ही
सामर्थ्य से जहाँ तक मन पहुँचना चाहता है, वहाँ तक उसके साथ मैं रहता हूँ, अथवा यदि वह स्थिर रहता है तो
वहाँ भी मैं रहता ही हूँ। दीपक जिधर भी जाकर बैठता है वहाँ तो प्रकाश रहता ही है और अगर कहीं भी गये
बिना वह अपने ही स्थान पर रहता है तो वहाँ भी प्रकाश रहता है। उसी प्रकार मेरा मनन करते हुए यदि मन
मद्रूप हुआ तो फिर वह कहीं भी जाय लेकिन उसकी मद्रूपता नहीं टूटती। इस प्रकार मेरा जो केवल शुद्ध स्वरूप

ग्यारहवाँ अध्याय ३०७
है, उसमें जिसका मन मत्स्वरूप में स्थिर होकर ध्रुव की तरह अटल रहता है उसे मननशील कहते हैं। 'मुनि'
शब्द का अर्थ मननशील ही है इसे ध्यान में रखो। यही अठारहवाँ लक्षण है। अगले श्लोक में दस लक्षणों का
अत्यन्त मधुर निरूपण है, उसे सुनने के लिये उद्धव सावधान होकर सारे शरीर को कान बना कर बैठ गया।
अप्रमत्तो गंभीरात्मा धृतिमान् जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३१ ॥
जब तक मन वृत्तिशून्य नहीं हो जाता तब तक चतुर पुरुष उस पर विश्वास नहीं करता। वृत्ति के रूप में
कहीं मन ठग न ले इस भय से वह आत्मज्ञान के कारण सावधान रहता है। दुर्वासा सरीखा ज्ञानी भी मन के
कारण क्षण-क्षण पर गुस्सा करता था। उसी क्रोध के आवेग में वह भीषण शाप देने के लिये दौड़ पड़ा। 'दुर्गंधा'
मत्स्यकन्या थी लेकिन पराशर उसके भी मोहपाश में फँस गया। नारद केवल मौका देख रहे थे लेकिन उतने ही
समय के लिये उन्हें गंगातट पर 'नारदी' बनना पड़ा। सारी सृष्टि का आजा ब्रह्मदेव लेकिन वह भी अपनी सुन्दर
कन्या को देख मन विकृत हो जाने के कारण उसका उपभोग करने के लिये उद्यत हो गया और सरस्वती के
पीछे दौड़ने लगा। इस संसार में मन की तरह लुच्चा कोई नहीं है। वह नाना प्रकार का छल कर ज्ञानी लोगों को
भी कष्ट देता है। लेकिन साधु उस मन का दमन करते हैं। अब शायद आप यह कहेंगे कि यदि 'मन' बिना ही
भोग होता है तो फिर वृत्ति क्यों क्षुब्ध होती है?' लेकिन ऐसी बात करने वाले भले ही ज्ञानी हों लेकिन वे मूर्ख
हैं। साधुओं को यह बात अच्छी नहीं लगती। वृत्ति सत्त्वगुण का आश्रय कर सूक्ष्मरूप में रहती है। वह मन को
क्षुब्ध कर 'मैं मुक्त हूँ' का आभास करा कर विषयी बना देती है। 'मुक्त हुआ' ऐसा अहंकार करना और विषयों
में आसक्त रहना, यही तो मनःक्षोभ से प्राप्त होता है। इसलिये जब तक वृत्ति है तब तक साधु को मुक्ति बिलकुल
मान्य नहीं है। मन अत्यन्त नाटकी है और नाटक बनाने वाला है। वही मुक्त होने का अहंकार करता है। इसलिये
उसका नाश करने के लिये साधु आत्मज्ञान से सावधान रहते हैं। कृष्णसर्प का मुँह हाथ में हो और यदि हाथ को
ढीला छोड़ दिया जाय तो वह तत्काल खा ही जायगा। इसलिये जब तक वह मर न जाय तब तक उसका मुँह
दबा कर ही रखना चाहिये। उसी प्रकार साधु मन का निर्दलन करते हैं। इस प्रकार निर्दलन करने में जैसी
सावधानी आवश्यक होती है वही साधु का लक्षण है। वास्तव में यह उन्नीसवाँ गुण है। अब बीसवाँ गुण सुनो।
पर्जन्यकाल में पानी से लबालब भरी हुई नदियाँ समुद्र में मिलती हैं तो समुद्र अहंकार से फूल नहीं जाता अथवा
ग्रीष्मऋतु में वे नदियाँ उतनी भर कर नहीं आतीं तो समुद्र सूख नहीं जाता। उसी प्रकार धन की अधिकता से
साधु का मन उल्हसित नहीं होता अथवा सर्वस्व चला जाने पर दीनता का भाव नहीं लाता। रात और दिन आये
या जाये, उससे सूर्य के प्रकाश में कोई कमी नहीं आती। उसी प्रकार अलग-अलग परिस्थितियाँ आने या जाने से
साधु की गम्भीरता नहीं ढलती। कितनी भी बिजली कड़के, उससे आकाश नहीं डगमगाता। उसी प्रकार विकारों
की कितनी भी लहरें क्यों न उठें लेकिन उसमें अटल रहना ही 'गांभीर्य' है। संतों की 'गंभीरता' यही है। यही
सचमुच जीव और शिव की 'शांति' है। यह संतों की बीसवीं अवस्था है। अब धैर्य का स्वरूप सुनो। जो अपने
धैर्य से मन-बुद्धि आदि इन्द्रियों और प्राण को अपने नियंत्रण में कर उन्हें नित्य आत्मसन्मुख करता है और उन्हें
वहाँ से लौटने नहीं देता या स्वयंवर में प्रबल शत्रु को अपने पराक्रम से जीत कर लायी हुई दुल्हन को वापस
नहीं जाने देता' उसी प्रकार साधु भी अपनी वृत्ति से धैर्य छूटने नहीं देता। जाल में फँसे हुए मृग को जिस प्रकार
