श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३२१
का प्रसाद ग्रहण करते समय भी लालचवश पूरा प्रसाद नहीं लेना चाहिये। पहले उसे सबको बाँटना चाहिये और
फिर थोड़ा-सा ग्रहण करना चाहिये। श्रीहरि को जो दीपक समर्पित करते हैं उससे अपने घर का काम नहीं करना
चाहिये। पुराणों में तथा ज्ञानसम्पन्न स्मृतिकारों ने ऐसा ही कहा है। यह तो साधारण बाह्यपूजा हुई। लेकिन
अंतःकरण में मुझ पर दृढ़ विश्वास और भक्ति होनी चाहिये। वही भक्ति भगवान को प्रिय है। भाविकों की पूजा
भक्ति से ही पूर्ण होती है। अब भक्ति का रहस्य सुनो। जिस भजन के कारण 'भक्त' कहा जाता है वह भजन ऐसा
है कि इस लोक में जो भी उत्तम और प्रिय वस्तु होती है उसे वे मुझे ही अर्पण करते हैं।
यत् यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः।
तत्तन्निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते॥४१॥
अधिक क्या कहें? यदि भक्त को सचमुच चन्द्रामृत भी प्राप्त हो जाय तो वह सारा का सारा भगवान को ही
अर्पण कर देता है। देह के लोभ के कारण स्वयं सेवन नहीं करता। अमरत्व प्राप्त करने के लोभ से यदि अमृत
का सेवन किया जाय तो देवतागण अमृतपान करते हुए भी यथाकाल मर ही जाते हैं। इसलिये नश्वर देह की
ममता से भक्त अमृतपान नहीं करते। यदि वही भगवान को अर्पण किया जाय तो अक्षय अमरत्त्व प्राप्त होता है।
याचना किये बिना अथवा दैवयोग से पारस अथवा चिन्तामणि भक्त के हाथ में आने पर वह उसे लोभ से अपने
पास नहीं रखता, उसे तत्काल भगवान को अर्पण कर देता है। लोभ से कल्पतरु जतन करने से सहज ही इच्छा
बढ़ती है लेकिन वही कल्पतरु भगवान को अर्पण करने से अपने आप निरिच्छता प्राप्त होती है। स्वार्थवश
चिन्तामणि पास में रखने से वह अंतःकरण में अत्यन्त चिन्ता ही उत्पन्न करता है। वही यदि भगवान को अर्पण
कर दिया जाय तो अंतःकरण निश्चिंत हो जाता है। कामधेनु का प्रतिपालन करने से मन में असीम इच्छा की
वृद्धि होती है लेकिन यदि उसे कृष्णार्पण कर दिया जाय तो देह में पूर्ण निरपेक्षता रहती है। आशा के चक्कर में
पारस पत्थर पास में रखने से वह धनलोभ बढ़ाता है लेकिन उसे भगवान को अर्पण कर देने से मनुष्य स्वार्थ से
मुक्त हो जाता है अथवा देश, काल और ऋतु के अनुसार जो उत्तम फल या पदार्थ उत्पन्न होते हैं या नया अन्न
उत्पन्न होता है उसे भक्तगण भक्तिभाव से मुझे ही अर्पण करते हैं। अपने मन की सारी प्रिय चीजें वे हरिचरणों
की ओर ही प्रस्तुत करते हैं। साथ ही भिन्न-भिन्न पदार्थों का स्वाद भी वे मुझे ही समर्पित करते हैं। मुझ अनन्त
के हाथों में मेरे भक्त प्रेमपूर्वक जो भी अर्पण करते हैं उनके फल का वर्णन करते समय वेद भी मौन हो जाते हैं।
मैं तो वेद का वक्ता हूँ किन्तु मैं भी उनके फल का वर्णन नहीं कर सकता। हे उद्धव! अब यह जान लो कि
उनका फल मैं स्वयं ही हूँ। हे उद्धव! प्राणों से भी अधिक मुझ पर जो प्रेम है उसी का नाम सच्ची भक्ति है यह
ध्यान में रखो। अब जिससे मुझे तत्काल पा सकते हो, वे मेरी पूजा के अत्यन्त पवित्र और कल्याणकारी स्थल
तुम्हें बताऊँगा।
सूर्योऽग्निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णवःखं मरुजलम्।
भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे॥४२॥
एकादश स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय में ग्यारह पूजास्थलों का वर्णन है उनका वर्णन एका जनार्दन ऐक्यरूप
से करेगा। सूर्य, अग्नि और ब्राह्मण; गौ, वैष्णव और आकाश, वायु, जल और पृथ्वी ये नौ स्थल तथा एक स्वयं
इस प्रकार दस स्थल हमें अत्यन्त पूजनीय हैं। सभी पंचमहाभूतों में यह ग्यारहवाँ पूज्य पूजास्थान है, यह जान
लो। अब उनकी पूजा का विधि-विधान और लक्षण सुनो।