दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वासनाओं के लिए है । इनके मारने का उपाय यही है कि रक्त
बीज के रक्त की बूंद पृथ्वी पर न गिर सके, यह कार्य महाकाली
को सौप दिया, जिसने उसे सम्पन्न किया । विषयासक्ति रक्त-
बोज के मरने पर ही शान्ति को प्राप्त होती है ।
श्री अम्बे जी की आरती
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली.
तेरे ही गण गायें भारती ।
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती ॥ १
तेरे (जगत के) भक्तजनों पर भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पड़ो करके सिंह सवारी,
सौ-२ सिंहों सी बलशाली, अष्टादस भुजाओं वाली,
दुष्टों को तो तू ही संहारती ॥ २ ओ मैया हम सब
माँ बेटे का इस जग में, बढ़ा ही निर्मल नाता ।
पूत कुपुत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता ।
सब पर अमृत बरसाने वाली, सबको हर्षाने वाली-
मैया भँवर उतारती-ओ मैया सम सब उतारें-
नहीं मांगते धन और दौलत, ना मांगे चांदी ना सोना,
हम तो मांगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना,
सब पर करुणा दर्शाने वाली, विपदा मिटाने वाली
सतियों के सत को संवारती ॥ ओ मैया सब
चौदस के दिन तेरे भवन में, भीड़ लगी है भारी ।
जो कोई माँगे सोई फल पावे, कोई न जाये खाली ।
सब की झोली भरने वाली, मांगी मुरादों वाली ।
ओ मैया हम सब उतारें तेरो आरती ॥
खनन-खनन घण्टा बाजे, घण्टों की झन्कार ।
तेरे भवन में मैया तेरी हो रहा जय-जय कार ॥
द्वार खड़े माँ तुझे पुकारें, एक बार तो आजा ।
भक्त खड़े, माँ तुझे पुकारें आकर दर्श दिखाजा ॥
अम्बे तू है जगदम्बे कालो, जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैय्या हम सब उतारें०