बहेलिया वापस जंगल में नहीं जाने देता उसी प्रकार साधु भी धैर्यपूर्वक मन पर नियंत्रण कर उसे देह की ओर

३०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं जाने देता। देह को अनेक प्रकार के सुख प्राप्त हों अथवा उसे हाथी के मस्तक पर बैठा दिया जाय तो भी
वह मन को देहाभिमान के पास भटकने नहीं देता अथवा प्रलयकाल के गड़गड़ाहट से भले ही पंचमहाभूतों में
अफरातफरी मची हुई हो लेकिन वह अपने श्रेष्ठ धैर्य से मन को देह से नहीं मिलने देता। इस बीच वह काल
की जबर्दस्त चोट के कारण वृत्ति को परब्रह्म की राह पर निश्चयपूर्वक लाकर चित्स्वरूप के बाजार में बेच देता
है। वहाँ उसे तत्काल स्वानंदरूपी उत्तम ग्राहक मिल गया तो उसने जीव के साथ मन, बुद्धि, प्राण, विवेक आदि
देकर उससे बदले में स्वानंद ले लिया। इसी का नाम है धैर्य ! साधु का यह इक्कीसवाँ गुण है। अब षट्विकारों
पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जाती है यह भी सुनो। वह साधु स्वानंद से तृप्त रहता है इसलिये उसे भूख नहीं
लगती। सांसारिक जीवन से वह तृप्त रहता है इसलिये उसे प्यास का भी विस्मरण हो जाता है। आत्मसुख का
उपभोग करते-करते शोक और दुःख तो भूल ही गया। चित्स्वरूप के ज्ञान से सन्देहरहित हो जाने के कारण मोह
भी उसके सामने नहीं आता। वह जागृति, स्वप्न और सुषुप्तावस्था इन तीनों से बाहर आत्मज्ञान के परिसर में
रहता है। वहाँ यदि जरा का आगमन होता है तो वह थर-थर काँपने लगता है। उसका कार्य और कारण दोनों ही
व्यर्थ हो जाते हैं। देहपन से उसे देह का भी भान नहीं रह पाता इसलिये मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है। वह
साक्षात् काल को भी निगल लेता है। इस प्रकार इन षट्विकारों को अनायास ही जीत कर साधु निश्चिंत होकर
इस संसार में जीते हैं। यह उसका बाईसवाँ लक्षण है। सभी प्राणियों में उसे अपने स्वामी (ब्रह्मस्वरूप) का दर्शन
होता है। फिर मान-सम्मान की अपेक्षा किससे की जाय ? इसलिये सचमुच ही मान-अभिमान का त्याग कर वे
विनम्र वृत्ति से जीते हैं। पहले देह में अभिमान जागृत होता है, तब मान-सम्मान की इच्छा होती है यह नियम है।
लेकिन यहाँ तो देह का भान ही नहीं रह गया है इसलिये मान-अभिमान भी रसातल में पहुँच जाते हैं। इसी का
नाम 'अमानिता' है। यह साधु का तेईसवाँ लक्षण है। अब 'साधु' किस प्रकार सम्मान देता है यह भी सुनो। वह
ब्रह्मदेव से लेकर मक्खी तक सभी को शिरसावंद्य मानता है। चराचर में सर्वत्र उसकी एकनिष्ठता रहती है।
ब्रह्मस्वरूप के अतिरिक्त अन्य किसी बुद्धि को वह जानता भी नहीं है। समस्त प्राणिमात्र में वह ब्रह्मरूप ही
देखता है और इसीलिये वह सब के आगे साष्टांग दण्डवत् करता है। वह देवता, मनुष्य अथवा गधे के बीच
भेदभाव नहीं करता। सभी को वह बड़े सन्तोष से नमन करता है। कितने ही कौशल से विभिन्न प्रकार के
अलंकार क्यों न बनाये गये हों लेकिन उससे सोने के गुण में कमी नहीं आती। उसी प्रकार नाम अथवा रूप की
भिन्नता के कारण वह अपने मन में रंच मात्र की भी कमी नहीं लाता। चीनी का निंबोली का कड़ुआ फल बनाने
से वह कड़ुआ नहीं हो जाता। उसी प्रकार सुअर जैसा कितना ही कनिष्ठ जानवर क्यों न हो लेकिन उसका
ब्रह्मस्वरूप नष्ट नहीं होता। समुद्र में भयंकर से भयंकर लहरें उठती हैं लेकिन उनमें शुद्ध पानी ही रहता है उसी
प्रकार कोई भी प्राणी हो उसमें ब्रह्मस्वरूप ही भरा रहता है। इसी प्रकार साधु समस्त प्राणियों को सम्मान ही देता
है। यही उसका इक्कीसवाँ लक्षण है। अब उसकी 'परबोधकता' अर्थात् दूसरों को बोध करने के सामर्थ्य के बारे
में सुनो। जिसका जैसा भाव और श्रद्धा होती है उसे वैसा ही उपदेश करना साधु को भाता है। कोई ज्ञान प्राप्त
करने पर भी पागल ही बना रहे और उसके अंतःकरण में उस ज्ञान की अव्यवस्थित छाप ही पड़ी रहे तो सच्चे
शिष्य की वास्तविक स्थिति उसकी समझ में नहीं आती। अर्थात्, ऐसा गुरु उपदेश करने के लिये पात्र नहीं होता।
कोई यदि ज्ञान के आश्चर्य से ही अंतःकरण भर जाने के कारण विस्मय से स्थितःप्रज्ञ होकर रह जाय और
