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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
उपसंहार
इस प्रकार इन तेरह अध्यायों के मनन करने से पाठकों
को पराम्बा के असली स्वरूप का बोध तो होगा ही, साथ ही
अपौरुषेय वेद प्रतिपाद्य जैसे अन्य भक्ति शास्त्र विद्वानों ने बताये
हैं वैसे ही दुर्गा-सप्तशती ग्रन्थ को स्थान देंगे । आइये, चिन्तकों
को कुछ प्रमाणों से अवगत करा दें—भक्ति वेद प्रति पाद्य है ।
शांडिल्य ने स्वयं कहा है—भक्ति प्रमेया श्रुतिभ्यः
पुराणेति हासाभ्यां च । १-२/६-१० । इसका अभिप्राय है कि
ईश्वर ने स्वयं अपनी वाणी रूप श्रुति से आज्ञा की है कि श्रुति
तथा इतिहास पुराणों से भक्ति का स्वरूप जानना चाहिए ।
इन सूत्रों की व्याख्या में नारायण तीर्थ ने ऋग्वेद के ऐसे अनेक
मंत्र उद्धृत किए हैं, जिनमें नाम स्मरण, श्रवण, कीर्तन,
भगवदर्पण, शरणागति, भगवत्प्रसाद, आत्म समर्पण आदि का
वर्णन है । न केवल साधन रूपा श्रवण कीर्तनादि लक्षणा भक्ति
का ही वर्णन है, अपितु वेदों में भावमयी रागात्मिका, रसमयौ
भक्ति का वर्णन है । ऋग्वेद के ६, १, ५ में परमेश्वर का एक
रक्षक एवं माता पिता के रूप में वर्णन मिलता है । ऋग्वेद के
८, ६८, ११ में अत्यन्त भक्ति भाव के साथ माता-पिता के रूप
में वर्णन किया गया है । वहाँ इन्द्र को पिता ही नहीं, पितृतम
एवं श्रेष्ठ सखा के रूप में निर्दिष्ट किया गया है । किसी-किसी
मन्त्र में ऐसे अनुराग का वर्णन है जैसे पत्नी अपने पतिदेव का
आलिङ्गन कर रही है-परिष्वजन्ते जनः यो यथा पतिम् (१०,
४३,१) । ऋग्वेद (१०, ४०, २) में तो परमेश्वर के प्रति
प्रेयसी-प्रियतम भाव की पराकाष्ठा ही कर दी गई है । ऐसा
लगता है मानो परकीया भाव से उपासना का वही बीज हो ।
भक्ति क्या है ?
सभी भक्ति-दर्शन तात्पर्यतः परमेश्वर के प्रति परमानुरक्ति