दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०४
की माला से विभूषित थी। मांस रहित अस्थि-पंजर, विशाल
मुख लपलपाती हुई जीभ, डरावनी लाल-लाल भोतर धँसी हुई
आँखें, भयंकर गर्जना करती, अनेक दैत्यों का वध करती,
कुछ को मुँह के द्वारा चबाती हुई, अस्त्र-शस्त्रों को चूर्णित
करती हुई, हाथी घोड़ों को मुँह में डालती सैन्य संहार करने
लगी। तब कुपित होकर दैत्य सेनापति चण्ड-मुण्ड विपरीत दिशाओं
से माँ पर टूट पड़े। दोनों के चक्रों से छुटे हुये बाणों को मुख
में लेकर काली देवी ने भयंकर गर्जना की और खड्ग-से 'हं' का
उच्चारण कर केश पकड़ कर पहले चण्ड का मस्तक काट लिया,
उसे मरा हुआ देख मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा । उसे भी रोष
में भर देवी ने धरती पर सुला दिया। तत्पश्चात् काली ने उन
दोनों के मस्तक हाथ में लेकर चण्डिका के पास जाकर प्रचण्ड
अट्टहास करते हुए कहा—देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड दोनों
महापशुओं को भेंट किया है अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और
निशुम्भ का वध स्वयं करना।
चडि कोपे, क्रोध अर्थ में प्रयुक्त होने वाली धातु से :चण्ड'
शब्द प्रतिपादित होता है इसी से चाण्डाल भी बनता है। 'मुडि'
खण्डने से मुण्ड बनता है; खण्डन करने में अश्रद्धा और द्वैत
भाव का होना अनिवार्य है। क्रोध भाव से चाण्डाल के आचरण
होते हैं। क्रोध आने का मूल कारण द्वैत भाव ही है और
द्वैत भाव का जनक अज्ञान ही है । इष्ट पर दृढ़ता करने
के कारण काकभुशुण्डी को लोमश ऋषि के शाप का भाजन
होना पड़ा, किन्तु क्षमा और सहिष्णुता गुणों के द्वारा ही पुनः
ऋषि के कृपा भाजन बन गये ।
उपर्युक्त दृष्टान्त चण्ड-मुण्ड के वध के व्यावहारिक प्रयोग
है। इस अध्याय में माँ काली के द्वारा जो चंड मुंड का वध किया
गया है। वे ये क्रोध रूप चंड और द्वैत बुद्धि रूप मुंड हैं
साधक को इनका बड़ा ध्यान रखना चाहिए । जो इन दोनों
का वध कर लेता है उसे जगत् में ख्याति मिलती है। **
१०५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अष्टमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशांकुश बाण चापहस्ताम् ।
अणिमादिभिरावृत्तां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
मैं गौर वर्णाङ्गाभामयी, करुणा तरङ्गायित नयना, पाश,
अंकुश, बाण और धनुष हाथ में धारण करने वाली अणिमा
आदि सिद्धियों की किरणों से आवृत्ता भवानी का चिन्तन करता
हूँ।
महर्षि कहते हैं कि चण्ड-मुण्ड दैत्यों के मारे जाने तथा
उनकी सेना के संहार के संदेश से दैत्यराज शुम्भ बड़ा क्रोधित
एवं क्षुभित हुआ और उसने सम्पूर्ण दैत्य सेना को युद्ध के लिए
प्रस्थान करने की आज्ञा दी। उसकी सेना का संकेत-अपनी
सेनाओं सहित उदायुध नाम के छियासी सेनापति, कम्बु नाम
वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक सवाहिनी, कोटिवीर्य कुल के
पचास और धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति अपनी-अपनी सेना
के साथ तथा कालक, दौर्हद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध
के लिए प्रस्थित हुए। इस भयंकर विशाल वाहिनी को देख
चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार, शंख की ध्वनि तथा सिंह की
दहाड़ की ध्वनि से आकाश पृथ्वी को गुँजित कर दिया, घण्टे की
ध्वनि दिशाएँ ध्वनित करने लगी। काली ने उस भयानक ध्वनि
से अपना मुख बढ़ा लिया। इसी बीच असुरों के विनाश और
देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा
इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ-जो रूप, वेश भूषा, वाहन, बल,
पराक्रम और आयुधों में अपने-अपने देवताओं के समान थी,
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०६
उनके शरीरों से निकलकर चण्डिका की सहायता के लिए दैत्य-
दलन हेतु समरांगण में आ गईं ।
बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, दैत्यों की वाहिनी प्रातः कालीन ओस
की बूँदों की तरह विनष्ट हो रही थी, तभी रक्त बीज इन्द्र की
शक्ति ऐन्द्री के वज्र से घायल हो गया । उसकी प्रत्येक रक्त-बूँद
से उसी के समान बल-पराक्रम सम्पन्न आयुधों से युक्त भयंकर
राक्षस वीर पैदा होकर मातृकाओं को मारने लगे ।
यावन्त पतितास्तस्य शरीराद्रक्त विन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद् वीर्यबल पराक्रमाः ॥ ८/४४
