श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत् माम्।
आतिथ्येन तु विप्राग्रे गोष्वङ्ग यवसादिना ॥ ४३ ॥
सूर्य मेरा अधिष्ठान है। जिस तेज के योग से सारे संसार की आँखें देखने में समर्थ होती हैं वह मेरे ही तेज
से प्रकाशमान होता है। घर में दीपक जलाने पर उसका प्रकाश खिड़की के बाहर दिखायी देता है। उसी प्रकार
मेरे स्वरूप में मेरा जो आत्मतेज होता है वही सूर्य के रूप में बाहर प्रकाशित होता है। आकाश में दिखायी देने
वाला वह सूर्य मैं नारायण ही हूँ यह जान लो। मेरे उसी सूर्य के सौरसूक्त और त्रैविद्या ये उपासनार्मंत्र हैं।
ऋग्वेदादि तीनों वेद, सारे सौरमंत्र तथा सूर्यसूक्त को ध्यान में रख कर सूर्य के समक्ष पठन करते समय सूर्य की
ज्ञानपूर्वक पूजा करनी चाहिये। लेकिन ऐसा कभी नहीं कहना चाहिये कि यह वैदिकों की उपासना है, जो वेदों
का पठन करते हैं उनके ही लिये वह उपयुक्त है और अज्ञानियों के लिये सूर्य की उपासना योग्य नहीं है। अब
जिससे सूर्य तत्काल प्रसन्न होंगे ऐसी एक सरल उपासना तुम्हें बताऊँगा उसका ध्यानपूर्वक श्रवण करो। सभी वेदों
की माता, सारे मंत्रों का मुकुटमणि जो गायत्री है उन्हें श्रेष्ठ वर्णों के ब्राह्मणों को भली-भाँति जान लेना चाहिये।
उसके अर्थ की ओर ध्यान दें तो ज्ञात होगा कि सूर्य उसके अधीन रहता है। उन तीन चरणों के गायत्री मंत्र से
तीन बार अर्घ्य देने को ही 'त्रैविद्या' कहते हैं। अर्धमात्रा, अर्धबिम्ब ध्यान तथा त्रिपदा गायत्री से अर्घ्य प्रदान
करने से चिद्घन परमात्मा को सन्तोष प्राप्त होता है और वह भक्त को अपनी तरह कर लेता है। यह मेरा पहला
अधिष्ठान है। इसी का नाम है 'सूर्यपूजा'। अब अग्निपूजा का जो लक्षण है उसे विस्तारपूर्वक और सम्पूर्ण सुन
लो। शरीर के सब अंगों में मुख श्रेष्ठ है। वह मेरा मुख अग्नि है, यह जान लो। यही बात सारे वेद और पुराण
गरज कर कह रहे हैं। ब्राह्मण मुझे सब में प्रिय हैं, वे मेरे मुख के बल पर श्रेष्ठत्व प्राप्त करें इसलिये मैंने उन्हें
अग्नि की सेवा में लगाया लेकिन वहाँ भी वे चूक गये। मेरे मुख में अवदान डाल कर 'इन्द्राय स्वाहा' कहते हैं।
इस प्रकार ब्राह्मण कर्म मार्ग में फँस गये और मुझे अर्पण करने का शुद्ध मार्ग वे भूल गये। मेरे मुख में अवदान
अर्पण करते समय उनकी योग्यता ही उनके आड़े आयी इसीलिये इन्द्र, यम, वरुण, सूर्य आदि अनेक प्रकार के
विकल्प अवदानों में उत्पन्न हो गये। वे यह भी नहीं मानते कि देवी और देवता मैं ही हूँ। मुझे भूलकर ही उनका
सारा व्यवहार चलता रहता है। त्रिभुवन के लोग जिन-जिन बातों का सेवन करते हैं वह सब मेरे मुख में ही
अर्पण होता है। लेकिन याज्ञिक लोग इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि कर्म के प्रति उनका विकल्प रहता है। इस
प्रकार ये ब्राह्मण विकल्प बुद्धि होकर अभी भी सन्देह में पड़े हुए हैं यह ध्यान में रखो। वेदशास्त्रों का अध्ययन
करने के बाद भी मुझे किस तरह अर्पण करना चाहिये इस सम्बन्ध में वे ठीक से नहीं बताते। उनकी एक समिधा
से भी मेरा मन तृप्त होता है, तिस पर एकाध और होमद्रव्य अर्पण करने से मेरे मुख को अत्यन्त सुख होता है।
उन्हें मैं अपना सर्वस्व अर्पण करता हूँ। मुझे आशारहित से प्रेम है इसलिये मैं निरिच्छ हाथों की प्रतीक्षा करता
रहता हूँ। उनसे मिलने वाले छोटे से छोटे ग्रास की भी मैं प्रतीक्षा करता रहता हूँ। उनके निर्विकल्प हाथों से,
भक्ति भाव से अग्नि को जो कुछ अर्पण होता है, भले ही वह तृण हो, काष्ठ हो या तिल हो या घृत हो, वह
चित्स्वरूप मैं ही सेवन करता हूँ। इस प्रकार मैंने अग्नि की उपासना के रूप में दूसरे स्थल की पूजाविधि
बतायी। अब ब्राह्मण भक्ति कैसे की जाय सुनो। उद्धव! पूजा में अत्यन्त श्रेष्ठ और मेरी प्राप्ति का शीघ्र मार्ग
पूछोगे तो ब्राह्मण मेरी पूजा का श्रेष्ठ स्थान है। उनके भजन का एक आश्चर्य यह है कि उसमें जो भी कोई विघ्न
आता है वह उन्हें देखते ही दूर भाग जाता है। इसलिये उनके चरणों पर मस्तक रखकर उनके चरणों की धूल
शिरसावंद्य करनी चाहिये। आवाहन और विसर्जन के अतिरिक्त शालिग्राम में मेरा अधिष्ठान रहता है लेकिन वे