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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 869 में से

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पृष्ठ 342

३२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि।
क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम्॥ ४५॥
जल में पृथ्वी निराधार रहती हैं इसलिये वह घुल कर उसका पानी होने लगता है इसलिये उसे धारण करने
वाला मैं (धराधर) उसमें जाकर रहता हूँ। इसलिये वह मूल रूप से निराधार होते हुए भी साधार हुई। इसलिये
पृथ्वी मेरा पूजास्थान है। अब उसकी पूजा की विधि सुनो। गौ के आकार का स्थंडिल बनाकर उस पर मेरा
आवाहन करना चाहिये। इसका कारण यह हैं कि पृथ्वी गौ की तरह है। इसलिये जब उसकी पूजा का प्रसंग हो
तो उसी के आकार का स्थंडिल बनाना चाहिये। उस स्थंडिल पर पृथ्वी की पूजा करने के लिये धराधर का
आवाहन करना चाहिये। फिर उसके लिंग की और हृदयमंत्र की मंत्रोक्त पूजा करनी चाहिये। हृदय, कवच,
शिखा, नेत्र, शक्ति, बीज आदि लक्षणों से युक्त यंत्र स्थंडिल पर बनाकर धराधर की महापूजा करनी चाहिये। अब
स्वयं अपनी पूजा करना यह दसवाँ पूजा स्थान है। उसके भी लक्षण सुनो। पहले एक और उसके बाद पूर्ण
अर्थात् शून्य यही दसवाँ लक्षण है। अपना पूजास्थान स्वयं होना यह पूजा का आश्चर्यकारक साधन है। शून्य के
आगे कितने ही शून्य क्यों न हो लेकिन उनकी गिनती नहीं होती। लेकिन यदि पहले शून्य के नीचे एक भी रेखा
आती है तो गणित लगाते-लगाते मनुष्य परेशान हो जायेगा। शून्य में शाखा निकलने पर उसे एक कहते हैं। जो
एकपन से ही पूर्ण हो वह सहज ही परिपूर्ण रहता है। शून्य के आगे शून्य ही आ जाये तो गणित क्या होगा?
निरिच्छा में जब इच्छा उत्पन्न होती है तभी वह अपनी पूजा स्वयं करने लगता है। एक में एक मिलाने पर दोपन
से दूजा उत्पन्न होता हैं और एक में से एक घटाने पर शून्य ही देखने को मिलता है। अपना देवता वह स्वयं रहता
है। जरा देखो, अपना पुजारी भी वह स्वयं ही होता है और भक्त भी वह स्वयं ही ! इस पूजा का चमत्कार कितना
आश्चर्यजनक है, देखो। हृदय में ही चैतन्यघन आत्माराम है यह भावना रख, स्वयं तद्रूप हो वह जो भी भोग
भोगता है वे सब सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाते हैं। वह अपने मुख में कौर डालता है तो उसके मुख से ही मैं सुखी
हो उठता हूँ और परमपुरुष भी तृप्त हो उठता है। यही मेरी योग्य पूजा है। वह जो भी भोग भोगता है वे सब मुझे
ही अर्पण होते हैं। उसके आनन्द में स्वयं मैं ही तन्मय होने के कारण वह पूजा भगवान को ही पहुँचती है। मेरी
पूजा में यही प्रमुख पूजा है। जो यह पूजा करता है उसने अपनी स्वेच्छा से यह पूजा की यही उसका अर्थ
निकलता है। पूजा के बहाने उसने गरुजध्वज, अधोक्षज को वश किया यही समझना चाहिये। यह मेरी प्रिय पूजा
है। गरुड़ध्वज को भी यह प्रिय है। ऐसी भक्ति अधोक्षज को प्रिय है। वही मेरा प्रिय भक्त है। सगुण हो या
निर्गुण, दोनों मेरे ही स्वरूप हैं। उनके प्रति जो अपने भोग अर्पण करता है वही मेरी सच्ची पूजा है। आत्मभोग से
ही भगवान की जो पूजा की जाती है वह यही है अथवा सभी प्राणिमात्र समान हैं यह मानकर समान भाव से
समस्त प्राणिमात्र की जो पूजा की जाती है वह भी भगवान की ही पूजा है। ग्यारहवीं पूजा का विचार करें तो उस
संख्या में आगे और पीछे एक ही होता है क्योंकि जो ग्यारहों इन्द्रियों को देखे वही समस्त प्राणिमात्र का पुजारी
होगा। एक के एक बाद रखने से ग्यारह होता है। यह विचार जिसने जान लिया उसने समझ लो समस्त प्राणिमात्र
की पूजा कर ली। आत्मभोग अर्पण करने से अपने ही देह में परब्रह्म होने का ज्ञान होता है। वही परब्रह्म सभी
प्राणियों में, देह में, विदेह में, समान रूप से रहता है। सारे देहों को चलाने वाला आत्मा सचमुच मैं ही हूँ।
इसलिये भिन्न-भिन्न प्राणियों को देखकर जिसका मेरे प्रति प्रेम कम नहीं होता, प्राणिमात्र में ऊँच-नीच का भेद
होते हुए भी जो परब्रह्म में कोई भेद नहीं देखता वह देखता है कि प्राणिमात्र में समानता की भावना एक सी है।
मेरे साथ ऐक्य प्राप्त कर लेने के कारण उसे समस्त प्राणिमात्र में समानता दिखायी देती है। वही समस्त प्राणिमात्र