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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

१०५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अष्टमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशांकुश बाण चापहस्ताम् ।
अणिमादिभिरावृत्तां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
मैं गौर वर्णाङ्गाभामयी, करुणा तरङ्गायित नयना, पाश,
अंकुश, बाण और धनुष हाथ में धारण करने वाली अणिमा
आदि सिद्धियों की किरणों से आवृत्ता भवानी का चिन्तन करता
हूँ।
महर्षि कहते हैं कि चण्ड-मुण्ड दैत्यों के मारे जाने तथा
उनकी सेना के संहार के संदेश से दैत्यराज शुम्भ बड़ा क्रोधित
एवं क्षुभित हुआ और उसने सम्पूर्ण दैत्य सेना को युद्ध के लिए
प्रस्थान करने की आज्ञा दी। उसकी सेना का संकेत-अपनी
सेनाओं सहित उदायुध नाम के छियासी सेनापति, कम्बु नाम
वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक सवाहिनी, कोटिवीर्य कुल के
पचास और धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति अपनी-अपनी सेना
के साथ तथा कालक, दौर्हद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध
के लिए प्रस्थित हुए। इस भयंकर विशाल वाहिनी को देख
चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार, शंख की ध्वनि तथा सिंह की
दहाड़ की ध्वनि से आकाश पृथ्वी को गुँजित कर दिया, घण्टे की
ध्वनि दिशाएँ ध्वनित करने लगी। काली ने उस भयानक ध्वनि
से अपना मुख बढ़ा लिया। इसी बीच असुरों के विनाश और
देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा
इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ-जो रूप, वेश भूषा, वाहन, बल,
पराक्रम और आयुधों में अपने-अपने देवताओं के समान थी,