दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११२
इसके पश्चात् देवता-दानवां के देखते देखते देवी और
शुम्भ दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । एक दूसरे ने अपने
रण कौशल से भयंकर दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से अपने
शत्रु के प्राण लेने चाहे । अन्त में माँ ने अपने त्रिशूल से शुम्भ का
हृदय छेद दिया और उसके प्राण-पखेरु उड़ गये । उस दुरात्मा
के मारे जाने से सम्पूर्ण जगत प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया
और आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा । नदियाँ भी ठीक मार्ग
से बहने लगीं ।
गुरु के द्वारा हृदय-ग्रन्थि के छेदन पर तात्विक ज्ञान
होता है, आसुरी वृत्तियों के नाश पर ही इन्द्रियों के देवता
प्रसन्न होते हैं सद्वृत्तियों से स्तुति की जाती है ।
इस अध्याय की कथा में समस्त दैत्यों की समाप्ति पर
देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवती की स्तुति की है, क्योंकि दैवी-
भाव तभी उदय होते हैं जब विकारों के दैत्य नष्ट हो जाते हैं-
इच्छा द्वेष समुत्थेन द्वन्द मोहेन भारत ।
सर्व भूतानि सम्मोहं सर्गेयान्ति परन्तप ॥ २६
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द मोह विमुक्ता भजन्ते माँ दृढ़व्रताः ॥ २८
जरा मरण मोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्मचाखिलम् ॥गी०अ०७/२७/२६
अर्थात् इच्छा द्वेष के कारण मोहित हुआ जीव बेचारा
‘जन्म-मरण (पुनरपिजननम् पुनरपि मरणम् पुनरपि जननी
जठरे शयनम्)’ रूपी संसार में पड़ा हुआ है । जिन पुण्य
बातों ने इन पर विजय प्राप्त की है वे ही भगवान् की सच्ची
भक्ति कर सकते हैं । मेरी भक्ति तथा मेरे लिए किया गया
पुरुषार्थ ही संसार को छुड़ा सकता है । वह भक्त ब्रह्म स्वरूप
हो जाता है । मेरी भक्ति अथवा मेरा भजन वही व्यक्ति कर
पाता है जो द्वन्द मोह से विमुक्त है वह ध्यान देने योग्य शब्द