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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 156 में से

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पृष्ठ 128

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०४
की माला से विभूषित थी। मांस रहित अस्थि-पंजर, विशाल
मुख लपलपाती हुई जीभ, डरावनी लाल-लाल भोतर धँसी हुई
आँखें, भयंकर गर्जना करती, अनेक दैत्यों का वध करती,
कुछ को मुँह के द्वारा चबाती हुई, अस्त्र-शस्त्रों को चूर्णित
करती हुई, हाथी घोड़ों को मुँह में डालती सैन्य संहार करने
लगी। तब कुपित होकर दैत्य सेनापति चण्ड-मुण्ड विपरीत दिशाओं
से माँ पर टूट पड़े। दोनों के चक्रों से छुटे हुये बाणों को मुख
में लेकर काली देवी ने भयंकर गर्जना की और खड्ग-से 'हं' का
उच्चारण कर केश पकड़ कर पहले चण्ड का मस्तक काट लिया,
उसे मरा हुआ देख मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा । उसे भी रोष
में भर देवी ने धरती पर सुला दिया। तत्पश्चात् काली ने उन
दोनों के मस्तक हाथ में लेकर चण्डिका के पास जाकर प्रचण्ड
अट्टहास करते हुए कहा—देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड दोनों
महापशुओं को भेंट किया है अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और
निशुम्भ का वध स्वयं करना।
चडि कोपे, क्रोध अर्थ में प्रयुक्त होने वाली धातु से :चण्ड'
शब्द प्रतिपादित होता है इसी से चाण्डाल भी बनता है। 'मुडि'
खण्डने से मुण्ड बनता है; खण्डन करने में अश्रद्धा और द्वैत
भाव का होना अनिवार्य है। क्रोध भाव से चाण्डाल के आचरण
होते हैं। क्रोध आने का मूल कारण द्वैत भाव ही है और
द्वैत भाव का जनक अज्ञान ही है । इष्ट पर दृढ़ता करने
के कारण काकभुशुण्डी को लोमश ऋषि के शाप का भाजन
होना पड़ा, किन्तु क्षमा और सहिष्णुता गुणों के द्वारा ही पुनः
ऋषि के कृपा भाजन बन गये ।
उपर्युक्त दृष्टान्त चण्ड-मुण्ड के वध के व्यावहारिक प्रयोग
है। इस अध्याय में माँ काली के द्वारा जो चंड मुंड का वध किया
गया है। वे ये क्रोध रूप चंड और द्वैत बुद्धि रूप मुंड हैं
साधक को इनका बड़ा ध्यान रखना चाहिए । जो इन दोनों
का वध कर लेता है उसे जगत् में ख्याति मिलती है। **