ज्यों-ज्यों इस रक्तबीज के शरीर पर प्रहार होता, रक्त-
पतन से अनेक असुर वर्षा में पैदा होने वाले जीवों की तरह पैदा
हो कर लड़ने लगते । इस दृश्य से देवता बड़े भयभीत हुए । उन्हें
उदास देखकर चण्डिका ने काली को अपने शस्त्रपात से गिरने
वाले रक्त विन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को मुख
से भक्षण करने का आदेश दिया । चामुण्डा की इस प्रक्रिया से
महा भयावह रक्तबीज युद्ध में मारा गया । देवताओं को अनुपम
हर्ष प्राप्त हुआ । मातृ-गण नृत्य करने लगा ।
इस अध्याय में रक्तबीज वध का प्रसङ्ग बड़ा शिक्षा प्रद
एवं महत्त्वपूर्ण है । बड़ा सुन्दर संकेत है—यह 'रक्त-बीज'
इच्छाओं का नाम है । मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं
होती हैं । प्रत्येक इच्छा सगर्भा होती है जैसे ही एक इच्छा
समाप्त होती है वैसे ही उससे भी अधिक प्रबल इच्छा पैदा हो
जाती है । इससे विषयों की अभिलाषा नष्ट करना साधक के
लिए कितना कठिन है । यह इस प्रसङ्ग से समझ सकते हैं ।
इन्द्रियाँ अथवा करण तो चौदह हैं; परन्तु प्रत्येक करण के विषय
अनन्त हैं । उनका पार पाना बहुत कठिन है । जैसे रक्त बीज
के रक्त की एक बूँद में जब इतनी प्रबलता है भला बताइए
कितनी बूँदें हुई होगी । यही असंख्य शब्द का प्रयोग विषयों की
१०७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वासनाओं के लिए है । इनके मारने का उपाय यही है कि रक्त
बीज के रक्त की बूंद पृथ्वी पर न गिर सके, यह कार्य महाकाली
को सौप दिया, जिसने उसे सम्पन्न किया । विषयासक्ति रक्त-
बोज के मरने पर ही शान्ति को प्राप्त होती है ।
श्री अम्बे जी की आरती
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली.
तेरे ही गण गायें भारती ।
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती ॥ १
तेरे (जगत के) भक्तजनों पर भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पड़ो करके सिंह सवारी,
सौ-२ सिंहों सी बलशाली, अष्टादस भुजाओं वाली,
दुष्टों को तो तू ही संहारती ॥ २ ओ मैया हम सब
माँ बेटे का इस जग में, बढ़ा ही निर्मल नाता ।
पूत कुपुत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता ।
सब पर अमृत बरसाने वाली, सबको हर्षाने वाली-
मैया भँवर उतारती-ओ मैया सम सब उतारें-
नहीं मांगते धन और दौलत, ना मांगे चांदी ना सोना,
हम तो मांगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना,
सब पर करुणा दर्शाने वाली, विपदा मिटाने वाली
सतियों के सत को संवारती ॥ ओ मैया सब
चौदस के दिन तेरे भवन में, भीड़ लगी है भारी ।
जो कोई माँगे सोई फल पावे, कोई न जाये खाली ।
सब की झोली भरने वाली, मांगी मुरादों वाली ।
ओ मैया हम सब उतारें तेरो आरती ॥
खनन-खनन घण्टा बाजे, घण्टों की झन्कार ।
तेरे भवन में मैया तेरी हो रहा जय-जय कार ॥
द्वार खड़े माँ तुझे पुकारें, एक बार तो आजा ।
भक्त खड़े, माँ तुझे पुकारें आकर दर्श दिखाजा ॥
अम्बे तू है जगदम्बे कालो, जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैय्या हम सब उतारें०
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०८
नवमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बन्धूक काञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशांकुशौ च वरदां निजवाहुदण्डैः ।
विभ्राणमिन्दु शकलाभरणं त्रिनेत्र
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥
बन्धूक-दुपहरिया पुपहरिया पुष्प की रक्तिमा-लालिमा
तथा स्वर्ण की पीतिमा की कान्ति से सुशोभित अर्द्ध नारीश्वर
के श्री विग्रह की शरण लेता हूँ; जो अपनी भुजाओं में सुन्दर
अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा धारण किये हुए हैं;
जिसके ललाट पर अर्द्ध चन्द्र का आभूषण आभूषित है और तीनों
नेत्रों से सुशोभित है ।
मधु-कैटभ का वध हो या धूम्रलोचन का ध्वंस, अथवा
चण्ड-मुण्ड संहार या फिर रक्तबीज के रक्त-पान से विनाश,
इन सब का उद्धार हुआ करुणामयी माँ के हाथ से। यह दैवी
कृपा का विधान है कि जिसे हम लय, प्रलय, विनाश, ध्वंस
कहते हैं वह कष्टों से, दुःखों से मुक्ति है। इसी में लोक-कल्याण
निहित है, अतः प्रत्येक मङ्गलाकांक्षी को भगवती का ध्यान
करना चाहिए ।
भगवती के चरित्र-लीला के आनन्द में निमग्न जिज्ञासु