लकड़ी की तरह या ढोंके की तरह पड़ा रह जाय तो गुरु को उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
कोई ज्ञान प्राप्त होने पर कंजूस हो जाता है। प्राण जाने पर भी वह कुछ नहीं बोलता। भय के कारण मौन ही

रहता है। कभी एक भी शब्द नहीं बोलता। कोई पुरुष लाखों रुपया प्राप्त होने पर उसे जमीन में गाड़ कर उस पर
पत्थर रख देता है, दान देने से वह व्यर्थ चला जायगा यह सोचकर उस सम्पत्ति को जमीन की संगति में छोड़
देता है। उसी प्रकार बड़े परिश्रम से आत्मज्ञान प्राप्त कर उसको सत्पात्र को दान नहीं करता यही उस कृपणता का
लक्षण है। अर्थात् यही मक्कारी है। कोई पुरुष ज्ञान प्राप्त कर उसे देना भी चाहता है लेकिन वह उपदेश शिष्य
की समझ में नहीं आता। गुरु का वह ज्ञान सत्त्वहीन हो गया है, ऐसा समझना चाहिये। अच्छे खेत में भी उसमें
अंकुर नहीं फूटेंगे। कुछ लोग अपनी दीक्षा और अनुभव को अत्यंत गहन बता कर बड़े-बड़े श्रीमान लोगों को
शिष्य बनाने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार वे ज्ञान का व्यवसाय ही शुरु करते हैं। शिष्य का मन आकर्षित करने
के लिये उसकी रुचि के अनुसार निरूपण करना, इस प्रकार धन के लालच से उपदेश करने पर वह ज्ञान
सत्त्वहीन ही हो जाता है। बीज में पानी घुसने पर वह खेत में बोने लायक नहीं रह जाता। उसी प्रकार ज्ञान में
धनलोभ का प्रवेश हो जाने पर उस उपदेश से किसी का भी लाभ नहीं होता। ज्ञान न मिलने से शिष्य मन ही मन
कुढ़ता रहता है और गुरु गुर्राता रहता है। वह सच्चा उपदेश कर्म नहीं है। यह घर के घर में लुकाछिपी है। जो
शब्दज्ञान में पारंगत होकर ब्रह्मानन्द में डोलता रहता है और शिष्य को उपदेश देने में समर्थ रहता है वही मेरा
साक्षात् स्वरूप है। मैंने जैसा अवतार धारण किया है उसी प्रकार यह भी अवतारी रहता है। इसीलिये वह अपने
सच्चे शिष्य को चित्स्वरूप के अलंकार से बड़ी चतुराई से अलंकृत करता है। 'वह' और 'मैं' का प्रयोग करते
समय उसमें केवल बाह्य दृष्टि से अन्तर मालूम होता है। किन्तु भीतर से वे दोनों एक ही घर के रहते हैं। एक ही
रहकर वह अनेकों को उपदेश करता है। एक की ज्ञानप्राप्ति कितनी सुलक्षण होती है? लेकिन कुछ जैसे के तैसे
अज्ञान में ही रहते हैं, यह किसका दोष है? किसान बुआई करता है। भूमि अच्छी होने पर उसमें फसल
लहलहाती है और जमीन बंजर हो तो उसमें एक अंकुर भी नहीं फूटता। बीज उत्तम ही रहता है। उसी प्रकार
भक्तों में ही उपदेश का अच्छा विस्तार होता है। तर्क करने वाले लोग बंजर खेत की तरह होते हैं। शिष्य समझ
सके उस ढंग से उपदेश कर उसे परमार्थ की ओर ले जाने का जो प्रभावशाली गुण होता है उसे 'परबोधकता'
कहते हैं जो पच्चीसवाँ प्रसिद्ध गुण है। साधु की मित्रता वैसे भी उत्तम रहती है। सबसे उसकी पुरानी ही जान-
पहचान रहती है। वह सबका मित्र होने के कारण उसका व्यवहार सबके साथ एक जैसा होता है। वही सबका
सगा और सम्बन्धी, वही वास्तव में सबका प्रिय रहता है। वह सबसे अलग रहते हुए मित्रता कायम रखता है।
अपनी कैसी भी गुप्त बात क्यों न हो उसे दूसरे को सुनाने में वह दूजे का भाव नहीं रखता। सारी दुनिया की ओर
वह अपनेपन से देखता है। अंतःकरण में वह सबके प्रति निष्कपट रहता है। दूध और पानी जैसे एक हो जाते हैं,
उनमें भेद नहीं दिखायी देता उसी प्रकार साधु भी सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर समस्त जीवों को अपने में
समरस कर लेता है। अत्यन्त मित्रता का लक्षण यह है कि दूसरों का दुःख हर कर उसे सुख प्रदान करना। उसी
प्रकार साधु भी जीवों का दुःख हर कर उन्हें सुख देता है। साधु की मित्रता की महिमा अपार है। वह सबका
पुराना ही मित्र है। इसलिये सबके साथ उसका सौजन्य नित नया ही रहता है। वह सदा निष्कपट रहता है। बन्धु
से भी अधिक मित्र महत्त्वपूर्ण है। पुत्र से भी अधिक मित्र विश्वास करने योग्य हैं। वही मित्र यदि विश्वासघात
करता है तो उसे ठग समझना चाहिये। मन, धन और कर्तव्य कर्म में जिसकी निष्कपट वृत्ति रहती है, उसी का
नाम है सच्ची मित्रता। यही पहचान ध्यान में रखनी चाहिये। इस प्रकार मैत्री का पूरा लक्षण विस्तारपूर्वक
