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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 869 में से

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पृष्ठ 336

३२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का स्मरण न हो। साथ ही वह नाजुक हो तथा चेहरे पर कृपा की छटा अंकित हो। जो मूर्ति देखते ही मन में बस
जाय, सबको अच्छी लगे और प्रेमपूर्वक उसकी ओर देखते ही अंतःकरण में प्रेम उमड़ पड़े ऐसी हो। वह
किंचित् हास्यमुख हो, मुद्रा अत्यन्त प्रसन्न हो। जिसके लावण्य के तेज से मन प्रसन्न हो उठता है वही है
सर्वांगसुन्दर मूर्ति। वहाँ बड़े-बड़े साधुओं को एकत्र कर एकनिष्ठा से अग्न्युत्तारणादि विधि करना चाहिये और
उसकी आँखों का आच्छादन निकाल कर किसी महान व्यक्ति के हाथों उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिये।
विस्तृत देवालय बनवाना चाहिये। उसके चारों ओर वन, उद्यान तथा उपवन बनवाना चाहिये। खेत, बगीचे,
तालाब तथा कुएँ बनवा कर सारा स्थान रमणीय एवं विश्राम करने योग्य बनाना चाहिये। अनेक प्रकार के वृक्ष
लगाने को 'वन' कहते हैं, केवल भक्ष्य फलों के पेड़ लगाने को 'उपवन' कहते हैं और केवल फूलों के पेड़
लगाने को 'उद्यान' कहते हैं। यह सारी तैयारी कर उसे कृष्णार्पण करना चाहिये। चारों ओर व्यापारी आकर
बाजार का निर्माण कर सकें इसलिये नगर बसाना चाहिये। रात-दिन वेदाध्ययन शास्त्रश्रवण तथा कीर्तन होना
चाहिये। इतना करने का सामर्थ्य न हो तो धनी लोगों से सहायता लेकर, भक्तिपूर्वक कार्य सम्पन्न करना चाहिये
अथवा भगवद्भक्तों को एकत्र बुला कर, उनमें जो श्रीमान हों उनसे सहायता लेकर उस धन से यह कार्य सम्पन्न
कराना चाहिये। एक बार देवता की प्रतिष्ठा करने के बाद जो पुनः उधर नहीं आता वह आलसी तथा अभागा है
यह जान लो। वह सच्चा भक्त नहीं है। जो मूर्ति की प्रतिष्ठा करने का कर्तव्य जानता है, धन खर्च कर भक्ति भी
कायम रखता है, वह छोटे कामों में भी सहभागी होता है और झाडू लगाने से भी पीछे नहीं हटता।
सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः।
गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद् यदमायया ॥ ३९॥
शिष्य तथा सेवक होते हुए भी जो प्रतिष्ठा और सम्मान को छोड़ स्वयं दंभरहित होकर देवालय में सफाई
आदि करता है और बड़े कौशल से रंगोली सजाता है, उनमें नानाप्रकार की आकृतियाँ निकाल कर उनमें अनेक
प्रकार के सुन्दर रंग भरता है उसे मेरे भजन में नितांत प्रेम रहता है। किसी गरीब भिखारी की तरह वह मेरी सेवा
करता है, निम्न स्तर सेवा करने में उसे बड़ा आनन्द आता है। मेरे भजन में वह कृत्रिमता नहीं लाता।
अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्।
अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्निवेदितम्॥४०॥
अनेक प्रकार की सम्पत्ति खर्च कर यहाँ देवालय बनवा कर देवता की प्रतिष्ठा की, मैं एक बहुत बड़ा भक्त
हूँ इस बात का अहंकार नहीं किया। मन में सच्ची भक्ति न होते हुए भी बाह्य रूप से प्रयास कर भक्ति का जो
विस्तार करता है वह ढोंग की कृति है, भक्त उसका स्पर्श भी नहीं करते। भक्त को अभिमान नहीं करना चाहिये।
मान-सम्मान की इच्छा नहीं करनी चाहिये, दांभिक भजन कभी नहीं करना चाहिये और किसी भी विषय की
अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। जो भी अनुभव आये, अथवा देवालय के निर्माण में जो खर्च हुआ हो अथवा जो
भी दान दिया हो उसका कभी उल्लेख नहीं करना चाहिये। यजमान जब अपनी की हुई बातों का स्वयं ही बखान
करता है तो वह सब निष्फल हो जाता है। प्राण निकलने के बाद जिस प्रकार प्रेत शेष रह जाता है उसी प्रकार वे
सारे धर्म निष्प्राण रह जाते हैं। किसान बुआई कर उसे ढँक देता है तभी अच्छी फसल उपजती है। उसी प्रकार
दान का उल्लेख न करने से ही वह फलदायी होता है। हम जब देवता को कुछ अर्पण करते हैं अथवा कोई अन्य
भगवान को कुछ अर्पण करता है तो हमें उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये। वह पुजारीपन का दोष होता है। देवता