दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
त्रयोदशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् ।
पाशाङ्कुश वराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे ॥
रवि-शिशु की प्रथम कोमल रश्मियों के समान कान्ति
युक्त, तीन नेत्र तथा चार भुजायें धारण किये हुए हैं; जो अपनी
भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश वर एवं अभय मुद्रा धारण किये
रहती हैं, मैं उन शिवा देवी का ध्यान करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि मेधा ने कहा—हे राजन् ! इस जगत्
को कारण करने वाली, ज्ञान उत्पन्न करने वाली, जिस देवी के
उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया है, भगवान् विष्णु की माया
स्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा दूसरे
विवेकी जन मोहित होते हैं हुए, हैं और होंगे । अतः तुम उन्हीं
परमेश्वरी की शरण में जाओ; उनकी आराधना करो क्योंकि
वे पराम्बा आराधना से प्रसन्न होकर भोग; स्वर्ग तथा मोक्ष
प्रदान करती हैं । महर्षि के वचन सुन तथा चरणों में प्रणाम
कर राजा तथा वैश्य दोनों ही ममता का परित्याग कर तपस्या
में लग गये । माँ भगवती के दर्शनों की महत्त्वाकांक्षा को लेकर
पावन नदी के तट पर मृतिका-मिट्टी की प्रतिभा बनाकर
पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से विधिवत पूजन करते तथा व्रत
उपवास करते हुए कठिन आराधना में लग गये थे ।
घोर तप से प्रसन्न हो माँ ने दर्शन दिए और वरदान
मांगने को कहा—राजा की वासना राज्य के प्रति बनी हुई थी
अतः उसने इस जन्म में राज्य मिले और अगले जन्म में भी
राजा बनूं यह वर मांगा । समाधि ने विरक्त एवं मुमुक्षु होने