बतलाया। यह साधु का छब्बीसवाँ लक्षण है। अब करुणा के बारे में सुनो। बदले में उपकार की इच्छा न कर, मैं
बहुत बड़ा दयावान हूँ यह अहंकार भी मन में न रख दीनजनों का दुःख निवारण करना इसी का नाम है सच्ची

३१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
करुणा। मन में धन की आशा कर वैद्य दवाइयों का पुलिंदा खोलता है अथवा सम्भावना पर दृष्टि रखकर जिस
प्रकार पौराणिक कथा सुनाने लगता है उस प्रकार का व्यवहार केवल विषय के स्वार्थ के लिये होता रहता है।
लेकिन साधु की बात वैसी नहीं होती। वह निरिच्छ होते हुए दयालु रहता है। उसकी आँखों में दया का समुद्र
भरा रहने के कारण ही वह अपना तन, मन, धन खर्च करके भी अनाथों पर दया करता है और दीनदुबलों को
संकट से मुक्त करता है। उसे अपने स्वार्थ की जितनी चिन्ता रहती है उससे भी अधिक चिन्ता अनाथ प्राणियों के
प्रति होती है। उद्धव! सचमुच इसी का नाम है पूर्ण दया। यह साधु का सत्ताईसवाँ लक्षण है, इसे ध्यान में रखो।
अब 'कवि' शब्द का प्रतिपादन ध्यान से सुनो। वेद और शास्त्र का रहस्य जिसे हाथ के मैल के समान स्पष्ट है
और जो सदैव ब्रह्मानन्द में डोलता रहता है उसका ही नाम सचमुच 'कवि' है। उपनिषद का अर्थ जिसके मुख
की ओर जोहता रहता है और शब्दज्ञान और अनुभवज्ञान जिससे सत्य होता है उसी का नाम 'कवि' प्रसिद्ध है।
'कवि' इस शब्द के वर्णन से अट्ठाईस लक्षण पूरे हो गये। अब दो अत्यन्त गहन लक्षण शेष हैं उन्हें अगले दो
श्लोकों में बताने का विचार श्रीकृष्ण ने किया।
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् संत्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः ॥ ३२ ॥
प्रपंच नगर के चारों ओर 'कर्म' की दुस्तर नदी प्रसिद्ध ही है। उसी के जल पर जीव जीते हैं। उत्पत्ति और
स्थिति उसके इस तट पर होती है। उस नदी के जल से ही कर्म को कर्मफल आते हैं और उस पानी के बल से
ही स्वर्ग, नरक आदि का भोग भोगना पड़ता है। प्रपंच नगरी से निकल कर जो परमार्थ की ओर दौड़ कर आने
लगता है सो वह कर्मनदी में गोता खाकर डूब जाता है। कुछ ज्ञानी इसे तरना कहते हैं लेकिन वही कर्म में गोता
खाकर स्वयं डूबते हैं और दूसरों को भी उसमें डुबाते हैं। वे व्यर्थ ही तरने की बकवास करते हैं। ऐसे कितने डूबे
उनका पता नहीं है। लेकिन वही डूबते समय बताते हैं कि तरने का उपाय कर्म ही है और यह कहकर सबको
डुबाते हैं। 'न कर्मणां' यह वेद का वचन है। इसका अर्थ है 'कर्म' से कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं होता। लेकिन कर्मठ
लोग इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन्हें कर्म का अहंकार रहता है। कर्म पूरी तरह देह के माथे रहता है। अगर
उस देह का ही अभिमान नहीं छूटा तो कर्म का त्याग कभी नहीं होगा उलटे देहबुद्धि से कर्मबन्धन अवश्य प्राप्त
होगा। कुछ ऐसे भी नष्ट होते हैं जो कर्म ही नहीं करते और कर्म नदी के इस तट पर खड़े होकर तर जाने की
बात करते हैं। इस प्रकार जो वर्णाश्रम कर्म का त्याग करने वाले होते हैं वे कर्म भ्रष्ट हैं। उन्हें पाखण्डी और पापी
समझना चाहिये। इस कर्मनदी को पार करके जाने वाला कोई एक भी वीर नहीं दिखाई देता। जब बड़े-बड़े नेता
इसमें डूब कर मर गये तो औरों की क्या बिसात है? इस कर्मनदी की उत्पत्ति सचमुच मुझसे ही है। उसका
यथार्थ भी तुम्हें आत्मज्ञान से बता देता हूँ। 'आज्ञायैवं' यह मूल श्लोक का पहला मूल पद है। उसके ही कारण
यह कर्मनदी फलीफूली है उसे स्पष्ट करता हूँ। मेरे आज्ञारूपी गम्भीर मेघों ने मेरे श्वासोच्छ्वास की वायु के योग
से चतुर्वेद की विधि की धाराओं की असीम वर्षा की। इससे कर्मनदी में असीम बाढ़ आयी। उतार किधर है,
किसी की समझ में नहीं आया। वहाँ गुण दोषों का घेरा पड़ा है तथा विधि-निषेधों के प्रवाह में कर्माकर्म का
भँवरा किस प्रकार भीतर बाहर घूम रहा है, देखो! संकल्प विकल्पों के बड़े-बड़े टीले नदी में चारों ओर खड़े हैं
जिससे नदी चारों ओर विस्तृत फैली हुई है। जो उसे पार करना चाहता है वह उन टीलों में फँसकर डूब जाता है।
एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाता। कहीं मगर के पाश में पड़ जाय तो फिर पूछिये ही मत। वह पूरा का पूरा
निगल जाता है। संकट में भी बाहर नहीं छोड़ता। देखते-देखते अधोगति तक पहुँचा देता है। अंगविकलता के

मत्स्य मांस की टोह में घूमते रहते हैं। कर्मठता के कछुए तो पत्थर की तरह कठोर होते हैं। जो भोगविलास के
कारण आलसी बन जाते हैं उन्हें कालसर्प अपने चंगुल में फँसा लेता है। उनके नाक में और मुँह में पानी भर
जाने के कारण मुँह से शब्द भी नहीं निकल पाता। कुछ व्यग्रता में डूब गये। कुछ तर जाने की आशा में कर्म के
प्रवाह में ही फँस जाते हैं। वे विधि निषेध के घेरे से सहसा बाहर नहीं आते। कुछ स्वकर्म के प्रवाह में फँस कर
दूर तक बहते चले जाते हैं। उन्हें सत्यलोक के मगर अपने बिल में घसीट ले जाते हैं। कुछ तो उस पार जा ही
नहीं पाते वे बीच ही में सुन्दर फल देखकर बीच रास्ते की ओर दौड़ते हैं और स्वर्ग के संकट में फँस जाते हैं।
युक्ति के बल पर तरने की आशा से जो निकलते हैं वे अहंकाररूपी भँवर में फँस जाते हैं जहाँ देव मछलियाँ उन्हें
निगल जाती हैं। कुछ तीनों वेदों की तुंबी दीक्षारूपी रस्सी से पेट के नीचे बाँध लेते हैं लेकिन वे अप्सराओं के
मायाजाल में फँस कर अंततः डूब जाते हैं। मंत्र-तंत्र का प्रयास करने वाले बेचारे दीक्षित तो अपने ही स्थान पर
डूब जाते हैं। सारांश यह कि कर्म नदी के उस पार पहुँचने वाला कोई नहीं दिखाई देता। यहाँ ऐसा कोई बिरला
ही दिखाई देता है। जो कोई इन सारे उपायों को एक ओर रख अनन्य भक्ति से मेरा भजन करता है उसे यह
कर्मनदी बिलकुल सूखा ही छोड़ देती है। जब तक मेरी भक्ति की नाव नहीं मिलती और उस पर प्रेम की पाल
नहीं चढ़ती तब तक बचाव के सभी प्रकार के प्रयास दुर्बल सिद्ध होते हैं। तो फिर ये पागल व्यर्थ का प्रयास क्यों
करते हैं ? अनन्य भक्ति का मार्ग स्वीकार कर, धर्मकर्म का त्याग करना यही तरने का सर्वोत्तम उपाय है। अन्य
कोई भी उपाय दुर्बल तथा अधोगति तक पहुँचाने वाला है। अपना धर्म क्या है और कर्म क्या है यह जाने बिना
अथवा मन से ही नास्तिकता स्वीकार कर अथवा आलस के कारण जो कर्म का त्याग करते हैं, यह उस प्रकार
का त्याग नहीं है अथवा शरीर को क्लेश होगा इस भय से, अथवा आलस के कारण या ज्ञान के अहंकार से जो
कर्म नहीं छोड़ते उस प्रकार का भी त्याग नहीं है यह ध्यान में रखो। मेरी वेदरूपी आज्ञा अत्यन्त पवित्र है। उन
वेदों का विस्तार से विचार कर स्वधर्म कर्मों के जो कर्मवाद हैं उन्हें जानने वाला तथा स्वधर्मगुण अत्यन्त उत्तम
है तथा उसमें बिगाड़ आ जाने से अधःपतन होता है ये दोनों बातें ध्यान में रखकर जो मेरी भक्ति के प्रति समर्पित
होता है, ऐसा भक्त अन्य किसी बात का स्मरण न कर अखण्ड हरि का ही स्मरण करता है। इसी को कहते हैं,
भक्ति में बिका प्राण! अन्य भजन आनुमानिक हैं। मेरे भजन प्रेम के कारण वह कर्म की याद भी भूल जाता है।
दरिद्र कर्म को कौन पूछता है ? वह भक्तों को बाधक नहीं होता। मेरे प्यार भरे भजन में रंग जाने पर वह सारे
कर्मों को भूल जाता है। वही भजन की समाधि है ऐसा समझना चाहिये। वहाँ सचमुच ही कर्म बाधक नहीं
होता। जिसकी कर्म पर श्रद्धा रहती है वही कर्म का अधिकारी होता है और जिसकी श्रद्धा श्रीकृष्ण पर होती है
वह कर्म का अधिकारी नहीं होता। जो जीवभाव से भक्ति को ही समर्पित होता है वह तत्क्षण कर्म से विलग हो
गया ऐसा मानना चाहिये। उसके भावार्थ पर जब मैं बिका तब वह कर्म में कैसे बँध सकता है ? गुणदोषों की
जननी अविद्या का जिसने निराकरण कर दिया और मेरे भजन में मग्न हो गया उस साधु को मैं प्रणाम करता हूँ।
देह में आत्म भावना की जो कल्पना है उसे ही मुख्य रूप से अविद्या समझना चाहिये। वह कल्पना ही यदि
अपने स्थान पर समाप्त हो जाय तो सचमुच संसार से अविद्या नष्ट हो जाती है। अविद्या का त्याग हो जाने पर
उसके साथ ही धर्म-अधर्मादिक का भी अपने आप त्याग हो जाता है। मस्तक टूट जाने पर शरीर कर्म करने के
लिये उठ नहीं पाता उसी प्रकार अविद्या का त्याग होने पर सभी धर्मों का त्याग धीरे-धीरे हो ही जाता है। देखो!
