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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 869 में से

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पृष्ठ 346

३३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सच है। उसके पास मेरी भक्ति राह देखती रहती है। सद्‌भक्ति ही क्यों, लेकिन गुरुप्रेम के कारण स्वयं मैं भी
दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक उसके पास खड़ा रहता हूँ। मुझे अपने भक्तों से जितना प्रेम नहीं है उतना अपने गुरुभक्तों
से है। लेकिन सत्संगति के बिना उत्तम भक्ति कभी भी नहीं प्राप्त होगी।
प्रायेण भक्तियोगेन सत्सङ्गेन विनोद्धव।
नोपायो विद्यते सध्यङ्प्रायणं हि सतामहम् ॥ ४८ ॥
मुझे प्राप्त करने के लिये भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग ये दो मार्ग हैं। उसमें ज्ञानमार्ग अत्यन्त कठिन है लेकिन
भक्तिमार्ग बिना किसी बाधा के भक्त को मुझ तक पहुँचाता है। इस संसार को पार करने के लिये अनेक लोगों ने
अनेक साधन बतलाये हैं लेकिन उन्हें व्यर्थ समझो। अनुभव से मेरा भक्तिमार्ग ही उत्तम दिखाई देता है। सारे
उपायों में जो अत्यन्त सरल, निर्विघ्न, नित्य और पवित्र है वह केवल मेरा भक्तिमार्ग है। ज्ञानमार्ग भक्त को बीच
रास्ते में ही व्याकुल कर देता है। खेत सींचने के लिये मोट और नहर यही दो उपाय हैं। मोट से कुएँ में एकत्र
पानी निकालते हैं और वह भी काफी परिश्रम के बाद कम मात्रा में ही मिलता है। पहले मोट, नाड़ा और बैलों
की जोड़ी इतनी तैयारी चाहिये, फिर उन बैलों को डंडे से पीटना पड़ता है और फिर उन्हें खींचना पड़ता है तब
कहीं जमीन का छोटा-सा भाग गीला हो पाता है। तिस पर भी कभी मोट फट जाती है या नाड़ा टूट जाता है
अथवा सहसा बैल बीमार पड़ जाता है या मर जाता है और ऐसा होते ही पानी का आना रुक जाता है और तैयार
फसल सूख जाती है। लेकिन नदी से निकले नाले की स्थिति वैसी नहीं है। एक बार नाली बना देने पर पानी का
प्रवाह अखण्ड चलता रहता है। ज्ञान भी मोट के पानी की तरह है। वेदशास्त्र पढ़कर मार्मिक पण्डित नित्य और
अनित्य का विचार करते हैं। उनमें से एक का झुकाव कर्म की ओर रहता है, एक संन्यास की ओर मुड़कर
मुण्डन करवाता है तो कोई इन दोनों को ही अनुचित ठहराता है। उनका कहना है कि देह को इस प्रकार के
संकट में नहीं डालना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि प्रारब्ध नाम की जो चीज है वही सच है। कोई कहता है
शब्दज्ञान ही सच है तो कोई कहता है इस सम्बन्ध में मौन ही रहना चाहिये। कुछ विद्वत्ता का त्याग करने की
बात करते हैं। जिसकी जितनी कल्पना चलती है वही बुद्धिमान कहलाते हैं। मूर्खों को कितना समझाया जाय?
कोई तप को श्रेष्ठ कहता है तो कोई मंत्रों के पुरश्चरण को तो कोई वेदाध्ययन को ही श्रेष्ठ मानते हैं। कुछ लोग
दान को श्रेष्ठ मानते हैं तो कुछ इन सबको खारिज कर देते हैं और मनुष्य को योगसाधना में फँसा देते हैं। वह
साधक को आसनों तथा मुद्राओं की लत लगाता है और वायु पीकर रहता है। बड़े पण्डितों को ज्ञान का अहंकार
होने के कारण सच्चे ज्ञान का कोई ज्ञान नहीं होता। ज्ञान मार्ग की यह अवस्था है। उसमें अनेक प्रकार के विघ्न
आते हैं। विकल्प से ही विद्वत्ता नष्ट होती है इसलिये विद्वत्ता से मेरी प्राप्ति नहीं होती। लेकिन मेरी भक्ति वैसी
नहीं है। भक्तिसम्पन्न लोग मेरा नाम लेकर ही मुझे प्राप्त करते हैं। नाम से कितनों का उद्धार हुआ इसकी गिनती
करना कठिन है। भागवत में यही कहा गया है। मेरे गुणों का वर्णन करने से अथवा हरिकथा नाम संकीर्तन करते
समय विघ्न का प्रवेश नहीं हो सकता। हरिनाम की गर्जना किले की तरह है। जहाँ हरिनाम का घोष होता है वहाँ
भला विघ्न का प्रवेश कैसे हो सकता है? मेरे भक्तों को देखकर वह भाग जाता है और मोक्ष के द्वार खुल जाते
हैं। मेरे भक्त पूरी तरह इच्छारहित रहते हैं। वे मोक्ष की आशा नहीं करते इसलिये मैं श्रीकृष्ण उनके भाव पर
लुब्ध रहता हूँ। सारांश बिना किसी विघ्न के मेरे पास आने के लिये भक्ति के सिवा कोई मार्ग नहीं है। सचमुच
भक्ति ही मेरी पसन्द है। इसलिये भगवान ने अपनी प्रिय भक्ति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया। उद्धव को