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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 156 में से

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पृष्ठ 144

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२०
का विशेष महत्त्व है। (कृष्ण पक्ष में चन्द्रक्षीण होता है। इन
तिथियों में क्रमशः मन भी लीन होता है। अतः मन तन्मय
होने पर पाठ की स्वाभाविक महिमा होगी।) मेरे पाठ से पाप,
दरिद्रता, शत्रुभय, त्रिताप, सब विघ्न, भयंकर ग्रह पीड़ायें शान्त
हो जाती हैं। पीठों में मेरा नित्य निवास रहेगा। नव दुर्गा
पाठ के वर्ष में चार अवसर हैं आश्विन शुक्लपक्ष, माघ शुक्लपक्ष
चैत्र शुक्लपक्ष तथा आषाढ़ शुक्लपक्ष प्रतिपदा से नवमी तक
विशेष पूजन करना चाहिये। बाल-ग्रह-पीड़ा, दुःस्वप्न-निवृत्ति
तथा हर प्रकार के भय नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार विस्तार
से माहात्म्य बतलाकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गयीं। देवता भी
प्रसन्न होकर अपने-अपने कार्य में लग गये। शेष दैत्य लोग
पाताल लोक में चले गये।
मेधा ऋषि ने कहा-राजन् इस प्रकार समय-समय पर
देवी प्रकट होती हैं समृद्ध करती हैं। प्रलय में कालो, महामारी
में सनातनी देवी। वे ही अभ्युदय हेतु लक्ष्मी रूप में प्रकट
होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूप गन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ १२/४१
विधिवत् पूजन करने से धन, धान्य, पुत्रादि की प्राप्ति
होती ही है; सद्बुद्धि भी मिलतो है जिससे सत् धर्म करने में
प्रवृत्ति होती है।