दिन में चन्द्रमा का उदय दिखायी देने पर भी वह होते हुए भी न होने जैसा होता है। उसी प्रकार अविद्या का
अस्त हो जाने पर धर्म के सभी प्रकारों की वही स्थिति होती है। सूर्योदय हो जाने पर खोजने पर भी जुगनू नहीं

३१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दिखायी देता। उसी प्रकार अविद्या का नाश हो जाने पर धर्माधर्म के झुण्ड भी निस्तेज हो जाते हैं। नवग्रहों का
समुदाय, नक्षत्रों की पंक्तियाँ, जुगनू के तेज की चमक ये सब रात्रि के साथ ही लुप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार
अविद्या के साथ धर्माधर्म की कला भी नष्ट हो जाती है। उद्धव! समस्त धर्मों के त्याग की यही पहचान है इसे
ध्यान में रखो। इसके अतिरिक्त मेरा भजन! इसी का नाम है मुख्य भागवतपन! लेकिन तुम कहोगे कि केवल
अविद्या का ही कैसे नाश होगा ? उसके साथ अधर्म का भी नाश होगा। लेकिन अरे भई! मेरी भक्ति के बढ़ने से
अविद्या अनायास ही नष्ट हो जाती है। अविद्या का नाश होते ही सभी धर्माधर्मों का नाश होता है। अब तुम
कहोगे कि ऐसी कौन-सी भक्ति है ? तो यह वही भक्ति है जिसका मैंने पहले निरूपण किया था। वह मेरी चौथी
भक्ति है, इसे ध्यान में रखो। उसके ही योग से अविद्या का निराकरण होता है। आर्त (रोग से पीड़ित), जिज्ञासु
(मोक्ष की कामना करने वोले) तथा अर्थार्थी (धन के इच्छुक) जो भक्ति करते हैं वह वास्तव में अविद्यात्मक
होती है इसलिये मुख्य रूप से चौथी भक्ति ही मेरी भक्ति है। उस भक्ति में अविद्या का स्पर्श नहीं होता और
भजन तो अपने ही स्थान पर अनायास होता रहता है। हे उद्धव! वही मेरी प्रिय भक्ति है। जिससे अविद्या रहती है
और सभी धर्म थर-थर काँपते रहते हैं उस भक्ति का झण्डा लहराते देख उसके भय से ही अविद्या के प्राण
निकल जाते हैं और सब धर्मों की चाह तो बिना जख्मी हुए मर जाती है। अपनी भक्ति का यह प्रकार भगवान ने
बड़े प्रेम से बतलाया। अब जिससे भक्ति सजती है उन भक्तों का भजनभाव भी सुनो। बिना मेरे अनुसंधान के
स्नान, संध्या, जप, होम, दान ये सब अधर्म ही हैं। वह मेरा भजन नहीं है। परपुरुष की चाह और उसके प्रति
प्रीति तथा पति के सामने झूठा प्रेम-प्रदर्शन यह जिस प्रकार पतिव्रता का लक्षण नहीं होता, उसी प्रकार वैसी
भक्ति भी व्यभिचारिणी ही होती है। स्त्रियों के प्रति इच्छा रखकर जो ध्यान और अनुष्ठान करता है उसकी वह
कृति जारिणी स्त्री की तरह रहती है वह कोई पवित्र भक्ति नहीं है। काया, वाचा तथा मन से मेरी भक्ति में मग्न
रहना, भजन करते समय दिन या रात का ख्याल न करना इसी का नाम सच्ची भक्ति है। जप के बिना भी जिसके
मुँह में मेरा नाम है, धारण किये बिना भी मेरा ही ध्यान है और जो सारे कर्म बिना संकल्प किये मुझे ही अर्पण
करता है, प्राणायाम के बिना ही वायु का विरोध करता है, मर्यादा के बिना ही स्वरूप ज्ञान होता है, विषय के
बिना ही सदा स्वानंद में रहता है इसी का नाम है शुद्ध भक्त! भक्त कहलाने में बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन
भजनमार्ग में हृदय विह्वल हो उठता है। अकृत्रिम भक्ति जब प्रकट होती है उसी समय, उद्धव मेरी भेंट होती है।
इस रीति से जो मेरा भजन करता है वह मुझमें और मैं उसमें निवास करता हूँ। सारे भक्तों में वही उत्तम भक्त है
और साधु यह नाम उस पर ही फबता है। पुरुषों में उत्तम पुरुष वही है। साधुओं में सर्वोत्तम साधु वही है। हे
उद्धव! मेरे विश्राम का अकृत्रिम स्थान वही है। उसके लिये मैं स्वयं अपने सर्वांग का बिस्तर बन जाता हूँ और
पग-पग पर मैं अपना प्राण उस पर न्योछावर करता हूँ। ध्यान में रखो। वह मुझे कितना प्रिय है यह पूछोगे तो मैं
कहूँगा कि उसी प्रकार जैसे जीव को प्राण प्रिय लगता है। उत्तम भक्त का यह लक्षण बताते समय भगवान भी
प्रेम में पागल हो गये। वे अधीर हो उठे। उनका अपने अंतःकरण पर नियन्त्रण न रहा। उसने उद्धव को गोद में
उठा लिया और वह प्रसन्नता से नाचने लगा। आश्चर्य से उद्धव का गला भी रुंध गया। श्रीकृष्णनाथ यह भी भूल
गये कि मैं देवता हूँ और यह एक भक्त है और यही भक्त और देवता का भाव उद्धव भी भूल गये। भक्ति के ऐसे
साम्राज्य में दोनों की जब एकरूपता हुई तो अपने भक्त की कथा सुनाने के लिये भगवान का जी मचल उठा।