राजा ने महामति मेधा से विनत भाव से कहा—भगवन् ! आपके
द्वारा रक्त-बीज के वध से सम्बन्धित देवी-चरित्र की यह अद्भुत
महिमा जानकर बड़ी उत्सुकता हो रही है कि इसके पश्चात्
क्रोध में भरे हुए शुम्भ-निशुम्भ ने क्या किया; सुनना चाहता
हूँ ।
महामुनि मेधा ने बताया—राजन् ! जन-धन-बल का संयोग
जैसे मनुष्य को खुशी देता है उसी प्रकार इनका वियोग महा
१०६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दुःखदायो बन जाता है, वह क्रोध में आग बबूला हो जाता है ।
अतः स्वाभाविक था कि रक्त बीज जैसे सेनापति तथा विशाल
सेना के मारे जाने पर शुम्भ-निशुम्भ का बौखला जाना
स्वाभाविक था । विमर्ष में भरकर निशुम्भ देवी की ओर दौड़ा ।
इसके साथ विशाल दैत्य सेना थी । शुम्भ भी मातृगणों से युद्ध
करके चण्डिका को मारने आ पहुँचा । दिव्य अस्त्रों से भयंकर
युद्ध हुआ । निशुम्भ ने तीखी तलवार से देवी के वाहन पर प्रहार
किया, फिर क्या था ? माँ ने उसके अनेक प्रहारों को अपने रण-
कौशल से छिन्न-भिन्न कर दिया । काली ने दोनों हाथों के आघात
से पृथ्वी को हिला दिया । शिवदूती ने दानवों के लिए अमंगल-
कारी अट्टहास किया, देवों ने जय-जयकार किया, इसी उपयुक्त
अवसर पर देवी ने राक्षस शुम्भ पर अपना शूल चला दिया, वह
मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
भाई के पतन को निशुम्भ सहन न कर सका, उसने अपने
बाणों से देवी, काली तथा सिंह को घायल कर दिया । दुर्गम
पीड़ा विनाशिनी दुर्गा ने कुपित होकर उसके बाणों और चक्रों
को काट कर अपने शूल से उसकी छाती विदीर्ण कर दी, जिससे
दूसरा महाबली पुरुष निकल कर देवी को ललकारने लगा, देवी
ने ठठाकर हँसते हुए तीक्ष्ण खड्ग से उसका सिर काट डाला ।
सिंह ने दैत्यों की गर्दन नोची, कालिका ने अनेक दैत्यों का भक्षण
किया । वैष्णवी ने चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए । शेष
भाग गये । इस प्रकार निशुम्भ का वध हुआ ।
इस युद्ध से विदित हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा
इनकी शक्तियाँ-ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी, कालिका, दुर्गा सभी
एक हैं; इस एक तत्व की उपासना ही लक्ष्य होना चाहिए चाहे
इष्ट किसी भी स्वरूप को बनायें ।
दूसरी बात यह है कि निशुम्भ की छाती से दूसरे पुरुष का
पैदा होकर पुनः देवी को ललकारने का तात्पर्य यह है कि चित्त
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११०
से आसुरी वृत्तियाँ संयम, नियम के द्वारा नियंत्रित करने पर
भी पैदा हो जाती है, जो हमारी दैवी वृत्तियों को निगलना
चाहती है । अतः साधक को सजग रहना चाहिए, माँ की शरण
लेनी चाहिए । माँ के निम्न मंत्र से सब मनोरथ पूरे हो सकते
हैं-
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ कवच ४४ ॥
माँ की शरण में पहुँचने पर मनुष्य की निश्चित ही समस्त
कामनायें पूर्ण होती हैं और वह परम ऐश्वर्य का भागी होता है ।
अतः माता की शरण लेना जीवन की सार्थकता है ।
१११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दशमोऽध्याय
ध्यानम्
ॐ उतप्त हेम रुचिरां रवि चन्द्र वह्नि-
नेत्रां धनुश्शर युताङ्कुश पाश शूलम् ।
रम्यैर्भुजैश्चदधतीं शिव शक्ति रूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
मैं तपाये हुए स्वर्ण के समान सुन्दर, सूर्य, चन्द्र और
अग्नि तीनों नेत्र वाली; अपनी सुन्दर भुजाओं में धनुष, वाण
अंकुश, पाश और शूल धारण किए तथा मस्तक पर अर्द्धचन्द्र
धारण किए हुए शिव शक्ति-शक्ति स्वरूपा कामेश्वरी का हृदय
में चिन्तन करता हूँ ।
खोट निकालने के लिए सोने को अग्नि में तपाया जाता
है, अतः देहाभिमान को गलाने के लिए साधना की अग्नि में
रहना चाहिए । रवि - चन्द्र वह्नि, क्रमशः प्रकाश,
आह्लादक एवं दाहक एवं पाचक है, प्रकाश के तीन ही आधार
है, घिना प्रकाश के अन्धकार विलीन हो नहीं सकता, सबकी
प्रकाशिका एक मात्र सच्चिदानन्दमयी माँ ही हैं, वे ही भक्त
पर रीझकर समस्त कामनायें-पूर्ण करती हैं अतः कामेश्वरी हैं
उन्हीं का ध्यान करना अपेक्षणीय है ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-राजन् ! अपने प्राणों के
समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सेना का
संहार जान संहार जान शुम्भ कुपित होकर बोला-“दुष्ट दुर्गे !
