श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सदासर्वदा परिपूर्ण रहता है। चन्द्रमा का तेज दिन में क्षीण हो जाता है लेकिन इस मुखचन्द्र की शोभा अप्रतिम है।
उसके सामने चन्द्रसूर्य का तेज भी फीका पड़ता है लेकिन हरि का मुख सदासर्वदा स्वयंप्रकाश ही रहता है।
सगुण स्वरूप में वह नारायण आर्तरूपी चकोरों को अमृतपान, मुमुक्षुरूपी चातकों को स्वानंदघन तथा सर्वभूषणों
का भूषण बन गया है। चारों खदानों के प्राणियों की क्रियाएँ चार प्रकार की होती हैं, उसी प्रकार चारों हाथों के
चारों आयुधों की स्थिति है। वेदों को देवता समझ नहीं आये तब वे लज्जित हुए थे उस समय जगत में अपना
प्रताप दिखाने के लिये वे हरि के हाथों के आयुध बन गये। सामवेद शंख बना, यजुर्वेद चक्र हुआ अथर्ववेद तेज
धार की गदा बना और ऋग्वेद कोमल सा कमल बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने चारों वेदों को चार हाथ में
संतुष्ट कर दिया। तब उपनिषद भी जग में नाम कमाने के लिये भगवान के बाहूभूषण और बाजूवंद बने और
हाथ के कंगन 'ब्रह्म मैं हूँ' इस शब्द ध्वनि का स्वर निकालने लगे। उसी प्रकार उनके नाखून, केश, उँगलियाँ
तथा उँगलियों में धारण की हुई तिकोनी, षटकोनी आदि विविध आकारों की रत्नजड़ित अँगूठियाँ उपासकों के
लिये उपासना का साधन बन गये हैं। हृदय पर स्थित पदक का तेज तो अपूर्व ही है। पेट पर त्रिगुण की तीन
रेखायें शोभायमान हैं और कमर की मेखला में लगाये घागरे में का कलश कितना उत्तम शोभायमान है। दोनों पैर
स्फटिक के खम्भों की तरह सुन्दर लगते हैं। लेकिन स्फटिक के पैर तो निर्जीव होते हैं। लेकिन हरि के पैर शरीर
का अंग होने के कारण सचेतन हैं। दोनों पैरों पर ध्वज, वज्र, अंकुश, ऊर्ध्वरेखा तथा पद्म आदि चिह्न तथा
यवांकित सामुद्रिक लक्षण होने के साथ पैरों की आकृति अत्यन्त सुन्दर है। पैर के तलवों की रक्तिम आभा और
उस पर घनश्याम वर्ण की छटा—मानों आकाश में इन्द्र धनुषों का समुदाय उमड़ पड़ा हो। जगन्नायक को इस
प्रकार सगुण हुआ देख दसों दिशाओं ने उनके चरणों के पास आने का साहस किया और अपना आत्मसुख साधने
के लिये वे हरि के पैरों की दस उँगलियाँ बन गयीं। चन्द्रमा भी कृष्णपक्ष में क्षीण हो रहा था इसलिये उसने भी
हरि के चरण धर लिये और वह उनके पैरों के नाखून बनकर स्वयं अत्यन्त पवित्र हो गया। यह मालूम होते ही
शंकर ने उस चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया तो सहज ही भगवान के चरणों का तीर्थ उसके
मस्तक पर से बहने लगा और उसी जल से संसार का उद्धार हुआ। देवता को इस प्रकार सगुण हुआ देख चारों
मुक्तियाँ उसके चरणों के पास आकर नम्र हो गयीं, इसीलिये संत देवमूर्ति के आगे सदा तत्पर रहते हैं। उन चार
मुक्तियों में सलोकता और समीपता ये दोनों दो पैरों के बीच में पैंजन के रूप में गरजते ही सरूपता पद का भूषण
बन गयी और सायुज्यता पैंजन बनी। बड़े-बड़े राक्षस भी उस पैंजन का भय खाते हैं। सर्वसुख हरिचरणों में है
और उसी के चरणों में समाधि भी है। हे उद्धव ! धैर्य, वीर्य, उदार, कीर्ति, गुणगांभीर्य, शौर्य ख्याति इसका कारण
मेरी सगुण मूर्ति ही है इसे अच्छी तरह ध्यान में रखो। मेरी इस मूर्ति के दर्शन से आँखों की प्यास मिटती है,
जन्म-मरण का बन्धन टूटता है और विषयों का पूरी तरह नाश हो जाता है। मेरी मूर्ति का दर्शन करने के बाद
योग-याग का श्रम नहीं करना पड़ता, गिरि-कन्दराओं में नहीं जाना पड़ता और न किसी प्रकार के संकट का
सामना करना पड़ता है। आसन, पात्र आदि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और न समाधि के साधन ही जरूरी
हैं। हे उद्धव ! मुझे प्राप्त करने का मुख्य साधन मेरी भक्ति ही है इसे ध्यान में रखो। मेरी पूजा के स्थान ग्यारह हैं,
वहाँ मेरा आवाहन कर मैंने बतायी हुई मूर्ति का ध्यान करना चाहिये। मेरी पूजा करें, मेरा ध्यान, कीर्तन करें, मेरा
नामकरण करें तथा मेरे गुणों का वर्णन करें। रात दिन मेरी कथा कथन करें, रात दिन मेरे चरित्र की बातें सुनायें,
इस प्रकार जो मेरा ध्यान करता है उसे ही मेरा सच्चा भक्त कहना चाहिये। दीपक की ज्योति हाथ में आते ही पूरे
घर में प्रकाश फैलता है उसी प्रकार जब मेरी मूर्ति की ओर ध्यान एकाग्र हो जाता है तभी सारा ज्ञान प्राप्त होता