ऐसे उत्तम भक्तों की कथा कृष्णनाथ को बहुत प्रिय लगती थी। इसीलिये वह उसे बार-बार सुना रहा था। श्लोक
में अनेक विचार होते हुए उन्हें दूर कर श्रीकृष्ण ने बड़ी चाह से स्वयं ही यह ग्रन्थ लिखवाया। महाराज! सचमुच

ग्यारहवाँ अध्याय ३१३
ही मैं अपने मन से यह कथा नहीं लिख रहा हूँ। इसे लिखवाने वाला श्रीकृष्ण ही हैं इसे श्रोतागण सत्य मानें।
अब श्रोतागण सावधान हो जायें। कथा का पिछला सन्दर्भ यह है कि दोनों एक दूसरे से गले मिले थे और उद्धव
को अत्यन्त आश्चर्य हुआ था। कृष्णनाथ प्रेम से विह्वल हो गये थे, उन्होंने अपने को सँभाला और उद्धव की पीठ
थपथपा कर उसे सावधान किया। उसने उद्धव से कहा "सचमुच तुम्हें भक्ति की कथा अच्छी लगी अतः मैं तुम्हें
वही कथा सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो। कोई मुझे जान कर मेरा भजन करता है तो भाव ही मुझे भजता है।
लेकिन मैं उन दोनों को ही भक्ति में रमता हूँ और ये दोनों ही मुझे अच्छे लगते हैं।"
ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।
भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥
आत्मस्वरूप में रहनेवाला, सच्चिदानंद, जगत का आदि, आनन्द का मूल स्रोत, नित्य सिद्ध, परमपवित्र ऐसे
मेरे रूप को वे भली-भाँति जानते हैं। देश, काल और वर्तमान इन सबमें सदा परिपूर्ण, सर्वात्म, सच्चिदानंदघन
तथा भेदरहित ऐसा एक मैं ही हूँ। सत्य, ज्ञान और अनन्तस्वरूप परब्रह्म वास्तव में मैं हूँ। यह जानकर जो मेरा
भजन करते हैं वही उत्तम भागवत हैं इसे ध्यान में रखो। तुम कहोगे कि शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाने के बाद
भजन कैसे किया जाय ? तो इसका उत्तर यह है कि जब देवता और भक्त दोनों वही बन जाते हैं और 'मैं' होकर
मेरा भजन करते हैं। दायाँ और बायाँ ये दोनों भाग अलग हैं किन्तु शरीर एक ही है उसी प्रकार देवता और भक्त
ये विभाग मेरे स्वरूप में पूर्णरूप से दिखायी देते हैं। जरा देखो ! लोहे का दर्पण बनाना है तो उसे लोहे से ही
बनाना होता है और वह अपने प्रकाश से प्रकाशित हो इसलिये उसे लोहे से ही चमकाना होता है। दर्पण साफ हो
जाने के बाद वह चन्द्र, सूर्य, आकाश, पृथ्वी के प्रतिबिम्ब स्वयं में धारण करता है। यह उससे अनायास ही होता
है। उसी प्रकार मेरे भक्त भी जब 'मैं' होकर अनन्यभाव से मेरा ही भजन करते हैं तब मेरा सारा वैभव उनमें
प्रतिबिम्बित होता है। अथवा जिस प्रकार समुद्र में लहरों के ऊपर और नीचे पानी ही रहता है उसी प्रकार मेरा
भक्त मुझ में ही होने के कारण अंतर्बाह्य मद्रूप ही होता है। जिस प्रकार नृसिंह की सुवर्ण की मूर्ति सुवर्ण के ही
हिरण्यकश्यपु का विदारण करती है और सुवर्ण के ही प्रह्लाद को गले लगाती है वैसी ही मेरे भजन की स्थिति
है। वहाँ सगुण और निर्गुण रूप में मैं ही रहता हूँ। जिस प्रकार सुवर्ण और कंगन अभिन्न होते हैं उसी प्रकार मद्रूप
हो जाने के बाद वह और मैं दोनों अभिन्न ही रहते हैं। इसलिये वह जिधर भी देखता है उधर उसे मेरा ही स्वरूप
दिखाई देने लगता है और दृश्य, द्रष्टा का त्रिगुट नष्ट होकर वह तत्काल मत्स्वरूप में मिल जाता है। यह जानकर
जो मेरा भजन करते हैं, वही भक्त उत्तम होते हैं, यह जान लो। उसी प्रकार मुझे जाने बिना जो मेरा भजन करते हैं
वे मेरे भोले भक्त हैं। उस भोले भक्त ने वेदों का पठन नहीं किया होता, वेदांतशास्त्र का श्रवण नहीं किया होता
उसमें विकल्प का लक्षण नहीं होता, वह केवल अनन्य भावार्थी होता है। उसे सगुण, निर्गुण का ज्ञान नहीं होता
लेकिन हृदय में देवता का वास है इतना वह जानता है। देह में जड़त्व है इसीलिये देवता उससे आचरण कराता
है। अपनी आँखें निकाल कर अलग से दूर रखे तो वहाँ हृदयस्थ नारायण न होने के कारण वह अन्धा ही होता
है। इसलिये देखने की कला भी देवता की ही होती है। जीभ केवल चमड़े की होती है। उसे रस का स्वाद क्या
होगा ? उसे काट डालने से वह बेचारी किसी प्रकार का स्वाद नहीं जानती। इसलिये जिह्वा के द्वारा रसास्वादन
करने वाला हृदयस्थ परमात्मा ही है। बुद्धि को ज्ञान प्रदान करने वाला भी सचमुच हृदय का नारायण ही है। मन
का आवागमन भी उस हृदयस्थ के ही अधीन होता है इसीलिये जब दूर हो जाने पर भी वह लौटकर हृदय में ही