तू बल के अभिमान में बड़ी मानिनी बनी हुई है ।” किन्तु दूसरी
स्त्रियों का बल लेकर लड़ती है । माँ ने कहा-‘अरे धूर्त' मैं अकेली
ही हूँ, मेरे सिवा संसार में दूसरा कौन है, ये सब मेरी विभूतियाँ
हैं, मुझमें प्रवेश कर रहीं हैं ऐसा कहते ही केवल अम्बिका देवी
ही अवशेष रहीं ।
रहस्य त्रय: प्राधानिक, वैकृतिक, मूर्ति रहस्य, क्षमा-प्रार्थना व उपसंहार
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११२
इसके पश्चात् देवता-दानवां के देखते देखते देवी और
शुम्भ दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । एक दूसरे ने अपने
रण कौशल से भयंकर दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से अपने
शत्रु के प्राण लेने चाहे । अन्त में माँ ने अपने त्रिशूल से शुम्भ का
हृदय छेद दिया और उसके प्राण-पखेरु उड़ गये । उस दुरात्मा
के मारे जाने से सम्पूर्ण जगत प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया
और आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा । नदियाँ भी ठीक मार्ग
से बहने लगीं ।
गुरु के द्वारा हृदय-ग्रन्थि के छेदन पर तात्विक ज्ञान
होता है, आसुरी वृत्तियों के नाश पर ही इन्द्रियों के देवता
प्रसन्न होते हैं सद्वृत्तियों से स्तुति की जाती है ।
इस अध्याय की कथा में समस्त दैत्यों की समाप्ति पर
देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवती की स्तुति की है, क्योंकि दैवी-
भाव तभी उदय होते हैं जब विकारों के दैत्य नष्ट हो जाते हैं-
इच्छा द्वेष समुत्थेन द्वन्द मोहेन भारत ।
सर्व भूतानि सम्मोहं सर्गेयान्ति परन्तप ॥ २६
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द मोह विमुक्ता भजन्ते माँ दृढ़व्रताः ॥ २८
जरा मरण मोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्मचाखिलम् ॥गी०अ०७/२७/२६
अर्थात् इच्छा द्वेष के कारण मोहित हुआ जीव बेचारा
‘जन्म-मरण (पुनरपिजननम् पुनरपि मरणम् पुनरपि जननी
जठरे शयनम्)’ रूपी संसार में पड़ा हुआ है । जिन पुण्य
बातों ने इन पर विजय प्राप्त की है वे ही भगवान् की सच्ची
भक्ति कर सकते हैं । मेरी भक्ति तथा मेरे लिए किया गया
पुरुषार्थ ही संसार को छुड़ा सकता है । वह भक्त ब्रह्म स्वरूप
हो जाता है । मेरी भक्ति अथवा मेरा भजन वही व्यक्ति कर
पाता है जो द्वन्द मोह से विमुक्त है वह ध्यान देने योग्य शब्द
११३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
है साथ ही यह भी जान लेना जरूरी है कि असुर कौन है ?
