दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११४
करता हैं। जो लोग दूसरों की कमाई खाते हैं और भोगी हैं
वे परा शक्ति स्नेह मूर्ति माँ को कैसे प्राप्त कर सकते हैं । श्रुति
भी कहती है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” यह आत्मा कमजोर
दिल-दिमाग वालों की पहचान में नहीं आ सकता, क्योंकि
विपर्यय ज्ञान-जो ध्रूमलोचन नाम से है, का मिटाना शूरवीरों
का काम है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू-आत्मज्ञान रहित होता
है। धन दुर्मदान्ध होता है अतः उसे ज्ञान विज्ञान रूपी दिन में
विवेक दिखाई नहीं देता ।
इन तीनों चरित्र के मनन से यह स्पष्ट हो जाता है कि
हमारे लक्ष्य में बाधक राग-द्वेष (मधु-कैटभ) अस्मिता अहंकार
(महिषासुर), विषयासक्ति तथा कामादिक विकारों (रक्त बीज,
शुम्भादि) के नष्ट होने पर ही दैवी गुणों का विकास होता है ।