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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

१११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दशमोऽध्याय
ध्यानम्
ॐ उतप्त हेम रुचिरां रवि चन्द्र वह्नि-
नेत्रां धनुश्शर युताङ्कुश पाश शूलम् ।
रम्यैर्भुजैश्चदधतीं शिव शक्ति रूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
मैं तपाये हुए स्वर्ण के समान सुन्दर, सूर्य, चन्द्र और
अग्नि तीनों नेत्र वाली; अपनी सुन्दर भुजाओं में धनुष, वाण
अंकुश, पाश और शूल धारण किए तथा मस्तक पर अर्द्धचन्द्र
धारण किए हुए शिव शक्ति-शक्ति स्वरूपा कामेश्वरी का हृदय
में चिन्तन करता हूँ ।
खोट निकालने के लिए सोने को अग्नि में तपाया जाता
है, अतः देहाभिमान को गलाने के लिए साधना की अग्नि में
रहना चाहिए । रवि - चन्द्र वह्नि, क्रमशः प्रकाश,
आह्लादक एवं दाहक एवं पाचक है, प्रकाश के तीन ही आधार
है, घिना प्रकाश के अन्धकार विलीन हो नहीं सकता, सबकी
प्रकाशिका एक मात्र सच्चिदानन्दमयी माँ ही हैं, वे ही भक्त
पर रीझकर समस्त कामनायें-पूर्ण करती हैं अतः कामेश्वरी हैं
उन्हीं का ध्यान करना अपेक्षणीय है ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-राजन् ! अपने प्राणों के
समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सेना का
संहार जान संहार जान शुम्भ कुपित होकर बोला-“दुष्ट दुर्गे !
तू बल के अभिमान में बड़ी मानिनी बनी हुई है ।” किन्तु दूसरी
स्त्रियों का बल लेकर लड़ती है । माँ ने कहा-‘अरे धूर्त' मैं अकेली
ही हूँ, मेरे सिवा संसार में दूसरा कौन है, ये सब मेरी विभूतियाँ
हैं, मुझमें प्रवेश कर रहीं हैं ऐसा कहते ही केवल अम्बिका देवी
ही अवशेष रहीं ।