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ गीता १६/४
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकार संयुक्ता कामराग बलान्विता ॥ १७/५
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुर निश्चयान् ॥ १७/६
दम्भ अहंकार, काम, राग, मद मोह से भरे लोग असुर
हैं असुषु-देहेन्द्रियादिषु रमते, वासनासु रमन्ते त एव असुराः जो
वासना पूर्ति में, इन्द्रियों को तृप्त करने में लगे हैं; वे ही असुर
हैं । गीता के सोलहवें अध्याय के सातवें मन्त्र से अठारहवें मन्त्र
तक शुम्भ-निशुम्भ की समस्त आसुरी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हो
जाती हैं । उदाहरणार्थ श्लोक १०/११ प्रस्तुत हैं-
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद् गृहीत्वा सद् ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचि व्रताः ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोग परमा एतावदिति निश्चिताः ॥गी.अ.१६/१०-११
काम भोग परायण असुर होते हैं। ‘नितरां शेरते चेष्टा येषाम्’
जो बेहोश हैं वे निशाचर हैं। शुम्भादि दैत्यों के नाम भी सार्थक
हैं। आपने अभी सुना है कि असुर वे हैं जो इन्द्रियों की पूर्ति
में प्रसन्न होते हैं और साधक या सुर वे हैं जो इच्छाओं की
निवृत्ति में प्रसन्न होते हैं ।
साधक के जीवन में यही प्रबल पुरुषार्थ है कि वह
इच्छाओं की निवृत्ति करे । विषयासक्ति-जिसे रक्त-बीज बताया
गया है, उसका नाश करें तभी काम-क्रोध, लोभ, मोहादि पर
विजय मिलेगी । इसी से परम सुन्दरी, परम सुकुमारी पराम्बा
की सवारी सिंह है जो गहन विपिन का राजा है, स्वयं शिकार
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११४
करता हैं। जो लोग दूसरों की कमाई खाते हैं और भोगी हैं
वे परा शक्ति स्नेह मूर्ति माँ को कैसे प्राप्त कर सकते हैं । श्रुति
भी कहती है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” यह आत्मा कमजोर
दिल-दिमाग वालों की पहचान में नहीं आ सकता, क्योंकि
विपर्यय ज्ञान-जो ध्रूमलोचन नाम से है, का मिटाना शूरवीरों
का काम है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू-आत्मज्ञान रहित होता
है। धन दुर्मदान्ध होता है अतः उसे ज्ञान विज्ञान रूपी दिन में
विवेक दिखाई नहीं देता ।
इन तीनों चरित्र के मनन से यह स्पष्ट हो जाता है कि
हमारे लक्ष्य में बाधक राग-द्वेष (मधु-कैटभ) अस्मिता अहंकार
(महिषासुर), विषयासक्ति तथा कामादिक विकारों (रक्त बीज,
शुम्भादि) के नष्ट होने पर ही दैवी गुणों का विकास होता है ।
११५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एकादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयन त्रय युक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशामीति करां प्रभजे भुवनेशीम् ॥
प्रातः कालीन सूर्य कान्ति के समान देदीप्यमान, चन्द्र -
मुकुट धारिणी, उच्च स्तनों से युक्त, तीनों नेत्र-सूर्य, चन्द्र, अग्नि
धारिणी, मन्द-मन्द मुसकान मुख छटा प्रसारिणी तथा हाथों में
अंकुश, पाश, अभय और वरद मुद्रा धारिणी माँ भुवनेश्वरी को
मैं नमन करता हूँ ।
महामुनि मेधा ऋषि कहते हैं कि असुरों के समापन होने
पर प्रसन्नचित्त होकर देवताओं ने स्तुति की-हे विश्वेश्वरी !
शरणागत संकट निवारिणी, भक्त जन कल्याणिनी माँ जगदम्बे
प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा करो, तुम ही इस संसार की आधार
हो, क्योंकि तुम ही पृथ्वी रूपा हो, तुम ही जल रूप होकर जगत
को तृप्त करती हो । तुम ही अनन्त बलशालिनी, वैष्णवी शक्ति
तथा जगत की कारण रूपा माया हो, तुमसे ही यह जगत मोहित
है । तुम्हीं मुक्ति दायिनी हो ।
हे माँ ! सम्पूर्ण विद्यायें तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं ।
जगत की सम्पूर्ण स्त्रियाँ तुम्हारी मूर्तियाँ हैं । तुमने ही विश्व को
व्याप्त किया है । तुम्हीं परा वाणी होने के कारण अवर्णनीया
हो ।
सर्व स्वरूपा देवि, बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में
विराजमान रहने वाली, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायिनी, कला-काष्ठादि
के रूप में उत्पत्ति, स्थिति एवं संहारकारिणी, मंगलमयी, मंगल
दायिनी, सर्व सिद्धि प्रदात्री, शरणागत वत्सला नारायणी आपको
