श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है तभी दृढ़ विश्वास के साथ मेरा ध्यान लगता है। जब मेरा दृढ़ ध्यान लगता है, अनन्यभाव से मेरा भजन होने
लगता है तभी वह समस्त पदार्थों के साथ मुझे आत्मसमर्पण करता है। वेदों में कही गयी क्रियाओं से अथवा
लौकिक रूढ़ियों से मान्य क्रियाओं से अथवा देहसम्बन्धी क्रियाओं से भले ही अलौकिक लाभ हो जाएँ लेकिन
भाविक भक्त उनका स्वीकार नहीं करते। वैदिक लाभ में तो स्वर्ग से लेकर सत्यलोक तक के सभी दिव्य भोग
प्राप्त होते हैं लेकिन भक्त उन भोगों को हाथ तक नहीं लगाते। वह आनन्दपूर्वक भजन करता है और उसी में
तृप्त रहता है। लौकिक लाभों का समुदाय ही है कल्पतरु, कामधेनु तथा चिन्तामणि। लेकिन भक्त उन्हें भी
कृष्णार्पण कर आनन्द से हरिभजन करता है और उसी में तृप्त रहता है। गजांतलक्ष्मी घर में आये यही दैहिक
लाभ की पराकाष्ठा है। लेकिन भक्त उसे भी कृष्णार्पण करता है और तृप्तिभाव से भजन करके सन्तुष्ट रहता है।
ब्रह्मपद प्राप्त होने तक के सभी लाभ हेय समझ कर जो भक्त अपने प्राण तक बेच देता है और सब कुछ मुझे
अर्पण करता है, जो मेरी सेवा के लिये प्राण बेचता है, वह आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाता। वह मेरी ही कथा,
मेरा ही ध्यान और मेरा ही महोत्सव करता है।
मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वामुमोदनम्।
गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद्गृहोत्सवः ॥ ३६ ॥
ध्यान की स्थिति में ध्यान करता है अन्यथा कथानिरूपण करता है। निरन्तर मेरी ओर ध्यान देने के प्रति
दक्ष रहता है। मन को खाली नहीं रहने देता। मेरे जन्म और लीलाओं का निरूपण करने में उसे परम आनन्द
मिलता है और ऐसी स्थिति में उसका शरीर रोमांचित हो जाने के कारण प्रेम से कथा और भी अधिक उल्हसित
होती है। हरिकथा का रहस्य सुनकर भी जिसका हृदय द्रवित नहीं होता वह जल में रहकर भी शुष्क पाषाण की
तरह है। मेरी भक्ति का लक्षण सुनो। वह पुण्यदिवसों पर व्रत करता है और दीनों के उद्धार के उपाय स्वयं करता
है और दूसरों से कराता है। भागवत धर्म के विशेष पर्व नृसिंहजयन्ती, रामजयन्ती, वामनजयन्ती, कृष्णजन्माष्टमी
तथा शिवरात्रि तो उत्तम से उत्तम हैं। वैष्णवों के लिये शिवरात्रि विरुद्ध है यह कहना अत्यन्त असंगत है। कोई
पुराण उसके विरुद्ध नहीं है ऐसा व्यासजी भी स्पष्ट रूप से कहते हैं। शंकर तमोगुण से काला ही था किन्तु विष्णु
का ध्यान कर वह शुद्ध हो गया और विष्णु शिव के ध्यान से काला हो गया। इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरे के
गुणों से सुशोभित हो रहे हैं। इसलिये शंकर गाय के दूध की तरह श्वेत है और विष्णु अत्यन्त सुन्दर घनश्याम है।
ध्यान का महत्त्व इतना बड़ा है कि उनमें से प्रत्येक जन इस प्रकार दूसरे का ध्यान कर उसके गुणों से व्याप्त हो
गया। जब मूलरूप से ही दोनों में एकता है तो उपासकों को ही उसमें विरोध क्यों मालूम होता है ? इसीलिये
शिवरात्रि का पर्व वैष्णवों के विरुद्ध नहीं। यह व्रत सभी के लिये पवित्र है। जो पर्व भगवान को प्रिय है, जो सारे
कल्याणों की खान है जो दोनों ही पक्षों का तारक है और जो वैष्णवों की जननी है ऐसी यह एकादशी है। यह
एकादशी शुक्ल और कृष्णपक्ष की विधि से भक्तों को कन्धे पर बिठाकर उन्हें सायुज्यसिद्धि देकर मोक्ष पद पर
बिठाती है। यदि कोई शुक्ल एकादशी का व्रत करता है और कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत छोड़ देता है तो
केवल एक ही पक्ष का व्रत उसे सायुज्य तक कैसे पहुँचा सकता है ? दो पक्ष होने से पक्षी उड़ सकता है। उनमें
से एक को उखाड़ देने से वह उड़ नहीं सकता। उसी प्रकार कृष्ण का त्याग करने से सायुज्य तक नहीं पहुँच
सकता। उसी प्रकार एकादशी है। उस एकादशी के दिन जो भी उत्सव किया जाता है वह मुझमें ही आकर
मिलता है इसमें कोई सन्देह नहीं है। जो एकादशी का व्रत करता है उसके घर में मैं सदा विचरण करता रहता हूँ