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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 869 में से

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पृष्ठ 348

३३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बोले, "सावधान होकर आदरपूर्वक मेरा भाषण सुनो। मेरा यह गुप्त ज्ञान तुम्हें मिलने से तुम्हारे वंश का उद्धार
होगा क्योंकि जिस वंश में कोई ब्रह्मज्ञानी उत्पन्न होता है तो वह वंश उसके कारण पावन हो जाता है। मेरा यह
भाषण बिलकुल सत्य है। यह जान लो। इस विषय में मन में कोई विकल्प न आने दो। लेकिन तुम कहोगे, "तुम
पूर्णब्रह्म नारायण स्वयं ही इस वंश में अवतरित हुए हो, अतः तुम्हारे ही कारण इस वंश का उद्धार हो गया। तुम्हारे
आगे मेरा ज्ञान है ही कितना ?'' तो नाम, रूप, जाति, गोत्र इन सबसे मैं अलिप्त ही हूँ। संसार के सभी कुलों से मैं
कुलीन हो गया हूँ क्योंकि सारा जगत ही मेरा गोत्र है। यह सब ध्यान में रखकर ही मैं अपनी गुप्त बात का सार
तुम्हें बताऊँगा। उसके योग से सारे संसार का उद्धार होगा। यह गुप्त ज्ञान सुनने के लिये उद्धव ने मन ही मन कान
खोले और श्रीकृष्ण के मुख की ओर एकटक देखते ही उसके नेत्रों की ओर उद्धव की दृष्टि अटक गयी। श्रीकृष्ण
का वह अत्यन्त गहन और रसाल निरूपण अगले अध्याय में है। इसलिए एका जनार्दन विनती करता है कि संत
मेरी ओर ध्यान दें और श्रोतागण सावधान हो जाएँ। आपके चरणों का मैंने मस्तक से वन्दन किया है। आपके
चरणों के प्रसाद से श्रीभागवत के श्लोकों का सुबोध अर्थ मैं वर्णन करूँगा ताकि संत सन्तुष्ट हो जाएँ। इसीलिए
एका जब जनार्दन की शरण में पहुँचा तब वह समुद्र की लहरों की तरह सुशोभित हो गया।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां श्रीकृष्णोद्धवसंवादे
एकादशपूजाविधानयोगो नाम एकादशो अध्याय ॥ ११ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।