दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
द्वादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ विद्युद्दाम समप्रभां मृगपतिस्कन्ध स्थितां भीषणाम् ।
कन्याभिः करवालखेट विलसद् हस्ताभिरासेविताम् ॥
हस्तैश्चक्र गदासिखेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम् ।
विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥
विद्युत् प्रभा के समान श्री अङ्गों से द्युतिमान, सिंह के
कंधों पर बैठने के कारण भयंकर प्रतीत होने वाली, हाथों में
ढाल और तलवार लिए हुए अनेक कन्याओं द्वारा सेवित, अपने
हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, धनुष, बाण, पाश और
तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए, मस्तक पर चन्द्रमुकुट शोभिता,
अग्निमय स्वरूपा, त्रिनेत्र धारिणी दुर्गा देवी को मैं शत-शत नमन
करता हूँ ।
बारहवें अध्याय में पराम्बा ने स्वयं अपने मुख से इस
ग्रंथ के पाठ, मंत्रों के जप की, यज्ञ की पूजा उपासना की
फल-श्रुति कही है । अतः साधकों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है ।
इस दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय और तीन चरित्र हैं
उनमें दैत्यों का विनाश माँ के शौर्य की अद्भुत लीलाओं का
गान है; जिसके द्वारा पराम्बा ने देवों की सुरक्षा और जगत्
का कल्याण किया है । इसका पाठ सिद्धिप्रद है । माँ ने स्वयं
देवों से इस प्रकार कहा-
एभिः स्तवैश्च माँ नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्यां सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ १२/२
देवताओं ! जो एकाग्र चित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों
द्वारा मेरी स्तुति करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर
कर दूँगी । अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी में 'दुर्गा सप्तशती' के पाठ