नमस्कार है । यहाँ ‘वत्सला’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । जैसे सद्यप्रसूता
धेनु (गाय) अपने बछड़े को अपनी जीभ से चाटकर शुद्ध और
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११६
स्वच्छ कर देती है । उसे अपने वत्स के शरीर पर लगे हुए मल-
मूत्र के छुड़ाने में घृणा न होकर प्यार उमड़ता है, इसीलिए
'वत्सला' कहते हैं ।
एक बालक मल-मूत्रावेष्टित पड़ा है, उसकी आँखों और
नाक से भी मैल निकल रहा है, रोता हुआ दीन-हीन अवस्था में
पड़ा हुआ है । ऊपर की ओर हाथ उठाये हुये माँ-माँ पुकारता
है । उसके आर्त स्वर को सुनकर ऐसी कौन माँ है जो दौड़कर
उसे छाती से न लगा ले और अपनी करुणामयी दृष्टि तथा
कोमल स्पर्श से निहाल न कर दे । संसार का नियम है कि साफ,
स्वच्छ, हँसते-खेलते बालक को तो सभी लोग गले लगा लेते हैं,
किन्तु वैसे बालक की शरणागत माँ ही है । इसी प्रकार सर्व -
विध साधन सम्पन्न साधक को सभी अपना बना सकते हैं किन्तु
जो दीन-हीन साधन विहीन अनाथ है, उसे तो करुणामयी माँ ही
गले लगाती है । अपना असीम प्यार बरसाती है और स्वयं उसे
शुद्ध कर लेती है ।
दीनों-हीनों, पीड़ितों की रक्षिके माँ, तुम ही ब्रह्माणी हो,
रुद्राणी हो, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, नारसिंही, वाराही भी
तुम ही हो, अपने अनेक आभूषण और आयुध धारण करके तुम्हीं
प्रकट होती हो । तुम्हें बारम्बार नमस्कार है । वृत्रासुर पर इन्द्र
की शक्ति होकर उसकी संहारिणी रूपा तुम्हीं हो । हे चण्ड-मुण्ड
विनाशिनी देवी ! तुम्हीं लक्ष्मी लज्जा, श्रद्धा, पुष्टि, स्वाहा,
स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि, महा विद्या, महा अविद्या रूपा नारायणी
हो, तुम्हें नमस्कार है । मेधा, सरस्वतो ऐश्वर्यरूपा, वाग्मी,
पार्वती, तामसी, महाकाली, नियता, संयता, ईशा सबको
अधीश्वरी तुम ही हो । हे सर्वस्वरूपे ! शक्ति सम्पन्ने ! दिव्य
रूपे माँ दुर्गे तुम्हें नमस्कार है । हे कल्याणी ! हे भद्र कालो !
हे जगदम्बे, सर्व प्रकार अपने आयुधों से रक्षा करने वालो
तुम्हें नमस्कार है ।
११७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सर्व रोग विनाशिनी, सर्वमनोरथ सिद्धिदायिनी, विपद्
विदारिणी, सर्व शरण प्रदायिनी, माँ तुम्हें नमस्कार है । हे
देवि ! दैत्यों के विनाश हेतु आपने विविध रूप धारण किये थे,
आपको नमस्कार है ! विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने
वाले शास्त्रों में; तथा वेदों में तुम्हारा ही वर्णन है । तुम्हीं
संसार को अविद्या द्वारा बांधने वाली और विद्या द्वारा मुक्त
करने वाली हो, अतः तुम्हें नमस्कार है ।
जहाँ राक्षस, शत्रु, सर्प आदि विषैले जीव, डाकू और
भयंकरतम परिस्थितियों में रहकर तुम ही विश्व की रक्षा करती
हो । हे विश्वनाथ वन्दनीये ! जो तुम्हें प्रेम से प्रणाम करते हैं;
उन्हें आपके आश्रय का अनुभव होता है । अभी आसुरी
सम्पत्ति का विनाश कर दैवि-सम्पति का विकास किया है । हम
सब आपकी शरण में हैं; कोटि-कोटि नमन करते हैं प्रसन्न होकर
वरदान दीजिए ।
हे मातु भवानी, जगजननी, संकट हरणी, जन मन भरने दो ।
माँ हम सब तेरे बालक हैं, चरण तले निज तुम रहने दो ॥ हे०
देव पड़े जब विपदा में थे, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गरजो, फिर रूप वही दरसाने दो ॥ हे०
शुम्भ निशुम्भ को तुमने मारा, महिषासुर को तूने पछाड़ा ।
तूने रक्त बीज संहार किया, वह परम छटा बरसाने दो ॥ हे०
तूने जीवन दान दिया है, तूने उबारा, तुम्ही उबारो ।
भव पार लगे जीवन नैया, सब जन-मन को हरषाने दो ॥ हे०
इस प्रकार देवताओं की स्तुति को सुनकर माँ जगदम्बे
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें वरदान मांगने के लिये कहा । तब
देवों ने कहा—
सर्व बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरिविनाशनम् ॥ ११/३६
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११८
हे तीनों लोकों की अधीश्वरी माँ ! हमारी समस्त बाधाओं
को दूर करते हुए शत्रुओं का विनाश करो। यह सुनकर
देवी ने कहा—“हे देवगण ! अठारहवें मन्वन्तर में (१)
शुम्भ-निशुम्भ के वध हेतु नन्द यशोदा के प्रकट होकर विन्ध्याचल
