श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३१५
को देखकर मैं ही दौड़कर उसकी अगवानी करता हूँ। सभी तरह से अपने भक्त की भक्ति पर आसक्त होने के
कारण मैं दिन-रात उसी के पास रहता हूँ। जो सच्चे भोले भाले भक्त होते हैं वे भगवान को प्रिय हैं। उनकी क्या
बात करें? उनके बिना आधा पहर रहने के ऐवज में कोई मेरी पसन्द के ढेर सारे उपहार दें तो वे भी मुझे नहीं
चाहिये। ऐसे भोले भक्तों को मैं उत्तम भागवत मानता हूँ। स्वयं भगवान होते हुए मैं उनके चरणों पर गिर पड़ता
हूँ। वे सचमुच ही उत्तम हैं। उनके लिये मैं भूखा रहता हूँ। उनके लिये मैं सदासर्वदा सावधान रहता हूँ। उनके
लिये मैं दसों दिशाओं में भटकता रहता हूँ क्योंकि भोला भक्त परम दुर्लभ है। उद्धव! और बात क्या कहूँ? भोले
भक्त को देखते ही मैं उसके प्रेमस्वरूप अपना पद उसे अर्पण करता हूँ। वैसे मोल ही लगाया जाय तो मेरे भक्त
मुझसे भी अधिक श्रेष्ठ हैं। इसीलिये मैं उनके अधीन रहता हूँ और उनके वचन का कभी उल्लंघन नहीं करता।
मैं उनके वचन का उल्लंघन कर ही नहीं सकता। वसुदेव और देवकी की शपथ लेकर कहता हूँ कि भजन के
लिये भक्ति ही प्रमुख है। उद्धव! जिस प्रकार घृत के बिना भोजन व्यर्थ है, वाँझ स्त्री का मैथुन व्यर्थ है उसी
प्रकार भक्ति के बिना भजन सचमुच व्यर्थ है। देखो! जहाँ भाव है वहाँ भाग्य रहता है। जहाँ भाव रहता है वहाँ
निश्चित रूप से मैं रहता हूँ। जहाँ भाव रहता है अपने स्वभाव के अनुसार ईश्वर प्रकट होता है। जहाँ भाव रहता
है वहाँ विरक्ति रहती है। जहाँ भाव होता है वहाँ शान्ति प्रकट होती है। जहाँ भाव होता है वहाँ आत्मबोध से
भक्ति का विकास होता है। इस प्रकार भक्तों में मेरी भक्ति मेरे साथ ही स्वानंदपूर्वक नाचती रहती है। इसलिये जो
भोले और भावार्थी होते हैं वही उत्तम भागवत हैं। जो अनजान भक्त हैं वे इस प्रकार मेरा भजन कर मुझे प्राप्त
करते हैं। अब उत्तम भक्ति कैसी होती है यह तुम्हें बताता हूँ।
मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम्।
परिचर्या स्तुतिः प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम्॥ ३४॥
अनेक प्रकार के अवतारों की तरह शैव अथवा वैष्णवों द्वारा तैयार की गयी अनेक मूर्तियाँ, तीर्थ क्षेत्रों में
जिनका विशेष महत्व है ऐसी मूर्तियाँ या जो मूर्तियाँ ईश्वर ने स्वयं ही बनायी होती है या मनुष्य अथवा किन्नरों
द्वारा स्थापित की रहती हैं अथवा जो स्वयंभू ही उत्पन्न होती हैं, जिन्हें शास्त्रों में गंडकी मूर्ति कहा जाता है, उनमें
से अनेक भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए आयी रहती हैं। अनेक दैत्यों तथा राक्षसों द्वारा बनायी रहती हैं। उनमें
से अनेक तीन वर्णों के लोगों द्वारा अपने-अपने घरों में पूजन के लिये तैयार करायी रहती है। मेरी ऐसी मूर्ति का
दर्शन लेने के लिये लोग तत्परता से दौड़ कर जाते हैं और उनकी पूजा करने के लिये लोगों के मन में अत्यन्त
चाह उत्पन्न होती है। जो मेरे भक्त हैं वे मेरा ही स्वरूप होते हैं। मेरे संत स्वयं मैं हूँ। कंजूस का मन जिस प्रकार
धन के लिये लालायित रहता है उसी प्रकार मेरा मन उनकी भेंट के लिये उत्कंठित रहता है। उन्हें मेरी मूर्ति की
अपेक्षा संतों के भजन में अधिक संतोष प्राप्त होता है। घरबार छोड़कर साधुओं की संगत में ही उन्हें अत्यन्त
सुख मालूम होता है। चिन्तामणि को जिस प्रकार जतन करके रखा जाता है उसी प्रकार वे सज्जनों की मर्यादा को
जतन करते हैं। निज नये भजन करते हैं और उनकी पूजा करने में तो उनका मन तृप्त ही नहीं होता। पूजा का
साहित्य एकत्र कर बड़ी श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं। एकान्त में मेरी पूजा करते समय यदि कोई साधु पुरुष घर में
आ जाय तो वह उसकी पूजा न कर मेरी ही पूजा करता रहेगा, वह मुझे लात मारे या मेरा घात करने के लिये
उद्यत हो जाय किसी स्त्री को एक ही लड़का हो और कोई उस लड़के के मस्तक पर लात मारे तो माँ को सहज
ही गुस्सा आता है। फिर उस क्रुद्ध माँ का गुस्सा शान्त करने के लिये यदि उसे रेशमी साड़ी भी दी जाय तो भी