दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११६
स्वच्छ कर देती है । उसे अपने वत्स के शरीर पर लगे हुए मल-
मूत्र के छुड़ाने में घृणा न होकर प्यार उमड़ता है, इसीलिए
'वत्सला' कहते हैं ।
एक बालक मल-मूत्रावेष्टित पड़ा है, उसकी आँखों और
नाक से भी मैल निकल रहा है, रोता हुआ दीन-हीन अवस्था में
पड़ा हुआ है । ऊपर की ओर हाथ उठाये हुये माँ-माँ पुकारता
है । उसके आर्त स्वर को सुनकर ऐसी कौन माँ है जो दौड़कर
उसे छाती से न लगा ले और अपनी करुणामयी दृष्टि तथा
कोमल स्पर्श से निहाल न कर दे । संसार का नियम है कि साफ,
स्वच्छ, हँसते-खेलते बालक को तो सभी लोग गले लगा लेते हैं,
किन्तु वैसे बालक की शरणागत माँ ही है । इसी प्रकार सर्व -
विध साधन सम्पन्न साधक को सभी अपना बना सकते हैं किन्तु
जो दीन-हीन साधन विहीन अनाथ है, उसे तो करुणामयी माँ ही
गले लगाती है । अपना असीम प्यार बरसाती है और स्वयं उसे
शुद्ध कर लेती है ।
दीनों-हीनों, पीड़ितों की रक्षिके माँ, तुम ही ब्रह्माणी हो,
रुद्राणी हो, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, नारसिंही, वाराही भी
तुम ही हो, अपने अनेक आभूषण और आयुध धारण करके तुम्हीं
प्रकट होती हो । तुम्हें बारम्बार नमस्कार है । वृत्रासुर पर इन्द्र
की शक्ति होकर उसकी संहारिणी रूपा तुम्हीं हो । हे चण्ड-मुण्ड
विनाशिनी देवी ! तुम्हीं लक्ष्मी लज्जा, श्रद्धा, पुष्टि, स्वाहा,
स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि, महा विद्या, महा अविद्या रूपा नारायणी
हो, तुम्हें नमस्कार है । मेधा, सरस्वतो ऐश्वर्यरूपा, वाग्मी,
पार्वती, तामसी, महाकाली, नियता, संयता, ईशा सबको
अधीश्वरी तुम ही हो । हे सर्वस्वरूपे ! शक्ति सम्पन्ने ! दिव्य
रूपे माँ दुर्गे तुम्हें नमस्कार है । हे कल्याणी ! हे भद्र कालो !
हे जगदम्बे, सर्व प्रकार अपने आयुधों से रक्षा करने वालो
तुम्हें नमस्कार है ।