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आता है। इन्द्रियों को प्रेरणा देने वाली अथवा उसे नियंत्रण में रखने वाली शक्ति भी हृदयस्थ के ही अधीन है।
इसीलिये उसे ही 'हृषीकेश' (अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी) कहते हैं। इस दृष्टि से देखें तो अपने ही हृदय में देवता
का निवास दिखाई देता है। मैं भी कैसा मूर्ख हूँ कि उसे देखने के लिये बाहर की ओर दौड़ता हूँ। वह तीर्थ में या
क्षेत्र में मिलेगा ऐसी हमारी कल्पना होती है। आत्मभाव के विना तीर्थ में भी देवता के दर्शन नहीं होंगे। सारांश,
भगवान मुझमें ही है उसके ही कारण इन्द्रियों में चेतनता रहती है और जो भी क्रिया-कर्म होते हैं वे उसके ही
कारण हाते हैं। देह तो केवल अचेतन प्रेत है। उससे कर्म नहीं होता यह स्पष्ट ही है। यह देह बिलकुल व्यर्थ है।
इन्द्रियों में चैतन्य लाना, कर्म, क्रिया अथवा कर्तव्य का पालन करना यह कार्य तो सचमुच देह से होता ही नहीं
है इसलिये मुख्य कर्ता वह हृदयस्थ परमात्मा ही है। इस प्रकार कर्तव्य के रूप में जो भी है उसे वह अपने माथे
पर नहीं लेता। सर्व कर्मों का कर्त्ता आत्मा है यह बात वह विश्वासपूर्वक मन में दृढ़ कर लेता है और फिर
अन्नपानादि का सेवन करते समय आत्माराम ही सबका भोक्ता है यह स्वीकार करता है। सारे कर्म या कर्तव्य
करते समय 'मैं' कर्त्ता हूँ यह बात उसकी समझ में ही नहीं आती। इस भोले भाव मेरा जो भजन हाता है, वह
उत्तम है। मैं वह भजन बड़ी चाह से ग्रहण करता हूँ क्योंकि वह मेरा खाद्य है इसे ध्यान में रखो। बच्चे को जिस
प्रकार सर्वभाव से माँ होती है उसी प्रकार मेरे भोले-भाले भक्तों के लिये सब कुछ मैं ही हूँ। दौड़कर माँ के गले
में पड़ने के लिये, कान में हित की गुप्त बात कहने के लिये तथा खाना, भोजन तथा विश्राम इन बातों के लिये
जिस प्रकार बालक के लिये माँ होती है उसी प्रकार मेरे भोले-भाले भक्तों के लिये प्यारी माँ के रूप में मैं हूँ।
उनके लिये अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ सब कुछ मैं ही हूँ। बालक के लिये माँ जिस प्रकार अपने मुँह का, पेट का तथा
गाँठ का सब कुछ खर्च करती है उसी प्रकार अपने भक्तों के लिये मैं भी अपना सब कुछ खर्च करता हूँ। बच्चे
के न माँगने पर भी जिस प्रकार माँ वात्सल्य से दौड़ कर बच्चे के मुँह में अपना स्तन लगाती है उसी प्रकार मैं भी
भोले भक्तों को अपने अनुसंधान में लगाता हूँ। ज्येष्ठ पुत्र और कनिष्ठ पुत्र इन दोनों का पालन करने वाला पिता
एक ही होता है किन्तु वह बड़े बेटे को डाँटता है तो छोटे का लाड़ करता है। ज्येष्ठ यदि कोई व्यंग्य की बात
करता है तो वह उसे चाँटा लगाता है और छोटा लड़का तुतला कर बोलता है तो उसे बड़ा संतोष होता है। ज्ञानी
के मुँह से कोई गलत बात निकलती है तो उसके दोष का फल उसे भोगना पड़ता है लेकिन भोले भक्तों की कथा
असंबद्ध भी हो तो भी भगवान को उससे सचमुच ही सन्तोष होता है। कर्माकर्म का प्रायश्चित्त ज्ञानियों को ही
करना पड़ता है। भोले भक्तों को मैं कभी भी कर्म से बँधने नहीं देता। बाप भोजन करने बैठता है तो बड़े बेटे को
अपने से दूर बैठाता है और छोटे बच्चे को गोद में बिठा कर अपने हाथ से खिलाता है। उस समय बच्चे को जो
भी अच्छा लगता है वह उसे खिलाता है। वह नहीं खाता तो उसकी खुशामद करता है। उसी प्रकार ज्ञानी लोग
साधनों का उपयोग कर जब थक जाते हैं तब कहीं उन्हें मेरी प्राप्ति होती है लेकिन अपने भोले भक्तों का मैं
अनायास ही उद्धार करता हूँ। मार्गदर्शक जानते हुए भी रास्ता चूक जाता है लेकिन बच्चा बाप की गोद में रहता है
उसे किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती। उसी प्रकार साधनों का कष्ट केवल ज्ञानी को भोगना पड़ता है।
भोले भक्तों का उद्धार मैं ही करता हूँ इसलिये उन्हें जरा भी प्रयास नहीं करना पड़ता। मैं उसे अपने कन्धे पर
बिठाकर सायुज्य सिद्धि तक पहुँचाता हूँ। लेकिन जरा देखिये उसकी भोली बुद्धि कितनी विचित्र होती है। वह
वहाँ भी भजनविधि नहीं छोड़ता। अंतःकरण में कपट को स्थान देना, यही भजन की बाधा होती है। वह कितनी
ही युक्ति प्रयुक्ति से विचार करे लेकिन मैं उसके विचारों से बाहर ही रहता हूँ। वही केवल जो भोला भावार्थी है
उसे आचार-विचार का ज्ञान नहीं होता। बिना इधर-उधर मुड़े वह सीधे मुझमें ही आकर मिलता है। भोले भक्त