में निवास करूंगी (२) फिर वैप्रचित्त दानवों का विनाश
करने के लिए भयंकर रूप में 'रक्त-दन्तिका' के नाम से
अवतरित होऊँगी (३) दुर्भिक्ष काल में मुनियों के स्तवन से
अयौनिजा अवतरित होकर उन्हें सौ नेत्रों से देखने के कारण
'शताक्षी' तथा प्राणियों को शाक खिलाकर प्राणों की रक्षा के
कारण 'शाकुम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी। उसी अवतार में
दुर्गम नामक महादैत्य का वध करने के कारण 'दुर्गा' नाम से
पूजी जाऊँगी (४) ऋषियों की रक्षा हेतु 'भीमा' देवी के नाम
से प्रकट होकर हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण
करूंगी। तब मुनिवृन्द नत मस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे (५)
तीनों लोकों को संतापित करने वाले 'अरुण' दैत्य का वध
करने तथा तीनों लोकों के कल्याण हेतु भ्रामरी के रूप में
अवतरित होऊंगी। उस समय सब लोग 'भ्रामरी' नाम से
मेरी स्तुति करेंगे।
इस प्रकार जब-जब जगत् में दानवी शक्ति बढ़ेगी तब-
तब उन शत्रुओं के विनाश तथा तुम्हारे कल्याण के लिये मैं
आती रहूँगी। माँ जगदम्बा ने अपने मुख से देवों को आश्वासन
दिया, अपने अवतारों का प्रयोजन तथा नामों का वर्णन किया।
यही उनकी करुणा है।
११६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
द्वादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ विद्युद्दाम समप्रभां मृगपतिस्कन्ध स्थितां भीषणाम् ।
कन्याभिः करवालखेट विलसद् हस्ताभिरासेविताम् ॥
हस्तैश्चक्र गदासिखेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम् ।
विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥
विद्युत् प्रभा के समान श्री अङ्गों से द्युतिमान, सिंह के
कंधों पर बैठने के कारण भयंकर प्रतीत होने वाली, हाथों में
ढाल और तलवार लिए हुए अनेक कन्याओं द्वारा सेवित, अपने
हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, धनुष, बाण, पाश और
तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए, मस्तक पर चन्द्रमुकुट शोभिता,
अग्निमय स्वरूपा, त्रिनेत्र धारिणी दुर्गा देवी को मैं शत-शत नमन
करता हूँ ।
बारहवें अध्याय में पराम्बा ने स्वयं अपने मुख से इस
ग्रंथ के पाठ, मंत्रों के जप की, यज्ञ की पूजा उपासना की
फल-श्रुति कही है । अतः साधकों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है ।
इस दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय और तीन चरित्र हैं
उनमें दैत्यों का विनाश माँ के शौर्य की अद्भुत लीलाओं का
गान है; जिसके द्वारा पराम्बा ने देवों की सुरक्षा और जगत्
का कल्याण किया है । इसका पाठ सिद्धिप्रद है । माँ ने स्वयं
देवों से इस प्रकार कहा-
एभिः स्तवैश्च माँ नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्यां सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ १२/२
देवताओं ! जो एकाग्र चित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों
द्वारा मेरी स्तुति करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर
कर दूँगी । अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी में 'दुर्गा सप्तशती' के पाठ
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२०
का विशेष महत्त्व है। (कृष्ण पक्ष में चन्द्रक्षीण होता है। इन
तिथियों में क्रमशः मन भी लीन होता है। अतः मन तन्मय
होने पर पाठ की स्वाभाविक महिमा होगी।) मेरे पाठ से पाप,
दरिद्रता, शत्रुभय, त्रिताप, सब विघ्न, भयंकर ग्रह पीड़ायें शान्त
हो जाती हैं। पीठों में मेरा नित्य निवास रहेगा। नव दुर्गा
पाठ के वर्ष में चार अवसर हैं आश्विन शुक्लपक्ष, माघ शुक्लपक्ष
चैत्र शुक्लपक्ष तथा आषाढ़ शुक्लपक्ष प्रतिपदा से नवमी तक
विशेष पूजन करना चाहिये। बाल-ग्रह-पीड़ा, दुःस्वप्न-निवृत्ति
तथा हर प्रकार के भय नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार विस्तार
से माहात्म्य बतलाकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गयीं। देवता भी
प्रसन्न होकर अपने-अपने कार्य में लग गये। शेष दैत्य लोग
पाताल लोक में चले गये।
मेधा ऋषि ने कहा-राजन् इस प्रकार समय-समय पर
देवी प्रकट होती हैं समृद्ध करती हैं। प्रलय में कालो, महामारी
