दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एकादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयन त्रय युक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशामीति करां प्रभजे भुवनेशीम् ॥
प्रातः कालीन सूर्य कान्ति के समान देदीप्यमान, चन्द्र -
मुकुट धारिणी, उच्च स्तनों से युक्त, तीनों नेत्र-सूर्य, चन्द्र, अग्नि
धारिणी, मन्द-मन्द मुसकान मुख छटा प्रसारिणी तथा हाथों में
अंकुश, पाश, अभय और वरद मुद्रा धारिणी माँ भुवनेश्वरी को
मैं नमन करता हूँ ।
महामुनि मेधा ऋषि कहते हैं कि असुरों के समापन होने
पर प्रसन्नचित्त होकर देवताओं ने स्तुति की-हे विश्वेश्वरी !
शरणागत संकट निवारिणी, भक्त जन कल्याणिनी माँ जगदम्बे
प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा करो, तुम ही इस संसार की आधार
हो, क्योंकि तुम ही पृथ्वी रूपा हो, तुम ही जल रूप होकर जगत
को तृप्त करती हो । तुम ही अनन्त बलशालिनी, वैष्णवी शक्ति
तथा जगत की कारण रूपा माया हो, तुमसे ही यह जगत मोहित
है । तुम्हीं मुक्ति दायिनी हो ।
हे माँ ! सम्पूर्ण विद्यायें तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं ।
जगत की सम्पूर्ण स्त्रियाँ तुम्हारी मूर्तियाँ हैं । तुमने ही विश्व को
व्याप्त किया है । तुम्हीं परा वाणी होने के कारण अवर्णनीया
हो ।
सर्व स्वरूपा देवि, बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में
विराजमान रहने वाली, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायिनी, कला-काष्ठादि
के रूप में उत्पत्ति, स्थिति एवं संहारकारिणी, मंगलमयी, मंगल
दायिनी, सर्व सिद्धि प्रदात्री, शरणागत वत्सला नारायणी आपको
नमस्कार है । यहाँ ‘वत्सला’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । जैसे सद्यप्रसूता
धेनु (गाय) अपने बछड़े को अपनी जीभ से चाटकर शुद्ध और