में सनातनी देवी। वे ही अभ्युदय हेतु लक्ष्मी रूप में प्रकट
होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूप गन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ १२/४१
विधिवत् पूजन करने से धन, धान्य, पुत्रादि की प्राप्ति
होती ही है; सद्बुद्धि भी मिलतो है जिससे सत् धर्म करने में
प्रवृत्ति होती है।
१२१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
त्रयोदशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् ।
पाशाङ्कुश वराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे ॥
रवि-शिशु की प्रथम कोमल रश्मियों के समान कान्ति
युक्त, तीन नेत्र तथा चार भुजायें धारण किये हुए हैं; जो अपनी
भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश वर एवं अभय मुद्रा धारण किये
रहती हैं, मैं उन शिवा देवी का ध्यान करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि मेधा ने कहा—हे राजन् ! इस जगत्
को कारण करने वाली, ज्ञान उत्पन्न करने वाली, जिस देवी के
उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया है, भगवान् विष्णु की माया
स्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा दूसरे
विवेकी जन मोहित होते हैं हुए, हैं और होंगे । अतः तुम उन्हीं
परमेश्वरी की शरण में जाओ; उनकी आराधना करो क्योंकि
वे पराम्बा आराधना से प्रसन्न होकर भोग; स्वर्ग तथा मोक्ष
प्रदान करती हैं । महर्षि के वचन सुन तथा चरणों में प्रणाम
कर राजा तथा वैश्य दोनों ही ममता का परित्याग कर तपस्या
में लग गये । माँ भगवती के दर्शनों की महत्त्वाकांक्षा को लेकर
पावन नदी के तट पर मृतिका-मिट्टी की प्रतिभा बनाकर
पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से विधिवत पूजन करते तथा व्रत
उपवास करते हुए कठिन आराधना में लग गये थे ।
घोर तप से प्रसन्न हो माँ ने दर्शन दिए और वरदान
मांगने को कहा—राजा की वासना राज्य के प्रति बनी हुई थी
अतः उसने इस जन्म में राज्य मिले और अगले जन्म में भी
राजा बनूं यह वर मांगा । समाधि ने विरक्त एवं मुमुक्षु होने
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२२
के कारण मुक्ति का वर प्राप्त किया। अत राजा सुरथ को
राज्य तथा समाधि वैश्य को दिव्य ज्ञान मिला, जिससे वह मुक्त
हो गया। यही सुरथ अगले जन्म में राजा बन कर सावर्णि
मनु होंगे।
स्पष्ट है करुणामयी माँ भक्त की अभिलाषानुसार
भक्ति एवं मुक्ति दायिनी हैं।
१२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
उपसंहार
इस प्रकार इन तेरह अध्यायों के मनन करने से पाठकों
को पराम्बा के असली स्वरूप का बोध तो होगा ही, साथ ही
अपौरुषेय वेद प्रतिपाद्य जैसे अन्य भक्ति शास्त्र विद्वानों ने बताये
हैं वैसे ही दुर्गा-सप्तशती ग्रन्थ को स्थान देंगे । आइये, चिन्तकों
को कुछ प्रमाणों से अवगत करा दें—भक्ति वेद प्रति पाद्य है ।
शांडिल्य ने स्वयं कहा है—भक्ति प्रमेया श्रुतिभ्यः
पुराणेति हासाभ्यां च । १-२/६-१० । इसका अभिप्राय है कि
ईश्वर ने स्वयं अपनी वाणी रूप श्रुति से आज्ञा की है कि श्रुति
तथा इतिहास पुराणों से भक्ति का स्वरूप जानना चाहिए ।
इन सूत्रों की व्याख्या में नारायण तीर्थ ने ऋग्वेद के ऐसे अनेक
मंत्र उद्धृत किए हैं, जिनमें नाम स्मरण, श्रवण, कीर्तन,
भगवदर्पण, शरणागति, भगवत्प्रसाद, आत्म समर्पण आदि का
वर्णन है । न केवल साधन रूपा श्रवण कीर्तनादि लक्षणा भक्ति
का ही वर्णन है, अपितु वेदों में भावमयी रागात्मिका, रसमयौ
भक्ति का वर्णन है । ऋग्वेद के ६, १, ५ में परमेश्वर का एक
रक्षक एवं माता पिता के रूप में वर्णन मिलता है । ऋग्वेद के
८, ६८, ११ में अत्यन्त भक्ति भाव के साथ माता-पिता के रूप
में वर्णन किया गया है । वहाँ इन्द्र को पिता ही नहीं, पितृतम
एवं श्रेष्ठ सखा के रूप में निर्दिष्ट किया गया है । किसी-किसी
मन्त्र में ऐसे अनुराग का वर्णन है जैसे पत्नी अपने पतिदेव का
आलिङ्गन कर रही है-परिष्वजन्ते जनः यो यथा पतिम् (१०,
४३,१) । ऋग्वेद (१०, ४०, २) में तो परमेश्वर के प्रति
प्रेयसी-प्रियतम भाव की पराकाष्ठा ही कर दी गई है । ऐसा
लगता है मानो परकीया भाव से उपासना का वही बीज हो ।
भक्ति क्या है ?
सभी भक्ति-दर्शन तात्पर्यतः परमेश्वर के प्रति परमानुरक्ति